बुधवार, 30 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ३९)

वैराग्य ही देगा साधना में संवेग

साधना के अभ्यास की पूर्णता के लिए वैराग्य की भी आवश्यकता है।  व्यावहारिक जीवन में देखा यह जाता है कि अनेकों प्रयत्नों के बावजूद साधक में चाहत होने पर भी साधना में संवेग नहीं उत्पन्न हो पाता।
    
महर्षि पतंजलि अगले सूत्र में स्पष्ट कहते हैं कि साधना में संवेग तब तक नहीं आ पायेगा, जब तक साधक वैराग्य से वंचित है। वैराग्य विहीन साधना में पहले तो गति और संवेग उत्पन्न ही नहीं होता, यदि किसी कारण संकल्प की दृढ़ता पर ऐसा हो भी गया, तो भी इससे मात्र भौतिक प्रयोजन ही पूरे हो पाते हैं। वैराग्य के बिना कैसी भी और कितनी भी साधना क्यों न की जाय, इसे आध्यात्मिक परिणाम नहीं होते। ऐसों को कभी भी आत्म जागृति की अनुभूति नहीं हो पाती। आत्म जागृति एवं आध्यात्मिक सम्पदा की प्राप्ति का एक ही उपाय है-वैराग्य। महर्षि के स्वरों में इस वैराग्य का सूत्र है-

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १/१५॥
शब्दार्थ- दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य= देखे और सुने गये विषयों में सर्वथा तृष्णा रहित चित्त की; वशीकारसंज्ञा = जो वशीकार नामक अवस्था है वह, वैराग्यम् = वैराग्य है।
अर्थात् वैराग्य, निराकांक्षा की ‘वशीकार संज्ञा’ नामक पहली अवस्था है। ऐन्द्रिक सुखों की तृष्णा में सचेतन प्रयास द्वारा भोगासक्ति की समाप्ति।
    
महर्षि पतंजलि के अनुसार वैराग्य की दो भाव दशाएँ हैं - १. साधन वैराग्य, २. सिद्ध वैराग्य। इन्हें यूँ भी कहा जा सकता है, १. अपर वैराग्य, २. पर वैराग्य। इस साधन वैराग्य या अपर वैराग्य को ही वशीकार संज्ञा दी गयी है। इस का मतलब है—देखे और सुने गए विषयों के प्रति वितृष्णा। इनके प्रति भोगासक्ति का न होना। इन विषय भोगों के लिए मन में गहरी निराकांक्षा। ऐसा होना ही वैराग्य है। इसी से साधना अभ्यास को ऊर्जा मिलती है। प्रकारान्तर से वैराग्य को अभ्यास का ऊर्जा स्रोत भी  कहा जा सकता है।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ७१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या  

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