सोमवार, 12 अगस्त 2019

👉 चरित्र-रक्षा के लिये बलिदान

राजनर्तकी मुदाल के सौंदर्य की ख्याति पूर्णमासी के चन्द्रमा की तरह सारे उरु प्रदेश में फैली हुई थी। उसे पाने के लिए राजधानी के बड़े-बड़े सामंतों, विद्वानों, प्रचारकों तथा राज घराने तक के लोगों में कुचक्र चल रहा था। ठीक उसी समय मुदाल अपने बिस्तर पर लेटी अपने और राष्ट्र के भविष्य पर विचार कर रही थी।

देश के कर्णधार मार्गदर्शक और प्रभावशाली लोग ही चरित्र भ्रष्ट हो गये तो फिर सामान्य प्रजा का क्या होगा ? अभी वह इस चिन्ता में डूबी थी कि किसी ने द्वार पर दस्तक दी- मुदाल ने दरवाजा खोला तो सामने खड़े महाराज करुष को देखते ही स्तम्भित रह गई। इस समय आने का कारण महाराज! न चाहते हुए भी मुदाल को प्रश्न करना पड़ा।

बड़ा विद्रूप उत्तर मिला- मुदाल! तुम्हारे रूप और सौंदर्य पर सारा उरु प्रदेश मुग्ध है। त्यागी, तपस्वी तुम्हारे लिए सर्वस्व न्यौछावर कर सकते हैं, फिर मेरे ही यहाँ आने का कारण क्यों पूछती हो भद्रे!

महाराज! सामान्य प्रजा की बात आप छोड़िये। आप इस देश के कर्णधार है, प्रजा मार्ग भ्रष्ट हो जाये तो उसे सुधारा भी जा सकता है पर यदि समाज के शीर्षस्थ लोग ही चरित्र भ्रष्ट हो जाये तो वह देश खोखला हो जाता है, ऐसे देश, ऐसी जातियाँ अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पाती महाराज! इसीलिये आपका इस समय यहाँ आना, अशोभनीय ही नहीं, सामाजिक अपराध भी है।

किसी ने सच कहा है अधिकार और अहंकार मनुष्य के दो प्रबल शत्रु है। वह जिस अन्तः करण में प्रवेश कर जाते हैं उसमें उचित और अनुचित के विचार की शक्ति भी नहीं रह पाती। मुदाल के यह सीधे-साधे शब्द करुष को बाण की तरह चुभे। वे तड़प कर बोले- मुदाल हम तुम्हारा उपदेश सुनने नहीं आये, तुम एक नर्तकी हो और शरीर का सौदा तुम्हारा धर्म है। कीमत माँग सकती हो, धर्म क्या है, अधर्म क्या है ? यह सोचना तुम्हारा काम नहीं है।

नर्तकी भर होते तब तो आपका कथन सत्य था महाराज! मुदाल की गंभीरता अब दृढ़ता और वीरोचित स्वाभिमान में बदल रही थी - किन्तु हम मनुष्य भी है और मनुष्य होने के नाते समाज के हित, अहित की बात सोचना भी हमारा धर्म है। हम सत्ता को दलित करके अपने देशवासियों को मार्ग-भ्रष्ट करने का पाप अपने सिर कदापि नहीं ले सकते।

स्थिति बिगड़ते देखकर महाराज करुष ने बात का रुख बदल दिया। पर वे अब भी इस बात को तैयार नहीं थे कि साधारण नर्तकी उनकी वासना का दमन कर जाये और मुदाल का कहना था कि विचारशील और सत्तारूढ़ का पाप सारे समाज को पापी बना देता है। इसलिये चरित्र को वैभव के सामने झुकाया नहीं जा सकता। मुदाल ने बहुत समझाया पर महाराज का रौद्र कम न हुआ। स्थिति अनियंत्रित होते देखकर मुदाल ने कहा- महाराज यदि आप साधिकार चेष्टा करना ही चाहते हैं तो तीन दिन और रुके, मैं रजोदर्शन की स्थिति में हूँ आज से चौथे दिन आप मुझे “चैत्य सरोवर” के समीप मिलें, आपको यह शरीर वही समर्पित होगा।

तीन दिन करुष ने किस तरह बिताये यह वही जानते होगे। चौथे दिन चन्द्रमा के शीतल प्रकाश में अगणित उपहारों के साथ महाराज करुष जब चैत्य विहार पहुँचे तो वहाँ जाकर उन्होंने जो कुछ देखा उससे उनकी तृष्णा और कामुकता स्तब्ध रह गई। मुदाल का शरीर तो वहां उपस्थित था पर उसमें जीवन नहीं था। एक पत्र पास ही पड़ा हुआ था - सौंदर्य राष्ट्र के चरित्र से बढ़कर नहीं चरित्र की रक्षा के लिये यदि सौंदर्य का बलिदान किया जा सकता है तो उसके लिए मैं सहर्ष प्रस्तुत हूँ शव देखने से लगता था मुदाल ने विषपान कर लिया है।

मुदाल के बलिदान ने करुष की आंखें खोल दी। उस दिन से वे आत्म-सौंदर्य की साधना में लग गये।

📖 अखण्ड ज्योति 1971 फरवरी पृष्ठ 44

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.44

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