सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 15)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 और विनोबा कौन हैं मित्रो! जवान आदमी। और गाँधी जी अस्सी वर्ष के करीब पहुँच गए थे। वो कौन थे? जवान आदमी। जवाहरलाल नेहरू चौहत्तर-पिचहत्तर वर्ष के थे, जब उनकी मृत्यु हुई। तब वे कौन थे? जवान आदमी और राजगोपालाचार्य? राजगोपालाचार्य की जब मृत्यु हुई थी, तो वे अस्सी वर्ष को भी पार कर गए थे। वे कौन थे? जवान आदमी, और हम और आप? हम और आप बुड्ढे आदमी हैं, जर्जर आदमी हैं, टूटे हुए और लकवा के मारे हुए आदमी हैं। कंगाली के मारे हुए, दरद के मारे हुए, दुर्भाग्य के मारे हुए और हम सब देवताओं के मारे हुए आदमी हैं।

🔷 हमारी नसें और हड्डियाँ गल गई हैं। हमार मन सड़ गया है और हमारी भावनाएँ सो गई हैं। हमारा जीवन समाप्त हो गया है। हम लुहार की धौंकनी के तरीके से साँस जरूर लिया करते हैं। हमारी साँस चलती तो है, पर बहुत धीरे-धीरे चलती है। हम कौन हैं? हम मुरदा आदमी हैं। हम मर गए हैं। हमारे अंदर कोई जीवट नहीं है, कोई जिंदगी नहीं है। हमारे अंदर कोई लक्ष्य नहीं है, कोई दिशा नहीं है। हमारे अंदर कोई तड़प नहीं है, कोई कसक नहीं है और हमारे अंदर कोई जोश नहीं है। हमारा खून ठंडा हो गया है।

🔶 साथियो! जिनका खून ठंडा हो गया है, उनको मैं क्या कहूँगा? उनको मैं बूढ़ा आदमी कहूँगा। पच्चीस वर्ष का हो तो क्या, अट्ठाइस वर्ष का हो तो क्या, बत्तीस वर्ष का हो तो क्या? वह बूढ़ा आदमी है और मौत का शिकार है। उसके सामने जिंदगी का कोई लक्ष्य नहीं है, उसके सामने कोई चमक नहीं है। जिसके सामने कोई चमक नहीं है, जिसके सामने कोई उम्मीद नहीं है, जिसकी हिम्मत समाप्त हो गई, जो आदमी निराश हो गया, जिसकी आँखों में निराशा और मायूसी छाई हुई है, वह बूढ़ा आदमी है। मित्रो! इन बूढ़े आदमियों का हम क्या करेंगे? इनसे हम क्या उम्मीद कर सकते हैं कि वे स्वयं के लिए क्या काम कर सकते हैं और भगवान् के लिए क्या कर सकते हैं। और समाज के लिए क्या कर सकते हैं? यह देखकर हम उनसे ना उम्मीद हो जाते हैं। हम उनसे ज्यादा-से-ज्यादा यही उम्मीद रखेंगे कि हमारा जब हवन होगा, तो उन्हें उम्मीद दिलाएँगे कि आपके बेटा-बेटी हो जाएँगे। उनके लिए बस सब से बड़ा एक ही काम है कि बेटा-बेटी हो जाएँ। पैसा हो जाए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

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