बुधवार, 16 मार्च 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 March 2022

ओजस्वी ऐसे ही व्यक्ति कहे जाते हैं, जिन्हें पराक्रम प्रदर्शित करने में संतोष और गौरव अनुभव होता है, जिन्हें आलसी रहने में लज्जा का अनुभव होता है, जिन्हें अपाहिज, अकर्मण्यों की तरह सुस्ती में पड़े रहना अत्यन्त कष्टकारक लगता है, सक्रियता अपनाये रहने में, कर्मनिष्ष्ठा के प्रति तत्परता बनाये रहने में जिन्हें आनन्द आता है।

अनीति को देखते हुए भी चुप बैठे रहना, उपेक्षा करना, आँखों पर पर्दा डाल देना, जीवित मृतक का चिह्न है। जो उसका समर्थन करते हैं, वे प्रकारान्तर से स्वयं ही दुष्कर्मकर्त्ता हैं। स्वयं न करना, किन्तु दूसरों के दुष्ट कर्मों में सहायता, समर्थन, प्रोत्साहन, पथ-प्रदर्शन करना एक प्रकार से पाप करना ही है। इन दोनों ही तरीकों से दुष्टता का अभिवर्धन होता है।

घड़ी पास में होने पर भी जो समय के प्रति लापरवाही करते हैं, समयबद्ध जीवनक्रम नहीं अपनाते, उन्हें विकसित व्यक्तित्व का स्वामी नहीं कहा जा सकता। घड़ी कोई गहना नहीं है। उसे पहनकर भी जीवन में उसका कोई  प्रभाव  परिलक्षित नहीं होने दिया जाता तो यह गर्व की नहीं, शर्म की बात है। समय की अवज्ञा वैसे भी हेय है, फिर समय-निष्ठा का प्रतीक चिह्न (घड़ी) धारण करने के बाद यह अवज्ञा तो एक अपराध ही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 14 मार्च 2022

👉 आकर्षक व्यक्तित्व बनाइये

सद्भावनायुक्त नागरिक ही आपको सामाजिक प्रतिष्ठा और मान-सम्मान देने वाले हैं। उनके दृष्टिकोण एवं विचारधारा पर आपकी सफलता अवलम्बित है। जैसा आपके आसपास वाले समझते हैं, वैसे ही वास्तव में आप हैं। समाज में आपके प्रत्येक कार्य की सूक्ष्म अलक्षित तरंगें निकला करती हैं, जो दूसरों पर प्रभाव डालती हैं।

भलाई, शराफत आदि सद्व्यहार वह धन है जो रात-दिन बढ़ता है। यदि दैनिक व्यवहार में आप यह नियम बना लें कि हम जिन लोगों के सम्पर्क में आयेंगे, उनके साथ सद्भावनायुक्त व्यवहार करेंगे, तो स्मरण रखिये आपके मित्र और हितैषियों की संख्या बढ़ती ही जायेगी। आप दूसरों को जितना प्रेम उदारता और सहानुभूति दिखलायेंगे, उनसे दस गुनी उदारता और सहानुभूति प्राप्त करेंगे। सद्व्यवहार दूसरे के अहं भाव की रक्षा करना वह आकर्षण है, जो दूर तक अपना प्रभाव डालता है। धीरे-धीरे उदारता मनुष्य के चरित्र का एक आवश्यक गुण बन जाती है। उदार मनुष्य दूसरों से प्रेम अपने स्वार्थ साधन के हेतु नहीं करता वरन् उनके कल्याण के लिए करता है। उदार व्यक्ति में प्रेम सेवा का रूप धारण कर लेता है। उदार व्यक्ति दूसरे के दु:ख से स्वयं दु:खी होता है। उसे अपने दु:ख-सुख की उतनी अहं की रक्षा करना चाहता है। सभी में कुछ न कुछ मात्रा में गर्व, मान अपने आप को बहुत श्रेष्ठ समझने की उच्च भावना है। अपने को सज्जन, उच्चतम, पवित्र, ईमानदार, सच्चा, बहादुर, कुलीन समझता है। अपनी समझदारी तर्क शक्ति, ज्ञान, पूर्णता उच्चता में नगण्य से नगण्य व्यक्ति को विश्वास है।
  
किसी से यह न कहिए कि तुम नीच हो, तुममें  समझदारी, ज्ञान, सतर्कता, नहीं है। तुम कठोर, कमजोर, दुर्बल, डरपोक हो और सोचने-समझने की भी शक्ति नहीं है। इस तरह के नकारात्मक अभावयुक्त शब्द अपने विषय में कोई भी सुनना पसन्द नहीं करता। दूसरों के गर्व को चूर्ण करने वाले ऐसे अनेक शब्द पारस्परिक वैमनस्य, कटुता, शत्रुता और लड़ाई के कारण बनते हैं। दूसरों से इस प्रकार चर्चा करनी कीजिए कि जिससे उसके सम्मान और गर्व की रक्षा होती चले। वह यह अनुभव करे कि आप उसकी इज्जत करते हैं, उसकी राय की कद्र व इज्जत करते हैं, उससे कुछ सीखना चाहते हैं। यदि किसी व्यक्ति के मन पर अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से यह बात बैठ जाय कि आप उसका सम्मान करते हैं, तो वह सदैव आपकी प्रतिष्ठा करता रहेगा।
  
आप लोगों की प्रशंसा, अभिवादन करना सीखें। प्रशंसा इस प्रकार से की जाय कि दूसरा यह न समझ सके कि उसे बनाया जा रहा है। प्रशंसा से दूसरा अत्यन्त उत्साहित होता है तथा अपना हृदय खोलकर रख देता है। जितना ही मनुष्य दूसरे की प्रशंसा करता है, उतनी ही उसमें अच्छा काम करने की शक्ति आती है, यहाँ तक कि कुछ समय के पश्चात् आपको अप्रत्यक्ष रूप से वह प्रेम करने लगता है। गुण-ग्राहक बनिए। दूसरों में जो उत्तम बातें हैं, उसे व्यवहार में लाने के लिए अवसर ताकिए। तनिक-सी गुण-ग्राहकता से दूसरा व्यक्ति एकदम आपकी ओर आकर्षित हो जाता है। यह एक मनोवैज्ञानिक नियम है कि जब दूसरा देखता है, आप उसमें दिलचस्पी व उसकी महत्ता स्वीकार कर रहे हैं, गुणों की तारीफ कर रहे हैं, तो वह अनायास ही आपसे प्रभावित हो जाता है। सम्भव है कि कोई किसी समय हतोत्साहित हो रहा हो और आपकी गुण ग्राहकता से उसका टूटता साहस पुन: जाग्रत्ï हो जाय और इस कारण वह आपकी ओर आकर्षित हो। जब हम लोगों को गुणग्राहक दृष्टि से निरीक्षण करने लगते हैं तो हर प्राणी में कितनी ही अच्छाइयाँ, उत्तमताएँ और विशेषताएँ दीख पड़ती हैं।  गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 13 मार्च 2022

👉 अच्छाइयाँ देखिए अच्छाइयाँ फैलेंगी

जैसा हम देखते, सुनते या व्यवहार में लाते हैं, ठीक वैसा ही निर्माण हमारे अंतर्जगत् का होता है। जो- जो वस्तुएँ हम बाह्य जगत् में देखते हैं, हमारी अभिरुचि के अनुसार उनका प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक अच्छी मालूम होने वाली प्रतिक्रिया से हमारे मन में एक ठीक मार्ग बनता है। क्रमश: वैसा ही करने से वह मानसिक मार्ग दृढ़ बनता जाता है। अंत में वह आदत बनकर ऐसा पक्का हो जाता है कि मनुष्य उसका क्रीतदास बना रहता है।

जो व्यक्ति अच्छाइयाँ देखने की आदत बना लेता है, उसके अंतर्जगत् का निर्माण शील, गुण, दैवी तत्त्वों से होता है। उसमें ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ की गंध नहीं होती। सर्वत्र अच्छाइयाँ देखने से वह स्वयं शील गुणों का केन्द्र बन जाता है।

अच्छाई एक प्रकार का पारस है। जिसके पास अच्छाई देखने का सद्गुण मौजूद है, वह पुरुष अपने चरित्र के प्रभाव से दुराचारी को भी सदाचारी बना देता है। उस केन्द्र से ऐसा विद्युत प्रभाव प्रसारित होता है जिससे सर्वत्र सत्यता का प्रकाश होता है। नैतिक माधुर्य जिस स्थान पर एकीभूत हो जाता है, उसी स्थान में समझ लो कि सच्चा माधुर्य तथा आत्मिक सौंदर्य विद्यमान है। अच्छाई देखने की आदत सौंदर्य रक्षा एवं शील रक्षा दोनों को समन्वय करने वाली है।

जो व्यक्ति गंदगी और मैल देखता है, वह दुराचारी, कुरूप, विषयी और कुकर्मी बनता है। अच्छाई को मन में रोकने से अच्छाई की वृद्धि होती है। दुष्प्रवृत्ति को रोकने से हिंसा, मारना, पीटना, ठगना, अनुचित भोग विलास इत्यादि बढ़ता है। यदि संसार में लोग नीर- क्षीर विवेक करने लगें और अपनी दुष्प्रवृत्तियों को निकाल दें, तो सतयुग आ सकता है और हम पुनः उन्नत हो सकते हैं।

-अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1946 पृष्ठ 19

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1946/December.19
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शुक्रवार, 11 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १३

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।

आप प्रेमी बनना चाहते हैं, तो पवित्र प्रेम का अभ्यास पहिले अपने घर से आरंभ कीजिए। प्रेम की प्रारंभिक पाठशाला अपना घर ही हो सकता है। घर के समस्त स्री-पुरुषों, बालक-बालिकाओं से निःस्वार्थ प्रेम करिए। फिर देखिए कि बदले में कितना अधिक प्रेम आपको प्राप्त होता है।

जानना चाहिए कि प्रेम का अर्थ है-त्याग और सेवा। आप घर के हर एक व्यक्ति के पक्ष में स्वार्थों को छोड़िए और जिसे जिस की आवश्यकता है, उसे वह प्रदान कीजिए। वृद्ध आप से शारीरिक सेवा  चाहते हैं, बालक आप के साथ हँसना-खेलना चाहते हैं, भाइयों को आपका आर्थिक सहयोग चाहिए,स्त्री को आपके स्नेह पूर्ण वार्तालाप की आवश्यकता है।
 
 जो जिस वस्तु को चाहता है, उसे वह प्रदान कीजिए परंतु ध्यान रखिए प्रेम कोई व्यापार नहीं है। एक हाथ से देकर दूसरे हाथ से माँगने की नीति प्रेमी को शोभा नहीं दे सकती। वृद्धों से आप आशा मत करिए कि वे आपकी प्रशंसा करें। न भाइयों से यह चाहिए कि कमाऊ होने के नाते आपको कुछ अधिक महत्त्व दें। स्त्री यदि आपकी इच्छानुसार  सेवा-सुभूषा करने में असमर्थ है, तो उस पर झुंझलाएँ मत,क्योंकि आप प्रेमी बनने जा रहे है। प्रेमी देकर माँग नहीं सकता।

दुनियाँ में सारे झगड़ों की जड यह है कि हम देते कम हैं और माँगते ज्यादा हैं। हमें चाहिए यह किं दें बहुत और बदला बिलकुल न माँगे या बहुत कम पाने की आशा रखें। यह नीति ग्रहण करते ही हमारे आसपास के सारे झगड़े मिट जाते हैं। प्रेमी त्याग करता है- उसका त्याग बेकार नहीं जाता, वरन हजार होकर लौट आता है। झगड़ा करने पर जितना बदला मिलता है, उससे अनेक गुना उसे बिना माँगे मिल जाता है। कदाचित कुछ कम भी मिले तो प्रेम से उत्पन्न होने वाले आंतरिक आनंद के मुकाबिले में वह कमी नगण्य है। निरंतर देते रहने का स्वभाव जिसके ह्दयों में स्थान कर लेता है, वह जानते हैं कि स्वर्गीय निर्धन आत्माएँ हर्षान्दोलित करने में कितनी समर्थ हैं। त्याग की दैवी वृत्तियाँ हमारे आसपास के वातावरण को स्वर्गीय संपदाओं से भर देती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २०

👉 भक्तिगाथा (भाग ११५)

श्रेष्ठ ही नहीं, सुलभ भी है भक्ति

महात्मा सत्यधृति, भक्त विमलतीर्थ के भक्ति अनुभव को कहते-सुनाते स्वयं में लीन हो गए थे। चिन्तन भक्त का हो या भगवान का, चित्त को परिशुद्ध, परिष्कृत कर ही देता है। भावनाएँ जब भी कभी भक्त अथवा भगवान के स्मरण से भीगती हैं, तब उनमें भक्ति का प्रादुर्भाव हो ही जाता है। महात्मा सत्यधृति अपने जीवनकाल में सम्राट थे। अखिल भूमण्डल पर राज्य था उनका। प्रजापालन, प्रजा का संरक्षण सर्वोपरि दायित्व था उनका। प्रशासन, न्याय व सुरक्षा, वह भी इतने व्यापक साम्राज्य की, ऐसे में उनके पास समय ही कहाँ था अन्य बातों के लिए। कठिन आध्यात्मिक साधनाएँ तो उनके वश में थी ही नहीं। यदि वह आसन, मुद्राओं का कठिन-जटिल अभ्यास करते, तो राज्य शासन के गुरुतर दायित्व कैसे निभते?

यम-नियम के दुःसाध्य व्रतों के साथ भला सैन्य संचालन किस तरह बन पड़ता? प्रत्याहार का अभ्यास करते हुए यदि वह मन व इन्द्रियों को अन्तर्लीन कर लेते तो बाह्य जगत् की परिस्थितियों की समयोचित व्यवस्था कैसे हो पाती? धारणा, ध्यान व समाधि के अनुकूल वह स्वयं ही अपने को नहीं मानते थे। हाँ, इतना अवश्य था कि उनमें आध्यात्मिक अभीप्सा अवश्य थी। जीवन की इन समस्त जटिलताओं की अनुभूति के साथ वह वह यह कामना अवश्य करते थे कि वह भी स्वयं के जीवन को सार्थक कर सकें। उनकी भावनाएँ भी भगवान में डूब सकें, ऐसी प्रार्थना वह परमेश्वर से जब-तब अवश्य कर लिया करते थे। अपने जीवन की जटिल दुरुहताओं को देख कर उन्हें निराशा भी होती और वे बहुधा सोचने लगते भला कैसे हो पाएगा यह सब? फिर तभी सोचने लगते भगवान तो करूणासिन्धु हैं, कोई न कोई मार्ग वह सुझाएँगे ही। अपने किसी न किसी प्रिय भक्त को अवश्य मेरे पास तक भेजेंगे।

अतीत की इन्हीं स्मृतियों से महात्मा सत्यधृति का मन सिंचित हो रहा था। काफी देर हो गयी थी, उन्हें यूं ही मौन बैठे हुए। सभी को उनके कुछ कहने की प्रतीक्षा थी पर उन्हें तो जैसे भावसमाधि हो गयी थी। देवर्षि नारद भी उनकी ओर देख रहे थे। लेकिन सत्यधृति की चेतना को जैसे चेत ही नहीं था। ऐसे में ब्रह्मर्षि वसिष्ठ ने स्थिति के संचालन सूत्र स्वयं के हाथों में लेते हुए कहा- ‘‘हे भक्तप्रवर देवर्षि! आप भक्ति का अपना अगला सूत्र कहें।’’ उत्तर में देवर्षि ने एक नजर महात्मा सत्यधृति की ओर देखते हुए धीमे स्वरों में कहा- ‘‘लेकिन महात्मा सत्यधृति तो अन्तर्लीन हैं, ऐसे में............?’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३०

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 11 March 2022

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 11 March 2022

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आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 2

साथियो! आपने हर हाल में समाज की सेवा की; लेकिन जब चुनाव में खड़े हुए, तो एमपी एमएलए के लिए लोगों ने आपको वोट नहीं दिया और दूसरे को दे दिया। इससे आपको बहुत धक्का लगा। आपने कहा कि भाई। हमने तो अटूट सेवा की थी; लेकिन जनता ने चुनाव में जीतने ही नहीं दिया। ऐसी खराब है जनता। भाड़ में जाये, हम तो अपना काम करते हैं। हमें चुनाव नहीं जीतना है।
 
उपासना में भी ऐसी ही निष्ठा की आवश्यकता है। आपने पत्थर की एकांगी उपासना की और एकांगी प्रेम किया। उपासना के लिए, पूजा करने के लिए हम जा बैठते हैं। धूपबत्ती जलाते हैं। धूपबत्ती क्या है? धूपबत्ती एक कैंडिल का नाम है। एक सींक का नाम है। एक लकड़ी का नाम है। वह जलती रहती है और सुगंध फैलाती रहती है।

सुगंध फैलाने में भगवान् को क्या कोई लाभ हो जाता है? हमारा कुछ लाभ हो जाता है क्या? हाँ, हमारा एक लाभ हो जाता है और वह यह कि इससे हमें ख्याल आता है कि धूप बत्ती के तरीके से और कंडी के तरीके से हमको भी जलना होगा और सारे समाज में सुगंध फैलानी होगी। इसलिए हमारा जीवन सुगंध वाला जीवन, खुशबू वाला जीवन होना चाहिए।

धूपबत्ती भी जले और हम भी जलें जलने से सुगंध पैदा होती है। धूपबत्ती को रखा रहने दीजिए और उससे कहिए कि धूपबत्ती सुगंध फैलाएँगी धूपबत्ती कहती है कि मैं तो नहीं फैलाती। क्यों? जलने पर सुगंध फैलाई जा सकती है। जलना होगा। इसीलिए मनुष्य को जीवन में जलना होता है। धूपबत्ती की तरह से सुगंध फैलानी पड़ती है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: ११

अकेला चलो

महान व्यक्ति सदैव अकेले चले हैं और इस अकेलेपन के कारण ही दूर तक चले हैं। अकेले व्यक्तियों ने अपने सहारे ही संसार के महानतम कार्य संपन्न किए हैं। उन्हें एकमात्र अपनी ही प्रेरणा प्राप्त हुई है। वे अपने ही आंतरिक सुख से सदैव प्रफुल्लित रहे हैं। दूसरे से दु:ख मिटाने की उन्होंने कभी आशा नहीं रखी। निज वृतियों में ही उन्होंने सहारा नहीं देखा।

अकेलापन जीवन का परम सत्य है। किंतु अकेलेपन से घबराना, जी तोडऩा, कर्तव्यपथ से हतोत्साहित या निराश होना सबसे बड़ा पाप है। अकेलापन आपके निजी आंतरिक प्रदेश में छिपी हुई महान शक्तियों को विकसित करने का साधन है। अपने ऊपर आश्रित रहने से आप अपनी उच्चतम शक्तियों को खोज निकालते हैं।

~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 Lose Not Your Heart Day 11
Walk Alone

Great men go far on their paths because they walk alone. Their inspiration comes from within. They alone spur their happiness and remove their sadness and they are helped along only by their own ideas.

Loneliness is an undeniable truth. To be afraid of it, feel inferior because of it, or lose sight of your duties because of it is the greatest sin. What you believe to be loneliness is actually a kind of solitude, given to you to develop your own inner strength. When you depend on yourself, you are better able to realize your full potential.

 ~ Pt. Shriram Sharma Acharya

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गुरुवार, 10 मार्च 2022

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 10 March 2022


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 10 March 2022

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 1

गायत्री मंत्र हमारे साथ साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥


देवियो भाइयो!


यह दुनिया बड़ी निकम्मी है। पड़ोसी के साथ आपने जरा सी भलाई कर दी, सहायता कर दी, तो वह चाहेगा कि और ज्यादा मदद कर दे। नहीं करेंगे, तो वह नेकी करने वाले की बुराई करेगा। दुनिया का यह कायदा है कि आपने जिस किसी के साथ में जितनी नेकी की होगी, वह आपका उतना ही अधिक बैरी बनेगा। उतना ही अधिक दुश्मन बनेगा; क्योंकि जिस आदमी ने आपसे सौ रुपये पाने की इच्छा की थी और आपने उसे पन्द्रह रुपये दिये। भाई, आज तो तंगी का हाथ है, पंद्रह रुपये हमसे ले जाओ और बाकी कहीं और से काम चला लेना।

पंद्रह रुपये आपने उसे दे दिये और वह आपके बट्टे खाते में गये, क्योंकि आपने पचासी रुपये दिये ही नहीं। इसलिए वह नाराज है कि पचासी रुपये भी दे सकता था, अपना घर बेचकर दे सकता था। कर्ज लेकर दे सकता था अथवा और कहीं से भी लाकर दे सकता था; लेकिन नहीं दिया। वह खून का घूँट पी करके रह जायेगा और कहेगा कि बड़ा चालाक आदमी है।

मित्रो! दुनिया का यही चलन है। दुनिया में आप कहीं भी चले जाइये, दुनिया की ख्वाहिशें बढ़ती चली जाती हैं कि हमको कम दिया गया। हमको ज्यादा चाहिए। असंतोष बढ़ता चला जाता है। और यह असंतोष अन्ततः वैर और रोष के रूप में परिणत हो जाता है। मित्रो, यह ऐसी ही निकम्मी दुनिया है। इस निकम्मी दुनिया में आप सदाचारी कैसे रह सकते हैं? जब कि आपके मन में पत्थर की उपासना करने की विधि न आये। पत्थर की उपासना करने का आनन्द जब आपके जी में आ जायेगा, उस दिन आप समझ जायेंगे कि इससे कोई फल मिलने वाला नहीं है।

कोई प्रशंसा मिलने वाली नहीं है और कोई प्रतिक्रिया होने वाली नहीं है। यह भाव आपके मन में जमता हुआ चला जाय, तो मित्रो! आप अन्तिम समय तक, जीवन की अंतिम साँस तक नेकी और उपकार करते चले जायेंगे, अन्यथा आपकी आस्थाएँ डगमगा जायेंगी।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/44.2

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १०

अंतःकरण के धन को ढ़ूंढो

तुम्हें अपने मन को सदा कार्य में लगाए रखना होगा। इसे बेकार न रहने दो। जीवन को गंभीरता के साथ बिताओ। तुम्हारे सामने आत्मोन्नति का महान कार्य है और पास में समय थोड़ा है। यदि अपने को असावधानी के साथ भटकने दोगे तो तुम्हें शोक करना होगा और इससे भी बुरी स्थिति को प्राप्त होगे।

धैर्य और आशा रखो तो शीघ्र ही जीवन की समस्त स्थिति का सामना करने की योग्यता तुम में आ जाएगी। अपने बल पर खड़े हेाओ। यदि आवश्यक हो तो समस्त संसार को चुनौती दे दो। परिणाम में तुम्हारी हानि नहीं हो सकती। तुम केवल सबसे महान से संतुष्ट रहो। दूसरे भौतिक धन की खोज करते हैं और तुम अंत:करण के धन केा ढूंढो।

 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 Lose Not Your Heart Day 10
Look for the Treasure Within Yourself


Keep your mind engaged in useful tasks; do not let it go idle. Take life seriously. The task of spiritual growth is before you, and time is very short. If you are led astray by your own negligence, you alone will have to pay the price.

Patience and hope will enable you to face any situation. Stand on your own feet and challenge the entire world if you need to, but you should only be satisfied after attaining your highest goals. When others look outside for worldly treasure, look inside for the treasure within yourself.

~Pt. Shriram Sharma Acharya
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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक: ९

नम्रता, सरलता, साधुता, सहिष्णुता

सहिष्णुता का अभ्यास करो। अपने उत्तरदायित्व को समझो। किसी के दोषों को देखने और उन पर टीका- टिप्पणी करने के पहले अपने बड़े- बड़े दोषों का अन्वेषण करो। यदि अपनी वाणी कानियत्रंण नहीं कर सकते तो उसे दूसरों के प्रतिकूल नहीं बल्कि अपने प्रतिकूल उपदेश करने दो।

सबसे पहले अपने घर को नियमित बनाओ क्योंकि बिना आचरण के आत्मानुभव नहीं हो सकता।नम्रता, सरलता,, साधुता,, सहिष्णुता ये सब आत्मानुभव के प्रधान अंग हैं।
दूसरे तुम्हारे साथ क्या करते हैं इसकी चिंता न करो। आत्मोन्नति में तत्पर रहो। यदि यह तथ्य समझ लिया तो एक बड़े रहस्य को पा लिया।

~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 Lose Not Your Heart Day 9
Courtesy, Simplicity, Empathy, Compassion


It is your responsibility to cultivate courtesy, simplicity, empathy, and compassion. Before looking for and criticizing faults in others, address the glaring flaws in yourself. If you are unable to control your speech, use it against yourself instead of others.

First, discipline yourself. Without discipline, you cannot experience your true nature. Courtesy, simplicity, empathy, and compassion are all manifestations of this true nature.

Disregard how others treat you and stay focused on your own growth. If you can grasp this, you have understood a great secret.

~Pt. Shriram Sharma Acharya

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मंगलवार, 8 मार्च 2022

👉 बुढ़ापा

"मम्मा ये बताओ, दादा दादी आपको बहुत परेशान करते हैं ना.."
"हाँ बेटा पर क्या कर सकते हैं.. अब हैं यहाँ तो झेलना ही पड़ेगा |"
"पर क्यूँ मम्मा... क्यूँ झेलना पड़ेगा"

"तुम नही समझोगे रहने दो"

"एक काम करते हैं मम्मा, इन दोनो को चाचा चाची के घर भेज देते हैं"
"वो वहाँ दो दिन भी नही रह पायेंगे बेटा.. चाची तो दादी को देखते ही तुनक जाती है और चाचा तो तुम्हारे चाची के पल्ले से ऐसे बँधे हैं कि वो उतना ही सुनते हैं जितना चाची कहती है | वहाँ इनका कोई गुज़ारा नही होने वाला | "

"तो बुआ को बोल दो ना ये उनके भी तो माँ पापा हैं ना , वो ही ले जायें कुछ दिनों के लिए इन दोनो को| "

"तुम भी ना बड़े भोले हो बेटा.. वहाँ नही जायेंगे दादा दादी.. ढकोसला करेंगे कि हम तो बेटी के घर का पानी भी नही पी सकते तो वहाँ जा कर रहेंगे कैसे और अगर रहने को तैयार हो भी गये तो तुम्हारी बुआ के पचासों बहाने निकल आयेंगे | वो कम थोड़े ना है, वो भी तो अपनी माँ पर ही गयी है | "

"क्या मम्मा मतलब कोई इन्हे अपने साथ नही रखना चाहता | एक काम करो मम्मा इन्हे वहाँ पहुँचा दो... वो मैने टीवी पर देखा था कुछ ओल्ड ऐज होम टाइप से है.. अरे वो जो उस दिन मूवी में आ रहा था | "

"वृद्धाआश्रम कहते हैं उसे ... मैं भी थक जाती हूँ काम कर के.. सुबह उठने से सोने तक इनके नखरे झेलना... तौबा तौबा... कब तक आखिर .. मैं भी कुछ दिन और देख रही हूँ..नहीं तो तुम्हारे पापा से बात करूँगी कि वो इन दोनो को वहीं छोड़ आये |"

"हाँ यही ठीक रहेगा.. दादी दिन भर टोकती रहती है.. टीवी मत देखो, मोबाइल मत खेलो..... मैं बच्चा थोड़े ना हूँ.. बड़ा हो रहा हूँ मैं... समझदार हो रहा हूँ.. ये भी कोई बात हुयी भला. .. हुँ...ह |"

"अरे मेरा राजा बेटा...इतना गुस्सा.... दस साल के ही हो अभी.. मेरी आँखो के तारे हो तुम.... इतनी जल्दी बड़े हो जाओगे कभी सोचा ही नही था | अब देखो तुम बड़े होते जाओगे और हम बूढ़े होते जाएँगे | फिर तुम्हारी शादी करेंगे.. प्यारी सी दुल्हनियाँ लायेंगे | "

"नहीं मम्मा प्लीज़.... मैं तो बड़ा हो रहा हूँ पर आप लोग प्लीज़ बूढ़े मत होना |"
"हा हा हा क्यूँ बेटा.. बूढ़ा तो सबको ही होना है एक दिन "

"पर मम्मा आप लोग बूढ़े हो जाओगे और मेरी वाइफ आयेगी तो उसे भी ऐसे ही परेशान होना पड़ेगा ना.. वो भी तरह तरह के आईडिया सोचेगी कि कैसे आप लोगों को यहाँ से हटाया जाये..  नो मम्मा प्लीज़ नो..आप भी दादी की तरह हो जाओगी और मेरी वाइफ को परेशान करोगी .... . मैं ऐसा नही होने दूँगा... एक काम करूँगा.. मैं मेरी शादी होते ही आप दोनों के लिए ओल्ड ऐज होम बुक करवा दूँगा जहाँ आप लोग रह सकोगे और मैं और मेरी वाइफ भी चैन से रह लेंगे |"

"हुँ...ह.. हमारा घर है हमारे पास... तुम रहना अपने घर में अपनी वाइफ को लेकर | यही करोगे तुम... पाल पोस कर बड़ा कर रहे हैं और तुम हमें वृद्धा आश्रम भेजने की तैयारी कर रहे हो | वाह बेटा वाह... | "

"मम्मा.. मैं कहाँ कुछ गलत कह रहा हूँ | दादा दादी ने भी तो पापा बुआ को पाला पोसा ही होगा ना...सभी माँ बाप पालते हैं अपने बच्चों को, उसमें क्या नया है... . पर अब जब सब बड़े हो गये हैं तो कोई बूढ़े लोगों को अपने पास नही रखना चाहता तो भला मैं क्यूँ रखूँगा, परेशानी बढ़ाते हैं ये बूढ़े लोग | मैं भी नही रखूँगा और साइंटिस्ट बन कर कोई ऐसी दवा बनाऊँगा जिससे कि मैं कभी बूढ़ा ही ना हो पाऊँ और मेरे बच्चों को कोई ओल्ड ऐज होम ना ढूँढना पड़े |"

अपने बेटे की बातें सुन माँ के शरीर में सिहरन सी दौड़ गयी और जिन आँखो में कुछ देर पहले परेशानी, व्यथा, गुस्सा दिख रहा था उन्ही आँखो में अब शर्म पानी का रूप ले चुका थी |

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 8 March 2022


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 8 March 2022


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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: ८

अपने आपकी समालोचना करो

जो कुछ हो, होने दो। तुम्हारे बारे में जो कहा जाए उसे कहने दो। तुम्हें ये सब बातें मृगतृष्णा के जल के समान असार लगनी चाहिए। यदि तुमने संसार का सच्चा त्याग किया है तो इन बातों से तुम्हें कैसे कष्ट पहुँच सकता है। अपने आपकी समालोचना में कुछ भी कसर मत रखना तभी वास्तविक उन्नति होगी।

प्रत्येक क्षण और अवसर का लाभ उठाओ। मार्ग लंबा है। समय वेग से निकला जा रहा है। अपने संपूर्ण आत्मबल के साथ कार्य में लग जाओ, लक्ष्य तक पहुँचोगे।

किसी बात के लिए भी अपने को क्षुब्ध न करो। मनुष्य में नहीं, ईश्वर में विश्वास करो। वह तुम्हें रास्ता दिखाएगा और सन्मार्ग सुझाएगा।

~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 Lose Not Your Heart Day 8
Introspect


Whatever happens, let it happen. Whatever is said about you, let it be said. You should consider these things as illusory as a mirage. If you have really detached yourself from the world, then why should such things affect you? Focus on inspecting yourself thoroughly for weaknesses. Only then can you begin the process of growth.

Take advantage of every moment and every opportunity. Your path is very long, and time is very short. Concentrate your inner strength on reaching your goal.

Do not despair in any situation. Have faith not in the capacity of man, but in the capacity of God. God will show you the right path.

~ Pt. Shriram Sharma Acharya

सोमवार, 7 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १२

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।

निःसंदेह आत्मा प्रेममय है। उसे सुख अपने विषय में ही प्राप्त होता है। मछली को पानी में आनंद है, इसके अतिरिक्त और कहीं चैन नहीं। प्राणी का मन तब तक शांति लाभ नहीं कर सकता जब तक कि वह प्रेम में निमग्न न हो जाए। जब तक प्यास नहीं बुझती तब तक हम इधर-उधर भटकते हैं और जब मधुर शीतल जल भर पेट पीने को मिल जाता है तो चित्त ठिकाने आ जाता है, संतोष लाभ करके एक स्थान पर बैठ जाते हैं। सर्प का जब पेट भर जाता है तो वह अपने बिल में प्रवेश कर जाता है, बाहर की उसे कुछ जरूरत नहीं रहती। सीप समुद्र के ऊपर उतराती फिरती है, पर जब स्वाति की बूँद उसमें पड़ जाती है तो मोती को प्राप्त करके समुद्र की तली में बैठ जाती है। आत्मा प्रेम का आनंद लूटने इस भूमण्डल पर आई है, अपनी प्रिय वस्तु को ढूँढने के इधर-उधर भटकती फिरती है। जिस दिन उसे इच्छित वस्तुएँ प्राप्त हो जाएँगी उसी दिन तृप्ति लाभ करके अपने परमधाम को लौट जाएँगी। भव भ्रमण और मुक्ति का यही धर्म है।

हमें बार-बार जन्म इसलिए धारण करना पड़ता है कि प्रेम की प्यास बुझा नहीं पाते। मोह-ममता की मृगतृष्णा में मारे-मारे फिरते हैं भव-बंधनों में उलझते फिरते हैं। जिस दिन हमें सद्गुरु की कृपा से यह समझ आ जाएगा कि जीवन का सार प्रेम है, उस दिन हम शाश्वत प्रेम को अपने अंतःकरण में से ढूँढ निकालेंगे।
 
अंतःकरण में जिस दिन प्रेम भक्ति का अविरल  स्त्रोत फूट निकलेगा, जिस दिन प्रेम गंगा में आत्मा स्नान कर लेगी, जिस दिन प्रेम का सागर हमारे चारों ओर लहरावेगा, उसी दिन आत्मा को तृप्ति मिल जाएगी और वह अपने धाम को लौट जाएगी। सच्चा प्रेमी अपने सुखों की भी इच्छा नहीं करता वरन जिस पर प्रेम करता है उसके सुख  पर अपने सुख को उत्सर्ग कर देता है। लेने का उसे ध्यान भी नहीं, देना ही एक मात्र उसका कर्त्तव्य हो जाता है। जिसके हृदय में प्रेम की ज्योति जलेगी वह गोरे चमडे पर फिसल कर अपने चमारपन का परिचय न देगा और न व्यभिचार की कुदृष्टि रखकर अपनी आत्मा को पाप पंक में घसीटेगा। वह किसी स्त्री के रंग, चमक-दमक, हाव-भाव या स्वर कंठ पर मुग्ध नहीं होगा वरन किसी देवी में उज्ज्वल कर्त्तव्य का दर्शन करेगा तो उसको झुककर प्रणाम करेगा। प्रेमी का दम तो बेकाबू हो सकता है पर दिमाग काबू में रहेगा। वह दूसरों के सुख के लिए त्याग करने में अपने को बेकाबू पावेगा परतु किसी को पतन के मार्ग पर घसीटने का स्मरण आते ही उसकी आत्मा कांप जाएगी। इस दशा में उसका एक कदम भी आगे नहीं बढ सकता। अपने प्रेम पात्र को बदनामी, पतन, दुख, भ्रम और नरक में घसीटने वाला व्यक्ति किसी भी प्रकार प्रेमी नहीं कहा जा सकता, वह तो नरक का कीड़ा है जो अपनी विषय ज्वाला में जलाने के लिए प्रेम पात्र को फँसाकर काँटों में घसीटता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १९

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👉 भक्तिगाथा (भाग ११४)

भक्ति की श्रेष्ठतम अवस्था

भक्त विमलतीर्थ की भक्तिगाथा को सुनाते हुए महात्मा सत्यधृति को ऐसी कितनी ही बीती स्मृतियों ने उन्हें घेर लिया। इन क्षणों में उनके आस-पास बैठा हुआ ऋषियों-महर्षियों एवं देवगणों का समुदाय प्रतीक्षा कर रहा था कि महात्मा सत्यधृति कुछ कहें। लेकिन इस समय तो वह स्वयं में लीन थे। यह स्थिति काफी देर तक बनी रही। कोई कुछ नहीं बोला, बस चतुर्दिक मौन पसरा रहा। नीरवता की सघनता सब ओर व्याप्त रही। यह स्थिति पता नहीं कितनी देर तक और बनी रहती, परन्तु ब्रह्मर्षि क्रतु के शब्दों ने नीरव में रव घोल दिया। उन्होंने सत्यधृति को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘‘महात्मन्! हम सभी आपके अनुभवों को ग्रहण करने के लिए उत्सुक हैं।’’

ब्रह्मर्षि क्रतु के इस कथन पर महात्मा सत्यधृति पहले तो मुस्कराए, फिर हल्के हास्य के साथ बोले- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! मुझे भी उत्सुकता है देवर्षि नारद के नवीन सूत्र की।’’ सत्यधृति के इस कथन के साथ ही सबकी दृष्टि देवर्षि की ओर घूम गयी जो इस समय शान्त-मौन बैठे हुए किसी चिन्तन में लीन थे। सबके इस अचानक ध्यानाकर्षण से देवर्षि के चिन्तन की कड़ियों में एक अनोखी झंकृति हुई और उन्होंने मधुर मन्द मुस्कान के साथ अपने नए सूत्र का उच्चारण किया-

‘उत्तरस्मादुत्तर-स्मात्पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति’॥ ५७॥
(उनमें) उत्तर-उत्तर कम से पूर्व-पूर्व की भक्ति कल्याणकारिणी होती है।

देवर्षि के इस सूत्र को सुनकर देर तक मौन बने रहे महात्मा सत्यधृति अब मुखर हो गए। उन्होंने कहना शुरू किया- ‘‘पिता महाराज की आज्ञा से मैं भक्त विमलतीर्थ से मिला था। उन्होंने अपने जीवनकाल में भक्ति के सभी रूप अनुभव किए थे। जिस समय मेरी भेंट उनसे हुई, उस समय वह गौणी भक्ति की सभी कक्षाओं को पार करके पराभक्ति में प्रतिष्ठित थे। भगवान सदाशिव का नित्य साहचर्य उन्हें प्राप्त था। उनके जीवन की प्रत्येक क्रिया, भक्ति में भीगी थी। उनके द्वारा बोला जाने वाला प्रत्येक शब्द, भक्ति के अमृतरस से सना था। उन्होंने ही आग्रहपूर्वक मुझे वह अपनी अनुभवकथा सुनायी थी, जिसे मैंने आप सभी को सुनाया।

वह स्वयं जब अपने इन बीते अनुभवों को याद करते थे, तो हँस पड़ते थे। एक दिन ऐसे ही उन्होंने मुझे हँसते हुए कहा था- पुत्र! जीव का जीवन और जगत सब का सब, सदाशिव की लीला ही है। लेकिन यह लीला तब तक समझ में नहीं आती जब तक जीवात्मा प्रकृति के गुणों के प्रबली सम्मोहन में रहती है। जैसे-जैसे यह सम्मोहन हटता है, वैसे-वैसे अनुभव होता है कि तामसी भक्ति से राजसी भक्ति श्रेष्ठ है, राजसी भक्ति से सात्त्विकी भक्ति श्रेष्ठ है और इन सभी तीनों से पराभक्ति श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें कोई आकांक्षा नहीं है। पराभक्ति की अवस्था विशुद्ध भगवान व भक्त के परस्पर प्रेम की अवस्था है। यहाँ किसी तरह का कोई लेन-देन नहीं है। भक्त इस अवस्था में सहज अनुभव करता है कि जीवन की सभी घटनाएँ भगवान की लीला के सिवाय और कुछ भी नहीं।

इस स्पष्ट अनुभव के बाद जीवन की सोच, जीवन की दृष्टि एवं जीवन के अनुभव सभी बदल जाते हैं। उस अवस्था में दुःख और सुख दोनों ही अपना अस्तित्त्व खो देते हैं। दुःख में दुःख का अहसास नहीं होता और सुख अपना कोई आकर्षण मन पर जमा नहीं पाता। बस एक सत्य जीवन के प्रत्येक घटनाक्रम में समाया दिखता है कि इन सभी घटनाओं में से प्रत्येक चित्तशुद्धि के लिए आवश्यक है। यदि इनमें से किसी भी घटनाक्रम को रोका गया तो चित्त की सम्पूर्ण शुद्धि न हो सकेगी और ऐसा हुए बगैर भक्ति की समग्रता जीवन में फलित न होगी।’’

महात्मा सत्यधृति ने देवर्षि नारद की ओर मीठे स्नेह से देखते हुए कहा- ‘‘हे देवर्षि! आप तो भगवान नारायण को परमप्रिय हैं। आप तो भक्ति के तत्त्व के परम ज्ञाता और विशद् मर्मज्ञ हैं। जबकि मेरा निजी अनुभव कुछ विशेष नहीं है। बस मैंने तो अपने जीवनकाल में प्रभुभक्तों के अनुभवों को सुना, बटोरा और स्वयं में इन्हें बोया और सींचा है। इन अनुभवों की कथा, विशेष तौर पर भक्त विमलतीर्थ के संग ने मुझे भक्ति का पावन स्पर्श प्रदान किया है। उन्हीं से मैंने यह जाना है कि आकांक्षा कोई भी और कैसी भी क्यों न हो, उससे भक्ति का  स्वरूप कभी निखर नहीं पाता। आकांक्षा का कोई भी रूप, प्यार को व्यापार में बदल देता है और इससे भक्ति की निष्कपट भावनाएँ दूषित एवं विक्षुब्ध हो जाती हैं।

इसीलिए तामसी भक्ति से राजसी भक्ति कहीं ज्यादा उचित है। जबकि राजसी से सात्त्विक भक्ति कहीं अधिक औचित्यपूर्ण है। और पराभक्ति! यहाँ तो आकांक्षा का निशान ही नहीं है। इसलिए यह श्रेष्ठतम है। जो इस अवस्था में जीता है, उसमें ही यथार्थ भक्ति प्रतिष्ठित है। यहाँ तो बस कृतज्ञता है, प्रार्थना है, अस्तित्त्व का अर्पण है, व्यक्तित्व का विसर्जन है, सर्वस्व का समर्पण है। यहाँ बूंद का सागर में स्वाभाविक विलय है। इस अवस्था में भक्त का रोम-रोम अनुभव करता है-

क्या पूजन क्या अर्चन रे!
पदरज को धोने उमड़े आते  
लोचन में जलकण रे!
अक्षत पुलकित रोम,
मधुर मेरी पीड़ा का कम्पन रे!
क्या पूजन क्या अर्चन रे!’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २२८

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👉 राजा बड़ा या संत

एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य ...