सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

👉 गुरुगीता (भाग 52)

👉 भावनाओं का हो सद्गुरु की पराचेतना में विसर्जन

🔷 सद्गुरु चेतना का यह तत्त्व सब भाँति अपूर्व है, नित्य है, स्वयं प्रकाशित एवं निरामय है। इसमें किसी तरह का विकार नहीं है। यह परमाकाश रूप, अचल, अक्षय और आनन्द का स्रोत है॥ ६४॥ वेद स्तोत्र भी यही कहते हैं। प्रत्यक्ष, शब्द आदि चारों प्रमाणों से भी यही सत्य सिद्ध होता है। गुरुदेव की आत्मचेतना, तपश्चेतना का सदा-सदा स्मरण करना चाहिए॥ ६५॥ हे महामति देवि! इसके मनन से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं। तुम्हारी साधुता को देखकर ही मैंने यह सत्य तुम्हें बताया है।
  
🔶 गुरुगीता के मंत्रों में इस परम सत्य का उद्घाटन है कि गुरुदेव ही स्मरणीय हैं, चिंतनीय हैं और मननीय हैं। उनकी पराचेतना में रमण करने से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है। कई शिष्य-साधक बौद्धिक रूप से इस सच्चाई को जानते हैं; किन्तु भावरूप से वे इसमें डूब नहीं पाते, निमग्न नहीं हो पाते। इसका कारण यह होता है कि उनकी बुद्धि तरह-तरह सांसारिक गणित लगाती रहती है। इस बुद्धि को श्रीमद्भगवद्गीता के गायक ‘व्यावसायित्मका बुद्धिः’ कहते हैं।

🔷 श्री रामकृष्ण परमहंस इसके लिए ‘पटवारी बुद्धि’ का शब्द उपयोग करते थे। जोड़-तोड़, कुटिलता-क्रूरता में निरत रहने वालों के लिए न तो साधना सम्भव है और न ही उनसे समर्पण बन पड़ता है और जो अपनी अहंता का सिर उतार कर गुरुचरणों पर रखने का साहस नहीं कर सकते, भला उनके लिए गुरु भक्ति कहाँ और किस तरह से सम्भव है। ऐसों को सद्गुरु चाहकर भी नहीं अपना पाते। शिष्य की भाव मलीनता उन्हें यह करने ही नहीं देती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 86

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