शनिवार, 10 अगस्त 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 Aug 2019

■  हम आज जहाँ हैं वही से आगे बढ़ने का प्रयत्न करें। पूर्णता की ओर चलने की यात्रा आरम्भ करें। दोषों को ढूँढें और उन्हें सुधारे। गुणों का महत्व समझें और उन्हें अपनाएँ। इस प्रकार आन्तरिक पवित्रता में जितनी कुछ अभिवृद्धि हो सकेगी उतने का भी दूसरों पर अच्छा प्रभाव पडे़गा। सन्मार्ग की दिशा में चलने के लिए उठाया हुए प्रत्येक कदम अपने लिए ही नहीं, समस्त संसार के लिए श्रेयस्कर होता है।

◇ ओ,  मानवधारी परमात्मा के अमरपुत्र। अपने पिता की सम्पत्ति को सम्भालो। यह सब तुम्हारे पिता की है, इसलिये तुम्हारी है। सबको अपना समझो और अपनी वस्तु की तरह विश्व की समस्त वस्तुओं को अपनी प्रेम की छाया में रखों। सबकों आत्मभाव और आत्मदृष्टि से देखो। 

★ आग बुझाने के लिए पानी डालना पड़ता है। अन्धकार होते ही दिया जलाना पड़ता है। ये बातें किसे नहीं मालूम है? और यदि ये बातें समझ में आती हैं तो सन्तों को यह बात क्यों नहीं समझाना चाहिए कि क्रोध को प्रेम से, बुराई को भलाई से, कृपणता को उदारता से और असत्य को सत्य से जीतना चाहिए। ये बातें भी व्यवहार की हैं।

◇ यदि आप यह जानना चाहें कि आप उन्नति कर रहे या नहीं, तो इसके लिए अधिक आत्म विवेचन करने की आवश्यकता नहीं है। इस बात को आप केवल यह देखकर समझ सकते है कि आपकी रुचि उत्तरोत्तर परिमार्जित हो रही है या नहीं। यदि आपकी रुचि सुसंस्कृत और निर्मल हो रही है तो आश्वास होकर अपने से कह सकते है कि मैं उन्नति कर रहा हूँ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...