मंगलवार, 24 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 33)

🌞  हिमालय में प्रवेश

पत्तीदार साग
🔴 साग भाजी का इधर शौक ही नहीं है। आलू छोड़कर और कोई सब्जी यहां नहीं मिलती। नीचे के दूर प्रदेशों से आने के और परिवहन के साधन न होने से आलू भी महंगा पड़ता है। चट्टी के दुकानदार एक रुपया सेर देते हैं। यों इधर छोटे-छोटे झरने हैं उनसे जहां-तहां थोड़ी-थोड़ी सिंचाई भी होती है किन्तु वहां भी शाक-भाजी होने का रिवाज नहीं है। रोज आलू खाते-खाते ऊब गया। सब्जी के बारे में वहां निवासियों तथा दुकानदारों से चर्चा की तो उन्होंने बताया कि जंगल में खड़ी हुई तरह-तरह की वनस्पतियों में से तीन पौधे ऐसे होते हैं जिनके पत्तों का साग बनाया जाता है (1) मारचा (2) लिंगड़ा (3) कोला।

🔵 एक पहाड़ी को पारिश्रमिक के पैसे दिये और इनमें से कोई एक प्रकार की पत्तियां लाने को भेजा। पौधे चट्टी के पीछे ही खड़े थे वह बात की बात में मारचा की पत्तियां दो-चार सेर तोड़ लाया। बनाने की तरकीब भी उसी से पूछी और उसी प्रकार उसे तैयार किया। बहुत स्वादिष्ट लगा। दूसरे दिन लिंगड़ा की और तीसरे दिन कोला की पत्तियां इसी प्रकार वहां के निवासियों से मंगवाई और बनाई खाईं। तीनों प्रकार की पत्तियां एक दूसरे से अधिक स्वादिष्ट लगीं। चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। एक महीने हरी सब्जी नहीं मिली थी, इसे खाकर तृप्ति अनुभव की।

🔴 उधर के पहाड़ी निवासी रास्ते में तथा चट्टियों पर मिलते ही थे। उनसे जगह-जगह मैंने चर्चा की कि इतने स्वादिष्ट पत्तीदार साग जब आपके यहां पैदा होते हैं उन्हें काम में नहीं लेते? पत्तीदार साग तो स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत लाभ दायक होते हैं। उनमें से किसी ने न तो मेरी सलाह को स्वीकार किया और न उन सागों को स्वादिष्ट तथा लाभप्रद ही माना। उपेक्षा दिखाकर बात समाप्त करदी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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