सोमवार, 7 मार्च 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग ११४)

भक्ति की श्रेष्ठतम अवस्था

भक्त विमलतीर्थ की भक्तिगाथा को सुनाते हुए महात्मा सत्यधृति को ऐसी कितनी ही बीती स्मृतियों ने उन्हें घेर लिया। इन क्षणों में उनके आस-पास बैठा हुआ ऋषियों-महर्षियों एवं देवगणों का समुदाय प्रतीक्षा कर रहा था कि महात्मा सत्यधृति कुछ कहें। लेकिन इस समय तो वह स्वयं में लीन थे। यह स्थिति काफी देर तक बनी रही। कोई कुछ नहीं बोला, बस चतुर्दिक मौन पसरा रहा। नीरवता की सघनता सब ओर व्याप्त रही। यह स्थिति पता नहीं कितनी देर तक और बनी रहती, परन्तु ब्रह्मर्षि क्रतु के शब्दों ने नीरव में रव घोल दिया। उन्होंने सत्यधृति को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘‘महात्मन्! हम सभी आपके अनुभवों को ग्रहण करने के लिए उत्सुक हैं।’’

ब्रह्मर्षि क्रतु के इस कथन पर महात्मा सत्यधृति पहले तो मुस्कराए, फिर हल्के हास्य के साथ बोले- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! मुझे भी उत्सुकता है देवर्षि नारद के नवीन सूत्र की।’’ सत्यधृति के इस कथन के साथ ही सबकी दृष्टि देवर्षि की ओर घूम गयी जो इस समय शान्त-मौन बैठे हुए किसी चिन्तन में लीन थे। सबके इस अचानक ध्यानाकर्षण से देवर्षि के चिन्तन की कड़ियों में एक अनोखी झंकृति हुई और उन्होंने मधुर मन्द मुस्कान के साथ अपने नए सूत्र का उच्चारण किया-

‘उत्तरस्मादुत्तर-स्मात्पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति’॥ ५७॥
(उनमें) उत्तर-उत्तर कम से पूर्व-पूर्व की भक्ति कल्याणकारिणी होती है।

देवर्षि के इस सूत्र को सुनकर देर तक मौन बने रहे महात्मा सत्यधृति अब मुखर हो गए। उन्होंने कहना शुरू किया- ‘‘पिता महाराज की आज्ञा से मैं भक्त विमलतीर्थ से मिला था। उन्होंने अपने जीवनकाल में भक्ति के सभी रूप अनुभव किए थे। जिस समय मेरी भेंट उनसे हुई, उस समय वह गौणी भक्ति की सभी कक्षाओं को पार करके पराभक्ति में प्रतिष्ठित थे। भगवान सदाशिव का नित्य साहचर्य उन्हें प्राप्त था। उनके जीवन की प्रत्येक क्रिया, भक्ति में भीगी थी। उनके द्वारा बोला जाने वाला प्रत्येक शब्द, भक्ति के अमृतरस से सना था। उन्होंने ही आग्रहपूर्वक मुझे वह अपनी अनुभवकथा सुनायी थी, जिसे मैंने आप सभी को सुनाया।

वह स्वयं जब अपने इन बीते अनुभवों को याद करते थे, तो हँस पड़ते थे। एक दिन ऐसे ही उन्होंने मुझे हँसते हुए कहा था- पुत्र! जीव का जीवन और जगत सब का सब, सदाशिव की लीला ही है। लेकिन यह लीला तब तक समझ में नहीं आती जब तक जीवात्मा प्रकृति के गुणों के प्रबली सम्मोहन में रहती है। जैसे-जैसे यह सम्मोहन हटता है, वैसे-वैसे अनुभव होता है कि तामसी भक्ति से राजसी भक्ति श्रेष्ठ है, राजसी भक्ति से सात्त्विकी भक्ति श्रेष्ठ है और इन सभी तीनों से पराभक्ति श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें कोई आकांक्षा नहीं है। पराभक्ति की अवस्था विशुद्ध भगवान व भक्त के परस्पर प्रेम की अवस्था है। यहाँ किसी तरह का कोई लेन-देन नहीं है। भक्त इस अवस्था में सहज अनुभव करता है कि जीवन की सभी घटनाएँ भगवान की लीला के सिवाय और कुछ भी नहीं।

इस स्पष्ट अनुभव के बाद जीवन की सोच, जीवन की दृष्टि एवं जीवन के अनुभव सभी बदल जाते हैं। उस अवस्था में दुःख और सुख दोनों ही अपना अस्तित्त्व खो देते हैं। दुःख में दुःख का अहसास नहीं होता और सुख अपना कोई आकर्षण मन पर जमा नहीं पाता। बस एक सत्य जीवन के प्रत्येक घटनाक्रम में समाया दिखता है कि इन सभी घटनाओं में से प्रत्येक चित्तशुद्धि के लिए आवश्यक है। यदि इनमें से किसी भी घटनाक्रम को रोका गया तो चित्त की सम्पूर्ण शुद्धि न हो सकेगी और ऐसा हुए बगैर भक्ति की समग्रता जीवन में फलित न होगी।’’

महात्मा सत्यधृति ने देवर्षि नारद की ओर मीठे स्नेह से देखते हुए कहा- ‘‘हे देवर्षि! आप तो भगवान नारायण को परमप्रिय हैं। आप तो भक्ति के तत्त्व के परम ज्ञाता और विशद् मर्मज्ञ हैं। जबकि मेरा निजी अनुभव कुछ विशेष नहीं है। बस मैंने तो अपने जीवनकाल में प्रभुभक्तों के अनुभवों को सुना, बटोरा और स्वयं में इन्हें बोया और सींचा है। इन अनुभवों की कथा, विशेष तौर पर भक्त विमलतीर्थ के संग ने मुझे भक्ति का पावन स्पर्श प्रदान किया है। उन्हीं से मैंने यह जाना है कि आकांक्षा कोई भी और कैसी भी क्यों न हो, उससे भक्ति का  स्वरूप कभी निखर नहीं पाता। आकांक्षा का कोई भी रूप, प्यार को व्यापार में बदल देता है और इससे भक्ति की निष्कपट भावनाएँ दूषित एवं विक्षुब्ध हो जाती हैं।

इसीलिए तामसी भक्ति से राजसी भक्ति कहीं ज्यादा उचित है। जबकि राजसी से सात्त्विक भक्ति कहीं अधिक औचित्यपूर्ण है। और पराभक्ति! यहाँ तो आकांक्षा का निशान ही नहीं है। इसलिए यह श्रेष्ठतम है। जो इस अवस्था में जीता है, उसमें ही यथार्थ भक्ति प्रतिष्ठित है। यहाँ तो बस कृतज्ञता है, प्रार्थना है, अस्तित्त्व का अर्पण है, व्यक्तित्व का विसर्जन है, सर्वस्व का समर्पण है। यहाँ बूंद का सागर में स्वाभाविक विलय है। इस अवस्था में भक्त का रोम-रोम अनुभव करता है-

क्या पूजन क्या अर्चन रे!
पदरज को धोने उमड़े आते  
लोचन में जलकण रे!
अक्षत पुलकित रोम,
मधुर मेरी पीड़ा का कम्पन रे!
क्या पूजन क्या अर्चन रे!’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २२८

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