सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ४३)

जब वैराग्य से धुल जाए मन

अन्तर्यात्रा का विज्ञान- महर्षि पतंजलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक प्रयोगों का निष्कर्ष है। परम पूज्य गुरुदेव ने बार-बार अपने इस जीवन सत्य को दुहराया है कि अध्यात्म एक सम्पूर्ण विज्ञान है। हाँ, यह अन्तर्जगत् का विज्ञान है, जबकि प्रचलित विज्ञान की अन्य शाखा-प्रशाखाएँ बाह्य जगत् की हैं। उनके एक-एक शब्द को समझने की कोशिश करनी होगी। दरअसल यह कठिन कार्य है। क्योंकि उनकी शब्दावली तर्क की, विवेचना की, विज्ञान की है, पर उनका संकेत परमात्मा की ओर है, महाभाव की ओर, प्रभु प्रेम के अहोभाव की ओर है। 
     
वैराग्य ऐसा ही शब्द है। कुछ लोगों ने इसका अर्थ जिम्मेदारियों से भाग कर निठल्लेपन से जिंदगी बिताना बना लिया है। पर वास्तव में देखा जाए तो इसका महत्व अनंत है। इसकी  अति दुर्लभ अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि की ओर ले जाती है। यह सम्प्रज्ञात समाधि क्या है? इस जिज्ञासा के समाधान  में महर्षि कहते हैं-
वितर्कविचारानंदास्मितारूपानुगमात्सम्प्रज्ञातः॥ १/१७॥

शब्दार्थ- वितर्क विचारानन्दास्मितारूपानुगमात्= वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता- इन चारों के सम्बन्ध से युक्त (चित्तवृत्ति का समाधान), सम्प्रज्ञातः=सम्प्रज्ञात समाधि है।
अर्थात् सम्प्रज्ञात समाधि वह समाधि है, जो वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता के भाव से संयुक्त होती है।
    
दरअसल यह वैराग्य से धुले हुए निर्मल चित्त की सहज परिणति है। इस स्थिति में मन पूरी तरह से सूक्ष्म और शुद्ध हो जाता है। यह इतना शुद्ध एवं सूक्ष्म हो जाता है कि उसकी कोई प्रवृत्ति नहीं रहती चिपकने की। हालाँकि यह समाधि का पहला चरण है। इसके अगले चरण में तो मन ही नहीं रहता। अ-मन की अवस्था है वह। लेकिन यह जो पहला चरण है, वह भी पुलकन और आनन्द से ओत-प्रोत है। ज्यादातर साधक तो यहीं ठहर जाते हैं। उन्हें आगे बढ़ने की सुध ही नहीं रहती। इस पहले चरण में भी चार भाव दशाएँ हैं।
    
पहली भावदशा है—वितर्क की। यह तर्क का एक खास रूप है। यूँ तर्क साधारण तौर पर तीन रूपों में प्रकट होता है। इनमें से पहली अवस्था है कुतर्क की। यह तर्क की निषेधात्मक स्थिति है। कुतर्क में जीने वालों की नजर हमेशा ही जिन्दगी के अँधेरे पहलुओं पर होती है। उदाहरण के लिए गुलाब के पौधे में सुन्दर फूल होते हैं, लेकिन चुभने वाले काँटे भी होते हैं। कुतर्क वाला व्यक्ति काँटों की गिनती करेगा और अन्ततः यह नतीजा निकालेगा कि वास्तविक सच्चाई तो कांटे ही हैं, यह गुलाब तो निरा भ्रम है। फिर है तर्क-यानि की गोल-गोल चक्करों वाली भुलभुलैया। तर्क में प्रवीण व्यक्ति कितना ही तर्क करे, पर पहुँचेगा कहीं नहीं। वह यूँ ही पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में भटकता हुआ ऊर्जा गँवाएगा। बिना ध्येय का विचार तर्क कहलाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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