गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४६)

जिससे निर्बीज हो जाएं सारे कर्म संस्कार

परम पूज्य गुरुदेव इस भाव सत्य को अपने वचनों में कुछ यूँ प्रकट करते थे। वह कहते थे कि निष्काम कर्म करते हुए मन शुद्ध हो जाता है। विचार और भावनायें धुल जाती हैं, तो सम्प्रज्ञात समाधि की झलक मिलती है। लेकिन इस शुद्धतम अवस्था में भी मन तो बना ही रहता है, लेकिन यह जब मन ही विलीन हो जाता है, तो समझो कि असम्प्रज्ञात समाधि उपलब्ध हो गयी। पहली अवस्था में काँटे हट जाते हैं, छट जाते हैं, तो दूसरी अवस्था में फूल भी गायब हो जाते हैं।
    
असम्प्रज्ञात समाधि की यह भाव दशा बड़ी अजब-गजब है। साधारण तौर पर सामान्य मनुष्य तो इसकी कल्पना ही नहीं कर सकता। मनोलय, मनोनाश की कल्पना करना, इसमें निहित सच्चाई की अनुभूति करना अतिदुर्लभ है, क्योंकि साधारण तौर पर तो सारी की सारी जिन्दगी मन के चक्कर काटते, मन की उलझनों में उलझते बीतती है। एक विचार, एक कल्पना से पीछा नहीं छूटता कि दूसरी आ धमकती है। यही सिलसिला चलता रहता है। अनवरत-निरन्तर यही प्रक्रिया गतिशील रहती है। हाँ, यह जरूर होता है कि कभी अच्छी कल्पनायें, अच्छे विचार उपजते हैं, तो कभी बुरे विचार और बुरी कल्पनायें सताती हैं।
    
पहली समाधि की दशा जिसे सम्प्रज्ञात कहते हैं, उसमें बुराई गिर जाती है। मन की सारी अशुद्धता तिरोहित हो जाती है। दूसरी अवस्था में असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में अच्छाई भी गिर जाती है। यहाँ तक कि अच्छाई या शुद्ध अवस्था को धारण करने वाला मन भी समाप्त हो जाता है। मन की यह समाप्ति प्रकारान्तर से देह बोध की समाप्ति है। इस अवस्था में देह के पृथक होने का अहसास होता है। अभी हम कितना ही कहते रहें कि मैं अलग और मेरी देह अलग। परन्तु यह बात होती निरी सैद्धान्तिक है। अनुभूति के धरातल पर इसकी कोई कीमत नहीं है। जब तक मन रहता है, तब तक हम सदा देह से चिपके रहते हैं। देह की चाहतें, देह के सुख-दुःख हमें लुभाते या परेशान करते रहते हैं।
    
लेकिन मन के गिरने के बाद, असम्प्रज्ञात दशा में देह और दैहिक व्यवहार का संचालन मन की गहरी परत में, चित्त में दबे हुए अप्रकट संस्कार करते हैं। अतीत के कर्मबीज, विगत जन्मों का प्रारब्ध-बस इसी के द्वारा जीवन की सारी गतिविधियाँ चलती रहती हैं। ध्यान रहे, इस असम्प्रज्ञात भाव दशा में नये कर्म बीज नहीं इकट्ठे होते, क्योंकि इनको इकट्ठा करने वाला मन ही जब नहीं रहा, तो फिर ये किस तरह इकट्ठा होंगे। अब तो बस जो कुछ अतीत का लेन-देन है, उसी का समाप्त होना बाकी रह जाता है। कुछ भी नये  की कोई गुंजाइश या उम्मीद नहीं रहती है।
    
इस सत्य को हम इस तरह भी अनुभव कर सकते हैं कि हम असम्प्रज्ञात समाधि द्वारा वृक्ष तो मिटा देते हैं। यहाँ तक कि उसकी जड़ें भी खोद देते हैं। फिर भी जो बीज धरती पर पड़े रह गये हैं, वे तो अभी फूटेंगे। ज्यों-ज्यों उनका मौसम आयेगा, वे अंकुरित होते चलेंगे। असम्प्रज्ञात समाधि के बावजूद जीवन और मरण का चक्र तो बना ही रहता है। हाँ, यह जरूर है कि जीवन की गुणवत्ता भिन्न होती है। लेकिन जन्म तो लेना ही पड़ेगा, क्योंकि बीज अभी जले नहीं है। जो व्यक्त था, वह तो कट चुका, परन्तु जो अव्यक्त है, वह तो अभी भी बाकी है। असम्प्रज्ञात समाधि सबीज समाधि है। इन बीजों के कारण योग साधक का जन्म होता है, जो अद्भुत होता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 7 अक्टूबर 2020

👉 एक विश्वास

मेरी बेटी की शादी थी और मैं कुछ दिनों की छुट्टी ले कर शादी के तमाम इंतजाम को देख रहा था. उस दिन सफर से लौट कर मैं घर आया तो पत्नी ने आ कर एक लिफाफा मुझे पकड़ा  दिया. लिफाफा अनजाना था लेकिन प्रेषक का नाम देख कर मुझे एक आश्चर्यमिश्रित जिज्ञासा हुई.

‘अमर विश्वास’ एक ऐसा नाम जिसे मिले मुझे वर्षों बीत गए थे. मैं ने लिफाफा खोला तो उस में 1 लाख डालर का चेक और एक चिट्ठी थी. इतनी बड़ी राशि वह भी मेरे नाम पर. मैं ने जल्दी से चिट्ठी खोली और एक सांस में ही सारा पत्र पढ़ डाला. पत्र किसी परी कथा की तरह मुझे अचंभित कर गया. लिखा था :

आदरणीय सर, मैं एक छोटी सी भेंट आप को दे रहा हूं. मुझे नहीं लगता कि आप के एहसानों का कर्ज मैं कभी उतार पाऊंगा. ये उपहार मेरी अनदेखी बहन के लिए है. घर पर सभी को मेरा प्रणाम.
आप का, अमर.

मेरी आंखों में वर्षों पुराने दिन सहसा किसी चलचित्र की तरह तैर गए.

एक दिन मैं चंडीगढ़ में टहलते हुए एक किताबों की दुकान पर अपनी मनपसंद पत्रिकाएं उलटपलट रहा था कि मेरी नजर बाहर पुस्तकों के एक छोटे से ढेर के पास खड़े एक लड़के पर पड़ी. वह पुस्तक की दुकान में घुसते हर संभ्रांत व्यक्ति से कुछ अनुनयविनय करता और कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर वापस अपनी जगह पर जा कर खड़ा हो जाता. मैं काफी देर तक मूकदर्शक की तरह यह नजारा देखता रहा. पहली नजर में यह फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों द्वारा की जाने वाली सामान्य सी व्यवस्था लगी, लेकिन उस लड़के के चेहरे की निराशा सामान्य नहीं थी. वह हर बार नई आशा के साथ अपनी कोशिश करता, फिर वही निराशा.

मैं काफी देर तक उसे देखने के बाद अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाया और उस लड़के के पास जा कर खड़ा हो गया. वह लड़का कुछ सामान्य सी विज्ञान की पुस्तकें बेच रहा था. मुझे देख कर उस में फिर उम्मीद का संचार हुआ और बड़ी ऊर्जा के साथ उस ने मुझे पुस्तकें दिखानी शुरू कीं. मैं ने उस लड़के को ध्यान से देखा. साफसुथरा, चेहरे पर आत्मविश्वास लेकिन पहनावा बहुत ही साधारण. ठंड का मौसम था और वह केवल एक हलका सा स्वेटर पहने हुए था. पुस्तकें मेरे किसी काम की नहीं थीं फिर भी मैं ने जैसे किसी सम्मोहन से बंध कर उस से पूछा, ‘बच्चे, ये सारी पुस्तकें कितने की हैं?’

‘आप कितना दे सकते हैं, सर?’

‘अरे, कुछ तुम ने सोचा तो होगा.’

‘आप जो दे देंगे,’ लड़का थोड़ा निराश हो कर बोला.

‘तुम्हें कितना चाहिए?’ उस लड़के ने अब यह समझना शुरू कर दिया कि मैं अपना समय उस के साथ गुजार रहा हूं.

‘5 हजार रुपए,’ वह लड़का कुछ कड़वाहट में बोला.

‘इन पुस्तकों का कोई 500 भी दे दे तो बहुत है,’ मैं उसे दुखी नहीं करना चाहता था फिर भी अनायास मुंह से निकल गया.

अब उस लड़के का चेहरा देखने लायक था. जैसे ढेर सारी निराशा किसी ने उस के चेहरे पर उड़ेल दी हो. मुझे अब अपने कहे पर पछतावा हुआ. मैं ने अपना एक हाथ उस के कंधे पर रखा और उस से सांत्वना भरे शब्दों में फिर पूछा, ‘देखो बेटे, मुझे तुम पुस्तक बेचने वाले तो नहीं लगते, क्या बात है. साफसाफ बताओ कि क्या जरूरत है?’

वह लड़का तब जैसे फूट पड़ा. शायद काफी समय निराशा का उतारचढ़ाव अब उस के बरदाश्त के बाहर था.
‘सर, मैं 10+2 कर चुका हूं. मेरे पिता एक छोटे से रेस्तरां में काम करते हैं. मेरा मेडिकल में चयन हो चुका है. अब उस में प्रवेश के लिए मुझे पैसे की जरूरत है. कुछ तो मेरे पिताजी देने के लिए तैयार हैं, कुछ का इंतजाम वह अभी नहीं कर सकते,’ लड़के ने एक ही सांस में बड़ी अच्छी अंगरेजी में कहा.

‘तुम्हारा नाम क्या है?’ मैं ने मंत्रमुग्ध हो कर पूछा?

‘अमर विश्वास.’

‘तुम विश्वास हो और दिल छोटा करते हो. कितना पैसा चाहिए?’

‘5 हजार,’ अब की बार उस के स्वर में दीनता थी.

‘अगर मैं तुम्हें यह रकम दे दूं तो क्या मुझे वापस कर पाओगे? इन पुस्तकों की इतनी कीमत तो है नहीं,’ इस बार मैं ने थोड़ा हंस कर पूछा.

‘सर, आप ने ही तो कहा कि मैं विश्वास हूं. आप मुझ पर विश्वास कर सकते हैं. मैं पिछले 4 दिन से यहां आता हूं, आप पहले आदमी हैं जिस ने इतना पूछा. अगर पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया तो मैं भी आप को किसी होटल में कपप्लेटें धोता हुआ मिलूंगा,’ उस के स्वर में अपने भविष्य के डूबने की आशंका थी.

उस के स्वर में जाने क्या बात थी जो मेरे जेहन में उस के लिए सहयोग की भावना तैरने लगी. मस्तिष्क उसे एक जालसाज से ज्यादा कुछ मानने को तैयार नहीं था, जबकि दिल में उस की बात को स्वीकार करने का स्वर उठने लगा था. आखिर में दिल जीत गया. मैं ने अपने पर्स से 5 हजार रुपए निकाले, जिन को मैं शेयर मार्किट में निवेश करने की सोच रहा था, उसे पकड़ा दिए. वैसे इतने रुपए तो मेरे लिए भी माने रखते थे, लेकिन न जाने किस मोह ने मुझ से वह पैसे निकलवा लिए.

‘देखो बेटे, मैं नहीं जानता कि तुम्हारी बातों में, तुम्हारी इच्छाशक्ति में कितना दम है, लेकिन मेरा दिल कहता है कि तुम्हारी मदद करनी चाहिए, इसीलिए कर रहा हूं. तुम से 4-5 साल छोटी मेरी बेटी भी है मिनी. सोचूंगा उस के लिए ही कोई खिलौना खरीद लिया,’ मैं ने पैसे अमर की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

अमर हतप्रभ था. शायद उसे यकीन नहीं आ रहा था. उस की आंखों में आंसू तैर आए. उस ने मेरे पैर छुए तो आंखों से निकली दो बूंदें मेरे पैरों को चूम गईं.

‘ये पुस्तकें मैं आप की गाड़ी में रख दूं?’

‘कोई जरूरत नहीं. इन्हें तुम अपने पास रखो. यह मेरा कार्ड है, जब भी कोई जरूरत हो तो मुझे बताना.’
वह मूर्ति बन कर खड़ा रहा और मैं ने उस का कंधा थपथपाया, कार स्टार्ट कर आगे बढ़ा दी.

कार को चलाते हुए वह घटना मेरे दिमाग में घूम रही थी और मैं अपने खेले जुए के बारे में सोच रहा था, जिस में अनिश्चितता ही ज्यादा थी. कोई दूसरा सुनेगा तो मुझे एक भावुक मूर्ख से ज्यादा कुछ नहीं समझेगा. अत: मैं ने यह घटना किसी को न बताने का फैसला किया.

दिन गुजरते गए. अमर ने अपने मेडिकल में दाखिले की सूचना मुझे एक पत्र के माध्यम से दी. मुझे अपनी मूर्खता में कुछ मानवता नजर आई. एक अनजान सी शक्ति में या कहें दिल में अंदर बैठे मानव ने मुझे प्रेरित किया कि मैं हजार 2 हजार रुपए उस के पते पर फिर भेज दूं. भावनाएं जीतीं और मैं ने अपनी मूर्खता फिर दोहराई.

दिन हवा होते गए. उस का संक्षिप्त सा पत्र आता जिस में 4 लाइनें होतीं. 2 मेरे लिए, एक अपनी पढ़ाई पर और एक मिनी के लिए, जिसे वह अपनी बहन बोलता था. मैं अपनी मूर्खता दोहराता और उसे भूल जाता. मैं ने कभी चेष्टा भी नहीं की कि उस के पास जा कर अपने पैसे का उपयोग देखूं, न कभी वह मेरे घर आया. कुछ साल तक यही क्रम चलता रहा. एक दिन उस का पत्र आया कि वह उच्च शिक्षा के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा है. छात्रवृत्तियों के बारे में भी बताया था और एक लाइन मिनी के लिए लिखना वह अब भी नहीं भूला.

मुझे अपनी उस मूर्खता पर दूसरी बार फख्र हुआ, बिना उस पत्र की सचाई जाने. समय पंख लगा कर उड़ता रहा. अमर ने अपनी शादी का कार्ड भेजा. वह शायद आस्ट्रेलिया में ही बसने के विचार में था. मिनी भी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी. एक बड़े परिवार में उस का रिश्ता तय हुआ था. अब मुझे मिनी की शादी लड़के वालों की हैसियत के हिसाब से करनी थी. एक सरकारी उपक्रम का बड़ा अफसर कागजी शेर ही होता है. शादी के प्रबंध के लिए ढेर सारे पैसे का इंतजाम…उधेड़बुन…और अब वह चेक?

मैं वापस अपनी दुनिया में लौट आया. मैं ने अमर को एक बार फिर याद किया और मिनी की शादी का एक कार्ड अमर को भी भेज दिया.

शादी की गहमागहमी चल रही थी. मैं और मेरी पत्नी व्यवस्थाओं में व्यस्त थे और मिनी अपनी सहेलियों में. एक बड़ी सी गाड़ी पोर्च में आ कर रुकी. एक संभ्रांत से शख्स के लिए ड्राइवर ने गाड़ी का गेट खोला तो उस शख्स के साथ उस की पत्नी जिस की गोद में एक बच्चा था, भी गाड़ी से बाहर निकले.

मैं अपने दरवाजे पर जा कर खड़ा हुआ तो लगा कि इस व्यक्ति को पहले भी कहीं देखा है. उस ने आ कर मेरी पत्नी और मेरे पैर छुए.

‘‘सर, मैं अमर…’’ वह बड़ी श्रद्धा से बोला.

मेरी पत्नी अचंभित सी खड़ी थी. मैं ने बड़े गर्व से उसे सीने से लगा लिया. उस का बेटा मेरी पत्नी की गोद में घर सा अनुभव कर रहा था. मिनी अब भी संशय में थी. अमर अपने साथ ढेर सारे उपहार ले कर आया था. मिनी को उस ने बड़ी आत्मीयता से गले लगाया. मिनी भाई पा कर बड़ी खुश थी.

अमर शादी में एक बड़े भाई की रस्म हर तरह से निभाने में लगा रहा. उस ने न तो कोई बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर डाली और न ही मेरे चाहते हुए मुझे एक भी पैसा खर्च करने दिया. उस के भारत प्रवास के दिन जैसे पंख लगा कर उड़ गए.
इस बार अमर जब आस्ट्रेलिया वापस लौटा तो हवाई अड्डे पर उस को विदा करते हुए न केवल मेरी बल्कि मेरी पत्नी, मिनी सभी की आंखें नम थीं. हवाई जहाज ऊंचा और ऊंचा आकाश को छूने चल दिया और उसी के साथसाथ मेरा विश्वास भी आसमान छू रहा था.

मैं अपनी मूर्खता पर एक बार फिर गर्वित था और सोच रहा था कि इस नश्वर संसार को चलाने वाला कोई भगवान नहीं हमारा विश्वास ही है.

👉 गुण ग्राहकता ही श्रेष्ठ है

जिनको दूसरों के गुण देखने की आदत है वे बुरे लोगों में भी चतुरता, मुस्तैदी, पुरुषार्थ, साहस आदि गुणों को देखते हैं और उनकी विशेषताओं की प्रशंसा करते हैं। यह ठीक है कि बुराइयों का प्रतिरोध किया जाना चाहिए, उन्हें रोका जाना चाहिए। पर यह भी ठीक है कि किसी को निन्दा करके या चिढ़ाने से नहीं सुधारा जा सकता। उन परिस्थितियों, समस्याओं और मनोवृत्तियों को सुधारने के लिए प्रयत्न करना होगा जिनके कारण बुराई उत्पन्न होती है। आमतौर से मनुष्य उससे प्रभावित रहता है जो उसकी किसी न किसी अंश में प्रशंसा करता है और उसमें जो थोड़ी बहुत अच्छाई है उसका आदर करता है। मनुष्य अपने विरोधी की नहीं प्रशंसक की बात मान सकता है और यदि सुधार संभव है तो उसी के द्वारा संभव है जिसके प्रति उसके मन में सद्भावना जमीं हुई है। 

यह सद्भावना जमाये रहने में वे ही सफल हो सकते हैं जो सद्भावनायुक्त, गुणग्राही एवं प्रशंसक हैं। इस विशेषता के कारण मनुष्य अजात शत्रु हो जाता है, जो अपने बुरे स्वभाव के कारण शत्रुता करना चाहते हैं वे भी देर तक कर नहीं पाते। सज्जनता के सामने उन्हें एक दिन परास्त ही होना पड़ता है। ऐसे अगणित उदाहरण आये दिन आँखों के सामने उपस्थित होते रहते हैं जिनमें सज्जनता के हथियार से दुर्जनों को परास्त ही नहीं किया गया वरन् उनका हृदय परिवर्तन करके सज्जनता का अनुयायी भी बना लिया गया। शत्रुओं की संख्या घटाने और मित्रों की संख्या बढ़ाने का सबसे उत्तम तरीका यह है कि हम दूसरों की अच्छाइयाँ ढूँढ़ना और उनकी प्रशंसा करना सीखें। इससे दूसरों पर तो अच्छा प्रभाव पड़ता ही है अपना मन भी प्रसन्नता अनुभव करता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४५)

जिससे निर्बीज हो जाएं सारे कर्म संस्कार

अन्तर्यात्रा का विज्ञान अन्तर्जगत के नंदनवन में प्रवेश करने के इच्छुक योग साधकों के लिए नेह भरा निमंत्रण है। इसमें उनके लिए आह्वान है, जो अन्तर्यात्रा करने के लिए उत्सुक हैं, जिज्ञासु हैं। जिनमें महर्षि पतञ्जलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव की योग अनुभूतियों का साझीदार बनने की निष्कपट चाहत है। इसकी प्रत्येक पंक्ति में उठ रही पुकार उनके लिए है, जो अध्यात्म विद्या के वैज्ञानिक बनना चाहते हैं। अगर ऐसा कुछ आप में है, तो इसे सुनिश्चित सत्य मानें कि महर्षि पतंञ्जलि एवं ब्रह्मर्षि गुरुदेव आपकी अंगुली थामकर आपको कदम दर कदम इस अन्तर्यात्रा पथ पर आपको आगे बढ़ायेंगे। बस, आपको केवल उठकर खड़़ा होना होगा। इसके लिए इस योग कथा की प्रत्येक पंक्ति के प्रत्येक शब्द पर गहनता से मनन करना होगा। 
    
महर्षि बता चुके हैं कि कर्म संस्कारों के निर्बीज होने की संभावना चित्त की असम्प्रज्ञात भावदशा में सम्भव बन पड़ती है। असम्प्रज्ञात समाधि क्या है? इस जिज्ञासा के समाधान में महर्षि का कथन है-
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः॥ १/१८॥
    
शब्दार्थ- विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः= विराम-प्रत्यय का अभ्यास जिसकी पूर्व अवस्था है और संस्कारशेषः= जिसमें चित्त का स्परूप ‘संस्कार’ मात्र ही शेष रहता है, वह योग, अन्यः -अन्य है।
अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि में सारी मानसिक क्रिया की समाप्ति होती है और मन केवल अप्रकट संस्कारों को धारण किये रहता है। 
    
सम्प्रज्ञात समाधि का पहला चरण पूरा करने के बाद ही योग साधक को असम्प्रज्ञात अवस्था सुलभ होती है। पहला चरण है—शुद्धता का और दूसरा चरण है- विलीनता का। हालाँकि ये दोनों ही क्रियायें मन की ऊपरी सतह पर ही सम्पन्न होती हैं। भीतरी सतह यानि कि अचेतन मन में पूर्व जन्मों के संस्कार जस के तस बने रहते हैं। इनका नाश अभी भी नहीं होता है। हालाँकि ये अप्रकट रहते हैं। फिर भी इनकी उपस्थिति बरकरार रहती है।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ८१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

👉 कर्म करो तभी मिलेगा

कौरवों की राज सभा लगी हुई है। एक ओर कौने में पाण्डव भी बैठे हैं। दुर्योधन की आज्ञा पाकर दुःशासन उठता है और द्रौपदी को घसीटता हुआ राज सभा में ला रहा है। आज दुष्टों के हाथ उस अबला की लाज लूटी जाने वाली है। उसे सभा में नंग किया जायेगा। वचनबद्ध पाण्डव सिर नीचा किए बैठे हैं।

द्रौपदी अपने साथ होने वाले अपमान से दुःखी हो उठी। उधर सामने दुष्ट दुःशासन आ खड़ा हुआ। द्रौपदी ने सभा में उपस्थित सभी राजों महाराजों, पितामहों को रक्षा के लिए पुकारा, किन्तु दुर्योधन के भय से और उसका नमक खाकर जीने वाले कैसे उठ सकते थे। द्रौपदी ने भगवान को पुकारा अन्तर्यामी घट−घटवासी कृष्ण दौड़े आये कि आज भक्त पर भीर पड़ी है। द्रौपदी को दर्शन दिया और पूछा किसी को वस्त्र दिया हो तो याद करो? द्रौपदी को एक बात याद आई और बोली—‟भगवान् एक बार पानी भरने गई थी तो तपस्या करते हुए ऋषि की लँगोटी नदी में बह गई, तब उसे धोती में से आधी फाड़कर दी थी। कृष्ण भगवान ने कहा—द्रौपदी अब चिन्ता मत करो। तुम्हारी रक्षा हो जायगी और जितनी साड़ी दुःशासन खींचता गया उतनी ही बढ़ती गई। दुःशासन हारकर बैठ गया, किन्तु साड़ी का ओर छोर ही नहीं आया।

यदि मनुष्य का स्वयं का कुछ किया हुआ न हो तो स्वयं विधाता भी उसकी सहायता नहीं कर सकता। क्योंकि सृष्टि का विधान अटल है। जिस प्रकार विधान बनाने वाले विधायकों को स्वयं उसका पालन करना पड़ता है वैसे ही ईश्वरीय अवतार महापुरुष स्वयं भगवान भी अपने बनाये विधानों का उल्लंघन नहीं कर सकते। इससे तो उनका सृष्टि संचालन ही अस्त−व्यस्त हो जायेगा।

इस सम्बन्ध में उन लोगों को सचेत होकर अपना कर्म करना चाहिए जो सोचते हैं कि भगवान सब कर देंगे और स्वयं हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। जीवन में जो कुछ मिलता है अपने पूर्व या वर्तमान कर्मों के फल के अनुसार। बैंक बैलेन्स में यदि रकम नहीं हो तो खातेदार को खाली हाथ लौटना पड़ता है। मनुष्य के कर्मों के खाते में यदि जमा में कुछ नहीं हो तो कुछ नहीं मिलने का। कर्म की पूँजी जब इकट्ठी करेंगे तभी कुछ मिलना सम्भव है। भगवान और देवता क्या करेंगे?

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४४)

जब वैराग्य से धुल जाए मन
    
जबकि वितर्क की भूमि विधेयात्मक है। एक तरह से वितर्क ‘आर्ट ऑफ पॉजिटिव थिंकिंग’ है। विधेयात्मक चिन्तन की कला है। यह सम्प्रज्ञात समाधि का पहला तत्त्व है। जो व्यक्ति आन्तरिक शान्ति पाना चाहता है, उसे वितर्क को अपनाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति ज्यादा प्रकाशमय पक्ष की ओर देखता है। वह फूलों को महत्त्व देता है, काँटों को भूल जाता है। उसके लिए अपने आप ही शुभ और सुन्दर के द्वार खुलते हैं।
    
परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि जो व्यक्ति हमेशा पॉजिटिव सोचता है, तो समझो उसका अध्यात्म राज्य में प्रवेश निश्चित है। उसने समाधि के द्वार पर अपना पहला कदम रख दिया। उनका कहना था-विधेयात्मक सोच से विचारणा उदय होती है। विचारणा का अर्थ है-सुव्यवस्थित विचार। इसे विचारों की समग्रता भी कह सकते हैं। गुरुदेव का कहना था कि विचार और विचारशीलता में भारी फर्क है। विचार तो यूँ ही उठते-गिरते रहते हैं, बनते-बिगड़ते रहते हैं। जबकि विचारशीलता अपने अस्तित्व की आन्तरिक गुणवत्ता है। विचारशीलता का अर्थ है-सजग एवं जागरूक बने रहना। यह विचारशीलता सम्प्रज्ञात समाधि की दूसरी भावदशा है। यहाँ चिन्तन की नवीन कोपलें फूटती हैं। चेतना का अँधियारा समाप्त होता है।
    
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि वितर्क यानि की सम्यक् तर्क ले जाता है विचारणा की ओर और विचारणा ले जाती है आनन्द की ओर। इस आनन्द की अनुभूति में अपनी अन्तर्चेतना की पहली झलक मिलती है। सम्प्रज्ञात समाधि की यह ऐसी अवस्था है, जैसे बादल हट गए और हमने क्षण भर के लिए सही चाँद को देख लिया। फिर से बादल घिर आते हैं। इसे कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि जैसे हम हिमालय यात्रा पर गए और वहाँ चहुँओर धुंध छायी हुई है। यकायक धुंध हटी और हिमालय के उच्चतम शिखर की शुभ्र धवल ज्योतिर्मय झलक मिल गयी। सच कहें, तो यथार्थ में यह सम्प्रज्ञात समाधि का पहला स्वाद है।
    
आनन्द की यह भावदशा ले जाती है विशुद्ध अंतस् सत्ता की अवस्था में। यह विशुद्ध अंतस् सत्ता ही अस्मिता है। अन्तस् सत्ता का अशुद्ध प्रकटीकरण अहंकार के रूप में होता है। अहंकार में तुलना होती है। यह किसी से ज्यादा होने का सुख हो उठता है। किसी का विरोध करने में, उससे जीवन में इसे बड़ा आनन्द आता है। अहंकार जीवन का नकारात्मक दृष्टिकोण है। जबकि अस्मिता विधेयात्मक दृष्टिकोण की अनुभूति है। इस अनुभूति में अपने स्वरूप की झलक मिलती है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि अस्मिता मैं का सम्यक् बोध है, जबकि अहंकार मैं का गलत बोध है। ध्यान की प्रगाढ़ता में अस्मिता की बड़ी सम्मोहक झलक मिलती है। ऐसा लगता है, जैसा सागर के बीच बूँद- जो अपने होने का अहसास तो कर पाती है, परन्तु अलगाव की अनुभूति नहीं कर पाती।

इस तरह सम्प्रज्ञात समाधि में सम्यक् तर्क, सम्यक् विचारणा, आनन्द की अवस्था और ‘हूँ’ पन की या अस्मिता का अनुभव समाया है। इस समाधि की भावदशा में चेतना अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है। परन्तु यहाँ अभी कर्मों के संस्कारों के बीज बने रहते हैं। इन्हें निर्बीज करने के लिए समाधि के अगले चरण में प्रवेश आवश्यक है। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Prepare Yourself to Receive God's Grace

Someone had left two tubs out in the open. One was facing up, the other was facing down. Rains came and filled the tub with its face up. The other one, facing down remained totally empty. The empty tub was furious. He cursed the other tub as well as the rain. The rain told him, "Don't be upset. I am not prejudiced. I provide water everywhere. The fault is entirely yours. If you turn your face up, I will fill you with water as well."  

The tub got the point and accepted his mistake. Telling this story to his disciples a monk said, "Just like rains, God's grace is showering down everywhere. We must prepare ourselves to receive it by performing Upasana. Worship is not begging for alms, it is about preparing oneself to receive the grace of God.

📖 From Pragya Puran

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

👉 एक अच्छा मनुष्य बनाइएगा

मैं बिस्तर पर से उठा,अचानक छाती में दर्द होने लगा मुझे... हार्ट की तकलीफ तो नहीं है. ..? ऐसे विचारों के साथ. ..मैं आगे वाले बैठक के कमरे में गया...मैंने नज़र की...कि मेरा परिवार मोबाइल में व्यस्त था...

मैंने ... पत्नी को देखकर कहा...काव्या थोड़ा छाती में रोज से आज ज़्यादा दु:ख रहा है...डाक्टर को बताकर आता हूँ . ..
हां, मगर संभलकर जाना...काम हो तो फोन करना  मोबाइल में देखते देखते ही काव्या बोली...

मैं... एक्टिवा की चाबी लेकर पार्किंग में पहुँचा ... पसीना,मुझे बहुत आ रहा था...एक्टिवा स्टार्ट नहीं हो रहा था...
ऐसे वक्त्त... हमारे घर का काम करने वाला ध्रुव सायकल लेकर आया... सायकल को ताला मारते ही उसे मैंने मेरे सामने खड़ा देखा...
क्यों साब? एक्टिवा चालू नहीं हो रहा है...मैंने कहा नहीं...

आपकी तबीयत ठीक नहीं लगती साब... इतना पसीना क्यों आया है ? 

साब... स्कूटर को किक इस हालत में नहीं मारते....मैं किक मारके चालू कर देता हूँ ...ध्रुव ने एक ही किक मारकर एक्टिवा चालू कर दिया, साथ ही पूछा..साब अकेले जा रहे हो 

मैंने कहा... हां 
ऐसी हालत में अकेले नहीं जाते...चलिए मेरे पीछे बैठ जाइए...मैंने कहा तुम्हें एक्टिवा चलाना आता है? साब... गाड़ी का भी लाइसेंस है, चिंता  छोड़कर बैठ जाओ...

पास ही एक अस्पताल में हम पहुँचे, ध्रुव दौड़कर अंदर गया, और व्हील चेयर लेकर बाहर आया...
साब... अब चलना नहीं, इस कुर्सी पर बैठ जाओ..

ध्रुव के मोबाइल पर लगातार घंटियां बजती रही...मैं समझ गया था... फ्लैट में से सबके फोन आते होंगे..कि अब तक क्यों नहीं आया? ध्रुव ने आखिर थक कर किसी को कह दिया कि... आज नहीँ आ सकता....

ध्रुव डाक्टर के जैसे ही व्यवहार कर रहा था...उसे बगैर पूछे मालूम हो गया था कि, साब को हार्ट की तकलीफ हो रही है... लिफ्ट में से व्हील चेयर ICU कि तरफ लेकर गया....

डाक्टरों की टीम तो तैयार ही थी... मेरी तकलीफ सुनकर... सब टेस्ट शीघ्र ही किये... डाक्टर ने कहा, आप समय पर पहुँच गए हो....इस में भी आपने व्हील चेयर का उपयोग किया...वह आपके लिए बहुत फायदेमंद रहा...

अब... कोई भी प्रकार की राह देखना... वह आपके लिए हानिकारक होगी...इसलिए बिना देर किए हमें हार्ट का ऑपरेशन करके आपके ब्लोकेज जल्द ही दूर करने होंगे...इस फार्म पर आप के स्वजन के हस्ताक्षर की ज़रूरत है...डाक्टर ने ध्रुव को सामने देखा...

मैंने कहा, बेटे, दस्तखत करने आते है? साब इतनी बड़ी जवाबदारी मुझ पर न रखो...

बेटे... तुम्हारी कोई जवाबदारी नहीं है... तुम्हारे साथ भले ही लहू का संबंध नहीं है... फिर भी बगैर कहे तुमने तुम्हारी जवाबदारी पूरी की, वह जवाबदारी हकीकत में मेरे परिवार की थी...एक और जवाबदारी पूरी कर दो बेटा, मैं नीचे लिखकर सही करके लिख दूंगा कि मुझे कुछ भी होगा तो जवाबदारी मेरी है, ध्रुव ने सिर्फ मेरे कहने पर ही हस्ताक्षर  किये हैं, बस अब. ..

और हां, घर फोन लगा कर खबर कर दो...

बस, उसी समय मेरे सामने, मेरी पत्नी काव्या का मोबाइल ध्रुव के मोबाइल पर आया.वह शांति से काव्या को सुनने लगा...

थोड़ी देर के बाद ध्रुव बोला, मैडम, आपको पगार काटने का हो तो काटना, निकालने का हो तो निकाल दो, मगर अभी अस्पताल ऑपरेशन शुरु होने के पहले पहुँच जाओ। हां मैडम, मैं साब को अस्पताल लेकर आया हूँ। डाक्टर ने ऑपरेशन की तैयारी कर ली है, और राह देखने की कोई जरूरत नहीं है...

मैंने कहा, बेटा घर से फोन था...?

हाँ साब.
मैंने मन में सोचा, काव्या तुम किसकी पगार काटने की बात कर रही है, और किस को निकालने की बात कर रही हो? आँखों में आंसू के साथ ध्रुव के कंधे पर हाथ रख कर, मैं बोला, बेटा चिंता नहीं करते।।

मैं एक संस्था में सेवाएं देता हूं, वे बुज़ुर्ग लोगों को सहारा देते हैं, वहां तुम जैसे ही व्यक्तियों की ज़रूरत है।
तुम्हारा काम बरतन कपड़े धोने का नहीं है, तुम्हारा काम तो समाज सेवा का है...बेटा. ..पगार मिलेगा, इसलिए चिंता ना करना।

ऑपरेशन बाद, मैं होश में आया... मेरे सामने मेरा पूरा परिवार नतमस्तक खड़ा था, मैं आँखों में आंसू के साथ बोला, ध्रुव कहाँ है?

काव्या बोली-: वो अभी ही छुट्टी लेकर गांव गया, कहता था, उसके पिताजी हार्ट अटैक में गुज़र गऐ है... 15 दिन के बाद फिर से आयेगा।

अब मुझे समझ में आया कि उसको मेरे में उसका बाप दिखता होगा...

हे प्रभु, मुझे बचाकर आपने उसके बाप को उठा लिया!

पूरा परिवार हाथ जोड़कर, मूक नतमस्तक माफी मांग रहा था...

एक मोबाइल की लत (व्यसन)...अपने व्यक्ति को अपने दिल से कितना दूर लेकर जाता है... वह परिवार देख रहा था....यही नहीं मोबाइल आज घर घर कलह का कारण भी बन गया है बहू छोटी-छोटी बाते तत्काल अपने मां-बाप को बताती है और मां की सलाह पर ससुराल पक्ष के लोगो से व्यवहार करती है परिणामस्वरूप वह बीस बीस साल भी ससुराल पक्ष के लोगो से अपनापा जोड़ नहीं पाती।

डाक्टर ने आकर कहा, सब से पहले यह बताइए ध्रुव भाई आप के क्या लगते?

मैंने कहा डाक्टर साहब, कुछ संबंधों के नाम या गहराई तक न जाएं तो ही बेहतर होगा उससे संबंध की गरिमा बनी रहेगी।

बस मैं इतना ही कहूंगा कि, वो आपात स्थिति में मेरे लिए फरिश्ता बन कर आया था!

पिन्टू बोला :- हमको माफ करो पप्पा... जो फर्ज़ हमारा था, वह ध्रुव ने पूरा किया, वह हमारे लिए शर्मजनक है, अब से ऐसी भूल भविष्य में कभी भी नहीं होगी. ..

बेटा, जवाबदारी और नसीहत (सलाह) लोगों को देने के लिए ही होती है...
जब लेने की घड़ी आये, तब लोग ऊपर नीचे (या बग़ल झाकते है) हो जातें है।

अब रही मोबाइल की बात...

बेटे, एक निर्जीव खिलोने ने, जीवित खिलोने को गुलाम कर दिया है, समय आ गया है, कि उसका मर्यादित उपयोग करना है।

नहीं तो.... परिवार, समाज और राष्ट्र को उसके गंभीर परिणाम भुगतने पडेंगे और उसकी कीमत चुकाने को तैयार रहना पड़ेगा।
बेटे और बेटियों को बड़ा अधिकारी या व्यापारी बंनाने की जगह एक अच्छा मनुष्य बनाइएगा।

👉 A TRUE PRAYER

Our prayers should be worthy of us as children of The Divine. We must pray the Almighty to arouse our indwelling love, wisdom and strength, which would support and guide steps in all phases of the revolving wheel of circumstances. We, as sparks of Divine Light, ought to pray for illuminating our inner self with the subliminal glow of divinity so that no storm of hardship or turbulence of ups and downs of life could ever quaver the flame of our faith in the divine origin of our souls.

“Oh Lord! Bless us with strength, courage and wisdom so that we could meet adversities as opportunities to refine our qualities and strengthen our potentials. The roadblocks of obstacles and challenges of the path should serve as harbingers of a brighter tomorrow.” –– Such would be an ideal prayer to elevate the level of our optimism and enthusiasm and would protect us from becoming disheartened, weak or cowardly.

We have to become intrepid warriors of Light and not perplexed fugitives in the battlefield of life.  Prayer is less about asking for things we are attached to than it is about our relinquishing our attachments – thus taking us beyond fear. When we pray, we don’t change the world; we change ourselves. We move away from BEGGING to LETTING – “IN THIS MOMENT I AM HERE, OH DIVINE MASTER, USE ME. LET THY WILL BE DONE THROUGH ME.”

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 समाज−सुधार का आधार

व्यक्तियों के समूह का नाम ही तो समाज है। हम सब अपने आपको सुधारें तो समाज का सुधार हुआ ही रखा है। कुछ मूढ़ताऐं, अन्ध−परम्पराएँ, अनैतिकताऐं, संकीर्णताऐं, हमारे सामूहिक जीवन में प्रवेश पा गई हैं। दुर्बल मन से सोचने पर वे बड़ी कठिन बड़ी दुस्तर, बड़ी गहरी जमी हुई दीखती हैं, पर वस्तुतः वे कागज के बने रावण की तरह डरावनी दीखते हुए भी भीतर ही भीतर खोखली हैं। हर विचारशील उनसे घृणा करता है। पर अपने को एकाकी अनुभव करके आस−पास घिरे लोगों की भावुकता से डर कर कुछ कर नहीं पाता। कठिनाई इतनी सी है। इसे कुछ ही थोड़े से विवेकशील लोग, यदि संगठित होकर उठ खड़े हों और जमकर विरोध करने लगें तो उन कुरीतियों को मामूली से संघर्ष के बाद चकनाचूर कर सकते हैं, तोड़−मरोड़ कर फेंक सकते हैं। गोवा की जनता ने जिस प्रकार भारतीय फौजों का स्वागत किया वैसा ही स्वागत इन कुरीतियों से सताई हुई जनता उनका करे जो इन अन्ध परम्पराओं को तोड़−मरोड़ कर रख देने के लिए कटिबद्ध सैनिकों की तरह मार्च करते हुए आगे बढ़ेंगे।

हत्यारा दहेज कागज के रावण की तरह बड़ा वीभत्स−नृशंस एवं डरावना लगता है। हर कोई भीतर ही भीतर उससे घृणा करता है, पर पास जाने से डरता है। कुछ साहसी लोग उसमें पलीता लगाने को दौड़ पड़ें तो उसका जड़ मूल से उन्मूलन होने में देर न लगेगी। दास−प्रथा, देवदासी प्रथा, वेश्या नृत्य, बहु−विवाह, जन्मते ही कन्यावध, भूत पूजा, पशुबलि आदि अनेक सामाजिक कुरीतियाँ किसी समय बड़ी प्रबल लगती थीं, अब देखते−देखते उनका नाम निशान मिटता चला जा रहा है। आज जो कुरीतियाँ, अनैतिकताऐं एवं संकीर्णताऐं मजबूती से जड़ जमाये दीखती हैं विवेकशीलों के संगठित प्रतिरोध के सामने देर तक न ठहर सकेंगी। बालू की दीवार की तरह वे एक ही धक्के में भरभरा का गिर पड़ेंगी। विचारों की क्रान्ति का एक ही तूफान इस तिनकों के ढेर को उड़ाकर बात की बात में छितरा देगा। जिस नये समाज की रचना आज स्वप्न सी लगती है, विचारशीलता के जाग्रत होते ही वह मूर्तिमान होकर सामने खड़ी दीखेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४३)

जब वैराग्य से धुल जाए मन

अन्तर्यात्रा का विज्ञान- महर्षि पतंजलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक प्रयोगों का निष्कर्ष है। परम पूज्य गुरुदेव ने बार-बार अपने इस जीवन सत्य को दुहराया है कि अध्यात्म एक सम्पूर्ण विज्ञान है। हाँ, यह अन्तर्जगत् का विज्ञान है, जबकि प्रचलित विज्ञान की अन्य शाखा-प्रशाखाएँ बाह्य जगत् की हैं। उनके एक-एक शब्द को समझने की कोशिश करनी होगी। दरअसल यह कठिन कार्य है। क्योंकि उनकी शब्दावली तर्क की, विवेचना की, विज्ञान की है, पर उनका संकेत परमात्मा की ओर है, महाभाव की ओर, प्रभु प्रेम के अहोभाव की ओर है। 
     
वैराग्य ऐसा ही शब्द है। कुछ लोगों ने इसका अर्थ जिम्मेदारियों से भाग कर निठल्लेपन से जिंदगी बिताना बना लिया है। पर वास्तव में देखा जाए तो इसका महत्व अनंत है। इसकी  अति दुर्लभ अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि की ओर ले जाती है। यह सम्प्रज्ञात समाधि क्या है? इस जिज्ञासा के समाधान  में महर्षि कहते हैं-
वितर्कविचारानंदास्मितारूपानुगमात्सम्प्रज्ञातः॥ १/१७॥

शब्दार्थ- वितर्क विचारानन्दास्मितारूपानुगमात्= वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता- इन चारों के सम्बन्ध से युक्त (चित्तवृत्ति का समाधान), सम्प्रज्ञातः=सम्प्रज्ञात समाधि है।
अर्थात् सम्प्रज्ञात समाधि वह समाधि है, जो वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता के भाव से संयुक्त होती है।
    
दरअसल यह वैराग्य से धुले हुए निर्मल चित्त की सहज परिणति है। इस स्थिति में मन पूरी तरह से सूक्ष्म और शुद्ध हो जाता है। यह इतना शुद्ध एवं सूक्ष्म हो जाता है कि उसकी कोई प्रवृत्ति नहीं रहती चिपकने की। हालाँकि यह समाधि का पहला चरण है। इसके अगले चरण में तो मन ही नहीं रहता। अ-मन की अवस्था है वह। लेकिन यह जो पहला चरण है, वह भी पुलकन और आनन्द से ओत-प्रोत है। ज्यादातर साधक तो यहीं ठहर जाते हैं। उन्हें आगे बढ़ने की सुध ही नहीं रहती। इस पहले चरण में भी चार भाव दशाएँ हैं।
    
पहली भावदशा है—वितर्क की। यह तर्क का एक खास रूप है। यूँ तर्क साधारण तौर पर तीन रूपों में प्रकट होता है। इनमें से पहली अवस्था है कुतर्क की। यह तर्क की निषेधात्मक स्थिति है। कुतर्क में जीने वालों की नजर हमेशा ही जिन्दगी के अँधेरे पहलुओं पर होती है। उदाहरण के लिए गुलाब के पौधे में सुन्दर फूल होते हैं, लेकिन चुभने वाले काँटे भी होते हैं। कुतर्क वाला व्यक्ति काँटों की गिनती करेगा और अन्ततः यह नतीजा निकालेगा कि वास्तविक सच्चाई तो कांटे ही हैं, यह गुलाब तो निरा भ्रम है। फिर है तर्क-यानि की गोल-गोल चक्करों वाली भुलभुलैया। तर्क में प्रवीण व्यक्ति कितना ही तर्क करे, पर पहुँचेगा कहीं नहीं। वह यूँ ही पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में भटकता हुआ ऊर्जा गँवाएगा। बिना ध्येय का विचार तर्क कहलाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४२)

प्रभु प्रेम से मिलेगा—वैराग्य का चरम

इस बारे में गुरुदेव प्रायः नारद मोह की कथा सुनाया करते थे। देवर्षि नारद पहले महान् ज्ञानी योग साधक थे। उनकी योग साधना अति प्रखर थी। विवेक उनमें पूर्णतया प्रज्वलित था। अपनी साधना की प्रचण्ड अविरामता में उन्होंने हिमालय में समाधि लगा ली। उनकी योग साधना का तेज ऐसा बढ़ा की देव शक्तियाँ परेशान हो गयी। देवलोक वासियों ने उन्हें डिगाने के लिए भाँति-भाँति के मायाजाल रचे। एक के बाद एक नए तरीके अपनाए, पर कोई कामयाबी न मिली। अन्तिम अस्त्र के रूप में उन्होंने कामदेव को सम्पूर्ण सेना के साथ भेजा। काम की सारी कलाएँ, अप्सराओं की सारी नृत्यलीलाएँ देवर्षि नारद के वैराग्य के सामने पराजित हो गयी। अन्ततः उन सबने देवर्षि से क्षमा याचना की और वापस अपने लोक चले गए।

काम को पराजित करने वाले नारद को अपने महान् वैराग्य का गर्व हो गया। अपनी काम विजय की कथा उन्होंने शिव, ब्रह्मा एवं विष्णु को सुना डाली। सर्वेश्वर ने उनके गर्वहरण के लिए लीला रची। जिन नारद के वैराग्य का प्रभाव कुछ ऐसा था कि - ‘काम कला कछु मुनिहि न व्यापी। निज भय डरेउ मनोभव पापी॥’ अर्थात् काम की कोई भी कला मुनिवर को नहीं व्यापी और वह कामदेव अपने पाप से डर गया। वही नारद कुछ ऐसे हो गए कि- ‘जप तप कुछु न होई तेहि काला। हे विधि मिलहि कवन विधि बाला॥’ अर्थात् उनसे उस समय कुछ भी जप-तप नहीं बन पड़ा। बस वे यही सोचने लगे कि हे विधाता किस तरह मेरा विवाह इस कन्या से हो जाय।

यह कथा सुनाते हुए गुरुदेव ने कहा था—सब कुछ होने पर भी जब तक अहं का भगवान् में समर्पण, विसर्जन, विलय नहीं होता, तब तक कभी वैराग्य सिद्ध नहीं होता। भक्तिमार्ग में पहले ही कदम पर अहं का बलिदान करना पड़ता है। इसीलिए भक्त को अपने आप ही सिद्ध वैराग्य मिल जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भक्ति की महिमा की अरण्यकाण्ड में बड़ी ही सुन्दर चर्चा की है। नारद की जिज्ञासा के उत्तर में भगवान् कहते हैं- 

जनहि मोर बल निज बल ताही। 

दुह का काम क्रोध रिपु आही॥

यह विचारि पंडित मोहि भजहीं।

पायहु ज्ञान भगति नहि तजहीं॥

भक्त को मेरा बल (भगवान् का बल) रहता है और ज्ञानी को अपने बल (स्व विवेक) का सहारा रहता है। काम क्रोध दोनों के ही शत्रु हैं। यह सोचकर विद्वज्जन मेरी भक्ति करते हैं। ज्ञान मिलने पर भी इसका त्याग नहीं करते। गुरुदेव कहते थे कि भक्त में वैराग्य की परम भावदशा प्रकट होती है। उसके लिए विराग (वैराग्य) आराध्य के प्रति वि+राग यानि कि विशिष्ट राग बन जाता है। श्रीरामकृष्ण देव इस प्रसंग पर कहा करते थे कि एक बार उनके प्रति प्रेम जग जाय, तो फिर रम्भा-तिलोत्तमा जैसी रूपसी अप्सराएँ चिता भस्म जैसी त्याज्य लगने लगती हैं। भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने भी यही सत्य कहा है-

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।

रसोवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निर्वतते॥—गीता-२/५९

यानि कि विषय भोग तो उसके भी छूट जाते हैं, जो इन्द्रिय से विषयों को नहीं ग्रहण कर रहा है, पर रस तो प्रभु दर्शन के बाद ही छूटता है। यह परं दृष्ट्वा स्थिति ही पर वैराग्य है, जो प्रभु भक्ति से सहज प्राप्त है। इस वैराग्य में ही समाधान की समाधि है।

.... क्रमशः जारी

📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७५

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

👉 त्याग का रहस्य: -

एक बार महर्षि नारद ज्ञान का प्रचार करते हुए किसी सघन बन में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक बहुत बड़ा घनी छाया वाला सेमर का वृक्ष देखा और उसकी छाया में विश्राम करने के लिए ठहर गये।

नारदजी को उसकी शीतल छाया में आराम करके बड़ा आनन्द हुआ, वे उसके वैभव की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगे। 

उन्होंने उससे पूछा कि.. “वृक्ष राज तुम्हारा इतना बड़ा वैभव किस प्रकार सुस्थिर रहता है? पवन तुम्हें गिराती क्यों नहीं?” 

सेमर के वृक्ष ने हंसते हुए ऋषि के प्रश्न का उत्तर दिया कि- “भगवान्! बेचारे पवन की कोई सामर्थ्य नहीं कि वह मेरा बाल भी बाँका कर सके। वह मुझे किसी प्रकार गिरा नहीं सकता।” 

नारदजी को लगा कि सेमर का वृक्ष अभिमान के नशे में ऐसे वचन बोल रहा है। उन्हें यह उचित प्रतीत न हुआ और झुँझलाते हुए सुरलोक को चले गये।

सुरपुर में जाकर नारदजी ने पवन से कहा.. ‘अमुक वृक्ष अभिमान पूर्वक दर्प वचन बोलता हुआ आपकी निन्दा करता है, सो उसका अभिमान दूर करना चाहिए।‘ 

पवन को अपनी निन्दा करने वाले पर बहुत क्रोध आया और वह उस वृक्ष को उखाड़ फेंकने के लिए बड़े प्रबल प्रवाह के साथ आँधी तूफान की तरह चल दिया।

सेमर का वृक्ष बड़ा तपस्वी परोपकारी और ज्ञानी था, उसे भावी संकट की पूर्व सूचना मिल गई। वृक्ष ने अपने बचने का उपाय तुरन्त ही कर लिया। उसने अपने सारे पत्ते झाड़ा डाले और ठूंठ की तरह खड़ा हो गया। पवन आया उसने बहुत प्रयत्न किया पर ढूँठ का कुछ भी बिगाड़ न सका। अन्ततः उसे निराश होकर लौट जाना पड़ा।

कुछ दिन पश्चात् नारदजी उस वृक्ष का परिणाम देखने के लिए उसी बन में फिर पहुँचे, पर वहाँ उन्होंने देखा कि वृक्ष ज्यों का त्यों हरा भरा खड़ा है। नारदजी को इस पर बड़ा आश्चर्य हुआ। 

उन्होंने सेमर से पूछा- “पवन ने सारी शक्ति के साथ तुम्हें उखाड़ने की चेष्टा की थी पर तुम तो अभी तक ज्यों के त्यों खड़े हुए हो, इसका क्या रहस्य है?”

वृक्ष ने नारदजी को प्रणाम किया और नम्रता पूर्वक निवेदन किया- “ऋषिराज! मेरे पास इतना वैभव है पर मैं इसके मोह में बँधा हुआ नहीं हूँ। संसार की सेवा के लिए इतने पत्तों को धारण किये हुए हूँ, परन्तु जब जरूरत समझता हूँ इस सारे वैभव को बिना किसी हिचकिचाहट के त्याग देता हूँ और ठूँठ बन जाता हूँ। मुझे वैभव का गर्व नहीं था वरन् अपने ठूँठ होने का अभिमान था इसीलिए मैंने पवन की अपेक्षा अपनी सामर्थ्य को अधिक बताया था। आप देख रहे हैं कि उसी निर्लिप्त कर्मयोग के कारण मैं पवन की प्रचंड टक्कर सहता हुआ भी यथा पूर्व खड़ा हुआ हूँ।“

नारदजी समझ गये कि संसार में वैभव रखना, धनवान होना कोई बुरी बात नहीं है। इससे तो बहुत से शुभ कार्य हो सकते हैं। बुराई तो धन के अभिमान में डूब जाने और उससे मोह करने में है। यदि कोई व्यक्ति धनी होते हुए भी मन से पवित्र रहे तो वह एक प्रकार का साधु ही है। ऐसे जल में कमल की तरह निर्लिप्त रहने वाले कर्मयोगी साधु के लिए घर ही तपोभूमि है।

‘अखण्ड ज्योति, फरवरी-1943’

👉 आत्म−नियंत्रण की आवश्यकता

असंयम को अपना कर हमने अपना स्वास्थ्य खोया है। चटोरेपन और कामवासना पर नियंत्रण करने का जिस दिन निश्चय कर लिया उसी दिन बिगड़ी बनने लगेगी। आहार और विहार का संयम रखकर जब सृष्टि के एकोएक प्राणी गेंद की तरह उछलते-कूदते, निरोगिता और दीर्घ जीवन का लाभ उठाते हैं तो हम क्यों न उठा सकेंगे? बन्दरिया मरे बच्चे को जैसे छाती से चिपटाये फिरती है उसी प्रकार असंयम की भुजाओं में कस कर हम भी अस्वस्थता को छाती से चिपटाये फिर रहे हैं। जहाँ यह कसकर पकड़ने की प्रक्रिया ढीली हुई नहीं कि अस्वस्थता और अकाल मृत्यु से पीछा छूटा नहीं।

तुच्छ स्वार्थों की संकीर्णता ने हमारे मनःक्षेत्र को गंदा कर रखा है। उदार और विशाल दृष्टि से न सोचकर हर बात को हम अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति की दृष्टि से सोचते हैं, अपना लाभ ही हमें लाभ प्रतीत होता है। दूसरों का लाभ, दूसरों का हित, दूसरों का दृष्टिकोण, दूसरों का स्वार्थ भी यदि ध्यान में रखा जा सके, अपने स्वार्थ में दूसरों का स्वार्थ भी जोड़कर सोचा जा सके, अपने सुख दुख में दूसरों का सुख-दुख भी सम्मिलित किया जा सके तो निश्चय ही विशाल और उदार दृष्टिकोण हमें प्राप्त होगा। और फिर उसके आधार पर जो कुछ सोचा या किया जायेगा सब कुछ पुण्य और परमार्थ ही होगा। वासना और तृष्णा ने हमें अन्धा बना दिया है संयम और सेवा की रोशनी यदि अपनी आँखों में चमकने लगे तो पिछले क्षण तक जो सर्वत्र नरक जैसा अन्धकार फैला दीखता था वह स्वर्गीय प्रकाश में परिवर्तित हो सकता है। तुच्छता को महानता में, स्वार्थ को परमार्थ में, संकीर्णता को उदारता में परिणत करते ही मनुष्य तुच्छ प्राणी न रहकर महामानव बन जाता है— देवताओं की श्रेणी में जा पहुँचता है। 

मन स्फटिक मणि के समान स्वच्छ है। हमारा अविवेक ही उसे मलीन बनाये हुए हैं। दृष्टिकोण का परिवर्तन होते ही उसकी मलीनता दूर हो जाती है और स्वाभाविक स्वच्छता निखर पड़ती है। स्वच्छ मन वाला व्यक्ति आनन्द की प्रतिमूर्ति ही तो है। वह अपने आपको तो हर घड़ी आनन्द में सराबोर रखता ही है, उसके समीपवर्ती लोग भी चन्दन के वृक्ष के समीप रहने वालों की तरह सुवासित होते रहते हैं। अपने मन का, अपने दृष्टिकोण का परिवर्तन भी क्या हमारे लिए कठिन है? दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है—पर आप को क्यों नहीं सुधारा जा सकेगा? विचारों की पूँजी का अभाव ही सारी मानसिक कठिनाइयों का कारण है। विवेकशीलता का अन्तःकरण में प्रादुर्भाव होते ही कुविचार कहाँ टिकेंगे? और कुविचारों के हटते ही अपना पशु−जीवन देव−जीवन में परिवर्तित क्यों न हो जायेगा?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४१)

प्रभु प्रेम से मिलेगा—वैराग्य का चरम

वैराग्य की कसौटी पर पूर्णतया खरा साबित हुए बिना योग की मंजिल मृगतृष्णा ही बनी रहेगी।  जहाँ साधन वैराग्य ऐन्द्रिक सुखों की तृष्णा में सचेतन प्रयास द्वारा भोगासक्ति की समाप्ति है, वहीं सिद्ध वैराग्य इसकी अगली और चरमावस्था है।
    
यह सिद्ध वैराग्य क्या है? इस जिज्ञासा के उत्तर में महर्षि कहते हैं-
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्॥ १/१६॥
शब्दार्थ- पुरुषख्यातेः= पुरुष के ज्ञान से; गुणवैतृष्ण्यम्= जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का अभाव हो जाना है; तत्= वह; परम्= पर वैराग्य है।
अर्थात् यह पर वैराग्य निराकांक्षा की अन्तिम अवस्था है- पुरुष के परम आत्मा के अन्तरतम स्वभाव को जानने के कारण समस्त इच्छाओं का विलीन हो जाना।
    
वैराग्य की यह अवस्था अतिदुर्लभ है। परमात्मा में अन्तश्चेतना के विलीन हो जाने पर यह अपने आप ही प्रकट हो जाती है। इसीलिए इसे पर वैराग्य कहते हैं। सिद्ध महापुरुषों की यह स्वाभाविक दशा होने के कारण इसे सिद्ध वैराग्य भी कहा जाता है। यह समस्त साधनाओं का फल है, जो सिद्ध योगियों को सहज सुलभ रहता है। अन्तर्चेतना प्रभु में विलीन होने के कारण विषयों के प्रति, भोगों के प्रति न गति होती है, न रुचि और न ही रुझान। यह प्रभुलीन भावदशा की सहज अभिव्यक्ति है। प्रभु प्रीति की सहज रीति है यह।
    
यह अवस्था कैसे मिले? इस परम सिद्धि का भाव चेतना में किस भाँति अवतरण हो? योग साधकों की जिज्ञासाओं का एक ही उत्तर है, प्रभु प्रेम। जिनमें भगवान् की भक्ति है, प्रभु चरणों में अनुरक्ति है, उन्हें यह सिद्धि अपने आप ही मिल जाती है। भक्ति के अलावा अन्य जो भी साधना मार्ग है- उन पर चलकर इस सिद्ध वैराग्य के दर्शन हो तो सकते हैं, पर बड़ी कठिनाई से। यह भी सम्भव है कि इन राहों पर साधकों को कई बार अटकना या रुकना पड़े। और हो सकता है, सब कुछ करके भी सिद्ध वैराग्य तक न भी पहुँचा जा सके।
    
इस सम्बन्ध में परम पूज्य गुरुदेव के श्रीमुख से निकले आप्त वचन मानसिक चेतना में उस दिन की भाँति ही प्रखरता से प्रदीप्त है। जब उन्होंने वैराग्य के मर्म को समझाते हुए कहा था- बेटा! मीरा, तुलसी, सूर, रैदास आदि भक्तों को यह अपने आप ही सुलभ हो जाता है। प्रभु स्मरण, प्रभु चिन्तन और प्रभु प्रेम में भीगा हुआ मन जब एक बार उनके चरणों में विलीन हो जाता है, तो किसे याद रह जाते हैं—विषय भोग। कहाँ याद रह पाती है- इन्द्रिय विलास की बातें। सब कुछ साँप की केंचुल की तरह उतर जाता है। पेड़ से सूखे पत्ते की भाँति झड़ जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 30 सितंबर 2020

👉 कर्म और व्यवहार

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया-

मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना, किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ..?

इसका क्या कारण है ?
राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये ..
अचानक एक वृद्ध खड़े हुये बोले- महाराज आपको यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है..

राजा ने घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार ( गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं.. राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा “तेरे प्रश्न का उत्तर आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं ,वे दे सकते हैं ।”

राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा..

राजा हक्का बक्का रह गया, दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे..

राजा को महात्मा ने भी डांटते हुए कहा ” मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास समय नहीं है...
आगे आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा..
वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर दे सकता है..

राजा बड़ा बेचैन हुआ, बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न..

उत्सुकता प्रबल थी..
राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर उस गाँव में पहुंचा..
गाँव में उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही..

जैसे ही बच्चा पैदा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया..

राजा को देखते ही बालक हँसते हुए बोलने लगा ..
राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुन लो –
तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई राजकुमार थे..
एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे ।
अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली ।हमने उसकी चार बाटी सेंकी..

अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहां आ गये..
अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा –
“बेटा, मैं दस दिन से भूखा हूँ, अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो, मुझ पर दया करो, जिससे मेरा भी जीवन बच जाय ...

इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले..

तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा आग...? चलो भागो यहां से….।

वे महात्मा फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही..

किन्तु उन भईया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि..
बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो क्या मैं अपना मांस नोचकर खाऊंगा?
भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये..
मुझसे भी बाटी मांगी… 
किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि 
चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …?

अंतिम आशा लिये वो महात्मा, हे राजन !..
आपके पास भी आये, दया की याचना की..
दया करते हुये ख़ुशी से आपने अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी।
बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और बोले..
तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा।
बालक ने कहा “इस प्रकार उस घटना के आधार पर हम अपना अपना भोग, भोग रहे हैं...
और वो बालक मर गया 

धरती पर एक समय में अनेकों फल-फूल खिलते हैं, किन्तु सबके रूप, गुण,आकार-प्रकार, स्वाद भिन्न होते हैं ..।

राजा ने माना कि शास्त्र भी तीन प्रकार के हॆ-- 
ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र
 
जातक सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं..
यही है जीवन...

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४०)

वैराग्य ही देगा साधना में संवेग

साधकों के मन में प्रायः जिज्ञासा उठती है कि यह वैराग्य सधे कैसे? अभ्यास तो थोड़ा बहुत जैसे-तैसे हो भी जाता है, परन्तु वैराग्य कहीं से भी नहीं पनपता। माला को पकड़े हुए हाथ मनके भले ही खिसकते रहे, पर मन काम-काज में, बेटी-बेटों में, नाती-पोतों में ही उलझा रहता है। अक्सर देखा यह जाता है कि हर एक की आयु के हिसाब से ये उलझनें अलग-अलग होती हैं। बच्चे अपने साधना अभ्यास के समय कुछ अलग सपने देखते हैं, तो किशोर व युवाओं के ख्वाब कुछ और होते हैं। इन सभी में यदि किसी एक तत्त्व की समानता होती है, तो वह है सभी में भटकाव। जप करते समय, ध्यान करते समय मन यूँ ही भटकता रहता है। रह-रह कर वह इन्द्रिय विषयों, भोग आसक्तियों की कल्पनाओं से घिर जाता है। हममें से किसी के साथ ऐसा होने का मतलब वैराग्य का अभाव है। जो यह कहते हैं कि हमारा जप में, ध्यान में मन नहीं लगता, तो उन्हें इस सत्य को जान लेना चाहिए कि इसका केवल एक कारण वैराग्य का न होना है।
 
वैराग्य हो कैसे? परम पूज्य गुरुदेव अपनी व्यक्तिगत चर्चाओं में इस बारे में एक ही बात कहते थे-बेटा! वैराग्य का जन्म विवेक के गर्भ से होता है। अभ्यास तो विवेक के बिना भी हो सकता है, पर वैराग्य कभी भी विवेक के बिना नहीं होता। पहले विवेक होगा, तभी वैराग्य सधेगा। विवेक  का अर्थ है सही-गलत की ठीक समझ, उचित-अनुचित का सही ज्ञान, नाशवान् और अविनाशी तत्त्व का बोध, सत् और असत् की पहचान। ऐसा होने पर ही वैराग्य सधता है। गुरुदेव कहा करते थे कि कोई व्यक्ति जान-बूझकर जहर नहीं खाता, उसी तरह से कोई भी समझदार आदमी कभी भी विषय भोगों में नहीं उलझता।
भगवान् श्री कृष्ण ने भगवद्गीता में साफ तौर पर कहा है-‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।।’—गीता ५/२२ अर्थात् इन्द्रियों के स्पर्श से अनुभव होने वाले जो भी भोग है, वे सबके सब दुःख के स्रोत हैं। ये सभी आदि और अन्त वाले होने के कारण नाशवान् हैं। इसलिए विवेकवान् लोग इसमें नहीं रमते। यानि कि जो भी विवेकवान है, वह हर कीमत पर विषय भोगों से दूर रहेगा। प्रकारान्तर से जहाँ विवेक है, वहीं वैराग्य होगा ही। इन दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। सम्भव नहीं है—इनमें अलगाव।
भोग चाहे लौकिक हो या अलौकिक, सभी निरर्थक है। अर्थपूर्ण केवल आत्मतत्त्व है। अपने सद्गुरु से प्रेम, ईश्वर से प्रेम ही जीवन का सार तत्त्व है। साधना अभ्यास के लिए हमें वैराग्यवान् एवं ईश्वर परायण होना ही पड़ेगा और इसके लिए जरूरी है, सांसारिक दुःखों का बार-बार चिंतन। वैराग्य की सच्ची साधना भगवान् बुद्ध को थी, जिन्होंने सारे राजसी सुखों के बीच रहकर भी यही निष्कर्ष निकाला ‘सब्बं दुक्ख्म्’ - यह सब दुःख ही है। श्रीरामकृष्ण परमहंस कहा करते थे- वैराग्य साधना है, तो भगवान् को पुकारो। उनके शब्दों में काशी की ओर जितना बढ़ो, कलकत्ता उतना ही पीछे छूटता है। यानि कि भगवान् की ओर जितना बढ़ोगे-संसार की आसक्ति उतना ही घटेगी। यह साधन वैराग्य जितना सघन होगा, उतना ही हम सिद्धवैराग्य की ओर आगे बढ़ेंगे।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 अपनी गुत्थी आप सुलझावें

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। जिस प्रकार वह अनुपयुक्त विचारों एवं आदतों का गुलाम बनकर अपनी स्थिति दयनीय बनाता है उसी प्रकार यदि वह चाहे तो विवेक को अपनाकर अपनी गतिविधियों को बदल एवं सुधार भी सकता है और उसके फलस्वरूप नरक के दृश्य को देखते−देखते स्वर्ग में परिणत कर सकता है। यह मानसिक परिवर्तन ही युग−निर्माण योजना का प्रधान आधार है। इसे मोटे रूप से ‘विचारक्रान्ति’ भी कह सकते हैं। हमारे सामने अगणित कठिनाइयाँ, गुत्थियाँ, कमियाँ और परेशानियाँ आज उपस्थित हैं। उनका कारण एक ही है—‛अविवेक’। और उनके समाधान का उपाय भी एक ही है—विवेक। 

जिस प्रकार सूर्य का उदय होने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है उसी प्रकार जिस दिन हमारे अन्तः करण में विवेक का उदय होगा उस दिन न तो व्यक्तिगत कठिनाइयाँ रहेंगी और न सामूहिक समस्याऐं उलझी दिखाई देंगी। मकड़ी अपना जाला आप बुनती है और उसी में फँसी बैठी रहती है। पर जब उसके मन में तरंग आती है तो उस सारे जाले को निगलकर पूर्ण स्वतंत्रता भी अनुभव करने लगती है। हमारी सभी समस्याऐं और सभी कठिनाइयाँ हमारी स्वयं की बनाई हुई हैं, बुनी हुई हैं। इन्हें सुलझा देना बाँये हाथ का काम है। आज गाँठ खुल नहीं रही है पर जब विवेक का दीपक जलेगा और रस्सी के मोड़−तोड़ साफ दीखने लगेंगे तो गाँठ खुलने में कितनी देर लगेगी?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३९)

वैराग्य ही देगा साधना में संवेग

साधना के अभ्यास की पूर्णता के लिए वैराग्य की भी आवश्यकता है।  व्यावहारिक जीवन में देखा यह जाता है कि अनेकों प्रयत्नों के बावजूद साधक में चाहत होने पर भी साधना में संवेग नहीं उत्पन्न हो पाता।
    
महर्षि पतंजलि अगले सूत्र में स्पष्ट कहते हैं कि साधना में संवेग तब तक नहीं आ पायेगा, जब तक साधक वैराग्य से वंचित है। वैराग्य विहीन साधना में पहले तो गति और संवेग उत्पन्न ही नहीं होता, यदि किसी कारण संकल्प की दृढ़ता पर ऐसा हो भी गया, तो भी इससे मात्र भौतिक प्रयोजन ही पूरे हो पाते हैं। वैराग्य के बिना कैसी भी और कितनी भी साधना क्यों न की जाय, इसे आध्यात्मिक परिणाम नहीं होते। ऐसों को कभी भी आत्म जागृति की अनुभूति नहीं हो पाती। आत्म जागृति एवं आध्यात्मिक सम्पदा की प्राप्ति का एक ही उपाय है-वैराग्य। महर्षि के स्वरों में इस वैराग्य का सूत्र है-

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १/१५॥
शब्दार्थ- दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य= देखे और सुने गये विषयों में सर्वथा तृष्णा रहित चित्त की; वशीकारसंज्ञा = जो वशीकार नामक अवस्था है वह, वैराग्यम् = वैराग्य है।
अर्थात् वैराग्य, निराकांक्षा की ‘वशीकार संज्ञा’ नामक पहली अवस्था है। ऐन्द्रिक सुखों की तृष्णा में सचेतन प्रयास द्वारा भोगासक्ति की समाप्ति।
    
महर्षि पतंजलि के अनुसार वैराग्य की दो भाव दशाएँ हैं - १. साधन वैराग्य, २. सिद्ध वैराग्य। इन्हें यूँ भी कहा जा सकता है, १. अपर वैराग्य, २. पर वैराग्य। इस साधन वैराग्य या अपर वैराग्य को ही वशीकार संज्ञा दी गयी है। इस का मतलब है—देखे और सुने गए विषयों के प्रति वितृष्णा। इनके प्रति भोगासक्ति का न होना। इन विषय भोगों के लिए मन में गहरी निराकांक्षा। ऐसा होना ही वैराग्य है। इसी से साधना अभ्यास को ऊर्जा मिलती है। प्रकारान्तर से वैराग्य को अभ्यास का ऊर्जा स्रोत भी  कहा जा सकता है।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या  

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३८)


बिन श्रद्घा-विश्वास के नहीं सधेगा अभ्यास

जो साधक किसी तरह अपनी साधना में दीर्घकाल और निरन्तरता को बनाए रखते हैं, उनमें भावभरी श्रद्धा एवं अडिग निष्ठा की कमी रह जाती है। बार-बार मन में सन्देह एवं चित्त में व्यग्रता पनपती रहती है। पता नहीं, यह साधना सही है भी या नहीं। पता नहीं, साधना का पथ दिखाने वाले गुरु ठीक भी हैं या नहीं। पता नहीं, मुझे मंजिल मिलेगी भी या नहीं। इस तरह से डगमगाती श्रद्धा और चंचल निष्ठा, साधक और उसकी साधना को कहीं भी नहीं पहुँचने देती। वह प्रत्यक्ष में क्रिया तो करता रहता है, पर भाव और विचारों की कमजोरी के कारण उसकी साधना सदा प्राणहीन और बलहीन बनी रहती है।
    
साधना के अभ्यास में बल और प्राण कैसे आएँ? इसका उत्तर स्वयं परम पूज्य गुरुदेव का अपना जीवन है। चौबीस वर्षों का दीर्घकाल, उसमें सदा बनी रहने वाली तप की निरन्तरता, सद्गुरु और गायत्री मंत्र पर गहन भाव श्रद्धा एवं अविचल अडिग निष्ठा ने ही उन्हें महासाधक और महायोगी होने का गौरव दिलाया। गुरुदेव अपनी चर्चा में कहते थे कि मेरे लिए गायत्री महामंत्र, गायत्री माता और अपनी मार्गदर्शक सत्ता में कभी कोई अन्तर नहीं रहा। गायत्री महामंत्र के २४ अक्षर ही मेरे जीवन सर्वस्व थे और हैं। अपनी अविराम साधना में पल-पल इनमें मैंने अपने प्राण अर्पित किए हैं। यही है आदर्श मानदण्ड—साधना के अभ्यास का। बिना थके, बिना रुके, समर्पित भावनाओं के साथ साधना का अभ्यास करते जाना चाहिए।
    
गायत्री महामंत्र की साधना के सम्बन्ध में गुरुदेव की एक बात और मनन योग्य है। वह कहते थे- गायत्री साधना के चमत्कार अनुभव करने हैं, तो मन को इधर-उधर मत भटकाओ, अधिक नहीं तो अनुष्ठान के नियमों का पालन करते हुए २४-२४ हजार के अनुष्ठान करते रहो। समर्पित भाव श्रद्धा के साथ की गई निरन्तर, निष्ठापूर्वक और लम्बे समय की साधना के परिणाम में गायत्री महामंत्र तुम्हें सब कुछ दे देगा। इस साधना में भाव श्रद्धा कैसी हो इस बारे में गोस्वामी जी महाराज के वचन है-
पुलक गात हिय सिय रघुबीरु।
जीह नाम जप लोचन नीरू॥
    
भावना से पुलकित शरीर, हृदय में आराध्य की छवि, जिह्वा से मंत्र जप, और नयनों में भाव बिन्दु। महातपस्वी भरत की साधना के प्रसंग में कही गयी चौपाई गायत्री साधकों के लिए जीवन मंत्र बन सकती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ६९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 राजा बड़ा या संत

एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य ...