मंगलवार, 6 अगस्त 2019

👉 स्वर्णिम ऊषा का उदय

अगले क्षणों जिस स्वर्णिम ऊषा का उदय होने वाला है, उसके स्वागत की तैयारी में हमें जुट जाना चाहिये। अपना ज्ञान-यज्ञ इसी प्रकार का शुभारम्भ मंगलाचरण है। असुरता की पददलित और मानता की पुण्य प्रतिष्ठापना का अपना व्रत संकल्प ईश्वरीय प्रेरणा का प्रतीक है। उसकी व्यापकता एवं सफलता सुनिश्चित है। प्रश्न केवल इतना भर है कि जिन आत्माओं में उसके लिए आवश्यक प्रकाश आगे बढ़कर अपने शौर्य प्रक्रियाएँ अपने ढंग से सम्पन्न होना है, वे परिपूर्ण होकर रहेंगी। किसी व्यक्ति के साहस या कार्यपन्न की प्रतीक्षा किये बिना गति अपने पथ पर अग्रसर होती रहेगी, उठा हुआ तूफान अपने वेग से बढ़ता रहेगा। प्रश्न इतना भर है कि जिन्हें कुछ महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करनी थी, वे समय रहते सजग हुए या अवसाद की मूर्छा में पड़े हुए, अपने को कलंक एवं पश्चाताप का भागी बनाने का दुर्भाग्य पूर्ण खेल खेलते रहें।

हम भाग्यशाली हैं, जो सस्ते में निपट रहे हैं। असली काम और बढ़े-चढ़े त्याग बलिदान अगले लोगों को करने पड़ेंगे। अपने जिम्मे ज्ञान-यज्ञ का समिधाधान और आज्याहुति होम मात्र प्रथम चरण आया है। आकाश छूने वाली लपटों में आहुतियाँ अगले लोग देंगे। हम प्रचार और प्रसार की नगण्य जैसी प्रक्रियाएँ पूरी करके सस्ते में छूट रहे हैं। रचनात्मक और संघर्षात्मक अभियानों का बोझ तो अगले लोगों पर पड़ेगा। कोई प्रबुद्ध व्यक्ति नव-निर्माण के इस महाभारत में भागीदार बने बिना बच नहीं सकता। इस स्तर के लोग कृपणता बरतें तो उन्हें बहुत महंगी पड़ेगी। लड़ाई के मैदान से भाग खड़े होने वाले भगोड़े सैनिकों की जो दुर्दशा होती है, अपनी भी उससे कम न होगी। चिरकाल बाद युग परिवर्तन की पुनरावृत्ति हो रही है। रिजर्व फोर्स के सैनिक मुद्दतों से मौज-मजा करते रहें, कठिन प्रसंग साथ ने आया तो कतराने लगे, यह अनुचित है। परिजन एकान्त में बैठकर अपनी वस्तुस्थिति पर विचार करें, वे अन्न कीट और भोग कीटों की पंक्ति में बैठने के लिए नहीं जन्मे हैं। उनके पास जो आध्यात्मिक सम्पदा है, वह निष्प्रयोजन नहीं है। अब उसे अभीष्ट विनियोग में प्रयुक्त किये जाने का समय आ गया, सो उसके लिये अग्रसर होना ही चाहिये।

हमारा आज का ज्ञान-यज्ञ छोटा-सा है। उसका उत्तर दायित्व भी नगण्य सा हम लोगों के कन्धों पर आया है। युग-निर्माण की विशालकाय प्रक्रिया में यह बीजारोपण मात्र है। इसका श्रेय, सुअवसर हमें मिला हो तो उसे करने के लिए उत्साह के साथ आगे आना चाहिये। प्रस्तुत छोटे से क्रिया-कलाप को-ज्ञान-यज्ञ के प्रस्तुत कार्यक्रम को गतिशील बनाने के लिए हमें बिना कुषण्ता दिखाये अपने उत्तरदायित्व निबाहने के लिये निष्ठा और उल्लासपूर्वक अग्रसर होना चाहिये। अपना ज्ञान-यज्ञ अधूरा न रहना चाहिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ ६७



http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/September/v1.67

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