मंगलवार, 24 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 32)

🌞  हिमालय में प्रवेश

सीधे और टेड़े पेड़

🔵  दिन बीत गये। बेचारी जड़ें सब शाखाओं को खूब विकसित होने के लायक रस कहां से जुटा पातीं। प्रगति रुक गई, टहनियां छोटी और दुबली रह गईं। पेड़ का तना भी कमजोर रहा और ऊंचाई भी न बढ़ सकीं। अनेक भागों में विभक्त होने पर मजबूती तो रहती ही कहां से? बेचारे यह दादरा और पिनखू के पेड़ अपनी डालियां छितराये तो रहे लेकिन समझदार व्यक्तियों में उनका मूल्य कुछ जंचा नहीं। उन्हें कमजोर और बेकार माना गया अनेक दिशाओं में फैल कर जल्दी से किसी न किसी दिशा में सफलता प्राप्त करने की उतावली में अन्ततः कुछ बुद्धिमत्ता साबित न हुई।

🔵  देवदारु का एक निष्ठ पेड़ मन-ही-मन इन टेढ़े तिरछे पेड़ों की चाल चपलता पर मुस्कराता हो तो आश्चर्य ही क्या है? हमारी वह चंचलता जिसके कारण एक लक्ष पर चीड़ की तरह सीधा बढ़ सकना सम्भव न हो सका यदि विज्ञ व्यक्तियों की दृष्टि में हमारे ओछे रह जाने के कारण जंचती हो तो इसमें अनुचित ही क्या है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आदेश की विचित्र पालना, एक उलझन मे एक सुलझन मे

🔷 एक बार एक महात्मा जी के दरबार मे एक राहगीर आया और उसने पुछा की हॆ महात्मन सद्गुरु की आज्ञा का पालन कैसे करना चाहिये? 🔶 महात्मा जी ने...