गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ८८)

भगवान और भक्त में भेद कैसा?

‘‘राम! राम!!’’ की मधुर ध्वनि के साथ कही गयी महर्षि वाल्मीकि की अनुभवकथा ने सभी को रोमांचित कर दिया। एक पुलकन, मीठी सी सिहरन के साथ सब महसूस करने लगे कि सन्त का सान्निध्य जीवन में सात्त्विकता की बाढ़ ला देता है और तब अनायास ही मनःस्थिति एवं परिस्थिति में सद्चिन्तन, सद्भाव एवं सत्कर्म के अंकुर फूटने लगते हैं। होने लगता है चहुँ ओर एक सुखद सात्त्विक परिवर्तन। रजस्-तमस् के अवरोधक स्वतः ही इसमें लय-विलय हो जाते हैं। इसलिए सन्त का मिलन जिन्दगी की सर्वाधिक पवित्र अनुभूति है। इस अनुभूति के सुखद स्पन्दन हिमवान के आंगन में सब तरफ व्याप रहे थे। इस भक्ति समागम में इनकी सर्वाधिक सघनता थी। क्योंकि इनमें तो सन्त, सिद्ध, ऋषि, देव इन्हीं का समूह एकत्रित था। इस उद्गम से प्रवाहित भक्तिगाथा की कथासरिता सभी लोकों को पावन बना रही थी।

अब तो यह सभी लोक-लोकान्तरों की चेतना का चैतन्य प्रवाह बन गया था। जहाँ कालक्रम से अनगिन लहरें उमगती-उफनती रहती थीं। न जाने कितनी दिव्य विभूतियाँ यहाँ स्वतः उपस्थित हो जाती थीं। उन्हें कोई और नहीं यहाँ के सात्त्विक वातावरण की सघनता स्नेहिल आमंत्रण सम्प्रेषित करती रहती थी। महर्षि विश्वसामः इसी आमंत्रण मंत्र से आकर्षित होकर पधारे थे। उनकी इस अचानक उपस्थिति ने सभी को चकित कर दिया। क्योंकि जो उन्हें जानते थे, उन्हें मालूम था कि महर्षि विश्वसामः कहीं आते-जाते नहीं। वह युगों से एकाकी रहते हुए आदिशक्ति भगवती महामाया की भक्ति करते हैं। हाँ, पहले किसी युग में वह गोमन्त जनपद में रहा करते थे। उनके इस सुखद आगमन ने सब को अत्यन्त सुख पहुँचाया। महर्षि वसिष्ठ एवं ऋषि विश्वामित्र तो उनको इस तरह अपने बीच पाकर आह्लादित हो गए। क्योंकि ये दोनों महान ऋषि इनसे पूर्व परिचित थे।

कुछ पल स्नेह-अभिवादन एवं अभिनन्दन में गुजरे। लेकिन महर्षि विश्वसामः देवर्षि के अगले सूत्र को सुनने के लिए उत्कंठित थे। इसके लिए उन्होंने मुखर आग्रह भी कर डाला। देवर्षि ने उन्हें नमन करते हुए अपना अगला सूत्र उच्चारित किया-

‘तसिं्मस्तज्जने भेदाभावात्’॥ ४१॥
क्योंकि भगवान और उनके भक्त में भेद का अभाव है। देवर्षि के इस सूत्र को सुनते ही महर्षि विश्वसामः उल्लसित होकर बोल उठे- ‘‘अहा! सत्य! सुन्दर!!! त्रिबार सत्य!!!!’’ इस भक्तिसूत्र पर इन लोक सम्मानित महर्षि की इस त्वरित प्रतिक्रिया से लगा कि उनकी कुछ स्मृतियाँ इस सूत्र में पिरोयी हैं। देवर्षि के अन्तर्भावों में महर्षि की यह प्रतिक्रिया कुछ विशेष ढंग से ध्वनित हुई। उन्होंने इसके उत्तर में महर्षि से अनुरोध किया कि वह इस सूत्र की व्याख्या करें। महर्षि विश्वसामः सम्भवतः इस आग्रह के लिए तैयार नहीं थे परन्तु फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने हामी भर दी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १६७

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