सोमवार, 13 दिसंबर 2021

👉 माँसाहार या शवाहार

मित्रों !! जिसे हम मांस कहते हैं वह वास्तव में क्या है?आत्मा के निकल जाने के बाद पांच तत्व का बना आवरण अर्थात शरीर निर्जीव होकर रह जाता है।यह निर्जीव,मृत अथवा निष्प्राण शरीर ही लाश या शव कहलाता है। यह शव आदमी का भी हो सकता है और पशु का भी।इस शव को बहुत अशुभ माना जाता है।

इसकी भूत मिट्टी आदि निकृष्ट चीजों से तुलना की जाती है।

यदि कोई इसे छू लेता है तो उसे स्नान करना पड़ता है। जिस घर में यह रखा रहता है उस घर को अशुद्ध माना जाता है। और वहां खाना बनना तो दूर कोई पानी भी नहीं पीना चाहता। इसको देखकर कई लोग तो डर भी जाते हैं क्योंकि आत्मा के निकल जाने पर यह अस्त-व्यस्त और डरावना हो जाता है।

मांसाहार करने वाले लोग इसी शव को  या लाश को खाते हैं। इसलिए यह मांसाहार !! शवाहार या लाशाहार ही है।

आधुनिक पात्रों में जंगली खाना
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कहा जाता हैं कि प्राचीन समय में जब सभ्यता का विस्तार नहीं हुआ था उस समय मानव जंगल में रहता था। तो उसके पास जीवन में उपयोगी साधनों का अभाव था। उस समय पेट भरने के लिए वह जंगली जानवरों का कच्चा मांस खा लेता था।

धीरे-धीरे कृषि प्रारंभ हुई अनेक प्रकार के खादों का उत्पादन हुआ, शहर बसे और मानव ने अनेक जीवन उपयोगी साधनों का आविष्कार कर उस  आदिम जंगली जीवन को तिलांजलि दे दी। उस समय की भेंट में आज उसके पास मकान, वस्त्र, जूते, बर्तन, मोटर, कम्प्यूटर आदि सब उत्तम प्रकार के आरामदायक साधन है।

उपरोक्त तथ्य यदि सत्य है तो मानव ने काफी विकास कर लिया है। वह हाथ में लेकर खाने के बजाए, पत्तों ऊपर रखकर खाने के बजाय आधुनिक डिजाइन की प्लेस में चम्मच के प्रयोग से खाता है। डाइनिंग टेबल पर बैठना भी उसने सीख लिया। परंतु प्रश्न यह है कि वह खाता क्या है? उसकी प्लेट में है क्या?

यदि इतनी साज सज्जा, रखरखाव को अपना कर, इतना विकास करके भी उसकी प्लेट पर रखा आहार यदि आदिम काल वाला ही है, यदि इतना विकास करके भी वह उस जंगली मानव वाले खाने को ही अपनाए हुए हैं तो विकास क्या किया?

यह तो वही बात हुई कि मटका मिट्टी के स्थान पर सोने का हो गया पर अंदर पड़ा पदार्थ जहर का जहर ही रहा।यदि सभ्यता ने विकास किया तो क्या सिर्फ बर्तनों और डाइनिंग टेबल कुर्सियों तक ही विकास किया?

क्‍या खाने के नाम पर सभ्यता नहीं आई? फर्क  इतना ही तो है उस समय जानवर को मारने के तरीके दूसरे थे और आजकल तीव्रगति वाली मशीनें यह कार्य कर देती है परंतु मुख तो अपने को मानव कहलाने वाले का ही है। मारने के हथियार बदल गए परंतु खाने वाला मुख तो नहीं बदला। मुख तो मानव का ही है।

पेट बन गया शमशान
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शव को जब श्मशान में ले जाते हैं तो उसे चिता पर लिटा कर आग लगाई जाती है। परंतु मानव को देखिए, वह शव को अथवा शव के टुकड़ों को रसोईघर में ले जाता है। फिर उस को रसोईघर के बर्तनों में पकाता है। तो उसकी रसोई क्या हो गई? श्मशान ही बन गई ना! तो फिर उस लाश को मुंह के माध्यम से पेट में डालता हैं। सच पूछो तो ऐसे व्यक्ति के घर की हवा भी पतित बनाने वाली है।

संत तुकाराम कहते हैं कि पापी मनुष्य यह नहीं देख पाता है कि सभी प्राणियों में प्राण एक सरीका होता है। जो व्यक्ति ना तो स्वयं कष्ट पाना चाहता है, ना मरना चाहता है वह निष्ठुरता पूर्वक दूसरों पर हाथ कैसे उठाता है?

वास्तव में मांस खाने वाले को इस शब्द का अर्थ समझना चाहिए मांस अर्थार्थ माम्सः मेरा वह।
जिसको मैं खा रहा हूं वह मुझे खाएगा। यह एक दुष्चक्र है। हिंसा इस चक्र को जन्म
देती है - उसके इस जन्म में मैं उसे खाता हूं,
अगले जन्म में मुझे हिंसा का शिकार होना होगा।
और इस प्रकार मेरा भोजन ही मेरा कॉल बन कर जन्म जन्मांतर तक मेरे पीछे लगा रहेगा।

इसलिए माँ प्रकृति की बड़ी संतान मानव को अपने छोटे भाइयों (मूक प्राणियों) को जीने का अधिकार देते हुए, मैं जिऊँ और अन्य को मरने दो, इस राक्षसी प्रवृत्ति को छोड़ देना चाहिए।

हम बदलेंगे,युग बदलेगा।

👉 मानवता का विशिष्ट लक्षण - सहानुभूति (भाग २)

सहानुभूति का अर्थ वाक्जाल या ऊपरी दिखावा मात्र नहीं। कई सयाने व्यक्ति बातों के थाल परोसने में तो कोई कसर नहीं करते, पर कोई रचनात्मक सद्भाव उनसे नहीं बन पात। अरे भाई! बड़ा बुरा हुआ तुम्हारी तो सारी सम्पत्ति जल गई, अब क्या करोगे, आजीविका कैसे चलेगी, बच्चे क्या खायेंगे आदि-आदि अनेकों प्रकार की मीठी मीठी चिकनी-चुपड़ी बातें तो करेंगे, पर यह न बन पड़ेगा कि बेचारे को अभी तो खाना खिलादे। जो सामान जलने से बच गया है, उसे कहीं रखवाने का प्रबन्ध करवा दें। कोई ऐसा संकेत भी करे तो नाक भौं सिकोड़ते हैं। भाई-बेबस हूँ, पिछली दालान में तो बकरियाँ बंधती हैं, बरामदे में शहतीर रखे हैं। जबान की जमा-खर्च बनाते देर न लगी, पर सहायता के नाम पर एक कानी कौड़ी भी खर्च करने को जो तैयार न हुआ, ऊपरी दया दिखाई ही तो इससे क्या बनता है। सच्ची सहानुभूति वह है जो दूसरों को उदारतापूर्वक समस्याएँ सुलझाने में सहयोग दे। करुणा के साथ कर्तव्य का सम्मिश्रण ही सहानुभूति है। केवल बातें बनाने से प्रयोजन हल नहीं होता है, उसे तो दिखाया या प्रपंच मात्र ही कह सकते हैं।

प्रशंसा और आत्म-सुरक्षा का सहानुभूति से कोई सम्बन्ध नहीं। प्रशंसा एक मूल्य है, जो आप कर्तव्य के बदले में माँगते हैं। मूल्य माँगने से आपकी सेवा की कर्तव्य न रही, कर्म बन गई। इसे नौकरी भी कह सकते हैं । ऐसी सहानुभूति से कोई लाभ नहीं हो सकता क्योंकि आपकी इच्छा पर आघात होते ही आप विचलित हो जायेंगे। प्रशंसा न मिली तो आत्मीयता का भाव समाप्त हो जाता है। ऐसी अवस्था में भावना की शालीनता नष्ट हो जाती है। ऐसी सहानुभूति घृत निकाले हुए छाछ जैसी होगी। शहद निकाल लिया तो मोम की क्या कीमत रही। बदले में कुछ चाहने की भावना से सहानुभूति की सार्थकता नहीं होती, इसे तो व्यापार ही कह सकते हैं।

सहानुभूति मानव अन्तःकरण की गहन, मौन और अव्यक्त कोमलता का नाम है। इसमें स्वार्थ और संकीर्णता का कहीं भी भाव नहीं होता। जहाँ ऐसी निर्मल भावनायें होती हैं, वहाँ किसी प्रकार के अनिष्ट के दर्शन नहीं होते। आत्मीयता, आदर, सम्मान और एकता की भावनाएँ, सहानुभूतिपूर्ण व्यक्तियों के अन्तःकरण में पाई जाती हैं। इससे वे हर घड़ी स्वर्गीय सुख की रसानुभूति करते रहते हैं। उन्हें किसी प्रकार का अभाव नहीं रहता। क्लेश उन्हें छू नहीं जाता। उनके लिए सहयोग की कोई कमी न रहेगी। ऐसे व्यक्ति क्या घर, क्या बाहर एक विलक्षण सुख का अनुभव कर रहे होंगे। और भी जो लोग उनके संपर्क में चले जाते हैं, उन्हें भी वैसी ही रसानुभूति होने लगती है।

दूसरों के दुःखों में अपने को दुःख जैसे भावों की अनुभूति हो तो हम कह सकते हैं कि हमारे अन्तःकरण में सच्ची सहानुभूति का उदय हुआ है। इससे व्यक्तित्व का विकास होता है और पूर्णता की प्राप्ति होती है। सभी में अपनापन समाया हुआ देखने की भावना सचमुच इतनी उदात्त है कि इसकी शीत छाया में बैठने वाला हर घड़ी अलौकिक सुख का आस्वादन करता है। दीनबन्धु परमात्मा की उपासना करनी हो तो आत्मीयता की उपासना करनी चाहिये। दार्शनिक बालक ने परमात्मा की पूजा का कितना हृदय स्पर्शी चित्र खींचा है। उन्होंने लिखा है- “दीनों के प्रति मैं सहज भाव से खिच जाता हूँ, उनकी भूख मेरी भूख है, उनके पैरों में रहता हूँ, वंचनाओं की पीड़ा सहना है, गले से लगाता हूँ, मैं भी उतनी देर के लिये दीन और ठुकराया हुआ प्राणी बन जाता हूँ।”

सहानुभूति लोगों में एकात्म-भाव पैदा करती है। दूसरे लोगों का आन्तरिक प्रेम और सद्भाव प्राप्त होता है। ऐसे लोगों में विचार-हीनता और कठोरता नहीं आ सकती। वे सदैव मृदुभाषी, उदार, करुणावान और सेवा की कोमल भावनाओं से ओत-प्रोत बने रहेंगे। जो दूसरों के साथ सहयोग करना नहीं जानते, जो समाज में सदैव अत्याचार और विक्षोभ की गलित-वायु फूँकते रहते हैं, उन्हें इन दुर्गुणों के बुरे परिणाम भी अनिवार्य रूप से भोगने पड़ते हैं। स्वार्थी असंवेदनशील और हिसाबी व्यक्ति चतुराई में कितने ही बड़े चढ़े रहें, कितने ही पढ़े-लिखें, शिक्षित तथा योग्य क्यों न हों, अन्त में सफलता से हाथ धोना ही पड़ेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 पृष्ठ १६

👉 भक्तिगाथा (भाग ९१)

भक्तों का संग है सर्वोच्च साधना

(अतएव) उस (महत्सङ्ग-भक्तसङ्ग) की ही साधना करो, उसी की साधना करो।’’ देवर्षि का यह सूत्र सुनकर ऋषि रुक्मवर्ण बरबस बाले उठे, ‘‘सुखद! सुन्दर!! सुमनोहर!!!’’ इतना कहने के साथ वह फिर से मौन होकर कहीं खो ग। देवर्षि द्वारा किए गए सूत्र उच्चारण के साथ ऋषि रुक्मवर्ण की प्रसन्नता का अतिरेक सभी ने देखा। उनके उल्लास की आभा सबने निहारी। इसे देखकर सबके अन्तर्भावों में एक ही बात आयी कि महर्षि रुक्मवर्ण की कुछ विशेष स्मृतियाँ अवश्य ही इस सूत्र में पिरोयी हैं। ऋषि रुक्मवर्ण, अवस्था एवं ज्ञान दोनों में ही ज्येष्ठ थे। उनसे कौन आग्रह करे यह तय न हो सका। आखिर सभी विशिष्टजनों ने महर्षि पुलह की ओर देखा। महर्षि पुलह ने सभी का यह दृष्टि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उन्होंने विनम्र स्वर में कहा- ‘‘महर्षि! हम सभी का समवेत आग्रह है कि देवर्षि के इस सूत्र की व्याख्या आज आप करें।’’ महर्षि पुलह के इस कथन पर रुक्मवर्ण ने सहजता से हामी भर दी।

कुछ देर उन्होंने अनन्त अन्तरिक्ष की ओर निहारा फिर कहने लगे- ‘‘दरअसल देवर्षि का यह सूत्र मेरी आत्मकथा है। मेरे अपने जीवन की सभी घटनाएँ इस अनूठे सूत्र में स्वाभाविक ढंग से पिरोयी हुई हैं। मेरे जीवन में यदि कुछ भी श्रेष्ठ एवं श्रेयस्कर हो सका है तो वह इसी विधि से हुआ है। देवर्षि ने सम्पूर्णतया सत्य कहा है कि महत्सङ्ग की साधना-भक्तसङ्ग की साधना अकेले ही परम समर्थ है। दैवयोग से बचपन में मेरे माता-पिता न रहे। पड़ोस के लोगों ने तरस खाकर मुझे एक भगवद्भक्त के आश्रम में दे दिया। उन उदारहृदय का आश्रम मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा वरदान बन गया। उनसे मैंने अपने जीवन का सबसे पहला पाठ यह सीखा कि जीवन में कोई भी घटना न तो बुरी है और न व्यर्थ। बुरा तो हमारा अपना मन होता है जो भगवान के मंगलमय विधान में बुराई ढूँढने लगता है।

भगवान तो परम कृपालु हैं, वे तो जीवात्मा की उन्नति के लिए, उसे निखारने-संवारने के लिए, उसके उत्तरोत्तर विकास के लिए उचित, उपयुक्त, आवश्यक एवं अनिवार्य घटनाओं की शृंखला रचते हैं। जिसके लिए जो सही है, उसके जीवन में वही घटित होता है। भगवद्विधान तो हमारे लिए सब कुछ जुटा देता है, बस हम ही अपनी नकारात्मक, निषेधात्मक वृत्तियों के कारण उनका सदुपयोग नहीं कर पाते। इनके सदुपयोग की कला का विकास भक्तसङ्ग से होता है क्योंकि भक्त के जीवन में कुछ नकारात्मक-निषेधात्मक होता ही नहीं है। सच में भक्त तो वही है जो भाव में, विचार में, कर्म में, प्रत्येक पल में सकारात्मक होता है। हमें अपने जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में जिन भगवद्भक्त महामानव का आश्रय मिला, उनसे मैंने यही सीखा कि प्रत्येक पल एवं प्रत्येक घटनाक्रम का सकारात्मक एवं सार्थक उपयोग करो।

उनके इस उपदेश को मानकर मैं जीवनप्रवाह के साथ बहता गया। जीवन की हर चोट, हर पीड़ा हमें गढ़ती गयी, संवारती गयी। भक्तसङ्ग की साधना से एक बात मैंने यह भी सीखी कि कभी कुछ मत मांगो, क्योंकि मांगने वाले को यह पता नहीं है कि यथार्थ में उसे क्या चाहिए? जबकि देने वाले परमेश्वर को यह पता है कि उसके भक्त को सचमुच में कब, क्या आवश्यकता है। सम्पूर्ण शरणागति ही तो भक्ति है, जो संकटों में, विषमताओं में, विपरीतताओं में विकसित होती है। मेरे जीवन में यही घटित होता रहा और भगवान अपने विभिन्न रूपों में मुझे सम्हालते रहे। उनकी ही प्रेरणा से मुझे भक्तों का दुर्लभ सान्निध्य मिलता रहा।

यदा-कदा ऐसा भी हुआ कि विषम घड़ियों में किसी भी भक्त का सान्निध्य न मिला। पर उन पलों में अन्तर्यामी मेरी अन्तर्चेतना में मुखर रहे। मनःस्थिति में कभी वह भाव एवं विचार बनकर प्रकट हुए तो परिस्थिति में सहृदय भक्त बनकर जीवन की राह दिखाते रहे। भक्तों के सङ्ग ने ही मुझे गढ़ा-निखारा। मेरी अपनी अनुभूति यही कहती है कि भक्तों का सङ्ग-साथ तो भक्तिशास्त्र का महाविद्यालय है। यह वह महागुरुकुल है, जहाँ स्वतः जीवनविद्या, भक्तिविद्या का शिक्षण मिल जाता है। भक्तों के संङ्ग में भगवान की सम्पूर्ण चेतना, उनकी अनन्त कृपा स्वाभाविक रीति से प्रकट होती है। इसलिए प्रयत्नपूर्वक भक्तों का सङ्ग करना चाहिए। यही श्रेष्ठतम साधना है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १७१

शनिवार, 11 दिसंबर 2021

👉 !! खुशी की वजह !!

जंगल के सभी खरगोशों ने एक दिन सभा बुलाई। बैठक में सभी को अपनी समस्याएं बतानी थीं। सभी खरगोश बहुत दुखी थे। सबसे पहले सोनू खरगोश ने बोलना शुरू किया कि जंगल में जितने भी जानवर रहते हैं, उनमें खरगोश सबसे कमज़ोर हैं।

सोनू बोल रहा था, “शेर, बाघ, चीता, भेड़िया, हाथी सब हमसे अधिक शक्तिशाली हैं। सबसे कोई न कोई डरता है, लेकिन हमसे कोई नहीं डरता।” सोनू की बात सुन कर चीकू खरगोश तो रोने ही लगा। उसने रोते हुए कहा कि खरगोशों की ऐसी दुर्दशा देख कर तो अब जीने का मन ही नहीं करता।

बात सही थी। खरगोश से कोई नहीं डरता था। उन्हें लगने लगा था कि संसार में उनसे कमज़ोर कोई और नहीं। ऐसे में तय हुआ कि कल सुबह सारे खरगोश एक साथ नदी के किनारे तक जाएंगे और सारे के सारे नदी में डूब कर जान दे देंगे। ऐसी ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी है।

सुबह सारे खरगोश इकट्ठा हुए और पहुंच गए नदी के किनारे। जैसे ही वो नदी के किनारे पहुंचे, उन्होंने देखा कि वहां बैठे मेंढ़क खरगोशों को देख कर डर के मारे फटाफट नदी में कूदने लगे।

उन्हें ऐसा करते देख खरगोश वहीं रुक गए। वो समझ गए कि मेंढ़क उनसे डर रहे हैं। बस फिर क्या था, मरना कैंसिल हो गया।

सोनू खरगोश ने वहीं एक सभा की और सभी खरगोशों को बताया कि भाइयों हमें हिम्मत से काम लेना चाहिए। इस संसार में कोई ऐसा भी है, जो हमसे भी कमज़ोर है। ऐसे में अगर हमारे पास दुखी होने की कई वज़हें हैं तो खुश होने की भी एक वज़ह तो है ही।

चीकू खरगोश ने भी कहा कि हां, हमें हिम्मत नहीं छोड़नी चाहिए। हम कमज़ोर हैं, ये सोच कर हमें दुखी होने की जगह ये सोच कर हमें खुश होना चाहिए कि हम सबसे अधिक खूबसूरत हैं और हम जंगल में किसी भी जानवर की तुलना में अधिक तेज़ गति से दौड़ सकते हैं। फिर सारे खरगोश खुशी-खुशी जंगल में लौट आए।

शिक्षा/संदेश :-
“ज़िंदगी में बेशक आपके सामने हज़ार-पांच सौ मुश्किलें होंगी लेकिन आप दुनिया को दिखा दीजिए कि अब आपके पास मुस्कुराने की दो हज़ार वज़हें हैं।”

👉 भक्तिगाथा (भाग ९०)

भक्तों का संग है सर्वोच्च साधना

 भक्त सदा ही अपने भगवान में समाया होता है। उसकी चेतना हमेशा ही भगवान में अन्तर्लीन-विलीन होती है। तभी तो वह सर्वदा भगवान से तदाकार-एकाकार रहता है। भक्त और भगवान में कभी कोई भेद नहीं होता, यह बात सभी की अनुभूतियों में घुल गयी। हिमालय के श्वेतशिखरों की आध्यात्मिक छांव में हो रहे इस भक्ति समागम में सभी श्रेष्ठ, उत्कृष्ट एवं दिव्य थे। हिमालय के धवलोज्जवल शिखरों की ही भांति इन सभी की आत्माएँ भी शुभ्र, धवल व उज्ज्वल थीं। किसी की भी अन्तर्भावना-अन्तर्चेतना में विकारों व विकृतियों के पंकिल छींटे न थे। इनमें से प्रत्येक- तप, ज्ञान, योग, आध्यात्मिक विभूति एवं शक्ति का उत्तुंग शिखर था। उनका यहाँ मिलना परमेश्वर के आध्यात्मिक हिमालय सभी सुमनोहर, आकाश स्पर्शी महाशिखरों के एकजुट होने जैसा था। फिर भी भक्ति के भावप्रवाह में भीगे इन सबके मन में एक त्वरा थी- एक अनूठे भक्त से मिलने की।

भक्ति और भक्त की सम्भवतः यही विशेषता है कि इनसे जितना मिलो, इन्हें जितना पाओ, उतना ही इनसे मिलने की, इन्हें पाने की सुखद चाहत तीव्र होती है। उन सबकी यह चाहत हिमालय के हिमकणों में, हिमप्रपातों के जलकणों में, हिमपक्षियों के कलरव-कूजन में मुखर हो रही थी। यह एक ऐसा आह्वान था जो प्रकृति में एक पुकार ध्वनित कर रहा था। यह ध्वनि प्रकृति की विभिन्न परतों में अनेक रूप ले, आकर्षण मंत्र बनकर परिव्याप्त हो रही थी। और यह तो सर्वविदित सत्य है कि प्रकृति अपने अन्तराल में बोये हुए बीजों को और अधिक सुपुष्ट करके कहीं अधिक संख्या में वापस करती है। बोया हुआ कभी निरर्थक नहीं होता, फिर वह कर्म हो अथवा भाव या विचार। प्रत्येक बीज अपनी गुणवत्ता एवं भूमि की उर्वरता के अनुरूप नूतन सृष्टि अवश्य करता है।

हिमवान के आंगन में इस क्षण जो आह्वान स्वर गंूज रहे थे, उस गूंज ने ऋषि रुक्मवर्ण को प्रेरित किया। ऋषि रुक्मवर्ण तप एवं ज्ञान का साकार विग्रह थे। अध्यात्म विद्या की विविध शाखाओं में उन्हें अनुभूतिपूर्ण पारांगतता थी। योग, वेदान्त एवं तन्त्र की सभी उपलब्धियाँ उन्हें सहज प्राप्त थीं परन्तु स्वयं उनको इनमें से किसी से कोई लगाव न था। वह तो बस भगवान् के भावमय भक्त थे। भक्ति ही उनका यथार्थ परिचय थी। वे अहर्निश भगवान में रमते थे। ऐसे परम भक्त आज अनायास और अचानक ही पधार गए। जैसे स्वयं भगवान ने ही उन्हें यहाँ भेज दिया हो। उनका इस तरह से अचानक आगमन सभी को बहुत सुखद व प्रीतिकर लगा। स्वयं सप्तर्षियों ने उनकी अभ्यर्थना की। अन्य सभी ने उनका अभिनन्दन किया। हालांकि इस अभ्यर्थना एवं अभिनन्दन से ऋषि रुक्मवर्ण संकोच में पड़ गए। बस वह विनम्र भाव से इतना कह सके कि मुझे तो आप सबके दुर्लभ सान्निध्य की चाहत यहाँ खींच लायी।

इतना कहने के बाद उन्होंने देवर्षि की ओर देखा और बोले- ‘‘देवर्षि के भक्तिसूत्रों की चर्चा तो आज त्रिलोकी में है। स्वयं भगवान सदाशिव भी इन सूत्रों पर मुग्ध हैं। मैं भी कैलाश जब प्रभु के दर्शनार्थ गया था, तब मैंने इन भक्तिसूत्रों एवं इस भक्ति समागम की ख्याति सुनी। जिसकी महिमा का बखान स्वयं महादेव करें, वह सब कुछ कितना सुमनोहर होगा, यही सोचकर मैं शीघ्रता से यहाँ पहुँच गया। अब तो देवर्षि से प्रार्थना है कि वह हमें अपना भक्तिसूत्र सुनाएँ।’’ ऋषि रुक्मवर्ण के अनुरोध पर देवर्षि ने कहा- ‘‘हम सब आपका दर्शन पाकर अनुग्रहीत हैं महर्षि, और मैं अब अपना अगला सूत्र आपके विचारार्थ प्रस्तुत करता हूँ-
‘तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम्’॥ ४२॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १७०

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

👉 ईश्वर की पूजा

मन को वश करके प्रभु चरणों मे लगाना बडा ही कठिन है। शुरुआत मे तो यह इसके लिये तैयार  ही नहीं होता है। लेकिन इसे मनाए कैसे? एक शिष्य थे किन्तु उनका मन किसी भी भगवान की साधना में नही लगता था और साधना करने की इच्छा भी मन मे थी।

वे गुरु के पास गये और कहा कि गुरुदेव साधना में मन लगता नहीं और साधना करने का मन होता है। कोई ऐसी साधना बताए जो मन भी लगे और साधना भी हो जाये। गुरु ने कहा तुम कल आना। दुसरे दिन वह गुरु के पास पहुँचा तो गुरु ने कहा सामने रास्ते मे कुत्ते के छोटे बच्चे हैं उसमे से दो बच्चे उठा ले आओ और उनकी हफ्ताभर देखभाल करो।

गुरु के इस अजीब आदेश सुनकर वह भक्त चकरा गया लेकिन क्या करे, गुरु का आदेश जो था। उसने 2 पिल्लों को पकड कर लाया लेकिन जैसे ही छोडा वे भाग गये। उसने फिरसे पकड लाया लेकिन वे फिर भागे।

अब उसने उन्हे पकड लिया और दुध रोटी खिलायी। अब वे पिल्ले उसके पास रमने लगे। हप्ताभर उन पिल्लो की ऐसी सेवा यत्न पूर्वक की कि अब वे उसका साथ छोड नही रहे थे। वह जहा भी जाता पिल्ले उसके पीछे-पीछे भागते, यह देख  गुरु ने दुसरा आदेश दिया कि इन पिल्लों को भगा दो।

भक्त के लाख प्रयास के बाद भी वह पिल्ले नहीं भागे तब गुरु ने कहा देखो बेटा शुरुआत मे यह बच्चे तुम्हारे पास रुकते नही थे लेकिन जैसे ही तुमने उनके पास ज्यादा समय बिताया ये तुम्हारे बिना रहनें को तैयार नही है।

ठीक इसी प्रकार खुद जितना ज्यादा वक्त भगवान के पास बैठोगे, मन धीरे-धीरे भगवान की सुगन्ध, आनन्द से उनमे रमता जायेगा। हम अक्सर चलती-फिरती पूजा करते है तो भगवान में मन कैसे लगेगा?

जितनी ज्यादा देर ईश्वर के पास बैठोगे उतना ही मन ईश्वर रस का मधुपान करेगा और एक दिन ऐसा आएगा कि उनके बिना आप रह नही पाओगे। शिष्य को अपने मन को वश में करने का मर्म समझ में आ गया और वह गुरु आज्ञा से भजन सुमिरन करने चल दिया।

बिन गुरु ज्ञान कहां से पाऊं।।।
सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

👉 मानवता का विशिष्ट लक्षण - सहानुभूति (भाग १)

मानव-जीवन की सफलता, सौंदर्य और उपयोगिता में वृद्धि जिन नैतिक सद्गुणों से होती है, उनमें सहानुभूति का महत्व कम नहीं है। शक्ति , सत्यनिष्ठा, व्यवस्था, सच्चाई कर्म-निष्ठा, निष्पक्षता, मितव्ययिता और आत्म-विश्वास के आधार पर सम्मान मिलता है, समृद्धि प्राप्त होती है और जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता के दर्शन होते हैं, किन्तु लौकिक जीवन में जो मधुरता तथा सरसता अपेक्षित है, वह सहानुभूति के अभाव में सम्भव नहीं। सहानुभूति चरित्र की वह गरिमा है, जो दूसरों का मन मोह लेने की क्षमता रखती है। इससे पराये अपने हो जाते हैं। किसी तरह की रुकावट परेशानी मनुष्य जीवन में नहीं आती। सहानुभूति से मन निर्मल होता है, पवित्रता जागती है और बुद्धि-प्रखरता से व्यक्तित्व निखर उठता है।

सन्त वेलूदलकाक्स का कथन है, “जब अपनी ओर देखो तो सख्ती से काम लो, दूसरों की ओर देखो तो नम्रता का उद्गार प्रकट करो। अनुचित छोटाकशी से परहेज करो- दोष-दर्शन साधारण मनुष्यों का कार्य है। इसमें सन्देह नहीं है कि दूसरों को गिराने, नीचा दिखाने की वृत्ति आत्म-हीनता की परिचायक है। निकृष्ट विचार-धारा के लोग सदैव समाज में कलह और कटुता के बीज बोते हैं। इससे सभी उनका निरादर करने लगते हैं। उनका विश्वास उठ जाता है और मुसीबत पड़ने पर कोई साथ तक नहीं देता। बीमार पड़े हैं, पर दवा का कहीं इन्तजाम नहीं । दूध माँगते हैं पर कोई पानी देने को भी तैयार नहीं होता । बड़ी दुर्दशा होती है, कोई पास तक नहीं आता। पर किया क्या जाए, जिसने दूसरों के साथ उदारता, करुणा, शालीनता, सभ्यता, मुक्तहस्तता एवं दयालुता का कभी भी रुख न अपनाया हो, उसको आड़े वक्त कोई सहयोग न करे, सहायता न दे तो इसमें आश्चर्य करने की कौन-सी बात है।

दूसरों को जीतने के लिये सहानुभूति एक रामबाण हैं। ‘सह’ का अर्थ है साथ-साथ, अर्थात् उस जैसा। अनुभूति का अर्थ है अनुभव, बोध। जैसी उसकी अवस्था हो वैसी ही अपनी, इसी का नाम सहानुभूति है। एक व्यक्ति पीड़ा से छटपटा रहा है, गहरी चोट लग गई, है इससे बेचारे का पाँव टूट गया है, कष्ट के मारे तड़फड़ा रहा है। एक दूसरा व्यक्ति उसकी बगल में खड़ा है, उससे यह दृश्य देखा नहीं जाता। यह कष्ट मुझे होता तो कितनी तकलीफ होती, वह इस भावना मात्र से छटपटा उठता है। उसकी भी दशा ठीक वैसी ही हो जाती है, जैसी चोट खाये व्यक्ति की। झट डॉक्टर को बुलाता है, घाव साफ करता है और दवा लगाता है। दूसरों की कठिनाई मुसीबतों को अपना दुःख समझ कर सेवा करने का नाम सहानुभूति है। यह मानवता का उच्च नैतिक गुण है। वाल्ट विटमैन के शब्दों से यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि सहानुभूति किसे कहते हैं। उन्होंने लिखा है, “मैं विपत्तिग्रस्त मनुष्य से यह नहीं पूछता कि तुम्हारी दशा कैसी है वरन्-मैं स्वयं भी आपदग्रस्त बन जाता हूँ।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 पृष्ठ १५

👉 भक्तिगाथा (भाग ८९)

भगवान और भक्त में भेद कैसा?

कुछ पल की शान्ति के बाद वे बोले- ‘‘जिन दिनों मैं गोमन्त जनपद में रहकर विद्याध्ययन कर रहा था उन्हीं दिनों वहाँ एक चरवाहा रहता था-मनसुखा। वह गुरुकुल की गायों को चराया करता था। गुरुकुल के वातावरण में रहने पर भी उसकी पढ़ाई में कोई रुचि न थी। हाँ, गुरुकुल के कुलपति ऋषि बृहत्साम जब भगवती महामाया की कथाएँ कहते तो वह अवश्य ध्यानपूर्वक सुनने आ जाता। यदा-कदा स्वयं भी ऋषिश्रेष्ठ से आग्रह करके जगदम्बा के चरित सुनता था। इसके अतिरिक्त उसमें अन्य कोई विशेष बात न थी। बस वह महर्षि के सौंपे गए कार्यों को निष्ठापूर्वक किया करता। कुछ विशेष न होने पर भी ऋषि बृहत्साम उस चरवाहे मनसुखा को अपने पुत्र से भी कहीं अधिक प्यार करते थे। उसके प्रति महर्षि की यह अतिरिक्त उदारता किसी को समझ में न आती थी।

उन्हीं दिनों मेरा स्वास्थ्य खराब हुआ। प्रारम्भ में तो गुरुकुल के आचार्यों ने औषधीय चिकित्सा की, परन्तु उससे कुछ लाभ न हुआ। इस तरह लाभ न हुआ तो कुछ मन्त्रवेत्ता आचार्यों ने मन्त्र प्रयोग किए, परन्तु ये सब विफल रहे। सदा सफल होने वाले मन्त्रों का विफल होना सभी के लिए आश्चर्य का विषय था। मेरी स्थिति दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी। अब तो चलना-फिरना सब बन्द हो गया था। भोजन, पथ्य यहाँ तक कि औषधि का सेवन भी सम्भव न हो रहा था क्योंकि जो कुछ ग्रहण करने की कोशिश करता, उसी का वमन हो जाता। ज्योतिष के मर्मज्ञ मनीषी भी आश्रम में थे। उन्होंने ग्रह गणना करके मेरा मारकेश एवं मृत्युयोग घोषित कर दिया। इन मनीषी आचार्यों के ज्ञान को सभी अकाट्य एवं अटल मानते थे। मेरी स्थिति मरणासन्न थी। सो मैं तो कुछ करने की स्थिति या सोचने की दशा में ही नहीं था।

ज्योतिष विद्या में पारंगत आचार्यों ने भी मारकेश निवारण के कई कठिन प्रयोग किए परन्तु कोई सफलता न मिली। आश्रम के सभी आचार्यों एवं सहपाठियों का मुझ पर विशेष प्रेम था, सो चिन्तित सभी थे परन्तु किसी से कुछ भी न हो पा रहा था। इनमें कई लोगों ने कुलपति ऋषि बृहत्साम से अनुमति लेकर कई चमत्कारी एवं तन्त्रज्ञान के प्रसिद्ध विशेषज्ञों को बुलाया परन्तु जटिल एवं दुष्कर तान्त्रिक क्रियाएँ भी विफल रहीं। अब तो सभी ने मान लिया कि मरण सुनिश्चित है। ज्योतिष विद्या के आचार्य उसी रात्रि को मेरा मरणयोग बता रहे थे। कुलपति ऋषि बृहत्साम स्वयं चिन्तित थे लेकिन कुछ भी बोल नहीं रहे थे।

ऋषि बृहत्साम की धर्मपरायण पत्नी और हम सबकी ममतामयी गुरुमाता पौलोमी मुझे अपने पुत्र की भांति स्नेह करती थीं। वे तो बिलखकर रोने लगीं। फिर उन्होंने कुलपति ऋषि बृहत्साम को एकान्त में ले जाकर  पूछा- क्या अब कुछ भी सम्भव नहीं है? उनके कथन पर बृहत्साम ने कहा- पुत्र विश्वसामः का अटल मृत्युयोग है, इसे कोई भी टाल नहीं सकता। क्या कोई भी नहीं? गुरुमाता ने जानना चाहा? हाँ, कोई भी नहीं, क्योंकि यह प्रारब्ध एवं प्रकृति का अकाट्य विधान है।

परन्तु आप तो कहते हैं कि भगवती सब कुछ करने में समर्थ हैं। हाँ, सो तो है। ऋषि बृहत्साम बोले- पर उन्हें ऐसा करने के लिए विवश कौन करेगा? फिर वे स्वयं ही बोले- अरे मनसुखा। वह तो माँ भवानी का सबसे लाडला बेटा है। वह कुछ मांगेगा तो माता इन्कार नहीं कर सकेंगी। ऋषि बृहत्साम के इतना कहते ही मनसुखा की खोज शुरू हुई। वह स्वयं भी मेरी बीमारी से व्यथित था। खोजने पर पास के अरण्य में मिल गया।

ऋषि पुकार रहे हैं, सुनकर वह दौड़ा भागा चला आया। उसके आने पर ऋषि ने कहा- पुत्र! तुम माँ से विश्वसामः का जीवन मांग लो। वह तुम्हारी पुकार अनसुनी नहीं करेंगी। ऋषि बृहत्साम के इस कथन पर सभी को अविश्सनीय आश्चर्य हुआ। परन्तु मनसुखा तो मेरे पास बैठकर करूण स्वर में बोला- माँ! विश्वसामः को स्वस्थ कर दो। ऐसा कहते हुए उसने मेरे मस्तक पर हाथ रखा। उसके संजीवनी स्पर्श से मेरी सुप्त होती जा रही चेतना जाग्रत हो गयी। मुझमें जीवन के लक्षण वापस लौटने लगे। सभी इस चमत्कार पर चकित हुए। ज्योतिष विद्या के मर्मज्ञ, तन्त्रवेत्ता, मन्त्रवेत्ता, औषधि देने वाले आचार्य इसे असम्भव मान रहे थे परन्तु प्रत्यक्ष को कौन नकारता। सत्य सम्मुख था। इन सबको चकित होते देख आचार्य ने कहा- भक्त स्वयं अपने भगवान का स्वरूप हो जाता है। सर्वदा भगवती का स्मरण करने वाले मनसुखा की चेतना भवानी में अन्तर्लीन हो गयी है। स्वस्थ होने पर मुझे यह कथा विस्तार से पता चली। तब मैंने निश्चय किया मैं मनसुखा की तरह भक्त बनूँगा। वैसा ही सरल, निश्छल, निर्दोष, निष्कपट, जिसके एक बार माँ कहने मात्र पर विश्वजननी द्रवित हो जाती हैं।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १६८

सोमवार, 6 दिसंबर 2021

👉 जिनमें साहस हो आगे आवें-

हमारा निज का कुछ भी कार्य या प्रयोजन नहीं है। मानवता का पुनरुत्थान होने जा रहा है। ईश्वर उसे पूरा करने वाले हैं। दिव्य आत्माएँ उसी दिशा में कार्य कर भी रही हैं। उज्ज्वल भविष्य की आत्मा उदय हो रही है, पुण्य प्रभाव का उदय होना सुनिश्चित है। हम चाहे तो उसका श्रेय ले सकते हैं और अपने आपको यशस्वी बना सकते हैं। देश को स्वाधीनता मिली, उसमें योगदान देने वाले अमर हो गये। यदि वे नहीं भी आगे आते तो भी स्वराज्य तो आता ही वे बेचारे और अभागे मात्र बनकर रह जाते। ठीक वैसा ही अवसर अब है। बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति अवश्यम्भावी है। उसका मोर्चा राजनैतिक लोग नहीं धार्मिक कार्यकर्त्ता संभालेंगे। यह प्रक्रिया युग-निर्माण योजना के रूप में आरम्भ हुई है। हम चाहते हैं इसके संचालन का भार मजबूत हाथों में चला जाए। ऐसे लोग अपने परिवार में जितने भी हों, जो भी हों, जहाँ भी हों, एकत्रित हो जाएँ और अपना काम सँभाल लें। उत्तर-दायित्व सौंपने की, प्रतिनिधि नियुक्त करने की योजना के पीछे हमारा यही उद्देश्य है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी १९६५

👉 परीक्षा की वेला आ गई-

साल में एक बार छात्रों की परीक्षा होती है, उस पर उनके आगामी वर्ष का आधार बनता है। प्रबुद्ध आत्माओं की परीक्षा का भी कभी-कभी समय आया करता है। त्रेता में दूसरे लोग कायरताग्रस्त हो चुप हो बैठे थे, तब रीछ बन्दरों ने वह परीक्षा उत्तीर्ण की थी। द्वापर में पाँच पाण्डवों ने भगवान का मनोरथ पूरा किया था। पिछले दिनों गुरु गोविन्दसिंह के साथी सिखों ने और समर्थ गुरु रामदास के शिवाजी आदि मराठा शिष्यों ने ईश्वर भक्ति की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। गायत्री की पुकार पर भी कितनों ने ही अपनी श्रेष्ठता का परिचय दिया था।

नव-निर्माण की ऐतिहासिक वेला में अब फिर प्रबुद्ध तेजस्वी, जागृत और उदात्त आध्यात्मिक भूमिका वाले ईश्वर भक्तों की पुकार हुई है। समय आने पर दूध पीने वाले मजनुओं की तरह हमें आंखें नहीं चुरानी चाहिए। यह समय ईश्वर से नाना प्रकार के मनोरथ पूरे करने के लिए अनुनय विनय करने का नहीं, वरन् उसकी परीक्षा कसौटी पर चढ़कर खरे उतरने का है। युग की पुकार ईश्वर की इच्छा का ही सन्देश लेकर आई है। माँगने की अपेक्षा देने का प्रश्न सामने उपस्थित किया है और अपनी भक्ति एवं आध्यात्मिकता को खरी सिद्ध करने की चुनौती प्रस्तुत की है। इस विषम बेला में हमें विचलित नहीं होना है वरन् श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी १९६५

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

👉 मिलन का प्रतिफल

आत्मा को परमात्मा के निकट पहुँचने पर वही बात बनती है जो गरम लोहे और ठण्डे लोहे के एक साथ बाँधने पर होती है। गरम लोहे की गर्मी ठण्डे में जाने लगती है और थोड़ी देर में दोनों का तापमान एक सरीखा हो जाता है। दो तालाब जब तक अलग-अलग रहते हैं तब तक उनके पानी का स्तर नीचा-ऊँचा बना रहता है पर जब बीच में नाली निकालकर उन दोनों को आपस में संबन्धित कर दिया जाता है तो अधिक भरे हुए तालाब का पानी दूसरे कम पानी वाले तालाब में चलने लगता है और यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि दोनों का जल स्तर समान नहीं हो जाता।

दो जलाशयों का मिलना या गरम-ठण्डे लोहे का परस्पर मिलना जिस प्रकार एकरूपता की स्थिति उत्पन्न करता है उसी प्रकार उपासना द्वारा आत्मा और परमात्मा का मिलन होने पर जीव में दैवी गुणों की तीव्रगति से अभिवृद्धि होने लगती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मेरी इच्छा

मेरी केवल यह इच्छा है कि प्रतिवर्ष यथेष्ठ संख्या में हमारे नवयुवकों को चीन जापान में आना चाहिए। जापानी लोगों के लिए आज भारतवर्ष उच्च और श्रेष्ठ वस्तुओं का स्वप्नराज्य है। और तुम लोग क्या कर रहे हो? ... जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हो, व्यर्थ बकवाद करने वालो, तुम लोग क्या हो? आओ, इन लोगों को देखो और  उसके बाद जाकर लज्जा से मुँह छिपा लो। सठियाई बुध्दिवालो, तुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी!

अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृध्दिगत कूडा-कर्कट भरे बैठे, सैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करनेवाले, युगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले, भला बताओ तो सही, तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? ...किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशी - गीरी के लिए अथवा बहुत हुआ, तो एक वकील बनने के लिए जी -जान से तडप रहे हो -- यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्वाकांक्षा है। तिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुण्ड के झुण्द बच्चे पैदा हो जाते हैं, जो भूख से  तडपते हुए उन्हें घेरकर ' रोटी दो, रोटी दो ' चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमा, गाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो?

आओ, मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उन्के हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़ड – मूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनो। कूपमंडूकता छोडो और बाहर दृष्टि डालो। देखो, अन्य देश किस तरह आगे बढ रहे हैं। क्या तुम्हे मनुष्य से प्रेम है? यदि 'हाँ' तो आओ,हम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखो; अत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते हों, तो रोने दो, पिछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हज़ार युवकों का बलिदान चाहती है -- मस्तिष्क-वाले युवकों का, पशुओं का नहीं। परमात्मा ने तुम्हारी इस निश्चेष्ट सभ्यता को तोडने के लिए ही अंग्रेज़ी राज्य को भारत में भेजा है...

स्वामी विवेकानन्द     
( वि.स.१/३९८-९९)

👉 भक्तिगाथा (भाग ८८)

भगवान और भक्त में भेद कैसा?

‘‘राम! राम!!’’ की मधुर ध्वनि के साथ कही गयी महर्षि वाल्मीकि की अनुभवकथा ने सभी को रोमांचित कर दिया। एक पुलकन, मीठी सी सिहरन के साथ सब महसूस करने लगे कि सन्त का सान्निध्य जीवन में सात्त्विकता की बाढ़ ला देता है और तब अनायास ही मनःस्थिति एवं परिस्थिति में सद्चिन्तन, सद्भाव एवं सत्कर्म के अंकुर फूटने लगते हैं। होने लगता है चहुँ ओर एक सुखद सात्त्विक परिवर्तन। रजस्-तमस् के अवरोधक स्वतः ही इसमें लय-विलय हो जाते हैं। इसलिए सन्त का मिलन जिन्दगी की सर्वाधिक पवित्र अनुभूति है। इस अनुभूति के सुखद स्पन्दन हिमवान के आंगन में सब तरफ व्याप रहे थे। इस भक्ति समागम में इनकी सर्वाधिक सघनता थी। क्योंकि इनमें तो सन्त, सिद्ध, ऋषि, देव इन्हीं का समूह एकत्रित था। इस उद्गम से प्रवाहित भक्तिगाथा की कथासरिता सभी लोकों को पावन बना रही थी।

अब तो यह सभी लोक-लोकान्तरों की चेतना का चैतन्य प्रवाह बन गया था। जहाँ कालक्रम से अनगिन लहरें उमगती-उफनती रहती थीं। न जाने कितनी दिव्य विभूतियाँ यहाँ स्वतः उपस्थित हो जाती थीं। उन्हें कोई और नहीं यहाँ के सात्त्विक वातावरण की सघनता स्नेहिल आमंत्रण सम्प्रेषित करती रहती थी। महर्षि विश्वसामः इसी आमंत्रण मंत्र से आकर्षित होकर पधारे थे। उनकी इस अचानक उपस्थिति ने सभी को चकित कर दिया। क्योंकि जो उन्हें जानते थे, उन्हें मालूम था कि महर्षि विश्वसामः कहीं आते-जाते नहीं। वह युगों से एकाकी रहते हुए आदिशक्ति भगवती महामाया की भक्ति करते हैं। हाँ, पहले किसी युग में वह गोमन्त जनपद में रहा करते थे। उनके इस सुखद आगमन ने सब को अत्यन्त सुख पहुँचाया। महर्षि वसिष्ठ एवं ऋषि विश्वामित्र तो उनको इस तरह अपने बीच पाकर आह्लादित हो गए। क्योंकि ये दोनों महान ऋषि इनसे पूर्व परिचित थे।

कुछ पल स्नेह-अभिवादन एवं अभिनन्दन में गुजरे। लेकिन महर्षि विश्वसामः देवर्षि के अगले सूत्र को सुनने के लिए उत्कंठित थे। इसके लिए उन्होंने मुखर आग्रह भी कर डाला। देवर्षि ने उन्हें नमन करते हुए अपना अगला सूत्र उच्चारित किया-

‘तसिं्मस्तज्जने भेदाभावात्’॥ ४१॥
क्योंकि भगवान और उनके भक्त में भेद का अभाव है। देवर्षि के इस सूत्र को सुनते ही महर्षि विश्वसामः उल्लसित होकर बोल उठे- ‘‘अहा! सत्य! सुन्दर!!! त्रिबार सत्य!!!!’’ इस भक्तिसूत्र पर इन लोक सम्मानित महर्षि की इस त्वरित प्रतिक्रिया से लगा कि उनकी कुछ स्मृतियाँ इस सूत्र में पिरोयी हैं। देवर्षि के अन्तर्भावों में महर्षि की यह प्रतिक्रिया कुछ विशेष ढंग से ध्वनित हुई। उन्होंने इसके उत्तर में महर्षि से अनुरोध किया कि वह इस सूत्र की व्याख्या करें। महर्षि विश्वसामः सम्भवतः इस आग्रह के लिए तैयार नहीं थे परन्तु फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने हामी भर दी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १६७

शनिवार, 27 नवंबर 2021

👉 परमात्मा की समीपता

परमात्मा के जितने ही समीप हम पहुँचते हैं उतनी ही श्रेष्ठताएँ हमारे अन्तःकरण में उपजती तथा बढ़ती हैं। उसी अनुपात से आन्तरिक शान्ति की भी उपलब्धि होती चलती है।
हिमालय की ठण्डी हवाएँ उन लोगों को अधिक शीतलता प्रदान करती हैं जो उस क्षेत्र में रहते हैं। इसी प्रकार आग की भट्टियों के समीप काम करने वालों को गर्मी अधिक अनुभव होती है। जीव ज्यों-ज्यों परमात्मा के निकट पहुँचता जाता है, त्यों-त्यों उसे उन विभूतियों का अपने में अनुभव होने लगता है जो उस परम प्रभु में ओत प्रोत हैं।
उपासना का अर्थ है—पास बैठना। परमात्मा के पास बैठने से ही ईश्वर उपासना हो सकती है। साधारण वस्तुएँ तथा प्राणी अपनी विशेषताओं की छाप दूसरों पर छोड़ते हैं तो परमात्मा के समीप बैठने वालों पर उन दैवी विशेषताओं का प्रभाव क्यों न पड़ेगा?

पुष्प वाटिका में जाते ही फूलों की सुगन्ध से चित्त प्रसन्न होता है। चन्दन के वृक्ष अपने समीपवर्ती वृक्षों को सुगन्धित बनाते हैं। सज्जनों के सत्संग से साधारण व्यक्तियों की मनोभावनाएँ सुधरती हैं, फिर परमात्मा अपनी महत्ता की छाप उन लोगों पर क्यों न छोड़ेगा जो उसकी समीपता के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 25 नवंबर 2021

👉 भावी सम्भावनायें और हमारा कर्त्तव्य

अगले दिन बहुत ही उलट-पुलट से भरे हैं। उनमें ऐसी घटनायें घटेंगी ऐसे परिवर्तन होंगे जो हमें विचित्र भयावह एवं कष्टकर भले ही लगें पर नये संसार की अभिनव रचना के लिए आवश्यक हैं। हमें इस भविष्यता का स्वागत करने के लिए-उसके अनुरूप ढलने के लिए-तैयार होना चाहिये। यह तैयारी जितनी अधिक रहे उतना ही भावी कठिन समय अपने लिये सरल सिद्ध होगा।

भावी नर संहार में आसुरी प्रवृत्ति के लोगों को अधिक पिसना पड़ेगा। क्योंकि महाकाल का कुठाराघात सीधा उन्हीं पर होना है। “परित्राणाय साधूनाँ विनाशायश्च दुष्कृताम्” की प्रतिज्ञानुसार भगवान को युग-परिवर्तन के अवसर पर दुष्कृतों का ही संहार करना पड़ता है। हमें दुष्ट दुष्कृतियों की मरणासन्न कौरवी सेना में नहीं, धर्म-राज की धर्म संस्थापना सेना में सम्मिलित रहना चाहिये। अपनी स्वार्थपरता, तृष्णा और वासना को तीव्र गति से घटाना चाहिए और उस रीति-नीति को अपनाना चाहिये जो विवेकशील परमार्थी एवं उदारचेता सज्जनों को अपनानी चाहिये।

संकीर्णताओं और रूढ़ियों की अन्य कोठरी से हमें बाहर निकलना चाहिए। अगले दिनों विश्व-संस्कृति, विश्व-धर्म, विश्व-भाषा, विश्व-राष्ट्र का जो भावी मानव समाज बनेगा उसमें अपनी-अपनी महिमा गाने वालों और अपनी ढपली अपना राग गाने वालों के लिये कोई स्थान न रहेगा। पृथकतावादी सभी दीवारें टूट जायेंगी और समस्त मानव समाज को न्याय एवं समता के आधार पर एक परिवार का सदस्य बन कर रहना होगा। जाति लिंग या सम्पन्नता के आधार पर किसी को वर्चस्व नहीं मिलेगा। इस समता के अनुरूप हमें अभी से ढलना आरम्भ कर देना चाहिये।

धन-संचय और अभिवर्धन की मूर्खता हमें छोड़ देना ही उचित है, बेटे पोतों के लिए लम्बे चौड़े उत्तराधिकार छोड़ने की उपहासास्पद प्रवृत्ति को तिलाँजलि देनी चाहिये क्योंकि अगले दिनों धन का स्वामित्व व्यक्ति के हाथ से निकल कर समाज, सरकार के हाथ चला जायगा। केवल शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार एवं सद्गुणों की सम्पत्ति ही उत्तराधिकार में दे सकने योग्य रह जायगी। इसलिए जिनके पास आर्थिक सुविधायें हैं वे उन्हें लोकोपयोगी कार्यों में समय रहते खर्च करदें ताकि उन्हें यश एवं आत्म-संतोष का लाभ मिल सके। अन्यथा वह संकीर्णता मधुमक्खी के छत्ते पर पड़ी डकैती की तरह उनके लिये बहुत ही कष्ट-कारक सिद्ध होगी।

लंका विजय में श्री राम के साथी रीछ-वानरों की तरह गिद्ध और गिलहरी की भाँति हमें युग-निर्माण योजना के महान अभियान में तत्परतापूर्वक संलग्न होना चाहिये। यह प्रयत्न एवं पुरुषार्थ नव युग के स्वागत की सच्ची अगवानी का महत्वपूर्ण आयोजन माना जायगा। विवेकशील और दूरदर्शी प्रबुद्ध व्यक्तियों को इस महत्वपूर्ण समय का उपयोग इसी दिशा में कदम उठाते हुए करना चाहिये। जो समय रहते अपने को बदल सकेंगे वस्तुतः वे ही शाँति और सन्तोष अनुभव करेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1967

मंगलवार, 23 नवंबर 2021

भाईचारे का बर्ताव

यदि कोई भंगी हमारे पास भंगी के रूप में आता है, तो छुतही बिमारी की तरह हम उसके स्पर्श से दूर भागते हैं। परन्तु जब उसके सिर पर एक कटोरा पानी डालकर कोई पादरी प्रार्थना के रूप में कुछ गुनगुना देता है और जब उसे पहनने को एक कोट मिल जाता है-- वह कितना ही फटा-पुराना क्यों न हो-- तब चाहे वह किसी कट्टर से कट्टर हिन्दू के कमरे के भीतर पहुँच जाय, उसके लिए कहीं रोक-टोक नहीं, ऐसा कोई नहीं, जो उससे सप्रेम हाथ मिलाकर बैठने के लिए उसे कुर्सी न दे! इससे अधिक विड्म्बना की बात क्या हो सकता है? 

आइए, देखिए तो सही, दक्षिण भारत में पादरी लोग क्या गज़ब कर रहें हैं। ये लोग नीच जाति के लोगों को लाखों की संख्या मे ईसाई बना रहे हैं। ...वहाँ लगभग चौथाई जनसंख्या ईसाई हो गयी है! मैं उन बेचारों को  क्यों दोष दूँ?  हें भगवान, कब एक मनुष्य दूसरे से भाईचारे का बर्ताव करना सीखेगा।


स्वामी विवेकानन्द     
 (वि.स.१/३८५)

👉 भक्तिगाथा (भाग ८७)

प्रभु कृपा से ही मिलता है महापुरुषों का संग

‘‘तब अपनी स्मृतिकथा सुनाकर हमें अनुगृहीत करें।’’ वातावरण में कई स्वरलहरियाँ एक साथ स्पन्दित हुईं। वशिष्ठ ने भी सभी की सहमति को स्वीकार कर कहना प्रारम्भ किया- ‘‘यह कथा महर्षि वाल्मीकि एवं देवर्षि नारद के आध्यात्मिक सम्मिलन से पूर्व की है। उस समय मैं किसी कार्यवश परमपिता ब्रह्मदेव से मिलने के लिए ब्रह्मलोक गया हुआ था। कमलासन पर विराजमान ब्रह्मदेव थोड़ा सा चिन्तित लग रहे थे। पास में ही माता सरस्वती भी विराजमान थी। भगवती सरस्वती के समीप ही मेरे अग्रज भ्राता सनक-सनन्दन आदि खड़े थे जिन्हें माता यदा-कदा स्नेह-वात्सल्य भाव से देख लेती थीं। ब्रह्मदेव की उस सभा में अन्य त्रैलोक्यपूजित महर्षि भी थे। परमपिता मुझे देखकर मेरा अभिवादन स्वीकार करते हुए बोले- तुम बड़े ही शुभ अवसर पर पधारे हो पुत्र! तुम्हारे लिए एक शुभ सूचना है और मेरे लिए एक समस्या है वत्स, जिसका समाधान होना है। मैंने विनीत स्वरों में उनसे कहा, पहले मुझे शुभ सूचना दें भगवन्, फिर यदि मुझे योग्य समझें तो समस्या से भी अवगत कराएँ?

मेरे इस कथन पर ब्रह्मदेव बोले- तो सुनो पुत्र! शुभ सूचना यह है कि तुम जिस कुल के पुरोहित हो, उस कुल में भगवान नारायण शीघ्र ही अवतार लेने वाले हैं। ब्रह्मदेव के इस कथन ने तो मुझे विह्वल कर दिया। खुशी से मेरे नेत्र भीग गए। मैं कुछ बोल न सका, बस अहोभाव से मैंने उन पूर्णपुरूष के प्रति कृतज्ञ भाव से हाथ जोड़ लिए। अब मेरी समस्या सुनो वत्स- थोड़ा रूककर ब्रह्मदेव बोले। अवश्य भगवन्। मैं अपनी प्रसन्नता के अतिरेक में परमपिता ब्रह्मदेव की समस्या वाली बात विस्मृत कर चुका था। उदार ब्रह्मदेव ने मेरी विस्मृति के अपराध को क्षमा करते हुए कहा- मेरी समस्या यह है कि प्रभु के इस अवतार की लीलाकथा कौन कहेगा? इस कार्य के लिए किसे निमित्त बनाया जाय? सृष्टिकर्त्ता होने के कारण यह दायित्व मेरा है।

ब्रह्मदेव की समस्या सचमुच ही विचारणीय थी। मुझे भी तत्काल कुछ सूझ नहीं पड़ा। उस समय मैंने बस सुमतिदायिनी माता सरस्वती को प्रणाम किया और भगवान नारायण का पावन स्मरण किया। प्रभुस्मरण के साथ ही मेरे मन में यह विचार आया कि भगवत्कथा तो वही कह सकता है जो भगवान का कृपापात्र हो। जो प्रभु का स्नेही हो, आत्मीय हो, उनका स्वजन हो। मेरे इस विचार की अभिव्यक्ति पर ब्रह्मदेव बोले- इस समय ऐसा धरा पर कौन है? मैंने इस पर कहा- हे पिताश्री! आपके इस प्रश्न का सही उत्तर यदि कोई दे सकता है तो वे स्वयं नारायण ही हैं। नारायण! नारायण!! नारायण!!! इस नाम का सुमधुर स्वर में तीन बार उच्चारण करके ब्रह्मदेव ने नेत्र मूंद लिए। और वे समाधि के सोपान चढ़ते हुए स्वयं क्षीरशायी पुराण पुरूषोत्तम के सम्मुख खड़े हो गए। थोड़ी देर बाद जब उन्होंने नेत्र खोले तो वह चकित-थकित किन्तु आश्वस्त थे।

क्या हुआ भगवन्? पुत्र! प्रभु ने अपनी लीलाकथा के लिए एक दस्युकर्म में रत-रत्नाकर को चुना है। वह उन्हें अपना सहज स्नेही मानते हैं। प्रभु ने कहा है कि पहले रत्नाकर स्वयं राम नाम की महिमा से रूपान्तरित होकर दस्यु से ऋषि बनेंगे, फिर वह रामकथा कहेंगे। यही नहीं, उन्हें स्वयं महामाया भगवती सीता के धर्मपिता होने का सौभाग्य भी मिलेगा। आश्चर्य! महाआश्चर्य!! परम आश्चर्य!!! परम अविश्वसनीय किन्तु अटल विश्वसनीय। भला पूर्णब्रह्म परमेश्वर की वाणी मिथ्या भी कैसे हो सकती है। उसे होना भी नहीं था। इसके बाद जो घटनाक्रम घटित हुए उसे महर्षि पहले ही सुना चुके हैं। बस मुझे तो केवल इतना सुनाना था कि देवर्षि नारद तो बस भगवत्कृपा के संवाहक बनकर महर्षि वाल्मीकि से मिले थे क्योंकि भगवत्कृपा के बिना तो सन्त-महापुरूषों का सान्निध्य मिलता भी नहीं है। महर्षि तो सदा ही राम के अपने हैं।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १६३

👉 सर्वोपयोगी सुलभ साधनाएं भाग १

दो शब्द

आध्यात्मिक जीवन की प्रगति के लिए साधना का अवलम्बन एक अनिवार्य तथ्य है। जो लोग समझते हैं कि मन्दिर में जाकर दर्शन कर आने, एक दो माला जप लेने अथवा कुछ पूजा-पाठ कर लेने से वे आध्यात्मिक शक्ति और शांति प्राप्त कर लेंगे वे बड़े भ्रम में हैं। ऐसा करके भले ही वे अपने मन को समझा लें, पर वास्तविक अभ्यास के लिये इससे कुछ उच्च स्तर की साधना ही काम दें सकती है। वह साधना ऐसी होनी चाहिए, जिसमें परमात्मा के प्रति कुछ आन्तरिक झुकाव हो और हमारे व्यावहारिक जीवन पर भी उसका प्रभाव पड़े। अगर पूजा-पाठ और जप-ध्यान करते हुए भी हम निकृष्ट स्वार्थ-साधन में, सांसारिक भोगों के चक्कर में और अन्य लोगों के कष्टों के प्रति उदासीनता और उपेक्षा की प्रवृत्ति में पड़े रहें, तो समझ लेना चाहिए कि हम पूजा-उपासना-साधना की नकल ही कर रहे हैं, सच्ची साधना और उसके कायाकल्प करने वाले परिणामों से अभी दूर ही हैं।

प्रस्तुत पुस्तक इसी उद्देश्य से लिखी गई कि लोग पुराने ढंग की बाह्य पूजा-पद्धति के घटाक्षेप में संशोधन करे उसके समयानुकूल रूप को अपनावें और अपना बहुत-सा समय तथा शक्ति लम्बे-चौड़े विधि-विधानों में लगाने के बजाय उसका एक बड़ा भाग परमार्थ और परोपकार युक्त जीवन जीने में खर्च करें। यदि पाठक पुस्तक में बतलाये मार्ग दर्शन को अपनाकर अपने जीवन क्रम में उपयुक्त तथ्य का समावेश करेंगे तो उनको मालूम होगा कि सामान्य पूजा-पाठ करने पर भी उनके भीतर उस आध्यात्मिक शान्ति और शक्ति का उदय हो रहा है जो सच्चे धर्म तथा ईश्वरोपासना का अन्तिम लक्ष्य है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 सर्वोपयोगी सुलभ साधनाएं

शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ८७)

प्रभुकृपा से ही मिलता है महापुरुषों का संग

महर्षि वाल्मीकि के अनुभव में भव बिसर गया और भाव भीगते रहे। ऋषिश्रेष्ठ की अतीत कथा के बारे में यद्यपि सभी को पता था, परन्तु इन पलों में तो जैसे वह सजीव हो उठी। महर्षि के स्वरों के आरोह-अवरोह, उनके उन्नत ललाट पर बनने-मिटने वाली लकीरें और सबसे अधिक उनके सजल नेत्रों से छिटकने वाली प्रभा सभी के अन्तर्हृदय में उतर गयी। उन क्षणों में अन्तःकरण और पर्यावरण दोनों ही तीव्रता से स्पन्दित हो उठे। वातावरण में भक्ति से भीगे भावों का प्रबल ज्वार उभर उठा।

सबके हृदय में यह अनुभूति प्रगाढ़ हुई कि महापुरुषों का संग-जीवन को रूपान्तरित करता है और यह रूपान्तरण भी अजब-अनोखा होता है। लोककिंवदन्ती कहती है कि पारस का स्पर्श कुरूप लोहे को चमकता सुवर्ण बना देता है। परन्तु ऐसा अनोखा पारस भी अपना दीर्घ संग देकर किसी लौहखण्ड को पारस नहीं बना सकता। लौहखण्ड को रहने भी दें तो यह अपने संग से सुवर्ण अथवा हीरक को भी पारस में नहीं बदल सकता परन्तु सन्तों के सान्निध्य में यह आश्चर्य सहजता से घटित होता है।

सन्तों का संग, उनका सान्निध्य, अनगढ़ मनुष्य को भी महामानव, देवमानव ही नहीं, देवों के लिए भी पूज्य सन्त में परिवर्तित कर देता है। महर्षि वाल्मीकि के साथ यही अघटित, घटित हुआ था। आज महर्षि वाल्मीकि, देवर्षि नारद की भांति भावप्रवण भक्त, उदारचेता सन्त थे। समस्त ऋषिगण, देवगण, सिद्ध महापुरुष, तपस्वी उनके लोकोत्तर जप, ज्ञान, भक्ति के साक्षी थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ एवं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र तो उनके समकालीन ही थे। इन तीनों महान विभूतियों ने मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम की लीलाओं को अपनी आँखों से निहारा था। इन्होंने अनगिन पल-क्षण-घड़ियाँ उन पूर्णब्रह्म परमेश्वर के साथ बितायी थीं। भगवान-भक्ति एवं भक्त के सतत सहचर्य को उन्होंने जी-भर जिया था।

आज फिर से हिमवान के आंगन वे सभी स्मृतियाँ पुनः सजीव हो रही थीं। हिमालय के जड़ कहे-समझे जाने वाले शैल-शिखर, सचेतन होकर इस अलौकिकता को निहार रहे थे। शीतल किन्तु सुरभित हवाओं में भी यही स्वर व्याप रहा था। हिमपक्षियों की कलरव ध्वनि में ऋषिश्रेष्ठ वाल्मीकि के अनुभवों के गीत ही गूंज रहे थे। मौन और मुखर भक्ति की अवर्णनीय प्रदीप्ति वहाँ चहुँ ओर प्रकीर्ण हो रही थी। सभी के मुख पर सन्तुष्टि के भाव थे, परन्तु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ किंचित अन्तर्लीन थे। देवर्षि ने तनिक विस्मित होते हुए उन्हें देखा, फिर बोले- ‘‘आप किन्हीं विचारों में निमग्न हैं ब्रह्मर्षि?’’ ब्रह्मर्षि ने उत्तर दिया- ‘‘विचारों में ही नहीं, स्मृतियों में भी परन्तु इन स्मृतिकड़ियों के जुड़ने के पहले आप अपने सूत्र की नयी कड़ी जोड़ें।’’

‘‘जो आज्ञा ब्रह्मर्षि!’’- कहते हुए ब्रह्मपुत्र नारद ने अपने अग्रज वशिष्ठ का आदेश शिरोधार्य करते हुए माथा नवाया और कहा-
‘लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव’॥ ४०॥

उन भगवान् (श्रीहरि) की कृपा से ही (सन्तों-महापुरूषों का) सङ्ग भी मिलता है। देवर्षि के इस सूत्र को सुनकर ब्रह्मर्षि के होठों पर हल्की सी स्मित प्रकाशित हो उठी। इसे देखकर देवर्षि सहित अन्य ऋषिगण एवं देवगण विस्मित से हो गए। सभी के नयनों में उत्सुकता-जिज्ञासा सघन हो गयी। अन्तर्भावों के पारखी ब्रह्मपुत्र वशिष्ठ ने अपना दायां हाथ उठाते हुए आश्वस्ति स्वर में कहा- ‘‘आप सब विस्मय न करें, दरअसल मेरी स्मृतियों एवं देवर्षि के सूत्र में एक अनोखा सम्बन्ध है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १६१

रानी लक्ष्मी बाई


मोरोपंत और भागीरथी की, मणिकर्णिका दुलारी थी।
वाराणसी की वीर छबीली, मनु  दुर्गा अवतारी थी।।   

बाजीराव के राज सभा में, बचपन उनका बीता था।
शास्त्रों की ज्ञाता थीं उनको, प्रिय रामायण गीता था।।
दरबारी बचपन से थी तो, राज काज में दक्ष रहीं ।
प्रजाहित की समझ उसे थी, न्याय हेतु निष्पक्ष रहीं।।
शिवा थे आदर्श मनु के, समर भूमि फुलवारी थी।
वाराणसी की वीर छबीली, मनु दुर्गा अवतारी थी।।   

शस्त्र चलाना बचपन से ही, बड़े  चाव से सीखा था।
भाला बरछा तलवारों से, मनु से न कोई जीता था।।
तीर कमान समशीर सदा, हाथों में शोभा पाते थे।
बड़े बड़े योद्धा भी उनसे, लड़कर हार ही जाते थे।।
दुश्मन तो थर थर कापें थे, जब उनने हुंकारी थी।
वाराणसी की वीर छबीली, मनु दुर्गा अवतारी थी।।   

राव गंगाधर संग फेरे ले, अब झाँसी की रानी थी।
मनु से लक्ष्मी बाई बनी वो, आगे असल कहानी थी।
अंग्रेजों के हड़प नीति ने, झांसी को अवसाद दिया।
किया खजाना जब्त राज्य का, राजकोष बर्बाद किया।।  
झाँसी को रक्षित करने का, संकल्प लिए ये नारी थी।
वाराणसी की वीर छबीली, मनु दुर्गा अवतारी थी।।   

रणचंडी बन कूद पड़ी वह, अंग्रेजों से टकराई थी।
युद्ध भूमि में रण कौशल से, उनको धुल चटाई थी।।
हारी गयी अंग्रेजी सेना, कालपी ग्वालियर भी हारी।
झांसी की रानी काली बन, रिपुओं पर वो थी भारी।।
वीरगति को पायी रानी, वीरांगना अवतारी थी।
वाराणसी की वीर छबीली, मनु दुर्गा अवतारी थी।।   

उमेश यादव

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