मंगलवार, 24 जनवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 18) 25 Jan

🌹 सार्थक, सुलभ एव समग्र साधना  

🔴 पदार्थ से शरीर और आत्मा का महत्त्व अधिक है। इसी प्रकार समृद्धि-सम्पन्नता का, प्रगति और योग्यता का, आत्मिक प्रखरता, प्रतिभा का स्तर भी क्रम से, एक से एक सीढ़ी ऊँचाई का समझा जा सकता है। आन्तरिक आस्थाएँ ही वे विभूतियाँ हैं, जो व्यक्ति के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को परिष्कृत करती हैं। व्यक्तित्त्व को प्रखर, प्रामाणिक एवं प्रतिभावान् बनाती हैं। इसी आधार पर वे क्षमताएँ उभरती हैं, जो अनेकानेक सफलताओं की उद्गम स्रोत हैं।              

🔵 आत्मबल के आधार पर अन्य सभी बल हस्तगत किये जा सकते हैं। इसी के आधार पर उपलब्धियों का सदुपयोग बन पड़ता है। परिस्थितियों की प्रतिकूलता रहने पर भी उन्हें व्यक्तित्त्व की उत्कृष्टता के आधार पर अनुकूल बनाया जा सकता है। संसार के इतिहास में ऐसे अगणित व्यक्ति हुए हैं, जिनकी प्रारम्भिक परिस्थितियाँ गई-गुजरी थीं। निर्वाह के साधनों तक की कमी पड़ती थी, फिर प्रगति के सरंजाम जुट सकना और भी कठिन, लगभग असम्भव दीख पड़ता था। इतने पर भी वे व्यक्तित्त्व की प्रामाणिकता के आधार पर सभी के लिये विश्वस्त एवं आकर्षक बन गये। उनका चुम्बकत्व व्यक्तियों, साधनों और परिस्थितियों को अनुकूल बनाता चला गया और वे अपने पुरुषार्थ के साथ उस सद्भाव का तालमेल बिठाते हुए दिन-दिन ऊँचे उठते चले गये और अन्तत: सफलता के सर्वोच्च शिखर तक जा पहुँचने में समर्थ हुए। ऐसे अवसरों पर व्यक्तित्त्व की उत्कृष्टता को ही श्रेय दिया जाता है। इस उपलब्धि को ही आत्मबल का चमत्कार कहते हैं।  

🔴 इसके विपरीत ऐसे भी अनेकानेक प्रसंग सामने आते रहते हैं, जिसमें सभी अनुकूलताएँ रहने पर भी लोग अपनी दुर्बुद्धि के कारण दिन-दिन घटते और गिरते चले गये। पूर्वजों के कमाये धन को दुर्व्यसनों में उड़ा दिया। आलस्य और प्रमाद में ग्रसित रहकर अपनी क्षमताओं और सम्पदाओं को गलाते चले गये। कई अनाचार के मार्ग पर चल पड़े और दुर्गति भुगतने के लिये मजबूर हुए। इसमें उनके मानस की गुण, कर्म, स्वभाव की निकृष्टता ने अनेक सुविधाएँ रहते हुए भी उन्हें असुविधा भरी परिस्थितियों तक पहुँचा दिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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