मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

👉 गुरुगीता (भाग 53)

👉 भावनाओं का हो सद्गुरु की पराचेतना में विसर्जन

🔶 इस भाव सत्य से जुड़ा एक बहुत ही प्रेरक प्रसंग है। यह प्रसंग श्री श्रीरामकृष्ण परमहंस देव के गृही शिष्य श्री रामचन्द्र दत्त के जीवन का है। श्री दत्त महाशय की भक्ति अपने गुरु के प्रति बढ़ी-चढ़ी थी; परन्तु इसी के साथ उनमें सांसारिक बुद्धि की भी छाया थी। उनमें अपनी विद्या-बुद्धि एवं धन-पैसे का अहंकार भी था। उनके संदर्भ में एक बात और उल्लेखनीय है कि श्री परमहंस देव के संन्यासी शिष्य स्वामी अद्भुतानन्द पहले इन्हीं के यहाँ नौकरी करते थे। इन अद्भुतानन्द को श्री रामकृष्ण के भक्त समुदाय में लाटू महाराज के नाम से जाना जाता है। दत्त महाशय ने ही उन्हें ठाकुर से मिलवाया था। बाद में उनकी भक्ति भावना को देखकर उन्हें ठाकुर की सेवा में अर्पित कर दिया।
  
🔷 यही दत्त महाशय एक दिन श्री श्री ठाकुर के पास दक्षिणेश्वर आये हुए थे। स्वाभाविक रूप से वे अपने साथ अपने गुरुदेव के लिए कुछ फल-मिठाइयाँ एवं कुछ अन्य सामान लाये हुए थे। ठाकुर ने स्वभावतः यह सामान युवा भक्त मण्डली में बाँट दिया। उन्हें इस तरह सामान बाँटते देखकर दत्त महाशय थोड़ा कुण्ठित हो गये। उन्हें लगा कि इतना कीमती सामान और इन्होंने इन लड़कों में बाँट दिया। अच्छा होता कि ये इस सबको अपने लिए रख लेते और बहुत दिनों तक इसका उपयोग करते रहते। उनकी ये सांसारिक भावनाएँ ठाकुर से छिपी नहीं रहीं। जिस समय वे यह सब सोच रहे थे, उस समय शाम का समय था और वे परमहंस देव के पास बैठे उनके पाँव दबा रहे थे।
  
🔶 इन भावनाओं के उनके मन में उठते ही श्री श्रीरामकृष्ण देव ने अपने पाँव से उनके हाथ झटक दिये और बाँटने से बचा हुआ उनका सामान उनके पास फेंकते हुए बोले-तू अब जा यहाँ से। मैं तुझे अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता। रही बात उस सामान की, जो तू अब तक यहाँ लाया करता था, वह भी और उससे ज्यादा तुझे मिल जायेगा। मैं माँ से प्रार्थना करूँगा कि वह सब कुछ बल्कि उससे बहुत ज्यादा तुझे लौटा दे। अचानक ठाकुर में आये इस भाव परिवर्तन से दत्त महाशय तो हतप्रभ रह गये; पर साथ ही वे यह भी समझ गये कि अन्तर्यामी ठाकुर ने उनके मन में उठ रही सभी भावनाओं को जान लिया है।
  
🔷 पर अब किया भी क्या जा सकता था? शाम गहरी हो गयी थी। वापस कलकत्ता भी नहीं लौट सकते थे। वैसे भी ऐसे मनःस्थिति में वह कलकत्ता लौटना भी नहीं चाहते थे। बस भरे हुए मन से सोचा ठाकुर के द्वारा तिरस्कृत जीवन अब किस काम का? और उनके अन्दर उमड़ आयी भक्ति भावना ने यह प्रेरणा दी कि क्यों न माँ के मन्दिर के पास बैठकर ठाकुर के नाम का जप किया जाय। बस ‘ॐ नमो भगवते रामकृष्णाय’ उनके कण्ठ से, प्राणों से और हृदय से बहने लगा। उनकी भावनाएँ अपने दिव्य गुरु में विलीन होने लगी। रात गहरी होती गयी और वह अपने सद्गुरु की पराचेतना में विलीन होते गये। भाव विलीनता इतनी प्रगाढ़ हुई कि शिष्यवत्सल श्री परमहंस देव स्वयं उनके पास आ गये और बोले-चल तेरा परिमार्जन हो गया। श्री ठाकुर के चरणों को अपने आँसुओं से धोते दत्त महाशय अनुभव कर रहे थे कि सद्गुरु की पराचेतना ही चिंतनीय-मननीय है। इस सत्य को हम भी अनुभव कर सकते हैं।                                 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 87

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

👉 मंगलसूत्र

🔷 वह आज सुबह से सड़कों पर यहाँ वहाँ भटक रहा है।पर कोई काम नहीं मिला। शायद उसकी ऐसी हालत देखकर कोई उसे किसी कार्य के लायक ही नहीं समझ रहा। तभी तो सभी उसे भिखारी समझ कर दुत्कार रहे हैं। दोपहर होने को आयी। जुबान सूख रही है।होठों पर पपड़ी सी जम गयी है।उसे ना ही खाने की जरूरत है और ना ही पानी की तलब। पिछले हफ्ते से उसने खाया ही कहाँ है भरपेट। जरूरत ही महसूस नहीं हुई। पर वह उस चीज को कहाँ से हासिल करे जिसकी तलब उसके दिमाग पर हावी होती जा रही है। राघव भी जाने कहाँ मर गया आज। सुबह से दो बार चौराहे पर ढाबे के आस पास सब कहीं छान चुका है। कहीं नहीं दिखा।

🔶 रोज तो वहीं खड़ा मिलता है। कहीं वह उससे खेल तो नहीं रहा? राघव अच्छी तरह जानता है कि वह नशे के बगैर नहीं जी सकता। फिर वह क्या करे? जेब में कौड़ी भी नहीं है। हाथ पैर जोड़कर दो चार खुराक उधारी पर ले लेता। कहीं भाग थोड़े ही जायेगा वह? हमेशा तो पैसे तुरंत चुकाता है। आज नहीं तो क्या हुआ?विश्वास भी कोई चीज है आखिर।

🔷 अपनी ही सोच पर हँस पड़ा वह। विश्वास और वह? इकलौता होने के कारण कितनी उम्मीदें थीं उस से माँ बापू को।पर उसने परवाह की कभी क्या? घर के बर्तन,रूपये पैसे जेवर जब गायब होने लगे तब सबको समझ आया कि लड़का हाथ से निकल चुका है। समझाना बुझाना कुछ काम नहीं आया। आखिरकार माँ ने आखिरी पत्ता फेंका। शायद ब्याह के बाद मोहमाया में पड़कर बुरी सोहबत से छूट जाये।

🔶 जब सोना उसकी दुल्हन बनकर आयी तो सचमुच वह उसका रूप देखकर अपनी सुधबुध ही खो बैठा था। कुछ दिन तक तो सब ठीक चला। माँ बाबू जी भी बेहद खुश कि चलो बुढ़ापा खराब होने से बच गया। पर वही कुपथ पर ले जाने वाले कुमित्र फिर आसपास मंडराने लगे। सोना का सोने जैसा रूप भी उसे न रोक सका।

🔷 उसने भले ही माँ बाबू जी को कभी सुख ना दिया पर सोना के प्रेम,सम्मान व सेवाभाव से वो निहाल थे। प्रारम्भ में तो वह संकोच करता रहा फिर धीरे धीरे ब्याह में मिले नेग निछावर व उपहारों पर नजर गड़ाने लगा। सोना भी कूछ ना कह पाती। कमरे में से कीमती सामान गायब होने लगे पर माँ बाबू जी को कुछ न पता चलता।

🔶 खुद तो पीता पिलाता। दोस्तों को भी खुश करता। धीरे धीरे साल गुजर गया। सोना का रूप पीला पड़ने लगा। मायके जाती तो किसी के बहुत पूछने पर भी कुछ ना बताती। पर अंदर ही अंदर चिंता का घुन लग चुका था उसे। जाने क्या होगा उसके भविष्य का? पेट में पल रही नन्ही सी जान भी क्या इसी माहौल में साँस लेगी? क्या क्या सपने देखे थे उसने,पर कच्चे रेत से सब ढह गये। माँ बाबू जी को जब उसके पेट से होने का पता चला तो उनकी खुशी का ठिकाना ना रहा।

🔷 उम्मीदों के नये पुल बनने लगे। पर अभी दुःखों का अंत कहाँ था। दर्द की पराकाष्ठा नहीं देखी थी उन्होंने। उधर ज्यों ज्यों पेट में पल रहा जीव बढ़ रहा था त्यों त्यों सोना के तन से गहनों का बोझ कम होता जा रहा था। अब तो माँ भी सब समझने लगी थी। विरोध करने पर वह घर से चले जाने की धमकी देकर सबकी बोलती बंद कर देता।

🔶 उफ्फ ......यह दिन भी देखना था। आज तो हद ही हो गयी। रात सोना को आपने गले पर स्पर्श का अहसास हुआ तो वह चिंहुक कर ऊठ गयी। मंगल सूत्र की डोरी पर पति का हाथ देखकर काँप गयी। वही मंगलसूत्र जिसे माँ ने पहली रात में कोठरी में जाने से पहले पकड़ाया था मुँह दिखाई के लिये। मोर के बड़े से ठप्पे वाला मंगलसूत्र। सुहाग की आखिरी निशानी बस यही तो बचा था उसके पास। सोना ने हाथ पकड़ लिया था। जाने कहाँ से हिम्मत आ गयी थी उसे। चिरौरी भरे स्वर में बोल गयी थी"अब इसे तो छोड़ दीजिये। कितना गिरेंगे आप?"

🔷 ग्लानि तो नहीं हुई पर शायद मन में भय कर गया कि सोना कहीं यह बात बता न दे माँ बाबू जी को। सो तड़के ही घर से निकल गया। पूरे दिन घर जाने की हिम्मत ना जुटा पाया। उधर सोना दिन भर आँसू बहाती रही। डाॅक्टर दीदी ने इसी महीने की तारीख दी थी। अब वह क्या करे? आज तो उसे सारी दुनिया ही बेगानी लग रही थी। पति के इस रूप की उसने कल्पना भी नहीं की थी। जब नन्हा घर में आ जायेगा तो वह मोहमाया में पड़ जायेगी। तब क्या होगा?नहीं ऐसा नहीं होने देगी वह। इस माहौल में वह अपने बच्चे को नहीं जीने देगी। उसे कुछ करना होगा.....जल्दी ही.....बच्चे के आने से पहले ही।

🔶 और वहाँ चंदन? वह सड़क किनारे ही पड़ गया था।नींद क्या आती? रात भर सोचता रहा सुबह राघव के पाँव पकड़कर खुराक माँगेगा। फिर मेहनत मंजूरी करके चुकता कर देगा। पर घर तो हरगिज नहीं जाना। पत्नी होकर भी पति की मदद नहीं कर सकती। ऐसा घर माँ बाप पत्नी किस काम के? करवटों में कब सुबह हुई पता ही नहीं चला। उठकर पास के नल पर हाथ मुँह धोया और फिर सड़क पर हो लिया,अपने लत की चाह में जो उसे कहाँ से कहाँ ले आयी थी।

🔷 उधर घर में जो घटित होना था वह हो चुका था। पर उसे क्या खबर क्या परवाह? खुद का भी होश नहीं था। दाढ़ी बढ़ चुकी थी। बाल बिखरे हुये और उसकी जिन्दगी की भाँति उलझे हुये। पेट पीठ से लग चुका था। एक भिखारी से कम लग भी नहीं रहा था। उस रात सोना के हाथ की रोटी खायी थी तबसे भरपेट खाना नसीब ही कहाँ हुआ था?

🔶 आज भी काम नहीं मिला था और ना ही राघव। क्या करे?....कहाँ से रूपयों का इन्तजाम हो?...ये कागज के रंगीन टुकड़े भी क्या चीज हैं। खूब रुलाते हैं इन्सान को।

🔷 तभी उसका ध्यान घाट की ओर जाते रेले पर चला गया। शायद कोई पर्व स्नान है। तभी इत्ता आदमी चला जा रहा है पगलाया हुआ। बड़ा दानपुण्य करते हैं लोग नदी किनारे। इस खयाल से ही उसकी निस्तेज बुझ चुकी आँखें चमक उठीं। भिखारी तो लग ही रहा है। कौन पहचानेगा उसे इस हुलिये में। शायद कुछ मिल जाये।यही सोचकर भीड़ के संग हो लिया। घाट पर एक किनारे बैठने भर की जगह ढूंढने में ज्यादा देर नहीं लगी उसे। लोग चले जा रहे थे पर कोई उसपर ध्यान नहीं दे रहा था। हाथ फैलाये हुये बुदबुदाता जा रहा था"लोग कितना बदल गये हैं। धर्म कर्म तो रहा ही नहीं दान पुण्य की भावना भी नहीं रही लोगों में।"......तभी भीड़ में सामने आते जाने पहचाने चेहरे पर नजर गड़ गई। अरे बाप रे.....इतवारी काका..कहीं देख तो नहीं लिया। कोई अमावस पूरनमासी नहीं छोड़ते। गंगा नहाना तो उनके जीवन का जरूरी कारज है। घबराकर मुँह फेरकर बैठ गया। भीड़ आगे बढ़ गयी।

🔶 यह ठीक नहीं है। कोई पहचान लेगा तो....। उठकर मेले में भटकता रहा। सांझ ढल रही थी। भूख प्यास अब शरीर पर असर दिखाने लगी थी। तलब भी बढ़ चली थी। इतना समय वह बिना नशे के कभी नहीं रहा। धीरे धीरे वह मेले की भीड़ को छोड़कर घाट के सुनसान हिस्से की ओर बढ़ चला। उसे मेले की चहल पहल,सजी दुकानें व खुश्बू बिखेरते चाट मिठाई के ठेले कुछ भी भा नहीं रहे थे। आँखें सुस्ती से बेजान हो चली थीं। शरीर निढाल हो गया था। पेड़ के तने से टेक लगाकर बैठ गया वह। सूरज अस्तांचल में समाने लगा था। उसे भी लग रहा था कि आज उसका सूरज भी ढलने को है। तुरंत उसे कुछ करना है, रात होने से पहले ही।

🔷 घाट पर कुछ चितायें जल रही थीं कुछ बस बुझने को ही थीं। जहाँ जीवन के बाद आता है इंसान,आज वह वहीं खड़ा है जिन्दा लाश बनकर। कैसी नियति है? अचानक नजर अभी अभी लायी गयी शवयात्रा पर ठिठक गयी। ट्रैक्टर ट्राॅली से जाने पहचाने लोग उतर रहे थे। लगता है गाँव में टपक गया है कोई।......बाबू जी?...ये भी हैं यहाँ?

🔶 कहीं देख ना लें। पेड़ की ओट हो लिया। चिता सजा दी गयी। यह क्या?....बाबू जी चिता को मुखाग्नि दे रहे हैं?

🔷 क्या माँ...? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। पर क्यों नहीं हो सकता? आँसू बह चले थे उसकी निर्लज्ज आँखों से। जी हुआ भागकर चला जाये बाबूजी के पास। गिर जाये उनके कदमों में।माँग ले माफी। पर यह क्या इतना आसान है अब ....। ना ही तन में ताकत बची थी और ना ही मन में हिम्मत। क्या मुँह लेकर जाता। शायद सोना ने सब बता दिया होगा।बर्दाश्त नहीं कर पायी होंगी। वह इतना गिर जायेगा माँ ने कभी नहीं सोचा होगा। पश्चाताप की एक चिंगारी उभरी और तुरंत बुझ भी गयी। चिता जल रही थी पर उसका शरीर कुछ और ही माँग रहा था उससे। उसकी सारी संवेदनायें, भावनायें और रिश्ते चिता के साथ ही भस्म होते जा रहे थे। जीवन भर संजोये गये संस्कार और बंधन लकड़ियों की चटकन के साथ ही दरक गये थे। आँखें मूंदकर बैठा रहा वह।

🔶 धीरे धीरे आहटें कम होती जा रही थीं। उसे लग रहा था कि वह अपना होश खोता जा रहा है। तभी कानों में पड़ी एक आवाज ने उसे चौंका दिया"कितना दुःख झेलकर पाला था मनोहर ने चंदन को। पर इतना बड़ा दुःख दिया उसने। पहले वह घर छोड़ गया। अब बहू ने जहर खा लिया। दुनिया ही उजड़ गयी बेचारे की। सुना है बहू भी पेट से थी।किलकारी गूंजने से पहले ही सब कुछ खत्म हो गया।"

🔷 "सही कह रहे हो। ऊपर वाले की रही मरजी थी। ऐसे लड़के से तो बेऔलाद होना ही भला है। बहू मरने से पहले ही कह गयी थी कि उसकी चिता को पति हाथ भी नहीं लगायेगा। बहुत भली थी........इसके बाद उसे कुछ भी सुनाई न पड़ा। कान में माँ ,बाबू जी,सोना सबकी आवाजें गूँजती रहीं। एक दूसरे में गडमड हुई फिर सन्नाटा छा गया।

🔶 अचानक ना जाने कहाँ से उसमें बला की ताकत आ गयी। वह दौड़ पड़ा चिता की ओर। लकड़ियाँ अभी धधक रही थीं और उनके बीच सोना का रूप और यौवन भी। पर उसे तो और किसी चीज की तलाश थी। जरूर वह आग के ढेर में होगी। पागलों की तरह वह लकड़ी से अंगारों को इधर उधर बिखेरे जा रहा था। चिता के राख बनने तक लगातार........

🔷 पर वह ठप्पा उसे नहीं दिखा, सुन्दर सा, बड़ा सा, मोर वाला......मंगलसूत्र का ठप्पा...... थक कर वह वहीं लुढ़क गया.... ....कानों में सबकी आवाजें खोती जा रही थीं।।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Feb 2018

👉 आज का सद्चिंतन 27 Feb 2018


👉 ईश्वर के अनुग्रह का सदुपयोग किया जाय

🔷 मनुष्य को सोचने और करने की स्वतन्त्रता प्राप्त है। उसका उपयोग भली या बुरी, सही या गलत किसी भी दिशा में वह स्वेच्छापूर्वक कर सकता है। भव बंधन में बँधना भी उसका स्वतन्त्र कर्तृत्व ही है। इसमें माया, प्रारब्ध, शैतान, ग्रह, नक्षत्र आदि किसी अन्य का कोई दोष या हस्तक्षेप नहीं है। जीवन के स्वरूप और उद्देश्य से अपरिचित व्यक्ति भौतिक लालसाओं और लिप्साओं में स्वतः आबद्ध होता है। वह चाहे तो अपनी मान्यता और दिशा बदल भी सकता है और जिस तरह बंधनों को अपने इर्द गिर्द लपेटा था उसी प्रकार उनसे मुक्त भी हो सकता है।

🔶 रेशम का कीड़ा अपना खोल आप बुनता है और उसी में बँधकर रह जाता है। मकड़ी को बंधन में बाँधने वाला जाल उसका अपना ही तना हुआ होता है। इसे उनकी प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। जब रेशम का कीड़ा खोल में से निकलने की बात सोचता है तो बुनने की तरह उसे कुतर डालने में भी कुछ कठिनाई नहीं होती। मकड़ी अपने फैलाये जाले को जब चाहे तब समेट भी सकती है। इन्द्रिय लिप्साओं और ममता, अहंता को प्रधानता देकर मनुष्य शोक-सन्ताप की विपन्नता में ग्रस्त होता है। यदि वह अपनी दिशा पलट ले तो जीवन मुक्त स्थिति का आनन्द प्राप्त करने में भी उसे कोई अड़चन प्रतीत न होगी।

🔷 समस्त विभूतियों से सम्पन्न मानव जीवन का अनुदान और सर्व तन्त्र स्वतन्त्रता का उपहार देकर भगवान ने अपने अनुग्रह का अन्त कर दिया। अब मनुष्य की बारी है कि वह सिद्ध कर दिखाये कि उसका सदुपयोग वह कर सकता है जो उसे दिया गया।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1972 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/October/v1.1

👉 सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है (अन्तिम भाग)

🔷 पूर्वकृत पापों के नष्ट होने का संबंध उन कर्मों से है जिनका अभी परिपाक नहीं हुआ है, जो अभी संचित रूप में पड़े हैं और समयानुसार फलित होने के लिए जो सुरक्षित रखे हुए हैं। वर्तमान काल में यदि अधिक बलवान शुभकर्म किए जाएं, मन में यदि उच्चकोटि की सतोगुणी भावनाओं का प्रकाश प्रज्वलित रहे तो उसके तेज से, ऊष्मा से वह अशुभ संचय झुलसने लगता है और हत प्रभ हीन वीर्य होने लगता है। जहाँ अग्नि की भट्टी जलती रहती हो उसके आस पास में कई पुस्तकें औषधियाँ आदि रखी रहें तो वे सब उस गर्मी के कारण जीर्ण शीर्ण निस्तेज और क्षतवीर्य हो जायेंगी। कोई बीज उस गर्मी को रखे रहें तो उनकी उपजाने की शक्ति मारी जायेगी।

🔶 इसी प्रकार यदि वर्तमान काल में कोई व्यक्ति अपनी मनोभूमि को तीव्रगति से निर्मल और सतोगुणी बनाता जा रहा है तो उसकी तीव्रता से भूतकाल के अशुभ कर्मों की शक्ति अवश्य नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि भूतकाल में अच्छे कर्म किये गये थे और उनका सुखदायक शुभ परिपाक होने जा रहा था तो वह परिपाक भी वर्तमान काल के कुकर्मों, दुर्गुणों, कुविचारों और दुष्ट भावनाओं के कारण हीन-वीर्य, निष्फल और मृतप्रायः हो सकता है। वर्तमान का प्रभाव भूत पर ही पड़ता है और भविष्य पर भी। महापुरुषों के पूर्वज भी प्रशंसा पाते है और संतान भी आदर की दृष्टि से देखी जाती है। दुष्ट कुकर्मियों के पूर्वज भी कोसे जाते हैं और उनकी संतानें भी लज्जा का अनुभव करती है।

🔷 स्मरण रखिए वर्तमान ही प्रधान है। पिछले जीवन में आप भले या बुरे कैसे भी काम करते रहे हों यदि अब अच्छे काम करते हैं तो चंद भोग्य बन गये फलों को छोड़ कर अन्य संचित पाप क्षतवीर्य हो जायेंगे और यदि उनका कुछ परिणाम हुआ भी तो बहुत ही साधारण स्वल्प कष्ट देने वाला एवं कीर्ति बढ़ाने वाला होगा। शिवि, दधीच, हरिश्चन्द्र, प्रहलाद, ध्रुव, पांडव आदि को पूर्व भोगों के अनुसार कष्ट सहने पड़े पर वे कष्ट अन्ततः उनकी कीर्ति को बढ़ाने वाले और आत्मलाभ कराने वाले सिद्ध हुए। सुकर्मी व्यक्तियों के बड़े-बड़े पूर्व घातक स्वल्प दुख देकर सरल रीति से भुगत जाते हैं। पर जो वर्तमान काल में कुमार्गगामी हैं उनके पूर्वकृत सुकर्म तो हीन वीर्य हो जायेंगे जो संचित पाप कर्म हैं वे सिंचित होकर परिपुष्ट और पल्लवित होंगे, जिससे दुखदायी पाप फलों की शृंखला अधिकाधिक भयंकर होती जाएगी।

🔶 हमें चाहिए कि सद्विचारों को आश्रय दें और सुकर्मों को अपनायें, यह प्रणाली हमारे बुरे भूतकाल को भी श्रेष्ठ भविष्य में परिवर्तित कर सकती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 19
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/February/v1.19

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( अन्तिम भाग)

🔶 निज के व्यक्तित्व को गर्हित करने वालों में निराशा, उदासी, आलस्य, प्रमाद, भय, चिन्ता, कायरता, लिप्सा स्तर की दुष्प्रवृत्तियों की गणना होती है। दूसरों से सम्बन्ध बिगाड़ने में क्रोध, आवेश, अहंकार, अविश्वास, लालच, अनुदारता जैसी आदतों को प्रमुख माना जाता है। भविष्य को बिगाड़ने में चटोरेपन, प्रदर्शन, बड़प्पन, दर्प, अविवेक, अनौचित्य जैसी उद्दण्डताओं का परिकर आता है। मर्यादाओं की अवज्ञा करने और अनाचार पर उतारू होने वाले लोग प्रायः वे होते हैं जिन पर विलास, लालच, संग्रह, अहंता के उद्धत प्रदर्शन का भूत सवार है। अनास्था या नास्तिकता इसी मनःस्थिति को कहते हैं। ईश्वर सद्भावना, सद्विचारणा एवं सत्प्रवृत्ति के समुच्चय को कहते हैं।

🔷 उसी के सम्मिलित स्वरूप की एक ऐसे व्यक्ति विशेष के रूप में अवधारणा की गयी है कि जो न्यायनिष्ठ है और अपनी वरिष्ठता का उपयोग अनुशासन बनाये रहने के लिए करता है। न उसका कोई प्रिय है और न अप्रिय, न किसी से लगाव, न पक्षपात, न विद्वेष। कर्म और उसका प्रतिफल ही ईश्वरीय नियति है। मानवोचित गौरव गरिमा का निर्वाह ही उसकी वास्तविक अर्चना है। इससे विमुख व्यक्तियों को नास्तिक कहा जा सकता है। शास्त्रों में जिन नास्तिकों की भर्त्सना की गयी है, वे उस समुदाय में नहीं आते जो पूजा-अर्चा से आनाकानी करते हैं। वरन् वे हैं जो उत्कृष्टता के प्रति अनास्था व्यक्त करते हैं।

🔶 आस्था-अनास्था की परख किसी के चिन्तन का स्तर एवं प्रवाह की कसौटी पर ही हो सकती है। भगवान को मस्तिष्क में विराजमान माना गया है। शेषशायी विष्णु का क्षीर सागर वही है। कैलास वासी शिव का निवास इसी मानसरोवर के मध्य में है। कमल पुष्प पर विराजमान ब्रह्माजी का ब्रह्मलोक यही है। तिलक चन्दन इसी पर लगाते हैं। आशीर्वाद वरदान के लिए उसी का स्पर्श किया जाता है। विधाता को जो भाग्य में लिखना होता है उसी पटल पर लिखते हैं। विचार तंत्र की गरिमा जितनी अधिक गाई जाय उतनी ही कम है। इसे ब्रह्माण्ड की, विराट ब्रह्म की अनुकृति कहा गया है। जिसने मनःसंस्थान का परिशोधन परिष्कार कर लिया, समझना चाहिए कि उसने तपश्चर्या और योगाभ्यास की आत्मा से सम्पर्क साध लिया। वह सिद्ध पुरुष बनेगा, स्वर्ग में रहेगा और जीवनमुक्तों की श्रेणी में सम्मिलित होकर हर दृष्टि से कृत-कृत्य बनेगा।

🔷 स्मरण रहे, शरीर के समस्त अंग-अवयवों का जितना महत्त्व है, उसके संयुक्त स्वरूप की तुलना में अकेले मस्तिष्क की महत्ता कहीं अधिक है। मस्तिष्क को सही और स्वस्थ रखने का तात्पर्य है उसकी विचार प्रक्रिया को सही दिशा प्रदान करना। पागलों और अविकसित मस्तिष्क वालों की जिन्दगी निरर्थक होती है और वे ज्यों-त्यों करके दिन काटते हैं। उलटी विचारणा अपनाने वाले, भ्रान्तियों और विकृतियों में ग्रसित होकर अनुपयुक्त सोचते रहने वाले उससे भी अधिक घाटे में रहते हैं। अनजान की तुलना में वे अधिक दुःख पाते और दुःख देते हैं जो उलटा सोचते और उलटे रास्ते चलते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Be Determined & Committed. (Part 3)

🔷 You have been asked to wear yellow clothes for it is symbol of being determined. Other people do not wear yellow clothes but you should wear. It also means you do not have any pressure from anyone and you are not interested to copy or follow the world. What is this? It is the symbol of being committed. Whatever is the kind of food, if it is bad what to do of it? Let us go with it, but no SAHAB! It does not taste good so let us taste KACHAUDI somewhere else. Please do not do so. Don’t discuss about different types of foods and tastes. What will happen then?

🔶 Whatever are the benefits of tasty foods, but I do not give importance to them as much as to this thing that you have waged war against your mind to change it to make your one enemy a friend. Your enemy number one is your mind; your friend number one is also your mind. Determination & self-discipline is the name of pressure and furnace that is needed to mould a new weapon, to change an enemy into a friend. To exercise self-discipline you have to be determined and committed and you should make little commitments from time to time so that your determination gets support and goes strong. Such little commitments mean not to do that work until this work is done.
                                                     
🔷 Be a committed man, only committed men have emerged as great men; only committed men have progressed and succeeded and only committed ones have enabled others to cross over. You should be determined and committed. Goodness must be your policy. Generosity must be your duty. Once you have done so, the second step you have to take is not to do these works that no salt on Thursday, celibacy on Thursday or two hours silence on Thursday etc. if you practice these little commitments in association with some excellent duty and responsibility then your ideas will succeed, your personality will be sharp and you will be counted amongst nice people. I hope you would understand the importance of self-discipline and commitment and go ahead to adopt the same.

Finished, today’s session.                                           
===OM SHANTI====
                                           
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 16)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! सारे-के-सारे ये वो लोग हैं, जो मर गए हैं, जो सड़ गए हैं। लोभ के अलावा, लालच के अलावा, ख्वाहिशों के अलावा, तमन्नाओं के अलावा इनके पास कुछ नहीं है। जो आदमी खाली हो गए हैं और जो ढोल तरीके से पोले हैं, उनका हम क्या करेंगे? इनके लिए हम कुछ नहीं करेंगे और न इनसे समाज के लिए, भगवान् के लिए ही कुछ उम्मीद रखेंगे। किसी के लिए भी इनसे उम्मीद नहीं रखेंगे। इनको हम छोड़ देंगे।

🔶 मित्रो! हमारा मिशन जो इंसान में भगवान् का अवतरण करने के लिए और जमीन पर स्वर्ग की धाराओं को बहाने के लिए बोया और खड़ा किया गया है, उसके लिए हमें जिंदा आदमियों की जरूरत है। जिंदा आदमी ही इस मिशन को आगे लेकर चलेंगे। मुरदा आदमी ज्यादा से ज्यादा माला घुमा देंगे। एक हनुमान जी की घुमा देंगे, एक लक्ष्मी जी की घुमा देंगे, एक युग-निर्माण की घुमा देंगे और एक अपने बेटे की घुमा देंगे और एक अपने मोहल्ले वाले की घुमा देंगे और कहेंगे कि गुरुजी मैं रोज नौ माला जपता हूँ। उसमें एक आपके लिए जपता हूँ और एक लक्ष्मी जी के लिए। वाह, बेटे! लक्ष्मी जी भूखी बैठी थी और भगवान् जी को तीन दिन से नाश्ता नहीं मिला था। तूने एक माला जपी थी, बस उससे भगवान् जी का कलेऊ हो जाएगा और उनको रोटी मिल जाएगी। अहा! ये हैं असली भगत और असली जादूगर। सारे जादू के पिटारे ये अपने माला में भरे हुए बैठे हैं।

🔷 मित्रो! इनसे हमारा काम चलेगा? इनसे हमारा काम नहीं चलेगा। जो व्यक्ति हर काम के लिए माला को ही काफी समझते हैं, उनसे हमारा काम नहीं चलेगा। जब कभी इनको जुंग आती है, छटपटाहट आती है, तो खट माला पकड़ लेते हैं और कहते हैं कि इस पर माला को चलाऊँगा, उस पर माला को चलाऊँगा। इस तरह वे तरह-तरह की चर्खियाँ चला देते हैं। जिस तरह बंदूक में तरह-तरह के कारतूस चढ़ा देते हैं? मंत्र का। इस माला पर महामृत्युंजय मंत्र का कारतूस दनादन चढ़ा दिया, जो खट्-खट् सब बीमारियों को मार डालता है और जब इसको लक्ष्मी जी की जरूरत पड़ती है तब? अहा! ‘‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’’ मंत्र का दे दनादन-दे दनादन जप, और वो आई देवी और ये आई चंडी और ये आया पैसा। बस इसके पास तो एक ही मशीनगन है। मरने दो इन अभागे को, इसके पास न कोई जिंदगी है, न कोई दिशा है, न कोई प्रेरणा है, न कोई लक्ष्य है और न इसके पास दिल है। ये अभागा तो केवल माला को लेकर ही दफन होने वाला है और माला को लेकर ही मरेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 52)

👉 भावनाओं का हो सद्गुरु की पराचेतना में विसर्जन

🔷 सद्गुरु चेतना का यह तत्त्व सब भाँति अपूर्व है, नित्य है, स्वयं प्रकाशित एवं निरामय है। इसमें किसी तरह का विकार नहीं है। यह परमाकाश रूप, अचल, अक्षय और आनन्द का स्रोत है॥ ६४॥ वेद स्तोत्र भी यही कहते हैं। प्रत्यक्ष, शब्द आदि चारों प्रमाणों से भी यही सत्य सिद्ध होता है। गुरुदेव की आत्मचेतना, तपश्चेतना का सदा-सदा स्मरण करना चाहिए॥ ६५॥ हे महामति देवि! इसके मनन से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं। तुम्हारी साधुता को देखकर ही मैंने यह सत्य तुम्हें बताया है।
  
🔶 गुरुगीता के मंत्रों में इस परम सत्य का उद्घाटन है कि गुरुदेव ही स्मरणीय हैं, चिंतनीय हैं और मननीय हैं। उनकी पराचेतना में रमण करने से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है। कई शिष्य-साधक बौद्धिक रूप से इस सच्चाई को जानते हैं; किन्तु भावरूप से वे इसमें डूब नहीं पाते, निमग्न नहीं हो पाते। इसका कारण यह होता है कि उनकी बुद्धि तरह-तरह सांसारिक गणित लगाती रहती है। इस बुद्धि को श्रीमद्भगवद्गीता के गायक ‘व्यावसायित्मका बुद्धिः’ कहते हैं।

🔷 श्री रामकृष्ण परमहंस इसके लिए ‘पटवारी बुद्धि’ का शब्द उपयोग करते थे। जोड़-तोड़, कुटिलता-क्रूरता में निरत रहने वालों के लिए न तो साधना सम्भव है और न ही उनसे समर्पण बन पड़ता है और जो अपनी अहंता का सिर उतार कर गुरुचरणों पर रखने का साहस नहीं कर सकते, भला उनके लिए गुरु भक्ति कहाँ और किस तरह से सम्भव है। ऐसों को सद्गुरु चाहकर भी नहीं अपना पाते। शिष्य की भाव मलीनता उन्हें यह करने ही नहीं देती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 86

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 26 Feb 2018


👉 सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है ( भाग 2)

🔶 जैसे गोबर के उपले आज थापे जाएं तो वे कई दिन में सूख कर जलाने लायक होते है। हम जो भले बुरे कर्म करते रहते हैं उनका भी धीरे धीरे परिपाक होता रहता है और कालान्तर में वे कर्मफल के रूप में परिणित होते है। इसी प्रक्रिया को भाग्य, तकदीर, कर्मलेख, विधाता के अंक, प्रारब्ध, होतव्यता, आदि नामों से पुकारते हैं। हम देखते हैं कि कई व्यक्ति अत्यन्त शुभ कर्मों में प्रवृत्त है पर उन्हें कष्ट में जीवन बिताना पढ़ रहा है और जो पाप में प्रवृत्त हैं वे चैन की छान रहे हैं। इस का कारण यही है कि उनके भूतकाल के कर्मों का उदय इस समय हो रहा है और आज की करनी का फल उन्हें आगे आने वाले समय में मिलेगा।

🔷 मोटा नियम यही है कि जो किया गया है, उसका फल अवश्य मिलेगा। कर्म जैसे मन्द या तीव्र किये गये होंगे उनकी बुराई अच्छाई के अनुसार न्यूनाधिक सुख दुख का विधान होता है। यह कर्म भोग बड़े बड़ों को भोगना पड़ता है।

🔶 परन्तु इसमें सूक्ष्म नियमानुसार कभी कभी हेर फेर भी हो जाता है। जो प्रारब्ध परिपक्व होकर भोग के रूप में प्रस्तुत है उसमें परिवर्तन होना तो कठिन है पर जो कर्म अभी पक रहे हैं, भोग बनने की स्थिति में जो अभी नहीं पहुँच पाये हैं उन पर वर्तमान कर्मों का प्रभाव पड़ता है और उनका फल न्यून या अधिक हो सकता है अथवा वे नष्ट भी हो सकते हैं। धर्म ग्रन्थों में जहाँ शुभ कर्मों का महात्म्य वर्णन किया गया है वहाँ स्थान-स्थान पर ऐसा उल्लेख आया है कि “इस शुभ कर्म के करने से पिछले पाप नष्ट हो जाते हैं।” यहाँ सन्देह उत्पन्न होता है कि यदि उस कर्म के करने वाले के पाप नष्ट ही हो गये तो वर्तमान में तथा भविष्य में किसी प्रकार का दुख या अभाव उसे न रहना चाहिए। परन्तु ऐसा होता नहीं, शुभ कर्म करने वाले भी अन्य साधारण व्यक्तियों की तरह सुख दुख प्राप्त करते रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 18

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/February/v1.18

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 5)

🔷 दोष जिस-तिस को देने और गुण इस-उस के गाने से सिर्फ मन हलका होता है। मूलतः चयन अपने ही रुझान का होता है। साथी और समर्थक तो बुरे से बुरे मार्ग पर चलने वालों को भी मिल जाते हैं और श्रेय पथ पर चलने वाले ही कहाँ हर किसी का समर्थन प्राप्त करते हैं। उन्हें भी ढेरों लोग मूर्ख बनाते और रास्ते में रोड़े अटकाते हैं। अस्तु, दूसरों को महत्त्व देना हो तो उतना ही देना चाहिए कि उनका अस्तित्व तो है, पर इतना नहीं कि किसी को उनके पीछे चलने के लिए विवश ही होना पड़े। आखिर स्वतन्त्र चिन्तन भी तो कोई वस्तु है। मस्तिष्क तो अपना है। उस पर अपना अधिकार नहीं। संकल्प बल से विचारों को दिशा नहीं दी जा सकती है और जो चल रहा है उसमें परिवर्तन-प्रत्यावर्तन की सम्भावना नहीं है, ऐसा मानकर नहीं चलना चाहिए।

🔶 विचारणा में जिस स्तर का अभ्यास पड़ गया है, एक बार उसके खरे-खोटे होने पर नये सिरे से पर्यवेक्षण करना चाहिए और जिन अनुपयुक्त अभ्यासों का कूड़ा-कचरा भरा पाया जाय, उसे साहसपूर्वक बुहार फेंकना चाहिए। लौट-लौट कर आने की कठिनाई तो घर में चमगादड़ों का घोंसला हटाने पर भी आती है। भगा देने पर भी वे लौटकर आती हैं। फिर भी वे इतनी प्रबल नहीं हैं कि गृहस्वामियों के निश्चय को पलट सकें। उन्हें झक मारकर अपना घोंसला अन्यत्र बनाना पड़ता है। कुविचारों की जड़ तभी तक जमी रहती है जब उन्हें उखाड़ने-उजाड़ने का कोई अन्तिम निर्णय नहीं होता। असमंजस का लाभ सदा विपक्षी को मिलता है। संशोधन के निश्चय और परिवर्तन के संकल्प में ही दुर्बलता हो, किसी अन्तिम निर्णय पर पहुँचना न बन पड़ रहा हो तो बात दूसरी है।

🔷 कुविचारों में निषेधात्मक विचारों का एक बहुत बड़ा परिकर है। इनमें से कुछ ऐसे हैं जो व्यक्तित्व को दबोचे रहते हैं और दलदल में से उबरने ही नहीं देते। कुछ ऐसे हैं जो व्यवहार को विकृत, उद्धत बनाकर साथियों से पटरी नहीं बैठने देते। कुछ ऐसे हैं जो दिशाधारा को प्रभावित करते हैं और कँटीली झाड़ियों में भटकाते हैं। इन सभी की अपनी-अपनी मण्डली और बिरादरी है। वे एक-एक के साथ एक जुड़े रहते हैं। रेलगाड़ी में जुड़े डिब्बे की तरह, जंजीर की कड़ियों की तरह, चींटी, दीमकों और टिड्डियों की तरह उन्हें झुण्ड बनाकर साथ-साथ चलते देखा जा सकता हैं। किन्तु साथ ही यह बात भी है कि रानी मक्खी के उड़ जाने के उपरान्त छत्ते की अन्य मधुमक्खियाँ भी इच्छा या अनिच्छा से अपनी अधिष्ठात्री के साथ चली जाती हैं, इसी प्रकार विचारों के परिकर भी जड़ जमाते और सिर पर पैर रखकर उलटे पावों पलायन करते भी देखे जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Be Determined & Committed. (Part 2)

🔶 Had they not waged war against ill-thoughts, what poor commitments alone could do; how those commitments would have completed. Ill-thoughts would have been overpowered and set aside in a corner. You must have an army of opponent thoughts in stand-by position to help you at any such crucial moment. The moment ill thoughts of avarice, sex-lust, jealousy and timidity come to your mind, just ask your good army to face them to stop and remove from mind. How it will do if you do not fight? Nothing worked except a war against RAVANA.

🔷 Did anything other than war worked against DURYODHAN? Did anything other than war worked against KANS? I am not talking about war of love, violence or non-violence. I however am only talking about war waged against ills & weaknesses in own personalities and improper conducts, wickedness prevalent in society. You must at any cost prepare an army of thoughts that is equally helpful in giving you support and making a new atmosphere around you. These are the thoughts of determination.
                                          
🔶 A farmer named HAZARI decided, ‘‘I have to plant a garden of one thousand mango trees.’’ Well people just conceded to him when he proceeded for that. Why people conceded? He was determined. Had he not been determined then he would have been wasting his time delivering here & there only speeches, ‘‘SAHAB, plant the tress, promote greenery.’’ So does anyone plant? The world spends a lot on advertisements but does anyone listen?

🔷 To be listened it is very essential that the person who is saying this must be a determined fellow. Being determined means committed to come around high class principles in life. Though essentially it should be for little things & for little periods initially so that no hindrance is faced in commitment, so that psychic force is developed and a base is prepared for bigger commitments ahead in life. It also helps a man to maintain his dignity by remembering such committed instances. Therefore it is very essential for you to be committed.
                                           
.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 15)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 और विनोबा कौन हैं मित्रो! जवान आदमी। और गाँधी जी अस्सी वर्ष के करीब पहुँच गए थे। वो कौन थे? जवान आदमी। जवाहरलाल नेहरू चौहत्तर-पिचहत्तर वर्ष के थे, जब उनकी मृत्यु हुई। तब वे कौन थे? जवान आदमी और राजगोपालाचार्य? राजगोपालाचार्य की जब मृत्यु हुई थी, तो वे अस्सी वर्ष को भी पार कर गए थे। वे कौन थे? जवान आदमी, और हम और आप? हम और आप बुड्ढे आदमी हैं, जर्जर आदमी हैं, टूटे हुए और लकवा के मारे हुए आदमी हैं। कंगाली के मारे हुए, दरद के मारे हुए, दुर्भाग्य के मारे हुए और हम सब देवताओं के मारे हुए आदमी हैं।

🔷 हमारी नसें और हड्डियाँ गल गई हैं। हमार मन सड़ गया है और हमारी भावनाएँ सो गई हैं। हमारा जीवन समाप्त हो गया है। हम लुहार की धौंकनी के तरीके से साँस जरूर लिया करते हैं। हमारी साँस चलती तो है, पर बहुत धीरे-धीरे चलती है। हम कौन हैं? हम मुरदा आदमी हैं। हम मर गए हैं। हमारे अंदर कोई जीवट नहीं है, कोई जिंदगी नहीं है। हमारे अंदर कोई लक्ष्य नहीं है, कोई दिशा नहीं है। हमारे अंदर कोई तड़प नहीं है, कोई कसक नहीं है और हमारे अंदर कोई जोश नहीं है। हमारा खून ठंडा हो गया है।

🔶 साथियो! जिनका खून ठंडा हो गया है, उनको मैं क्या कहूँगा? उनको मैं बूढ़ा आदमी कहूँगा। पच्चीस वर्ष का हो तो क्या, अट्ठाइस वर्ष का हो तो क्या, बत्तीस वर्ष का हो तो क्या? वह बूढ़ा आदमी है और मौत का शिकार है। उसके सामने जिंदगी का कोई लक्ष्य नहीं है, उसके सामने कोई चमक नहीं है। जिसके सामने कोई चमक नहीं है, जिसके सामने कोई उम्मीद नहीं है, जिसकी हिम्मत समाप्त हो गई, जो आदमी निराश हो गया, जिसकी आँखों में निराशा और मायूसी छाई हुई है, वह बूढ़ा आदमी है। मित्रो! इन बूढ़े आदमियों का हम क्या करेंगे? इनसे हम क्या उम्मीद कर सकते हैं कि वे स्वयं के लिए क्या काम कर सकते हैं और भगवान् के लिए क्या कर सकते हैं। और समाज के लिए क्या कर सकते हैं? यह देखकर हम उनसे ना उम्मीद हो जाते हैं। हम उनसे ज्यादा-से-ज्यादा यही उम्मीद रखेंगे कि हमारा जब हवन होगा, तो उन्हें उम्मीद दिलाएँगे कि आपके बेटा-बेटी हो जाएँगे। उनके लिए बस सब से बड़ा एक ही काम है कि बेटा-बेटी हो जाएँ। पैसा हो जाए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 51)

👉 भावनाओं का हो सद्गुरु की पराचेतना में विसर्जन
🔶 गुरुगीता का गायन करते हुए शिष्यों की अन्तश्चेतना श्रद्धा रस में भीग रही है। भक्ति का उफान उनकी भाव चेतना में हिलोरें ले रहा है। इन हिलोरों में न केवल अतीत के कल्मष घुले हैं; बल्कि प्रखरता प्रकाश की नयी आभा भी फैली है। गुरुगीता के मंत्रों का प्रभाव ही कुछ ऐसा है। ये भगवान् महादेव के वचन हैं, जो सदा सर्वदा अमोघ हैं। भगवान् सदाशिव की वाणी तीनों कालों में सत्य है। महाकाल के वचनों पर काल का कोई प्रभाव नहीं है। काल का पाश, देश की सीमाएँ इन्हें छू भी नहीं सकती। इन वचनों का सही-सही मर्म तो केवल माता पार्वती ने ही समझा। जो प्रथम श्रोता होने के साथ भगवान् साम्ब सदाशिव की प्रथम शिष्या भी हैं। अपने सद्गुरु की अनुगत और उन्हीं में विलीन।
  
🔷 शिष्यों के लिए वह परम आदर्श हैं। समर्पण-विसर्जन व विलय की सघनता की साकार मूर्ति। जो शिष्य हैं, वे इन सजल श्रद्धा के साकार भाव विग्रह से श्रद्धा के कुछ कण पाकर स्वयं को प्रखर प्रज्ञा रूपी गुरुदेव में लय कर सकते हैं। इस भाव प्रवाह में अवगाहन करने वालों ने गुरु भक्ति की पूर्व कथा में पढ़ा कि सद्गुरु का नाम मंत्रराज है। इसका जप करने से बुद्धि खरा सोना बनती है। इसके स्मरण-चिंतन से महासंकटों से रक्षा होती है। हर किसी अवस्था में चलते-फिरते, बैठते-उठते यह मंत्रराज साधक की रक्षा करता है। जो भी शिष्य इसकी साधना करता है, उसे अविनाशी, निराकार व निर्विकार आत्म तत्त्व की अनुभूति होती रहती है।
  
🔶 गुरुदेव के इस अद्भुत स्वरूप के एक अन्य रहस्यमय आयाम को प्रकट करते हुए भगवान् भोलेनाथ आदिमाता भवानी से कहते हैं-

अपूर्वाणां परं नित्यं स्वयं ज्योतिर्निरामयम्। विरजं परमाकाशं ध्रुवमानन्दमव्ययम्॥ ६४॥
श्रुतिः  प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानश्चतुष्टयम्। यस्य चात्मतपो वेद देशिकंच सदा स्मरेत्॥ ६५॥
मननं यद्वरं कार्यं तद्वदामि महामते। साधुत्वं च मया दृष्ट्वा त्वयि तिष्ठति साम्प्रतम्॥ ६६॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 85

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

👉 कैसी वाणी कैसा साथ?

🔷 दवे साहेब विश्वविद्यालय के विद्यार्थियो के बीच बहुत प्रसिद्द थे। उनकी वाणी, वर्तन तथा मधुर व्यवहार से कॉलेज के प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियो उन्हें ‘वेदसाहेब’ से संबोधन करते थे. ऐसे भी वे संस्कृत के प्राध्यापक थे, और उनकी बातचीत में संस्कृत श्लोक-सुभाषित बारबार आते थे. उनकी ऐसी बात करने की शैली थी जिससे सुनने वाले मुग्ध हो जाते थे।

🔶 एक दिन विज्ञान के विद्यार्थियो की कक्षा में अध्यापक नहीं थे तो वे वहाँ पहुंच गए. सभी विद्यार्थियों ने खड़े होकर उनका सम्मान किया और अपने स्थान पर बैठ गए।

🔷 कक्षा प्रतिनिधि ने दवे साहेब से कहा, सर, कॉलेज के समारोहों में हमने आपको कई बार सुना है. लेकिन आज आपसे करीब से बातचीत करने का मौका मिला है. कृपया संस्कृत साहित्य में से कुछ ऐसी बातें बताइये जो हमारे दैनिक जीवन में काम आये।

🔶 दवे साहेब मुस्कराए और बोले :  पृथिव्याम त्रिनिरत्नानि जलं, अन्नं, सुभाषितम।। यानि कि अपनी इस धरती पर तीन रत्न हैं – जल,अन्न तथा अच्छी वाणी।

🔷 बिना जल तथा अन्न हम जी नहीं सकते, लेकिन सुभाषित या अच्छी वाणी एक ऐसा रत्न है जो हमारी बोली को श्रृंगारित करता है. हम अपने विचारों को सरलता से तथा स्पष्टता से सुभाषित द्वारा सबके सम्मुख रख सकते है।

🔶 दवे साहब अभी बोल ही रहे थे कि किसी विद्यार्थी ने प्रश्न किया,  हम वाणी का प्रयोग कैसे करें? तथा हमें किस तरह के लोगों का संग करना चाहिए?

🔷 पुत्र, तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया हैं, इसका उत्तर मैं तीन श्लोकों के माध्यम से देना चाहूंगा। तुम्हारा पहला प्रश्न- वाणी का प्रयोग कैसे करें?

यस्तु सर्वमभिप्रेक्ष्य पुर्वमेवाभिभाषते।
स्मितपुर्वाभिभाषी च तस्य लोक: प्रसीदति।।
(महाभारत शांतिपर्व 84/6)

🔶 देवों के गुरु बृहस्पतिजी हमें इस श्लोक से शिक्षा देते है कि, लोकव्यवहार में वाणी का प्रयोग बहुत ही विचारपूर्वक करना चाहिए. बृहस्पतिजी स्वयं भी अत्यंत मृदुभाषी एवं संयतचित्त है. वे देवराज इन्द्रसे कहते है : राजन ! आप तो तीनों लोकों के राजा हैं, अत: आपको वाणी के विषयमें बहुत ही सावधान रहना चाहिए. जो व्यक्ति दूसरोँ को देखकर पहले स्वयं बात करना प्रारंभ करता है और मुस्कराकर ही बोलता है, उस पर सभी लोग प्रसन्न हो जाते है।

यो हि नाभाषते किंचित सर्वदा भृकुटीमुख:।
द्वेष्यो भवति भूतानां स सांत्वमिह नाचरन।।
(महा. शान्ति. 84/5)

🔷 इसके विपरीत जो सदा भौहें टेढ़ी किए रहता है, किसी से कुछ बातचीत नहीं करता, बोलता भी है तो टेढ़ी या व्यंगात्मक वाणी बोलता है, मीठे वचन न बोलकर कर्कश वचन बोलता है, वह सब लोगों के द्वेष का पात्र बन जाता है।

🔶 अब तुम्हारा दूसरा प्रश्न – हमें किसका संग करना चाहिए?

सद्भि: संगं प्रकुर्वीत सिद्धिकाम: सदा नर:।
नासद्भिरिहलोकाय परलोकाय वा हितम्।।
(गरुड़पु. आ. 108/2)

🔷 देवों के गुरु बृहस्पतिजी बताते है कि ‘जो मनुष्य चारों पुरुषार्थ [यानि कि धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष] की सिद्धि हो ऐसी चाहत रखता हो तो उसे सदैव सज्जनों का ही साथ करना चाहिए. दुर्जनों के साथ रहने से इहलोक तथा परलोकमें भी हित नहीं है।

🔶 दवेसाहेब तथा विद्यार्थियो का संवाद पूरा हुआ और सभी विद्यार्थियो के मुखमंडल पर आनंद की उर्मी थी, आज सभी विद्यार्थियों को एक अच्छी सीख मिल चुकी थी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 Feb 2018


👉 सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है ( भाग 1)

🔶 प्रारब्ध कर्मों का, भूतकाल में किये हुए भले बुरे कामों का, फल मिलना प्रायः निश्चित ही होता है। कई बार तो ऐसा होता है कि कृतकार्य का फल तुरन्त मिल जाता है, कई बार ऐसा होता है कि प्रारब्ध भोगों की प्रबलता होने के कारण विधि निर्धारित भली-बुरी परिस्थिति वर्तमान काल में बनी रहती है और इस समय जो कार्य किए गए है उनका परिणाम कभी पीछे भुगतने के लिए जमा हो जाता है।

🔷 यदि प्रत्येक भले बुरे कर्म का फल तुरन्त हाथों-हाथ मिल जाता होता तो इस संसार में कहीं भी पापी और पाप का निशान ढूंढ़ने मिलता। क्योंकि जैसे विष खाते ही तुरन्त मृत्यु हो जाती है। वैसे ही पाप करते ही उसकी भयंकर पीड़ा होती तो उसे कोई स्पर्श भी न करता और बुराई का स्वादिष्ट फल मिठाई की तरह मधुर, बर्फ सा शीतल, चन्दन सा सुगंधित और सब प्रकार मनोहर आनन्द मय होता तो दौड़ दौड़ कर सभी लोग बुराई करते, अशुभ कर्म करने में कोई किसी से पीछे न रहता। परन्तु परमेश्वर ने मनुष्य की बुद्धिमता की परीक्षा करने के लिए और उसकी स्वतंत्रता, दूरदर्शिता और विवेकशीलता को स्वतंत्र दिशा में विकसित होने देने के लिए ऐसी व्यवस्था की है कि कर्मफल तुरन्त तो बहुत कम मिलते हैं वे आगे पीछे के लिए जमा होते रहते है। यह उधार खाता, उचंत खाता, बैंकों के हिसाब की तरह आगे पीछे जमा खर्च में पड़ता रहता है। यह वह स्थान है जिस पर मनुष्य की बुद्धिमता परखी जाती है, इसी खतरे से सावधान करने के लिए धर्म का विधान है।

🔶 वेद पुराण शास्त्र, इतिहास इसी जगह पर सावधान करने के लिए अपना अभिमत घोषित करते रहते हैं। फिर भी लोग चूकते हैं।-भ्रम में पड़ते हैं, और इस संदेह में पढ़ते हैं कि जाने कर्मफल मिलता भी है या नहीं। शास्त्रों की वाणी, धर्म की व्यवस्था जाने सच है भी या नहीं। इस संदेह में भ्रमित होकर ही वे पाप और नास्तिकता को अपना लेते है। तुरन्त फल न मिलना यही तो माया है, इस माया में ही मनुष्य भ्रमित होता है। आग छूने से जलन और बर्फ छूने से ठंडक की भाँति यदि पाप पुण्य का स्पर्श अपना अपना तुरन्त परिणाम दिखाते तो वेदशास्त्र धर्म भजन, पूजन कथा, कीर्तन आदि किसी की जरूरत न पड़ती। जैसे हरी घास को देखते ही गधा सीधा उसे खाने को चला जाता है वैसे ही सब लोग पुण्य के लिए सीधे चल देते है। और जैसे लाल झंडे को देखकर भैंस बिदकती है वैसे ही पाप का नाम सुनते ही लोग उससे बचकर दूर भागते हैं। पर ऐसा है नहीं, यही ईश्वर की माया है। हम माया को समझें और उसके जाल में न उलझें यही हमारी बुद्धिमानी का प्रमाण हो सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/February/v1.17

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 4)

🔶 कहा जाता है कि शरीर बल, सूझ-बूझ, साधन और सहयोग से कठिनाइयों का हल निकलता है और प्रगति का द्वार खुलता है। यह कथन जितना सही है उससे भी अधिक सही यह है कि मनोबल बाजी जीतता है। वही सबसे बड़ा बल है। शरीर से दुर्बल और साधनों की दृष्टि से अभावग्रस्त होते हुए भी कितने ही व्यक्ति महत्त्वपूर्ण सफलतायें प्राप्त कर सकने में समर्थ हुए हैं। इसमें उनके मनोबल ने ही प्रमुख भूमिका निभाई है। मनोबल को बढ़ाने और अक्षुण्ण रखने के लिए आवश्यक है कि सदा आशा भरे सपने देखे जायें। रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाकर वर्तमान परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का, ऊँचा उठने का ढाँचा खड़ा किया जा सकता है और उस उत्साह भरे पराक्रम के सहारे सफलता के स्तर तक पहुँचा जा सकता है।

🔷 कल क्या होने जा रहा है यह किसी को भी विदित नहीं है। न वैसा कुछ नियति निर्धारण है। मनुष्य स्वयं ही किसी रास्ते का चयन करते हैं, अपने ही पैरों चलते हैं और अपनाये गये मनोरथ के अनुरूप किसी लक्ष्य तक पहुँचते हैं। कौन किस स्तर का चयन करे? किसके पैर किस राह पर चलें, यह उसका अपना फैसला है। दूसरे तो हर बुरे-भले काम में साथ देते और रोक-टोक करते देखे गये हैं। उनमें से किन्हें महत्त्व दिया जाय, किन्हें न दिया जाय, यह फैसला अपना ही होता है।

🔶 यह सोचना व्यर्थ है कि परिस्थितियों या सम्बन्धियों ने उन्हें दबाया और ऐसा करने को विवश किया जैसा कि मन नहीं था। यह बात मात्र दुर्बल मनोबल वालों पर ही लागू होती है। मनस्वी जानते हैं कि कोई किसी को बाधित नहीं कर सकता। मनुष्य की संरचना इतनी दुर्बल नहीं है कि उस पर दूसरों के फैसले लद सकें और अपरिहार्य बन सकें। एक समय की भूल दूसरे समय सुधर भी सकती है। आज की सहमति को कल की असहमति में भी बदला जा सकता है। परिवर्तन काल की उथल-पुथल में कुछ अड़चन असुविधा तो होती है, पर नया रास्ता बन जाने की भी संगति मुड़-तुड़ कर बैठ ही जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Be Determined & Committed.

🔷 Many noble, important and interesting works you have to do after you go back from here but you will not be able to do so because your mind will loosen. To overcome this situation you please prepare an army, a series of thoughts. Thoughts can be cut off by thoughts; one poison can be killed by another poison; throne can be stuck out by another throne. Ill-thoughts that usually trouble you must be countered by an army of opponent thoughts. Good thoughts, noble thoughts too can form a strong army.  
                                         
🔶 If ill-thoughts of avarice, dishonesty and longing come to your mind, you please keep in stand-by position an army of statements of great men their history, health and honesty and say we will use honestly earned money only and not dishonestly earned money. If ill-thoughts of sex, lust and adultery come to your mind, you please again keep in stand-by position an army of good-thoughts like how HANUMAN became a powerful person due to celibacy, how BHISM PITAMAH became an able person due to celibacy. You can remind many such persons from history taking from SHANKERACHARYA to many other saints and noble persons who had once waged war against their ill-thoughts to place their names in history.
                                           
.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 14)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 इसलिए मित्रो! जहाँ कहीं भी क्षमताएँ दिखाई पड़े, प्रतिभाएँ दिखाई पड़ें, वहाँ आप हमारे संदेश वाहक के रूप में जाना और खासतौर से उनसे प्रार्थना करना, अनुरोध करना। पूर्व में मैंने विभूतिवानों को संबोधित किया था और उनका आह्वान किया था कि आपकी जरूरत है। भगवान् ने आपको विशेषताएँ दी हैं, उसकी उसे जरूरत है, लड़ाई, युद्ध का जब वक्त आता है, तो नौजवानों की भरती कंपलसरी कर दी जाती है और जो लोग बुड्ढे होते हैं, उनको छोड़ दिया जाता है।

🔶 कंपलसरी लड़ाई में सभी नौजवानों को, चौड़े सीने वालों को पकड़ लिया जाता है और फौज में भरती कर लिया जाता है। कब? जब देश पर दुश्मन का हमला होता है। मित्रो! उनसे जो नौजवान हैं, प्रतिभावान् हैं, विभूतिवान् हैं, उनसे मेरा संदेश कहना। लेकिन जो व्यक्ति मानसिक दृष्टि से बुड्ढे हो गए हैं, वे जवान हों तो क्या, सफेद बाल वाले बुड्ढे हों तो क्या, हमको उनकी जरूरत नहीं है। क्यों? क्योंकि वे मौत के शिकार हैं। वे इसी के लिए हैं कि जब मौत को चारे की जरूरत पड़े, तो वे उसकी खुराक का काम करें।

🔷 मित्रो! बुड्ढा आदमी कौन? क्या वह जिसके बाल सफेद हो गए हैं? सफेद बालों वाला बुड्ढा होता है कहीं, वह जवान होता है। इंग्लैण्ड का प्रधानमंत्री जिसका नाम चर्चिल था, अस्सी वर्ष का हो गया था और उसकी कमर में दरद रहता था। इंग्लैंड के लोगों ने कहा कि हम अपनी हुकूमत और अपने राष्ट्र की जिम्मेदारी इस आदमी के हाथ में सुपुर्द करेंगे, और वो चर्चिल जो था, जब दिन-रात जर्मनी वाले इंग्लैण्ड के ऊपर बम बरसा रहे थे, तब सारी-की-सारी सत्ता का केन्द्र वही एक आदमी था। बड़ा जबरदस्त आदमी, नौजवान आदमी था। कितने वर्ष का था, अस्सी वर्ष का, जो सारे-के-सारे लोगों से कह रहा था, इंग्लैण्ड के लोगों! घबराने की जरूरत नहीं। भगवान् हमारा सहायक है और हम ऊँचा उठेंगे, आगे बढ़ेंगे और हम फतह करके रहेंगे। हर आदमी के अंदर उसने जिंदगी पैदा की और जोश पैदा किया। वो कौन आदमी था? जवान आदमी था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 50)

👉 मंत्रराज है सद्गुरु का नाम

🔷 गुरुगीता के इन मंत्रों में साधना के कई गम्भीर रहस्य समाए हैं। इन मंत्रों में जिस साधना विधि का सांकेतिक वर्णन है, उसकी विस्तृत चर्चा कई तांत्रिक ग्रन्थों में मिलती है। इसकी विस्तार से विवेचना तो एक अलग लेख की विषय वस्तु बनेगी। जिसे श्रद्धालु शिष्यों के अनुरोध पर फिर कभी दिया जाएगा; परन्तु यहाँ संक्षेप में सद्गुरु नाम के महामंत्र का उल्लेख अवश्य किया जा रहा है। इसे ही भगवान् भोलेनाथ ने परम मंत्र एवं मन्त्रराज कहा है। इस मंत्र का स्वरूप क्या होगा? इस प्रश्न के उत्तर में गुरुभक्त सिद्धजन कहते हैं कि ॐ ऐं (नाम) आनन्दनाथाय गुरवे नमः ॐ, इस प्रकार सद्गुरु के नाम का जप करना चाहिए। इस मंत्र के स्वरूप को अपने गुरुदेव के मंगलमय नाम के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। जैसे अपने गुरुदेव का नाम है ‘श्रीराम’ तो उनके नाम का महामंत्र होगा- ‘ॐ ऐं श्रीराम आनन्दनाथाय गुरवे नमः ॐ’। जो गुरुभक्त हैं, वे प्रतिदिन गायत्री महामंत्र के जप के साथ इस महामंत्र की एक माला का भी जप कर सकते हैं।
  
🔶 अनुभवी साधकों का तो यह भी कहना है कि गायत्री महामंत्र के जप का दशांश गुरु नाम मंत्र का जप करने से गायत्री जप पूर्ण हो जाता है। नियमित साधना करने वाले सूक्ष्मतत्त्व के ज्ञाता साधकों का यह मानना है कि कई बार जन्म-जन्मान्तर के अशुभ कर्मों के कारण गायत्री का जप शीघ्र फलदायी नहीं हो पाता। विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए किए गए अनुष्ठान सफल नहीं होते हैं। इसका कारण केवल इतना ही है कि विगत  जन्मों के अशुभ संस्कार, दुर्लंघ्य प्रारब्ध इसमें बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। इसी वजह से गायत्री महामंत्र के कई अनुष्ठान कर लेने के बावजूद भी पुत्र प्राप्ति की, धन प्राप्ति की कामनाएँ अधूरी रहती हैं। कई बार तो साधक के मन की आस्था घटने लगती है। उसे अविश्वास घेर लेता है। अन्तःकरण में अंकुरित होने वाले सन्देह एवं भ्रम कहने लगते हैं कि कहीं गायत्री साधना के ही प्रभाव में कुछ कमी तो नहीं।
  
🔷 ऐसी स्थिति में सद्गुरु का तपोबल ही सम्बल होता है। जो काम अपने प्रयास, पुरुषार्थ से असम्भव होता है, वह गुरुकृपा से सम्भव होता है। गुरु कृपा ही असम्भव को सम्भव बनाने वाली प्रक्रिया है; पर इसका विधिवत् आह्वान करना पड़ता है। इसे अपने अन्तःकरण में धारण करना पड़ता है। यदि ऐसा किया जा सके, तो दुष्कर और दुरूह प्रारब्ध को भी मोड़-मरोड़ कर अपने अनुकूल बनाया जा सकता है। सभी तरह की विघ्न-बाधाओं को धूल-धूसरित और धराशायी किया जा सकता है। राह के सभी रोड़े फिर कभी आड़े नहीं आते। असफलता-सफलता में परिवर्तित होती है। खोया आत्मबल फिर से वापस मिलता है।
  
🔶 बस इसके लिए करना इतना ही है कि सन्ध्यावंदन के बाद गायत्री जप करने से पहले एक माला गुरु नाम के महामंत्र का जप करें। फिर इसके बाद गायत्री जप करें और बाद में गायत्री जप का दशांश गुरु नाम मंत्र का जप करें। उदाहरण के लिए यदि तीस माला गायत्री जपी गयी है, तो तीन माला गुरुनाम मंत्र का जप करें। कई तन्त्र ग्रन्थ यह भी कहते हैं कि प्रत्येक दस माला के बाद एक माला गुरु नाम मंत्र का जप किया जा सकता है। कई साधकों ने इस विधि को भी परम कल्याणकारी अनुभव किया है। इस विधि से की गई साधना न केवल लौकिक उपलब्धियाँ एवं सफलताएँ प्रदान करती है; बल्कि अलौकिक आध्यात्मिक सफलताओं के भी भण्डार खोलती है। इस तरह नियमित निरन्तर की गई साधना से साधक को आत्मतत्त्व की अनुभूति होती है। उसका जीवन कृतकृत्य एवं कृतार्थ होता है। गुरुदेव के तपोबल को और अधिक शिष्य कैसे आत्मसात् करें, इसकी चर्चा अगले मंत्रों में की गई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 82

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

👉 बेवक़ूफ़ : एक गृहणी

🔶 वो रोज़ाना की तरह आज फिर ईश्वर का नाम लेकर उठी थी। रसोई में आई और चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाया। फिर बच्चों को नींद से जगाया ताकि वे स्कूल के लिए तैयार हो सकें।

🔷 कुछ ही पलों मे वो अपने  सास ससुर को चाय देकर आयी फिर बच्चों का नाश्ता तैयार किया और इस बीच उसने बच्चों को ड्रेस भी पहनाई। फिर बच्चों को नाश्ता कराया।

🔶 पति के लिए दोपहर का टिफीन बनाना भी जरूरी था। इस बीच स्कूल का रिक्शा आ गया और  वो बच्चों को रिक्शा तक छोड़ने चली गई।

🔷 वापस आकर पति का टिफीन बनाया और फिर मेज़ से जूठे बर्तन इकठ्ठा किये। इस बीच पतिदेव की आवाज़ आई की मेरे कपङे निकाल दो। उनको ऑफिस जाने लिए कपङे निकाल कर दिए।

🔶 अभी पति के लिए उनकी पसंद का नाश्ता तैयार करके टेबिल पर लगाया ही था की छोटी ननद आई और ये कहकर ये कहकर गई की भाभी आज मुझे भी कॉलेज जल्दी जाना, मेरा भी नाश्ता लगा देना।

🔷 तभी देवर की भी आवाज़ आई की भाभी नाश्ता तैयार हो गया क्या? अभी लीजिये नाश्ता तैयार है। पति और देवर ने नाश्ता किया और अखबार पढ़कर अपने अपने ऑफिस के लिए निकल चले।

🔶 उसने मेज़ से खाली बर्तन समेटे और सास ससुर के लिए उनका परहेज़ का नाश्ता तैयार करने लगी। दोनों को नाश्ता कराने के बाद फिर बर्तन इकट्ठे किये और उनको भी किचिन में लाकर धोने लगी।

🔷 इस बीच सफाई वाली भी आ गयी। उसने बर्तन का काम सफाई वाली को सौंप कर खुद बेड की चादरें वगेरा इकट्ठा करने पहुँच गयी और फिर सफाई वाली के साथ मिलकर सफाई में जुट गयी।

🔶 अब तक 11 बज चुके थे, अभी वो पूरी तरह काम समेट भी ना पायी थी की काल बेल बजी। दरवाज़ा खोला तो सामने बड़ी ननद और उसके पति व बच्चे सामने खड़े थे।

🔷 उसने ख़ुशी ख़ुशी सभी को आदर के साथ घर में बुलाया और उनसे बाते करते करते उनके आने से हुई ख़ुशी का इज़हार करती रही। ननद की फ़रमाईश के मुताबिक़ नाश्ता तैयार करने के बाद अभी वो नन्द के पास बेठी ही थी की सास की आवाज़ आई की बहु खाने का क्या प्रोग्राम हे।

🔶 उसने घडी पर नज़र डाली तो 12 बज रहे थे। उसकी फ़िक्र बढ़ गयी वो जल्दी से फ्रिज की तरफ लपकी और सब्ज़ी निकाली और फिर से दोपहर के खाने की तैयारी में जुट गयी। खाना बनाते बनाते अब दोपहर का दो बज चुके थे।

🔷 बच्चे स्कूल से आने वाले थे, लो बच्चे आ गये। उसने जल्दी जल्दी बच्चों की ड्रेस उतारी और उनका मुंह हाथ धुलवाकर उनको खाना खिलाया। इस बीच छोटी नन्द भी कॉलेज से आ गयी और देवर भी आ चुके थे।

🔶 उसने सभी के लिए मेज़ पर खाना लगाया और खुद रोटी बनाने में लग गयी। खाना खाकर सब लोग फ्री हुवे तो उसने मेज़ से फिर बर्तन जमा करने शुरू कर दिये।

🔷 इस वक़्त तीन बज रहे थे। अब उसको खुदको भी भूख का एहसास होने लगा था। उसने हॉट पॉट देखा तो उसमे कोई रोटी नहीं बची थी।

🔶 उसने फिर से किचिन की और रुख किया तभी पतिदेव घर में दाखिल होते हुये बोले की आज देर हो गयी भूख बहुत लगी हे जल्दी से खाना लगा दो।

🔷 उसने जल्दी जल्दी पति के लिए खाना बनाया और मेज़ पर खाना लगा कर पति को किचिन से गर्म रोटी बनाकर ला ला कर देने लगी।
 
🔶 अब तक चार बज चुके थे। अभी वो खाना खिला ही रही थी की पतिदेव ने कहा की आ जाओ तुम भी खालो। उसने हैरत से पति की तरफ देखा तो उसे ख्याल आया की आज मैंने सुबह से कुछ खाया ही नहीं।
 
🔷 इस ख्याल के आते ही वो पति के साथ खाना खाने बैठ गयी। अभी पहला निवाला उसने मुंह में डाला ही था की आँख से आंसू निकल आये।
 
🔶 पति देव ने उसके आंसू देखे तो फ़ौरन पूछा की तुम क्यों रो रही हो। वो खामोश रही और सोचने लगी की इन्हें कैसे बताऊँ की ससुराल में कितनी मेहनत के बाद ये रोटी का निवाला नसीब होता हे और लोग इसे मुफ़्त की रोटी कहते हैं।
 
🔷 पति के बार बार पूछने पर उसने सिर्फ इतना कहा की कुछ नहीं बस ऐसे ही आंसू आ गये। पति मुस्कुराये और बोले कि तुम औरते भी बड़ी "बेवक़ूफ़" होती हो, बिना वजह रोना शुरू कर देती हो।

🔶 क्या आपको भी लगता है की गृहणी मुफ़्त की रोटिया तोड़ती है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 24 Feb 2018


👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 3)

🔷 जंक्शन पर गाड़ियाँ एक लाइन में खड़ी होती हैं। इनमें से किसे, किस दिशा में दौड़ना है, कहाँ पहुँचना है, इसका निर्धारण प्वाइंटमैन लीवर गिराकर करता है। वह दो पटरियों को इस प्रकार मिला देता है कि गाड़ी की दिशा बन सके और फिर उस पर दौड़ते हुए वह अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सके। एक ही लाइन में खड़ी दो गाड़ियाँ साथ-साथ छूटती हैं, पर उनकी दिशा अलग होने के कारण एक बम्बई पहुँचती है तो दूसरी कलकत्ता। दोनों के बीच भारी दूरी है। यह क्योंकर बन गयी? इसका उत्तर लीवर गिराकर पटरियाँ जोड़ने वाला प्वाइंटमैन हर किसी को आसानी से समझा सकता है कि एक समय के उस छोटे से निर्धारण ने कैसा कमाल कर दिया। यह उदाहरण विचारणा को दिशाधारा मिलने के सम्बन्ध में पूरी तरह लागू होता है।

🔶 मनुष्य जिस भी स्तर की विचारणा अपनाना चाहे, उसे वैसे चयन की परिपूर्ण स्वतन्त्रता है। तर्क और तथ्य तदनुरूप ढेरों इकट्ठे किए जा सकते हैं। मित्र सम्बन्धी साथ नहीं देंगे, परिस्थितियाँ प्रतिकूल बनेंगी, घाटा पड़ेगा और भविष्य अन्धकार से घिरा रहेगा, इस स्तर की निराशाजनक कल्पना के पक्ष में अनेकों तर्क सोचे जा सकते हैं। संगति बिठाने वाले ढेरों ऐसे उदाहरण भी मिल सकते हैं जिनमें कल्पित निराशा का समर्थन करने वाले घटनाक्रम घटित हुए हों। निराशा को अंगीकार करने वाला अपने पक्ष को पुष्ट करने के लिए अनेकानेक कारण ढूँढ़ सकता है। साथ ही जोर देकर कह भी सकता है कि उसने जो सोचा है गलत नहीं है।

🔷 रुख बदलते ही दूसरे प्रकार के तर्कों और उदाहरणों का पर्वत खड़ा हो जायेगा। आशा और उत्साह की उमंगें उठें, उज्ज्वल भविष्य पर विश्वास जमे तो फिर उस स्तर के तर्कों की कमी न रहेगी। हेय परिस्थितियों में जन्मे और पले व्यक्तियों में से कितनों ने असाधारण प्रगति की और आशाजनक सफलता प्राप्त की है, इसके उदाहरणों से न केवल इतिहास के पृष्ठ भरे पड़ें हैं वरन् वैसे उदाहरणों से अपना समय एवं सम्पर्क क्षेत्र भी सूना नहीं मिलेगा। वैसा अपने लिए क्यों नहीं हो सकता? जो काम एक कर सका उसे दूसरा क्यों नहीं कर सकता? इस प्रकार के विधेयक विचारों का सिलसिला यदि मनःक्षेत्र में चल पड़े, तो न केवल वैसा विश्वास बँधेगा वरन् प्रयत्न भी चल पड़ेगा और यह असम्भव न रहेगा कि उत्कर्ष की जो साध संजोयी थी वह समयानुसार पूरी होकर न रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 God among Sufferers

🔶 "Where can I find God?", asked a young man. And saint Namdev said," Come with me in the evening. I shall show you God right before your eyes." The young man waited impatiently. In the evening the saint took him to a hutment and stood in front of a poor old man's hut. They went inside the hut. There on a tattered bed lay a frail sick child whose mother has passed away. He had been diagnosed with T.B. Saint Namdev gave him medicine, attended to him and caressed him. When leaving, the saint promised the boy that he will visit him again the next day.
                                      
🔷 "We have spent the entire evening", said the young man, "where is the God you promised me to show?" And the saint replied, "Oh! Didn't you see Him? That poor sick child was God himself!" Now, the young man understood that serving the humanity is the real worship of God.
                                           
📖 From Pragya Puran

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 13)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! आपको समय से पहले बदल जाना चाहिए, नहीं तो आपको पश्चाताप ज्यादा करना पड़ेगा। जब कोई डाकू चीजें छीन ले जाता है, तो आदमी को ज्यादा अफसोस होता है, लेकिन अगर अपने हाथों से किसी भिखारी को दे देता है, स्कूल की इमारत बनाने के लिए दे देता है, तो उसको संतोष होता है। पैसा तो चला गया न, चाहे वह डाकू ले गया हो तो भी और चाहे स्कूल बनाने के लिए दे दिया तो भी। लेकिन अपने हाथ से देने पर संतोष रहता है। अतः आपको लोगों से यह कहने के लिए जाना है क अब युग बदल रहा है, समय बदला रहा है, युग की धाराएँ बदल रही हैं। धन के बारे में मूल्यांकन बदल रहा है। धन लोगों के पास रहने वाला नहीं है।

🔷 धन बहुत तेजी से चला जाने वाला है। आप देख नहीं रहे हैं क्या? गवर्नमेंट क्या-क्या कर रही है? मृत्यु टैक्स लगा रही है। संपत्ति टैक्स लगा रही है और दूसरे टैक्स लगा रही है। सब अगले दिनों जो गवर्नमेंट आने वाली है, अगले दिनों जो समय आने वाला है, उसमें रशिया वाला कानून लागू हो जाएगा, चाइना वाला कानून लागू हो जाएगा। हमको और आपको बस हाथ-पाँव से मेहनत करनी पड़ेगी, परिश्रम करना पड़ेगा और उस मेहनत के बदले में जो खुराक हमको मिलनी चाहिए, जो रोटी मिलनी चाहिए, वह मिल जाएगी। खुराक की सारी-की-सारी चीजें मिल जाएँगी।

🔶 साथियो! लोगों से कहना कि आपको भगवान् ने जो विभूतियाँ दी हैं, क्षमताएँ दी हैं, उसका सवाब आप उठा सकते हैं, लाभ उठा सकते हैं, जीवात्मा को शांति दे सकते हैं। जीवात्मा की शांति के लिए, पुण्य के लिए अपने आपको तैयार कर लेना चाहिए, ताकि आपका अंतःकरण शांति में रहे और समाज को भी आपके बदले का अनुदान मिले और हमारा सिर भी गर्व से ऊँचा उठ जाए। समय से पहले हम अंगद के तरीके से इसीलिए आपके पास आए हैं, ताकि यह बता सकें कि आपको वक्त रहते बदल जाना चाहिए और लाभ उठा लेना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 50)

👉 मंत्रराज है सद्गुरु का नाम

🔶 गुरुगीता के गायन से गुरुभक्ति जाग्रत् होती है। शिष्य में समर्पण की सजलता पनपती है। ज्यों-ज्यों इसकी प्रगाढ़ता बढ़ती है, त्यों-त्यों शिष्य की चेतना अपने गुरुदेव में विलीन हो जाती है। शिष्य गुरुमय हो जाता है। यह सब प्रभाव-प्रताप गुरुगीता का है। धन्य हैं वे, जो इसका निरन्तर पठन, चिन्तन व मनन करते हैं। गुरुभक्ति का यह शास्त्र सब भाँति से अद्भुत-अनुपम है। जो अनुभवी हैं, वे इसके मर्म को जानते हैं। जिन्हें अभी इसका अनुभव नहीं मिला है, वे प्रयास करने पर इसका स्वाद चख सकते हैं। शिव के वचन- आदिमाता पार्वती के द्वारा श्रवण से उपजा यह शास्त्र अनेक आध्यात्मिक रहस्यों से भरा है। इसके प्रत्येक मंत्र में सद्गुरु की कृपा का अमृत है।
  
🔷 अमृत सिंचन के उपर्युक्त मंत्र में गुरुगत प्राण शिष्यों ने पढ़ा कि श्रीगुरु की कृपादृष्टि से ही इस जगत् की सृष्टि हुई है। जगत् के सभी पदार्थ इसी से पुष्ट होते हैं। सत्शास्त्रों का सार मर्म इसी में समाया है। गुरुदेव की कृपादृष्टि की अनुभूति होने पर पता चलता है कि जगत् की सभी सम्पदाएँ व्यर्थ हैं। इस दृष्टि से ही शिष्य के अवगुण घुलकर परिमार्जित होते हैं। तत् सत्ता यही है। इसी से साधक में एकत्व से युक्त समत्व दृष्टि विकसित होती है। गुणों को विकसित करने वाली, मोक्ष मार्ग को प्रकाशित करने वाली, सकल भुवनों की स्थापना का परम कारण यही है। सद्गुरु की दृष्टि में ही पुरुष-प्रकृति एवं अन्य चौबीस तत्त्व समाये हैं। समष्टि की रूपमाला व जीवन के सभी नियम-काल सभी कुछ गुरुदेव की कृपादृष्टि में समाहित हैं।
  
🔶 गुरुकृपा और गुरुदेव के नाम की महिमा के एक नये आयाम को उद्घाटित करते हुए भगवान् साम्ब सदाशिव माता पार्वती से कहते हैं-
  
अग्निशुद्धसमंतात    ज्वालापरिचकाधिया। मंत्रराजमिमं   मन्येऽहर्निशं   पातु  मृत्युतः॥ ६१॥
तदेजति   तन्नैजति    तद्दूरे    तत्समीपके। तदन्तरस्य  सर्वस्य  तदु  सर्वस्य  बाह्यतः॥ ६२॥
अजोऽहमजरोऽहं च अनादिनिधनः स्वयम्।     अविकारश्चिदानन्द  अणीयान्महतो  महान्॥ ६३॥
  
🔷 हे देवि! सद्गुरु का नाम परम मंत्र है। यह मंत्रराज है। इसका जप करने से बुद्धि अग्नि में तपाए सुवर्ण की भाँति शुद्ध होती है। इसके स्मरण-चिंतन से निरन्तर मृत्यु से रक्षा होती है॥ ६१॥ चलते हुए या बैठे हुए, दूर होने पर, पास रहने पर, बाहर होने पर अथवा अन्दर रहने पर गुरु नाम का यह महामंत्र समूची सामर्थ्य से रक्षा करता है॥ ६२॥ जो इस मंत्रराज की साधना करता है, उसे अजन्मा, अमर, अजर, अनादि, मृत्युरहित, निर्विकार, चिदानन्द, अणु से भी सूक्ष्म और महत् से भी विराट् आत्मतत्त्व की निरन्तर अनुभूति होती रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 80

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

👉 दोस्ती

🔷 एक तितली मायूस सी बैठी हुई थी।पास ही से एक और तितली उड़ती हुई आई। उसे उदास देखकर रुक गई और बोली - क्या हुआ? उदास क्यों इतनी लग रही हो?

🔶 वह बोली - मैं एक फूल के पास रोज जाती थी। हमारी आपस में बहुत दोस्ती थी। बड़ा प्रेम था। पर अब उसके पास समय ही नहीं है मेरे लिए। वह तो बहुत व्यस्त हो गया है।

🔷 दूसरी तितली बोली - वह व्यस्त हो गया है तो तेरे पास तो समय है न तू तो जा सकती है। तू गई?

🔶 मैं क्यों जाऊँ? जब अब उसे मेरी ज़रूरत नहीं में क्यों जाऊँ?

🔷 तितली बोली - पगली ! तू कैसे कह सकती है कि उसे तेरी ज़रूरत नहीं। अनुमान क्यों लगाती है? क्या पता वह तेरा ही उस भीड़ में इंतज़ार करता हो।

🔶 तितली के आँसू निकल आए। उसने अपनी सखी को गले लगाया और गई अपने मित्र से मिलने। फूल बोला - कहाँ रही इतने दिन ! मेरा बिल्कुल मन नहीं लगा तुम्हारे बिन !! कहाँ थी ??

🔷 तितली मुस्कुराई और बोली कहीं नहीं रास्ता गुम हो गया था।

🔶 प्रेम लेने का मन करे तो प्रेम दे दो। किसी से बात करने का मन करे तो बात कर लो। दूसरे का इंतज़ार न करो। कुछ पता नहीं दूसरा भी इंतज़ार कर रहा हो।

🔷 प्रभु हमसे प्रेम करें या प्रभु हमसे पहले प्रेम करें,यह सोचने की बजाय उनसे पहले ही प्रेम करना प्रारम्भ कर दो। उनके प्रेम के इंतज़ार में नहीं, अपितु उनसे लाड प्यार करने में समय व्यतीत करो।

🔶 प्यार देने में अलग आनन्द है ..और प्यार लेने में अलग।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 23 Feb 2018


👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 2)

🔶 शरीर के साथ अनाचार करने वाले ही आमतौर से दुर्बल, रुग्ण रहते हैं। स्वयं कष्ट सहते और साथियों को त्रास देते हैं। ठीक यही बात मस्तिष्क पर भी लागू होती है। विचारणा की भी एक विधा और मर्यादा है। पटरी पर चलने वाली रेल की तरह ही उसकी भी दिशाधारा होनी चाहिए। नदियाँ जब किनारों का अतिक्रमण करके उफनने लगती हैं तो बाढ़ के रूप में अपनी विकरालता का परिचय देती हैं। रेल भी पटरी छोड़कर बेहिसाब किधर को ही चल पड़े तो उससे होने वाले दुष्परिणाम की कल्पना कोई भी कर सकता है।

🔷 विचारों की शक्ति असीम है। इस संसार पर अदृश्य शासन करने वाले-दैत्य दानवों की पौराणिक मान्यता को यदि प्रत्यक्ष देखना हो तो एक शब्द में उस समूचे परिवार को विचार प्रवाह कह सकते हैं। यही क्षेत्र है जिसका स्तर मनुष्य के उत्थान-पतन का आधारभूत कारण माना जाता है। आम आदमी का मस्तिष्क सम्बद्ध वातावरण के अनुरूप ढलता पाया गया है। किन्तु यह पत्थर की लकीर नहीं है, कोई चाहे तो उसका परिपूर्ण परिशोधन और उपयुक्त नव निर्धारण कर सकने में भी समर्थ हो सकता है। आदिवासी वन प्रदेशों में रहते हैं, पर उन पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है कि वे नगरों में प्रवेश नहीं कर सकते या वहाँ जाकर कोई काम धन्धा नहीं कर सकते।

🔶 गाड़िया लुहार जहाँ-तहाँ भटकते और लोहा पीटकर गुजारा करने के अभ्यस्त हैं। पीढ़ियों से इसी तरह रहते हैं। फिर भी इसे उनका स्वेच्छा निर्धारण ही कहा जायेगा। वे चाहें तो अन्य नागरिकों की तरह अपने निवास निर्वाह में बिना किसी कठिनाई के स्थायित्व भी ला सकते हैं। विचारणा के सम्बन्ध में भी यही बात है। यों वह बनती और पकती तो वातावरण के चाक और आवे में ही है। फिर भी मनुष्य मिट्टी नहीं है, वह घोंसले के पक्षी की तरह किसी भी दिशा में कभी भी उड़ सकता है और अपने दायरे-कार्यक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन कर सकने के लिए स्वतंत्र है। हमें अपना वर्तमान सुधारने की जब उमंग उठे तो सर्व प्रथम इस मनःक्षेत्र का ही निरीक्षण-परीक्षण करना चाहिए और उसकी दिशाधारा में, स्तर एवं अभ्यास में तदनुरूप परिवर्तन करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Transformation of an Age (Part 2)

🔶 If it is allowed to go on this way and if the current trend of scientific progress, growth in selfishness within men is allowed to continue and if no control over humans is managed this world will end. If situation remains the same keep this in mind that the state of affairs of this world after 100 years is going to be worsened if any of you is alive by then, I however will not be alive. But there is one more situation I dream of. Dreams I see. My dream world is very beautiful world. It is such a world that is soaked in love, faith, mutual respects and cooperation. It is a world wherein each one is intending to serve other, so sweet, so nice is my dream world that keeps rounding in my mind. If somehow my dream comes true then all this wealth, science, amenities and facilities, I feel, will make this earth a heaven.
                                      
🔷 Thousands and millions of years ago where were such roads, electricity, lightening, telephone and post offices. There were nothing like that but in such a scenario our ancestors used to live heavenly life. Today when we have far better circumstances, the same world could be far more peaceful, easy and pleasuring and create immense happiness. Today we are positioned at a crossroad from here we have to proceed whether towards destruction or towards development. You have to play a role here at this point. You have to cast your vote. When two sides have same votes, vote of president proves to be game changer .your vote is game changer. It is up to you which side you choose to vote. You may either vote for destruction-side or other side of constructive measures.
                                           
🔶 I feel you must vote for peace and harmony. For this you must stop living like an animal rather start living like a man, thoughtful man and like a wise man. This is very crucial phase of time which is not going to repeat itself in future.   

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 12)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! आप वहाँ जाना और लोगों से यह कहना कि अगर कहीं आपके अंदर जिंदादिली हो, तो आपको समय की पुकार सुननी चाहिए और युग की पुकार सुननी चाहिए। समय की माँग को पूरा करना चाहिए और युग की माँग को पूरा करना चाहिए और महाकाल ने, भगवान् ने जहाँ आपको बुलाया है, वहाँ आपको चलना चाहिए। हनुमान् जी भगवान् की पुकार सुनकर चले गए थे, रीछ और बंदर चले गए थे, गिलहरी चली गई थी। आपके लिए क्या यह संभव नहीं है? क्या आप इस लोभ और मोह से, अपने वासना और तृष्णा के बंधनों को काटते हुए अंगद के तरीके से चलने के लिए तैयार हैं?

🔶 मित्रो! मैं आपको अंगद के तरीके से संदेशवाहक बनाकर के भेजता हूँ। मेरे गुरु ने मुझे संदेशवाहक बनाकर भेजा। हिंदुस्तान से बाहर कई बार अंगद की तरह से मैं केवल संदेशवाहक के रूप में गया हूँ। मैंने कोई व्याख्यान नहीं दिए और न संगठन किए। सारे-के-सारे देशों में, विदेशों में और न जाने कहाँ-से-कहाँ गया, लेकिन अपने गुरु का संदेश लेकर के गया। मैंने लोगों से कहा, देखो अपने को बदल दो। समय बदल रहा है। परिस्थितियाँ बदल रही हैं। धन किसी के पास रहने वाला नहीं है। अगले दिनों में, थोड़े दिनों में आप देखना कि धन किस तरीके से गायब हो जाता है। राजाओं के राज किस तरीके से चले गए, यह हमने और आपने देख लिया। आपने देखा कि थोड़े दिनों पहले जो लोग राजा कहलाते थे, सोने-चाँदी की तलवारें लेकर हाथी पर चला करते थे, आज वे किस तरीके से अपनी दोनों वक्त की रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं।

🔷 साथियो! जहाँ कहीं भी जाएँगे, वहाँ आप लोगों से कहना कि समय बहुत जबरदस्त है। समय सबसे बड़ा है। धन बड़ा नहीं है। जहाँ कहीं भी विभूतियाँ आपको दिखाई पड़ती हों, वहाँ आप हमारे संदेशवाहक के रूप में जाना, जैसे कि हमारे गुरुजी ने सारी दुनिया के जबरदस्त आदमियों के पास और भावनाशील आदमियों के पास हमको संदेश दे करके भेजा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 49)

👉 सद्गुरु की कृपादृष्टि की महिमा

🔷 इनमें से एक सत्य घटना ऐसी है, जिसमें से गुरुगीता के इन महामंत्रों का मर्म उद्घाटित होता है। यह घटना विशिष्टाद्वैत सम्प्रदाय के संस्थापक भगवत्पाद श्री रामनुजाचार्य के जीवन की है। आचार्य की कृपा से अनेकों धन्य हुए। इन धन्यभागी लोगों में कुरेशभट्ट की चर्चा होती है। इन कुरेशभट्ट ने अपने सच्चे शिष्यत्व से, सार्थक समर्पण से, स्वयं की अहंता के विसर्जन से गुरु की कृपा दृष्टि को अनुभव किया। जीवन की सार्थकता पायी। सच्चा अध्यात्म लाभ अर्जित किया।
  
🔶 कुरेशभट्ट असाधारण मनीषी, परम तपस्वी एवं ख्याति प्राप्त विद्वान् थे। उनके तर्कों की धार, प्रवाहपूर्ण प्राञ्जल भाषा पण्डित मण्डली को कुण्ठित कर देती थी। पण्डित समाज में उनका भारी मान था। अनेकों योग एवं तंत्र की सिद्धियाँ उन्हें सहज सुलभ थीं; पर अध्यात्म के यथार्थ तत्त्व से वे वंचित थे। इस बात की कसक उनमें थी; लेकिन साथ ही उनमें कहीं इस बात का सूक्ष्म अहं भी था कि वे परम विद्वान् एवं सिद्धि सम्पन्न हैं। अध्यात्म की जिज्ञासा एवं विद्वत्ता के अहं ने उन्हें द्वन्द्व में डाल रखा था। समझ में नहीं आ रहा था कि वे किसे अपना मार्गदर्शक गुरु बनाएँ। अन्त में बड़े सोच-विचार के बाद उन्होंने आचार्य रामानुज की शरण में जाने का निश्चय किया। आचार्य उन दिनों भारत की धरती पर सर्वमान्य विद्वान् थे। उनके तप की प्रभा से समस्त दिशाएँ प्रकाशित थीं।
  
🔷 अपनी जिज्ञासा को लेकर वे रामानुज के पास पहुँच गए; परन्तु उनकी अहं वृत्ति के कारण आचार्य ने उन्हें अस्वीकृत कर दिया। कई बार उन्होंने इसके लिए प्रयास किया, पर हर बार असफल रहे। एक दिन जब वे आचार्य के पास बैठे थे, आचार्य की मुँहबोली बहिन अतुला उनके पास आयी और बोली- भैया ससुराल में मुझे रोटी बनाने में बड़ा कष्ट होता है। आपके पास यदि कोई उपयुक्त व्यक्ति हो, तो उसे मुझे दे दीजिए ; ताकि वह मेरी ससुराल में खाना पका सके। कुछ देर सोचने के बाद आचार्य की दृष्टि पास बैठे कुरेश भट्ट की ओर गयी और उन्होंने कहा- कुरेश, मैं तुम्हें अपना शिष्य तो नहीं बना सकता, परन्तु यदि तुम चाहो तो मेरी इस बहिन के यहाँ रसोइया बन सकते हो। परम धनवान्, महाविद्वान्, प्रचण्ड तपस्वी सिद्धि सम्पन्न कुरेश के लिए ऐसा प्रस्ताव सुनकर पास बैठे लोग चौंक पड़े।
  
🔶 लेकिन कुरेश अहंभाव से भले ग्रस्त हो, पर शास्त्रों के मर्म से परिचित थे। उन्हें सद्गुरु की कृपादृष्टि का मर्म पता था। बिना क्षण की देर लगाए उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार करते हुए कहा, प्रभु! आप शिष्य न सही, मुझे अपना सेवक होने का गौरव दे रहे हैं। यही मेरे लिए सब कुछ है। उस क्षण से लेकर वर्षों तक वह अतुला की ससुराल में रोटी बनाते रहे। सबको प्रेमपूर्ण भोजन कराते रहे। साथ ही उनका मन सद्गुरु के ध्यान में रमा रहा। प्रार्थना की इस निरन्तरता ने उनके अहं को धो डाला।  उनकी चेतना उनके सद्गुरु से एक हो गयी। आत्मज्ञान एवं ब्रह्मज्ञान की विभूतियाँ उनमें आ विराजी। एक दिन आचार्य स्वयं उन्हें लेने उनके पास आए और बोले- वत्स! अब तुम स्वतः ही मेरे शिष्य बन गए हो। सद्गुरु की अमृतवर्षिणी कृपा दृष्टि को पाकर उनका जीवन कृतकृत्य हो गया। सचमुच ही सद्गुरु कृपा ऐसी है, जो शिष्य के जीवन को शुद्धतम बना देती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 78

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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