मंगलवार, 24 जनवरी 2017

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 28) 25 Jan

🌹 साहस का शिक्षण—संकटों की पाठशाला में

🔵 शरीर और मन की अनुकूलताएं रुचिकर लगती हैं। उन्हें जुटाने के लिए मनुष्य का समूचा पुरुषार्थ लगा रहता है। जीवन यापन के लिए आवश्यक सुविधायें जुटाई जायं, यह उचित है पर यह नहीं भूलना चाहिये कि चाहते हुए भी वह जरूरी नहीं कि सदा अभीष्ट प्रकार की परिस्थितियां बनी रहेंगी। कठिनाइयां प्रतिकूलताएं भी जीवन पथ पर प्रस्तुत होती हैं तथा मनुष्य के धैर्य एवं जीवट की परीक्षा लेती हैं। अनभ्यस्त शरीर और मन को ऐसे अवसरों पर अधिक परेशानी होती है। उपस्थित कठिनाइयों संकटों को वे व्यक्ति अभिशाप मानते हैं। जिन्होंने सतत अनुकूलताओं में ही रहना सीखा है।

🔴 प्रायः देखा यह जाता है संकटों के अवसर पर अनभ्यस्त अपना मन ही अधिक समस्या खड़ा करता है। आरम्भ से ही उसे हर तरह की परिस्थितियों में रहने के लिए प्रशिक्षित और अभ्यस्त किया गया होता तो उपस्थित होने वाली कठिनाइयां भी खेल-खिलवाड़ जैसी महसूस होतीं। पुरुषार्थ एवं जीवट को निखारने का उन्हें भी माध्यम माना जाता है तथा उतना ही उपयोगी उन्हें भी समझा जाता है जितना कि अनुकूल परिस्थितियों को।

🔵 पर बिरले होते हैं जो अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों में एक जैसे निस्पृह बने रहते हैं और अपने मन को दोनों ही में सन्तुलित बनाये रखते हैं। अन्यथा अधिकांश की प्रसन्नता अप्रसन्नता परिस्थितियों पर अवलम्बित होती है। वे अभीष्ट तरह की सुख सुविधाएं उपलब्ध रहने पर मोद मनाते तथा उनके तिरोहित होते ही शोकातुर हो उठते हैं। थोड़े से व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो कठिनाइयों तथा संघर्षों को स्वयं आमन्त्रित करते हैं। सुविधाओं तथा ढर्रे का जीवन उन्हें नहीं रुचता। कठिनाइयों संकटों से जूझे बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता। वे जानते हैं कि उनका सामना किये बिना आन्तरिक जीवट को उभरने और सुदृढ़ बनने का अवसर नहीं मिल सकता। ऐसे व्यक्ति शूरवीर साहसी मनस्वी बनते हैं। स्वयं धन्य होते और दूसरों का प्रेरणा प्रकाश देते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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