मंगलवार, 24 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 33) 24 Jan

🌹 जप-यज्ञ के समय के वस्त्र
🔴 ऐसे कपड़े जो शरीर पर चिपके रहते हैं—नित्य नहीं धुलते, उनको धार्मिक क्रिया-कृत्यों में धारण न किया जाय तो ही अच्छा है। मोजे हर हालत में उतार देने चाहिए, उनकी गन्दगी लगभग जूते के ही समतुल्य होती है।

🔵 जिन प्रदेशों में धोती कुर्ते का रिवाज नहीं है, बनाना भी कठिन है, वहां पाजामा के उपयोग की भी छूट मिल सकती है। पर वह भी धुला हुआ तो हो, यह ध्यान रखा जाय। जहां आसानी से धोती-कुर्ते का प्रबन्ध हो सकता है, वहां तो उसके लिए जोर दिया ही जाय। इस सन्दर्भ में आलस्य या उपेक्षा न बरतें। कंधे पर पीला दुपट्टा धर्मानुष्ठानों के लिए शास्त्रोक्त परिधान है। जहां तक सम्भव हो जप, साधना यज्ञ-प्रक्रिया आदि के अवसर पर कंधे पर पीला दुपट्टा रखा जाय। इसमें सांस्कृतिक एकता एवं भावनात्मक समस्वरता का समावेश है।

🔴 इसलिए यथासम्भव सभी धर्मकृत्यों में धोती, कुर्ता, पीला दुपट्टा धारण करने पर जोर दिया जाय। पर इसे इतना कड़ा प्रतिबन्ध माना जाय कि किसी श्रद्धालु को मात्र इसी कारण सम्मिलित होने से रोका जाय। अच्छा यह है कि सामूहिक आयोजनों में कुछ सैट इस प्रकार के रखे जायें जिन्हें वे लोग प्रयोग कर सकें जो इस प्रकार के वस्त्र घर से लेकर नहीं आये हैं। महिलाएं प्रायः साड़ियां ही पहनती हैं। वे धर्मकृत्यों में पीली रंगी रहें। शरीर पर धारण करने के वस्त्र चिपके रहने वाले नहीं ढीले होने चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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