सोमवार, 25 मई 2020

👉 Man Ka Samadhan मन का समाधान

उपासना का अर्थ मात्र देवालय बना देना नहीं है। वैसा जीवन भी जीना होता है, तभी वह सफल है।

चित्रगुप्त अपनी पोथी के पृष्ठों को उलट रहे थे। यमदूतों द्वारा आज दो व्यक्तियों को उनके सम्मुख पेश किया गया था। यमदूतों ने प्रथम व्यक्ति का परिचय कराते हुए कहा, “यह नगर सेठ हैं। धन की कोई कमी इनके यहाँ नहीं। खूब पैसा कमाया है और समाज हित के लिये धर्मशाला, मन्दिर, कुआँ और विद्यालय जैसे अनेक निर्माण कार्यों में उसका व्यय किया है।” अब दूसरे व्यक्ति की बारी थी। उसे यमदूत ने आगे बढ़ाते हुए कहा, "यह व्यक्ति बहुत गरीब है। दो समय का भोजन जुटाना भी इसके लिए मुश्किल है।

एक दिन जब ये भोजन कर रहे थे, एक भूखा कुत्ता इनके पास आया। इन्होंने स्वयं भोजन न कर सारी रोटियाँ कुत्ते को दे दीं। स्वयं भूखे रहकर दूसरे की क्षुधा शान्त की। अब आप ही बतलाइये कि इन दोनों के लिये क्या आज्ञा है?" चित्रगुप्त काफी देर तक पोथी के पृष्ठों पर आँखें गड़ाये रहे। उन्होंने बड़ी गम्भीरता के साथ कहा-धनी व्यक्ति को नरक में और निर्धन व्यक्ति को स्वर्ग में भेजा जाये।"

चित्रगुप्त के इस निर्णय को सुनकर यमराज और दोनों आगन्तुक भी आश्चर्य में पड़ गये। चित्रगुप्त ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा-धनी व्यक्ति ने निर्धनों और असहायों का बुरी तरह शोषण किया है। उनकी विवशताओं का दुरुपयोग किया है और उस पैसे से ऐश और आराम का जीवन व्यतीत किया। यदि बचे हुये धन का एक अंश लोकेषणा की पूर्ति हेतु व्यय कर भी दिया, तो उसमें लोकहित का कौन सा कार्य हुआ?

निर्माण कार्यों के पीछे यह भावना कार्य कर रही थी कि लोग मेरी प्रशंसा करें, मेरा यश गायें। गरीब ने पसीना बहाकर जो कमाई की, उस रोटी को भी समय आने पर भूखे कुत्ते के लिए छोड़ दी। यह साधन-सम्पन्न होता, तो न जाने अभावग्रस्त लोगों की कितनी सहायता करता? पाप और पुण्य का सम्बन्ध मानवीय भावनाओं से है, क्रियाओं से नहीं। अतः मेरे द्वारा पूर्व में दिया गया निर्णय ही अंतिम है।" सबके मन का समाधान हो चुका था।

अखण्ड ज्योति – अक्टूबर 1995 पृष्ठ 32

👉 Prem Aur Permeshwar प्रेम और परमेश्वर

प्रत्येक प्राणी में परमात्मा का निवास है। इस घट-घट वासी परमात्मा का जो दर्शन कर सके समझना चाहिए कि उसे ईश्वर का साक्षात्कार हो चुका। प्राणियों की सेवा करने से बढ़कर दूसरी ईश्वर भक्ति हो नहीं सकती। कल्पना के आधार पर धारणा-ध्यान द्वारा प्रभु को प्राप्त करने की अपेक्षा सेवा-धर्म अपना कर इसे साकार ब्रह्म-अखिल विश्व को सुन्दर बनाने के लिए संलग्न रहना-साधना का श्रेष्ठतम मार्ग है। अमुक भजन ध्यान से केवल ईश्वर को ही प्रसन्नता हुई या नहीं? इसमें सन्देह हो सकता है, पर दूसरों को सुखी एवं समुन्नत बनाने के लिए जिसने कुछ किया है उसे आत्म-सन्तोष, सहायता द्वारा सुखी हुए जीवों का आशीर्वाद और परमात्मा का अनुग्रह मिलना सुनिश्चित है।

प्रेम से बढ़कर इस विश्व में और कुछ भी आनन्दमय नहीं है। जिस व्यक्ति या वस्तु को हम प्रेम करते हैं वह हमें अतीव सुन्दर प्रतीत होने लगती है। इस समस्त विश्व को परमात्मा का साकार मान कर उसे अधिक सुन्दर बनाने के लिए यदि उदार बुद्धि से लोक मंगल के कार्यों में निरत रहा जावे तो यह ईश्वर के प्रति तथा उसकी पुण्य वृत्तियों के प्रति प्रेम प्रदर्शन करने का एक उत्तम मार्ग होगा। इस प्रकार की हुई ईश्वर उपासना कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। इसकी सार्थकता के प्रमाणस्वरूप तत्काल आत्मसन्तोष मिलता है। श्रेय की भावनाओं से ओत-प्रोत उदार हृदय ही स्वर्ग है। जिसे स्वर्ग अभीष्ट हो उसे अपना अन्तःकरण प्रेम और सेवा धर्म से परिपूर्ण बना लेना चाहिए।

ऋषि तिरुवल्लुवर
अखण्ड ज्योति जुलाई 1964 पृष्ठ 1


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/July/v1.3

शुक्रवार, 22 मई 2020

👉 युग परिवर्तन का आधार भावनात्मक नव निर्माण (भाग १)

सूर्योदय पूर्व दिशा से होता है। उषा काल की लालिमा उसकी पूर्व सूचना लेकर आती है। कुक्कुट उस पुण्य बेला की अग्रिम सूचना देने लगते हैं। तारों की चमक और निशा कालिमा की सघनता कम हो जाती है। इन्हीं लक्षणों से जाना जाता है कि प्रभात काल समीप आ गया और अब सूर्योदय होने ही वाला है।

नव जागरण का, युग परिवर्तन का सूर्योदय भी इसी क्रम से होगा। यह सार्वभौम प्रश्न है, विश्व मानव से सम्बन्धित समस्या है। एक देश या एक जाति की नहीं। फिर भी उदय का क्रम पूर्व से ही चलेगा। कुछ चिरन्तन विशेष परम्परा ऐसी चली आती है कि विश्व मानव ने जब भी करवट ली है तब उसका सूत्र संचालन सूर्योदय की भाँति ही पूर्व दिशा से हुआ है। यों पाश्चात्य देशवासी भारत को पूर्व मानते हैं, पर जहाँ तक आध्यात्मिक चेतना का प्रश्न है निस्संदेह यह श्रेय सौभाग्य इसी देश को मिला है, वह विश्व की चेतनात्मक हलचलों का उत्तरदायित्व अग्रिम पंक्ति में खड़ा होकर वहन करे, इस बार भी ऐसा ही होने जा रहा है। युग परिवर्तन का प्रकाश इसी पुण्य भूमि से आरंभ हो चुका अब वह कुछ ही समय में विश्व व्यापी बनने जा रहा है।
  
विश्व जड़ और चेतन दो भागों में विभक्त है। जड़ प्रकृति से सम्बन्धित प्रगति को सम्पदा के रूप में देखा जा सकता है और चेतन प्रकृति के विकास को विचारणा एवं भावना के रूप में समझा जायेगा। सुविधा और संपदा की अभिवृद्धि भौतिक प्रगति कहलाती है और चेतना की उत्कृष्टता को आत्मिक उत्कर्ष कहा जाता है, जहाँ तक भौतिक प्रगति का सम्बन्ध है वहाँ तक उसके लिए राजतन्त्र, अर्थतन्त्र, विज्ञान तन्त्र और शिक्षा तन्त्र का उत्तरदायित्व है कि वे अधिकाधिक सुविधा एवं सम्पदा उत्पन्न करके सुख साधनों को आगे बढ़ायें।

आत्मिक प्रगति के लिए ज्ञान तन्त्र उत्तरदायी है। इसे दूसरे शब्दों में दर्शन, धर्म, अध्यात्म एवं कला के नाम से जाना जा सकता है। चेतना की भूख इन्हीं से बुझती है, उसे इन्हीं से दिशा और प्रेरणा मिलती है। परिवर्तन एवं उत्कर्ष भी इन्हीं आधारों को लेकर सम्भव होता है। अस्तु यह अनिवार्य है कि यह चेतनात्मक प्रगति आवश्यक हो तो ज्ञान तन्त्र को प्रखर बनाना पड़ेगा। सच तो यह है जब कभी ज्ञान तन्त्र शिथिल पड़ता है, विकृत होता है तभी व्यक्ति का स्तर लड़खड़ाता है और उस अस्त- व्यस्तता में भौतिक जगत की समस्त गतिविधियाँ उलझ जाती हैं। तत्त्वदर्शी सदा से यह कहते रहे है कि सम्पदा नहीं विचारणा प्रमुख है। यदि विचारणा सही रही तो सम्पदा छाया की तरह पीछे- पीछे फिरेगी, पर यदि सम्पदा को ही सब कुछ माना गया और चेतना स्तर की उत्कृष्टता उपेक्षित की गई तो बढ़ी हुई सम्पदा दूध पीकर परिपुष्ट हुए सर्प की तरह सर्वनाश करने पर उतारू हो जायेगी। यह शाश्वत तथ्य है इसे इतिहास ने लाखों बार आजमाया है और करोड़ों बार आजमाया जा सकता है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 Do Not Panic or Perplex

Life is full of challenges and testing moments! Many a times the adverse circumstances are so intense that one just can’t bear them, he loses patience, gets anxious and panicked; cries on his destiny and helplessness… But this doesn’t solve the problem. The only source of definite support in such cases is – prudence and patience.

Ups and downs, good and bad experiences are natural phases of human life. We must remember this fact and convince ourselves of the truth that wisdom and pure knowledge (gyana) are the only keys to conquer the agonies caused by the tides of adversities or tragedies. Firm faith in God’s grace and justice is a must in such testing moments of sufferings. We must understand that our knowledge is too limited to grasp the system of God. Whether we realize it at that time or not, the circumstances and experiences that appear so painful to us also occur in fact for our welfare only.

Because of our half or illusory knowledge and narrow attitude, we cannot grasp the real cause or purpose behind the happenings in our life. We must accept it that major cause of our agonies and anxiety is our ignorance; we want everything to conform to our expectation, our favor. But the course of life has many dimensions, beyond our perception. Faith in absolute justice and mercy of the Omniscient God is all the more important in the moments of hardships and pains. This gives us instant courage and light and helps maintain our calm without which we can’t even think properly. All religious scriptures preach the importance of the feeling of content and peace in all circumstance. It is indeed the nectar source of annulling all worries and panics even in the difficult, tragic situations. Adoption of peace, patience and satisfaction does not mean that you should not transact your duties or progress in your life. Rather, it implies that you should complete all your tasks, all duties, with mental stability and calm and a sense of inner faith in all circumstances.

📖 Akhand Jyoti, April 1943

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👉 Akhand Jyoti Pariwar अखण्ड-ज्योति परिवार

कष्ट पीड़ित, कामनाग्रस्त, ऋद्धि सिद्धि के आकाँक्षी, स्वर्ग मुक्ति के फेर में पड़े हुए, विरक्त , निराश व्यक्ति भी हमारे संपर्क में आते रहते हैं। ऐसे कितने ही लोगों से हमारे सम्बन्ध भी हैं, पर उनसे कुछ आशा हमें नहीं रहती। जो अपने निजी गोरखधन्धे में इतने अधिक उलझे हुए हैं कि ईश्वर, देवता, साधु, गुरु किसी का भी उपयोग अपने लाभ के लिए करने का ताना-बाना बुनते रहते हैं, वे बेचारे सचमुच दयनीय हैं। जो लेने के लिए निरन्तर लालायित हैं, उन गरीबों के पास देने के लिए है ही क्या? देगा वह—जिसका हृदय विशाल है, जिसमें उदारता और परमार्थ की भावना विद्यमान है। समाज, युग, देश, धर्म, संस्कृति के प्रति अपने उत्तरदायित्व की जिसमें कर्तव्य-बुद्धि जम गई होगी—वही लोक-कल्याण की बात सोच सकेगा और वही वैसा कुछ कर सकेगा। आज के व्यक्ति वादी, स्वार्थ परायण युग में ऐसे लोग चिराग लेकर ढूँढ़ने पड़ेंगे। पूजा उपासना के क्षेत्र में अनेक व्यक्ति अपने आपको अध्यात्म-वादी कहते मानते रहते हैं पर उनकी सीमा अपने आप तक ही सीमित है। इसलिए तत्वतः वे भी संकीर्ण व्यक्ति वादी ही कहे जा सकते हैं।

हमारी परम्परा पूजा उपासना की अवश्य है पर व्यक्ति बाद की नहीं। अध्यात्म को हमने सदा उदारता, सेवा और प्रस्ताव की कसौटी से कसा है और स्वार्थी को खोटा एवं परमार्थी को खरा कहा है। अखण्ड-ज्योति परिवार में दोनों ही प्रकार के खरे-खोटे लोग मौजूद हैं। अब इनमें से उन खरे लोगों की तलाश की जा रही है जो हमारे हाथ में लगी हुई मशाल को जलाये रखने में अपना हाथ लगा सकें, हमारे कंधे पर लदे हुए बोझ को हलका करने में अपना कंधा लगा सकें। ऐसे ही लोग हमारे प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी होंगे। इस छाँट में जो लोग आ जावेंगे उनसे हम आशा लगाये रहेंगे कि मिशन का प्रकाश एवं प्रवाह आगे बढ़ाते रहने में उनका श्रम एवं स्नेह अनवरत रूप से मिलता रहेगा। हमारी आशा के केन्द्र यही लोग हो सकते हैं। और उन्हें ही हमारा सच्चा वात्सल्य भी मिल सकता है। बातों से नहीं काम से ही किसी की निष्ठा परखी जाती है और जो निष्ठावान् हैं उनको दूसरों का हृदय जीतने में सफलता मिलती है। हमारे लिए भी हमारे निष्ठावान् परिजन ही प्राणप्रिय हो सकते हैं।

लोक सेवा की कसौटी पर जो खरे उतर सकें, ऐसे ही लोगों को परमार्थी माना जा सकता है। आध्यात्मिक पात्रता इसी कसौटी पर परखी जाती है। हमारे उस देव ने अपनी अनन्त अनुकम्पा का प्रसाद हमें दिया है। अपनी तपश्चर्या और आध्यात्मिक पूँजी का भी एक बड़ा अंश हमें सौंपा है। अब समय आ गया जब कि हमें भी अपनी आध्यात्मिक कमाई का वितरण अपने पीछे वालों को वितरित करना होगा। पर यह क्रिया अधिकारी पात्रों में ही की जायगी, यह पात्रता हमें भी परखनी है और वह इसी कसौटी पर परख रहे हैं कि किस के मन में लोक सेवा करने की उदारता विद्यमान है। इसी गुण का परिचय देकर किसी समय हमने अपनी पात्रता सिद्ध की थी अब यही कसौटी उन लोगों के लिए काम आयेगी जो हमारी आध्यात्मिक पूँजी के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत करना चाहेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964 पृष्ठ 50-51


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गुरुवार, 21 मई 2020

👉 कलंक और आक्रमण से निष्कलंक की सुरक्षा (अंतिम भाग)

प्रज्ञावतार ही निष्कलंक अवतार हैं। उसके प्रतिपादनों और समर्थकों को लोक श्रद्धा कैसे मिले? इसके रचनात्मक आधार तो कितने ही हैं, पर एक विरोधात्मक आधार भी हैं .. आसुरी आक्रमण। इसके पश्चात् ही किसी महान् व्यक्ति या आन्दोलन को प्रौढ़ता का पता चलता हैं। कलंक कालिका का दौर और अवरोध आक्रमणों का क्रम ही वह स्थिति उत्पन्न करेगा। जिससे निष्कलंक भगवान का सर्वत्र जय-जयकार होने लगे।

यह क्रम अपने अभियान में भी निश्चित रूप से चलेगा। चलता भी रहा है। प्रतिगामी निहित स्वार्थ द्वारा तरह-तरह के आक्षेप लगाये जाते रहे हैं। बदनाम करने का कोई अवसर उन्होंने नहीं छोड़ा। अश्रद्धा उत्पन्न करने के लिए जो कुछ कहा जा सकता था - जो कुछ किया या कराया जा सकता था, उसमें की कुछ कमी नहीं रहने दी गई हैं। यह सारा उत्पात उन आसुरी तत्वों हैं जो अवांछनियताओं की सड़ी कीचड़ में ही डाँस, मच्छरों की तरह अपनी जिन्दगी देखते हैं। कुछ ईर्ष्यालु हैं, जिन्हें अपने अतिरिक्त किसी अन्य का यश वर्चस्व सहन ही नहीं होता। इसके अतिरिक्त सड़े टिमाटरों का भी एक वर्ग हैं जो पेट में रहने वाले कीड़ों की-चारपाई पर साथ सोने वाले खटमलों की-आस्तीन में पलने वाले साँपों की तरह आश्रय पाते हैं वहीं खोखला भी करते हैं। बिच्छू अपनी माँ के पेट का माँस खाकर ही बढ़ते और पलते हैं, माता का प्राण हरण करने के उपरान्त ही जन्म धारण करते हैं। कृतघ्नों और विश्वासघातियों का वर्ग इस युग में जिस तेजी से पनपा हैं उतना संभवतः इतिहास भी इससे पहले कभी भी नहीं देखा गया।

अवाँछनीयता हर क्षेत्र में अड्डा डाले और जड़ जमाये बैठी हैं। युग परिवर्तन की प्रक्रिया भी उसे उखाड़ने की उसी क्रम अनुपात से चलेगी जिससे कि सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन। ऐसी दिशा में दुष्प्रवृत्तियों के सामने जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित होगा। अभियान को जब तक दुर्बल समझा जायगा तब तक उसे उपहास उपेक्षा का पात्र बने रहने दिया जायगा। व्यंग तिरस्कार बरसते रहेंगे। किन्तु जब उसकी समर्थता और सफलता का आभास होने लगेगा तो विरोध एवं आक्रमण का सिलसिला चल पड़ेगा। अन्ततः वह देवासुर संग्राम उतना ही प्रचण्ड हो जायगा जितना कि सृजन प्रत्यावर्तन। इसके लिए प्रत्येक सृजन शिल्पी को पहले से ही तैयार रहना होगा। किसान का मुख्य काम अन्न उपजाना है, विभुक्षा का समाधान करना हैं। तो भी उसे इस कार्य क्षेत्र में आये दिन सर्प, बिच्छुओं, दीमकों, सुअर, भेड़ियों से मुठभेड़ के साधन सँजोकर रखने होते हैं। स्वयं श्रेष्ठ कर्म से निरत हैं। यह इस बात की गारंटी नहीं कि दुष्ट दुरात्माओं के आक्रमण होंगे ही नहीं। सज्जनता सामने से ही अनाक्रम दीखती है, पर परोक्ष रूप से उसमें भी दुष्टता की विघातक सामर्थ्य परिणाम में भरी पड़ी है। असुर वस्तुस्थिति को समझता हैं इसलिए देव पर कुछ प्रत्यक्ष कारण न रहने पर भी आक्रमण करने से चूकता नहीं। प्रकाश के उदय में अन्धकार की मृत्यु है। इसलिए सूर्योदय से पूर्व एक बार सघन तमिस्रा जमा होती है और प्रकाश से जूझने का उपक्रम करती हैं, भले ही उसे अन्ततः मुँह की ही क्यों न खानी पड़े।

युग निर्माण अभियान की प्रज्ञावतार प्रक्रिया उन समस्त सम्भावनाओं से भरी हुई है। सहयोग उसे प्रचुर परिणाम में मिलना हैं किन्तु ऐसी घटनाएँ भी कम नहीं होंगी जा प्रत्यक्ष आक्रमण में कठिनाई और परोक्ष दुरभिसन्धि रचने में सरलता देखकर उसी मार्ग को अपनाये। अन्तः क्षेत्र से उभरने वाले और बाहरी क्षेत्र से आक्रमण करने वाली दोनों ही स्तर की दुरभिसन्धियों से अभियान की सुरक्षा का प्रबन्ध करना चाहिए। इस संदर्भ में बरती जाने वाली जागरूकता, साहसिकता एवं शूर-वीरता उतनी ही आवश्यक हैं जितनी कि सृजन प्रयोजनों के लिए बरती जाने वाली उदार सेवा-साधना एवं भाव भरी परमार्थ परायणता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1979 पृष्ठ 55

👉 Learn to Share

You are really fortunate if God has endowed you with vigor, brilliance, knowledge, power, prosperity and glory. Then your life must be progressive and joyful in the worldly sense. But this success or joy would be momentary and won’t be fulfilling, if you keep your resources and belongings closed to your chest and use them only for your selfish interests. Your joy, your satisfaction would expand exponentially if you learn to distribute them and share whatever you have with many others.

Try to spend at least a fraction of your wealth, your resources for the needy. Your help will not only give them support to rise and progress, more importantly, it will bestow the spiritual benefits of being kind and altruistic. This will augment your happiness manifold. Those being helped by you will also be happy and thus the stock of joy in the world will also expand.

Distributing and sharing with a sight of altruistic wisdom and a feel of compassion provide the golden key to unalloyed joy. God has been so kind to you; you should also be kind to others. God is defined as the eternal source of infinite bliss because HIS mercy pervades everywhere for all creatures, for everything; HIS divine powers are omnipresent; every impulse of joy is an expression of HIS beatitude.

You should see the dignity of HIS divine creation in this world. God has also given you an opportunity to glorify your life by selflessly spreading HIS auspicious grace…

📖 Akhand Jyoti, April 1943

👉 अपेक्षा ही दुःख का कारण

किसी दिन एक मटका और गुलदस्ता साथ में खरीदा हों और घर में लाते ही ५० रूपये का मटका अगर फूट जाएं तो हमें इस बात का दुःख होता हैं। क्योंकि मटका इतनी जल्दी फूट जायेगा ऐसी हमें कल्पना भी नहीं थीं। परंतु गुलदस्ते के फूल जो २०० रूपये के हैं, वो शाम तक मुर्झा जाएं, तो भी हम दुःखी नहीं होते। क्योंकि ऐसा होने वाला ही हैं, यह हमें पता ही था।
 
मटके की इतनी जल्दी फूटने की हमें अपेक्षा ही नहीं थीं, तो फूटने पर दुःख का कारण बना। परंतु​ फूलों से अपेक्षा नहीं थीं, इसलिए​ वे दुःख का कारण नहीं बनें। इसका मतलब साफ़ हैं कि जिसके लिए जितनी अपेक्षा ज़्यादा, उसकी तरफ़ से उतना दुःख ज़्यादा और जिसके लिए जितनी अपेक्षा कम, उसके लिए उतना ही दुःख भी कम।

👉 विचार करें........

माँ एक-एक भिंडी को प्यार से धोते पोंछते हुये वह काट रही थी छोटे-छोटे टुकड़ों में, फिर अचानक एक भिंडी के ऊपरी हिस्से में छेद दिख गया, शायद सोचा,  भिंडी खराब हो गई, वह फेंक देगी लेकिन नहीं, उसने ऊपर से थोड़ा काटा, कटे हुये हिस्से को फेंक दिया। फिर ध्यान से बची भिंडी को देखा, शायद कुछ और हिस्सा खराब था, उसने थोड़ा और काटा और फेंक दिया फिर तसल्ली की, बाक़ी भिंडी ठीक है कि नहीं। तसल्ली होने पर काट के सब्ज़ी बनाने के लिये रखी भिंडी में मिला दिया।

मैं मन ही मन बोला, वाह क्या बात है, पच्चीस पैसे की भिंडी को भी हम कितने ख्याल से, ध्यान से सुधारते हैं, प्यार से काटते हैं. जितना हिस्सा सड़ा है उतना ही काट के अलग करते हैं, बाक़ी अच्छे हिस्से को स्वीकार कर लेते हैं, ये तो क़ाबिले तारीफ है ।

लेकिन अफसोस!

इंसानों के लिये कठोर हो जाते हैं एक ग़लती दिखी नहीं कि उसके पूरे व्यक्तित्व को काट के फेंक देते हैं, उसके सालों के अच्छे कार्यों को दरकिनार कर देते हैं,महज अपने अहम को संतुष्ट करने के लिए उससे हर नाता तोड़ देते हैं ।

क्या पच्चीस पैसे की एक भिंडी से भी कमतर हो गया है आदमी❓ विचार करें........

बुधवार, 20 मई 2020

👉 कलंक और आक्रमण से निष्कलंक की सुरक्षा (भाग ३)

दुरभिसंधियों के रचने वाले हर सफलता के बाद साहस के साथ अपने दुष्कर्मों को निर्द्वंद्व होकर बढ़ाते है। निष्ठावानों से टकराने पर उनके दाँत खट्टे होते है। आक्रमण महंगा पड़ता है और भविष्य के लिए उनकी हिम्मत टूट जाती हैं। लोक तिरस्कार के कारण वे मुँह दिखाने लायक नहीं रहते। यह उदाहरण दूसरों के सामने भी प्रस्तुत होता हैं और श्रेष्ठता से अकारण टकराने का प्रतिफल क्या होता हैं इसका पता न केवल आततायियों को वरन् उस वर्ग के अन्य लोगों का साहस तोड़ने के लिए भी पर्याप्त होता हैं। अपयश और तिरस्कार का दण्ड जेल फाँसी से भी महंगा पड़ता है। ऐसी स्थिति श्रेष्ठ व्यक्तियों या आन्दोलनों से ही टकराने पर बनती हैं। सामान्य लोगों के बीच तो आक्रमण प्रत्याक्रमण के क्रम आये दिन चलते ही रहते हैं।

अन्ध श्रद्धाओं का समर्थन भी जोखिम भरा हैं। किसी के साथ अनगढ़ अधकचरे, अपरिपक्वों की मण्डली हो तो वह उसे जन-शक्ति समझने की भूल करता रहता है। किसकी श्रद्धा एवं आत्मीयता कितनी गहरी है, इसका पता चलाने का एक मापदण्ड यह भी हैं कि अफवाहों या आरोपों पर तो विश्वास कर लिया जाय, किन्तु सदाशयता पक्षधर अनेकानेक घटनाओं का क्षण भर में भुला दिया जाय। जो अफवाहों की फूँक से उड़ सकते हैं वे वस्तुतः बहुत ही हलके और उथले होते है। ऐसे लोगों का साथ किसी बड़े ही प्रयोजन के लिए कभी कारगर सिद्ध नहीं हो सकता। उन्हें कभी भी, कोई भी, कुछ भी कहकर विचलित कर सकता है। ऐसे विवेकहीन लोगों की छँटनी कर देने के लिए कुचक्रियों द्वारा लगाये गये आरोप या आक्रमण बहुत ही उपयोगी सिद्ध होते है।

योद्धाओं की मण्डली में शूरवीरों का स्तर ही काम आता है, शंकालु, अविश्वास, कायर प्रकृति के सैनिकों की संख्या भी पराजय का एक बड़ा कारण होती हैं। ऐसे मूढ़मतियों को अनाज में से भूसा अलगकर देने की तरह यह आक्रमणकारिता बहुत ही सहायक सिद्धा होती हैं। दूरभिसंधियां के प्रति जन-आक्रोश उभरने से सहयोगियों का समर्थन और भी अधिक बढ़ जाता हैं उस उभार से सुधारात्मक आन्दोलनों का पक्ष सबल ही होता है। कुसमय पर ही अपने पराये की परीक्षा होती हैं। इस कार्य को आततायी जितनी अच्छी तरह सम्पन्न करते हैं उतना कोई और नहीं। अस्थिर मति और प्रकृति के साथियों से पीछा छूट जाना और विवेकवानों का समर्थन सहयोग बढ़ना जिन प्रतिरोधों के कारण सम्भव होता हैं वह आक्रमणों को उत्तेजना उत्पन्न हुए सम्भव ही नहीं होता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1979 पृष्ठ 54

सोमवार, 18 मई 2020

👉 कलंक और आक्रमण से निष्कलंक की सुरक्षा (भाग २)

ईसा को अपराधी ठहराया और शूली पर लटकाया गया। सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ा। दयानन्द को विष दिया गया। गाँधी को गोली से उड़ाया गया। व्याध ने कृष्ण के प्राण हरण किये। गुरु गोविंद सिंह के अबोध बालकों को जल्लादों के सुपुर्द किया गया। मीरा निर्दोष होते हुए भी उत्पीड़न सहती रहीं। जहाँ तक अपराधों, आक्रमणों और प्रताड़नाओं का सम्बन्ध हैं वहाँ तक जो जितना उच्चस्तरीय आत्मवेत्ता हुआ है उसे उतना ही अधिक भार सहन करना पड़ा है। भगवान बुद्ध की जीवन गाथा पढ़ने से पता चलता है कि पुरातन पंथी और ईर्ष्यालु उनके प्राणघाती शत्रु बने हुए थे। उन्होंने अंगुलिमाल को आक्रमण के लिए उकसाया था। चरित्र हनन के लिए ढेरों दुरभिसंधियाँ रची थी। समर्थकों में अश्रद्धा उत्पन्न करने के लिए जो षड़यन्त्र रचे जा सकते थे उसमें कुछ कसर नहीं छोड़ी गई थी। गाँधी को विरोध होता रहा। उन पर पैसा बटोरने और हड़पने का लांछन लगाने वालों की संख्या आरम्भ में तो अत्यधिक थी, प्रताप बढ़ने के बाद ही वह घटने लगी थी। अन्ततः उन्हें गोली से ही उड़ा दिया गया। मध्यकाल में सन्तों में से प्रायः प्रत्येक को शत्रुओं की प्रताड़नाएं सहनी पड़ी हैं। आद्य शंकराचार्य, चैतन्य महाप्रभु, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, रामदास, गुरु गोविंदसिंह, बन्दा वैरागी आदि इसके जी-जागते प्रमाण हैं।

संसार के सुधारकों में प्रत्येक को प्रायः ऐसे ही आक्रमण न्यूनाधिक मात्रा में सहने पड़े है। संगठित अभियानों को नष्ट करने के लिए कार्यकर्त्ताओं में फूट डालने, बदनाम करने, बल प्रयोग से आतंकित करने, जैसे प्रयत्न सर्वत्र हुए है। ऐसा क्यों होता है यह विचारणीय हैं। सुधारक पक्ष को अवरोधों का सामना करने पर उनकी हिम्मत टूट जाने, साधनों के अभाव से प्रगति क्रम शिथिल या समाप्त हो जाने जैसे प्रत्यक्ष खतरे तो हैं, किन्तु परोक्ष रूप से इसके लाभ भी बहुत हैं। व्यक्ति की श्रद्धा एवं निष्ठा कितनी सच्ची और कितनी ऊँची हैं इसका पता इसी कसौटी पर कसने से लगता हैं कि आदर्शों का निर्वाह कितनी कठिनाई सहन करने तक किया जाता रहा। अग्नि तपाये जाने और कसौटी पर कसे जाने से कम में, सोने के खरे-खोटे होने का पता चलता ही नहीं। आदर्शों के लिए बलिदान से ही महा-मानवों की अन्तःश्रद्धा परखी जाती है और उसी अनुपात से उनकी प्रामाणिकता को लोक-मान्यता मिलती हैं। जिसे कोई कठिनाई नहीं सहनी पड़ी ऐसे सस्ते नेता सादा सन्देह और आशंका का विषय बने रहते हैं। श्रद्धा और सहायता किसी पर कभी पर तभी बरसती हैं जब वह अपनी निष्ठा का प्रभाव प्रतिकूलताओं से टकरा कर प्रस्तुत करता हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1979 पृष्ठ 53

👉 यदि कोई आप को महत्त्व न दे, तो भी आप दुखी न हों

इस संसार में व्यक्ति अकेला नहीं जी  सकता, क्योंकि उसमें इतना शक्ति सामर्थ्य नहीं है, कि वह अपने सारे काम स्वयं सुख पूर्वक कर लेवे। उसे समाज का सहयोग तो लेना ही पड़ता है। इसीलिए मनुष्य सामाजिक प्राणी कहलाता है। आपके परिवार के लोग, आपके संबंधी रिश्तेदार, आपके मित्र, और देश विदेश के लोग भी आपको अनेक क्षेत्रों में सहयोग देते हैं।
     
जब आप समाज में एक दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं, तो आपको एक दूसरे को सम्मान या महत्त्व भी देना होता है।
     
इस सम्मान या महत्त्व देने के व्यवहार से परस्पर प्रेम संगठन विश्वास आनंद उत्साह आदि गुणों की वृद्धि होती है। जब आप किसी दूसरे व्यक्ति को उसके गुणों और योग्यता के आधार पर कुछ महत्त्व देते हैं, तो आप उससे भी वैसी ही आशा रखते हैं, कि वह भी आपके गुणों और योग्यता के आधार पर आपको सम्मान देगा, महत्त्व देगा। ऐसी आशा रखना, स्वाभाविक ही है।
       
परंतु कभी कभी, कोई व्यक्ति, जो कुछ अधिक ही अभिमानी होता है, वह आपकी योग्यता को या तो समझता नहीं अथवा  समझते हुए भी जानबूझकर आपको उचित सम्मान या महत्त्व नहीं देता। ऐसी स्थिति में आपको कष्ट होता है। उस स्थिति में भी आप दुखी न हों। इसका उपाय यह है कि मान लिया, 10 में से 1 व्यक्ति ने आपके साथ कुछ ठीक व्यवहार नहीं किया। आपको उचित महत्त्व नहीं दिया, तो उस एक व्यक्ति की आप भी उपेक्षा करें। आप भी उस पर ध्यान न दें। (उससे द्वेष नहीं करना है। उपेक्षा करनी है।) शेष 9 व्यक्ति जो आपको सम्मान और महत्त्व देते हैं, उनके साथ अपना व्यवहार रखें, और आनंद से जिएं।

याद रहे, आप का रिमोट कंट्रोल आपके हाथ में ही रखें, दूसरे के हाथ में न दें। अर्थात् ऐसा न हो, कि सामने वाला व्यक्ति एक बटन दबाए, और आपको क्रोध आ जाए; आपका जीवन अस्त-व्यस्त हो जाए। बल्कि ऐसे अनुचित व्यवहारों का समाधान (उपेक्षा करना) अपने पास तैयार रखें। ऐसा अवसर आते ही उस समाधान का प्रयोग करें। क्रोध, लोभ, अभिमान और तनाव मुक्त होकर आनंदित जीवन जिएं।

👉 When is a Prayer Granted?

Our prayers deserve to be heard by the Almighty only when we take care of making use of the potentials he has already bestowed upon us. Accumulation of negative tendencies of lethargy, dullness, escapism from duties, ignorance, etc makes one hazardous – for his own life – like a balloon full of concentrated acid, which is most likely to explode anytime or ruin due to the acidic burning.

The rules in the system of God work like a vigilant gardener who uproots the useless and harmful wild growth and carefully nurses the saplings of the useful vegetation. If a field is not ploughed and is full of useless grass or shrubs etc, how can it yield a crop (even if the soil is fertile)? Who will praise a farmer, who lets his field be destroyed without bothering to clean it? The system of God certainly can’t allow its field of Nature to be left unguarded. The rules of the Omnipresent are such that the vices, the evils, the futile, get eliminated continuously so that the perfection and eternal beauty of HIS creation remains unperturbed. If you expect your calls to be heard, you will also have to constantly strive for self-refinement.

The best way to get the response to your prayers is to awaken your self confidence and follow the path of duties. Then alone your inner self will awake. The opening to the path to the Light Divine lies deep within the realm of soul and enlightened inner self provides the only bridge to reach this sublime source.

Those who don’t have faith in the dignity of their own souls, who keep ignoring the inner voice and hunt in the external world to quench their wishes are lost in the smog of passions and confusions and invite adversities for themselves. Those who scorn their own (inner) selves are also rebuked at God’s end and their prayers evaporate in the void…

📖 Akhand Jyoti, March 1943

रविवार, 17 मई 2020

👉 कलंक और आक्रमण से निष्कलंक की सुरक्षा (भाग १)

प्रगति के मार्ग में अवरोध का- विशेषतया श्रेष्ठ सम्भावनाओं में अड़चने आने का अपना इतिहास है, जिसकी पुनरावृत्ति अनादिकाल से होती रहीं हैं। जिस प्रकार आसुरी सक्रमणों को निरस्त करने के लिए दैवी सन्तुलन की सृजन शक्तियों का अवतरण होता हैं उसी प्रकार श्रेष्ठता की अभिवृद्धि को आसुरी तत्व सहन नहीं कर पाते। उसमें अपना पराभव देखते हैं और बुझते समय दीपक के अधिक तेजी के साथ जलने की तरह अपनी दुष्टता का परिचय देते हैं। मरते समय चींटी के पंख उगते हैं। पागल कुत्ता जब मरने को होता हैं तो तालाब में डूबने को दौड़ता हैं। पागल हाथी पर्वत पर आक्रमण करता हैं और उससे टकरा-टकराकर अपना सिर फोड़ लेता हैं। आसुरी तत्व भी जब अन्तिम साँस लेते हैं और एक वारगी मरणासन्न की तरह उच्छास खींचकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते है। अवतारों में पुष्प-प्रक्रियाओं भी निर्बाध रीति से बिना किसी अड़चन के सम्पन्न नहीं हो तो जाती, उसमें पग-पग पर अवरोध और आक्रमण आड़े आते है।

भगवान कृष्ण पर जन्म काल से ही एक के बाद एक आक्रमण हुए। वसुदेव जब उन्हें टोकरी में रखकर गोकुल ले जा रहें थे तो सिंह गर्जन, घटाओं का वर्षण, सर्पों का आक्रमण जैसे व्यवधान उत्पन्न हुए। इसके बाद पूतना, वृत्तासुर, तृणावत, कालिया, सर्प आदि द्वारा उनके प्राण हरण की दुरभिसन्धियाँ रची जाती रही। कस, जरासंध, शिशुपाल जैसे अनेकों शत्रु बन गये। चारुढ़, मुष्टिकासुर आदि ने उन पर अकारण आक्रमण बोले। अन्ततः भीलों ने गोपियों का हरण-व्याध द्वारा प्रहार करने जैसी घटनाएं घटित हुई।

कृष्ण की चरित्र-निष्ठा और न्याय-निष्ठा उच्च स्तरीय थी तो भी उन्हें रुक्मिणी चुराने का दोष लगाया गया। चरित्र हनन की चोट भगवान राम को भी सहनी पड़ी। सीता जैसी सती को लोगों ने दुराचारिणी कहा और अग्नि परीक्षा देने के लिए विवश किया। अपवादियों के दोषारोपण फिर भी समाप्त नहीं हुए और स्थिति यहाँ तक आ पहुंची कि सीता परित्याग जैसी दुःखदायी दुर्घटना सामने आई। जयंती ने सीताजी पर अश्लील आक्रमण किया। सूर्पणखा राम के स्तर को गिरा कर असुरों के समतुल्य ही बनाना चाहती है। चाहना अस्वीकार करने पर उसने जो विपत्ति ढाई वह सर्वविदित है। सत्यता और कर्त्तव्यों के प्रति राम के व्यवहार में कहीं अनौचित्य नहीं था। फिर भी उसने वह षड़यंत्र रचा जिससे उन्हें चौदह वर्ष के एकाकी वनवास में प्राण खो बैठने जैसा ही त्रास सहना पड़ा। खरदूषण, मारीच, अहिरावण, रावण, कुम्भकरण ने आक्रमण पर आक्रमण किये इनमें से किसी से भी राम की ओर से पहल नहीं हुई थी। वे तो मात्र आत्म-रक्षा की ही लड़ाई लड़ते रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1979 पृष्ठ 53

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 17 May 2020

■ जीवन के आधार स्तम्भ सद्गुण है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को श्रेष्ठ बना लेना, अपनी आदतों को श्रेष्ठ सज्जनों की तरह ढाल लेना वस्तुतः ऐसी बड़ी सफलता है, जिसकी तुलना किसी भी अन्य सांसारिक लाभ से नहीं की जा सकती। इसलिए सबसे अधिक ध्यान हमें इस बात पर देना चाहिए कि हम गुणहीन ही न बने रहें। सद्गुणों की शक्ति और विशेषताओं से अपने को सुसज्जित करने का प्रयत्न करें।

□ इस संसार की रचना कल्पवृक्ष के समान नहीं है कि जो कुछ हम चाहें वह तुरन्त ही मिल जाया करे। यह कर्मभूमि है, जहाँ हर किसी को अपना रास्ता आप बनाना पड़ता है। अपनी योग्यता और विशेषता का प्रमाण प्रस्तुत किये बिना कोई किसी महत्त्वपूर्ण स्थान पर नहीं पहुँच सकता । यहाँ हर किसी को परीक्षा की अग्नि में तपाया जाता है और जो इस कसौटी पर खरा उतरता है, उसी को प्रामाणिक एवं विश्वस्त माना जाता है।

◆ बुराइयों का दोष मन के मत्थे मढ़ना ठीक नहीं। मनुष्य स्वयं इसका अपराधी होता है और इसी में उसका कल्याण है कि वह अपना दोष स्वीकार कर ले और उसका परिमार्जन करने का प्रयत्न करे। जिस प्रकार मन को उसने बलात् पूर्वक अधोगामी बनाया है, उसी प्रकार उसे सन्मार्गगामी बनाने का भी प्रयत्न करें।

◇ उन्नति कोई उपहार नहीं है, जो छत फाड़कर अनायास ही हमारे घर में बरस पड़े। उसके लिए मनुष्य को कठोर प्रयत्न करने पड़ते हैं और एक मार्ग अवरुद्ध हो जाय तो दूसरा सोचना पड़ता है। गुण, योग्यता और क्षमता ही सफलता का मूल्य है। जिसमें जितनी क्षमता होगी उसे उतना ही लाभ मिलेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पात्रता एक चमत्कारी शक्ति

पात्रता के अभाव में सांसारिक जीवन में किसी को शायद ही कुछ विशेष उपलब्ध हो पाता है। अपना सगा होते हुए भी एक पिता मूर्ख गैर जिम्मेदार पुत्र को अपनी विपुल सम्पत्ति नहीं सौंपता। कोई भी व्यक्ति निर्धारित कसौटियों पर खरा उतरकर ही विशिष्ट स्तर की सफलता अर्जित कर सकता है। मात्र माँगते रहने से कुछ नहीं मिलता, हर उपलब्धि के लिए उसका मूल्य चुकाना पड़ता है। बाजार में विभिन्न तरह की वस्तुएँ दुकानों में सजी होती हैं, पर उन्हें कोई मुफ्त में कहाँ प्राप्त कर पाता है? अनुनय विनय करने वाले तो भीख जैसी नगण्य उपलब्धि ही करतलगत कर पाते हैं। पात्रता के आधार पर ही शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय आदि क्षेत्रों में भी विभिन्न स्तर की भौतिक उपलब्धियाँ हस्तगत करते सर्वत्र देखा जा सकता है।
  
अध्यात्म क्षेत्र में भी यही सिद्धान्त लागू होता है। भौतिक क्षेत्र की तुलना में अध्यात्म के प्रतिफल कई गुना अधिक महत्त्वपूर्ण, सामर्थ्यवान् और चमत्कारी हैं। किन्हीं-किन्हीं महापुरुषों को देख एवं सुनकर हर व्यक्ति के मुँह में पानी भर आता है तथा उन्हें प्राप्त करने के लिए मन ललचाता है, पर अभीष्ट स्तर का आध्यात्मिक पुरुषार्थ न कर पाने के कारण उस ललक की आपूर्ति नहीं हो पाती। पात्रता के अभाव में अधिकांश को दिव्य आध्यात्मिक विभूतियों से वंचित रह जाना पड़ता है जबकि पात्रता विकसित हो जाने पर बिना माँगें ही वे साधक पर बरसती हैं। उन्हें किसी प्रकार का अनुनय विनय नहीं करना पड़ता है। दैवी शक्तियाँ परीक्षा तो लेती हैं, पर पात्रता की कसौटी पर खरा सिद्ध होने वालों को मुक्तहस्त से अनुदान भी देती हैं।
  
यह सच है कि अध्यात्म का, साधना का चरम लक्ष्य सिद्धियाँ-चमत्कारों की प्राप्ति नहीं है, पर जिस प्रकार अध्यवसाय में लगे छात्र को डिग्री की उपलब्धि के साथ-साथ  बुद्धि की प्रखरता का अतिरिक्त अनुदान सहज ही मिलता रहता है, उसी तरह आत्मोत्कर्ष की प्रचण्ड साधना में लगे साधकों को उन विभूतियों का भी अतिरिक्त अनुदान मिलता रहता है, जिसे लोक-व्यवहार की भाषा में सिद्धि एवं चमत्कार के रूप में जाना जाता है। पर चमत्कारी होते हुए भी ये प्रकाश की छाया जैसी ही हैं। प्रकाश की ओर चलने पर छाया पीछे-पीछे अनुगमन करती है। अन्धकार की दिशा में बढ़ने पर छाया आगे आ जाती है, उसे पकड़ने का प्रयत्न करने पर भी वे पकड़ में नहीं आतीं। इसी प्रकार अर्थात् दिव्यता की ओर-श्रेष्ठता की ओर परमात्म पथ की ओर बढ़ने पर छाया अर्थात् ऋद्धि-सिद्धियाँ साधक के पीछे-पीछे चलने लगती हैं। इसके विपरीत उन्हीं की प्राप्ति को लक्ष्य बनाकर चलने पर तो आत्म-विकास की साधना से वंचित बने रहने से वे पकड़ में नहीं आतीं।
  
दिव्यता की ओर बढ़ने का अर्थ है- अपने गुण, कर्म, स्वभाव को इतना परिष्कृत, परिमार्जित कर लेना कि आचरण में देवत्व प्रकट होने लगे। इच्छाएँ, आकांक्षाएँ देवस्तर की बन जाएँ। संकीर्णता, स्वार्थपरता हेय और तुच्छ लगने लगे। समष्टि के कल्याण की इच्छा एवं उमंग उठे और उसी में अपना भी हित दिखाई दे। दूसरों का कष्ट, दुःख अपना ही जान पड़े और उनके निवारण के लिए मन मचलने लगे। सभी मनुष्य समस्त प्राणी अपनी ही सत्ता के अभिन्न अंग लगने लगें। आत्म विकास की इस स्थिति पर पहुँचे हुए साधक की, ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ सहचरी बन जाती हैं। पर इन अलौकिक विभूतियों को प्राप्त करने के बाद वे उनका प्रयोग कभी भी अपने लिए अथवा संकीर्ण स्वार्थों के लिए नहीं करते। संसार के कल्याण के लिए ही वे उन शक्तियों का सदुपयोग करते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 15 मई 2020

👉 Hriday Parivartan हृदय परिवर्तन

एक राजा को राज भोगते काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया।

राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी। नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा - "बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताई। एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए।"

अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा।

जब यह बात गुरु जी ने सुनी। गुरु जी ने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं।

वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया।

उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया।

नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कहा - "बस कर, एक दोहे से तुमने वेश्या होकर सबको लूट लिया है।"

जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे - "राजा! इसको तू वेश्या मत कह, ये अब मेरी गुरु बन गयी है। इसने मेरी आँखें खोल दी हैं। यह कह रही है कि मैं सारी उम्र जंगलों में भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई! मैं तो चला।" यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े।

राजा की लड़की ने कहा - "पिता जी! मैं जवान हो गयी हूँ। आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था। लेकिन इस नर्तकी ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही। क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है?"

युवराज ने कहा - "पिता जी! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे। मैंने आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देना था। लेकिन इस नर्तकी ने समझाया कि पगले! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है। धैर्य रख ।"

जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया। राजा के मन में वैराग्य आ गया। राजा ने तुरन्त फैंसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ।" फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री ! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं। तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो।" राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया।

यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा - "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी?" उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया। उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा धंधा बन्द करती हूँ और कहा कि "हे प्रभु! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना। बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी।"

समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती। एक दोहे की दो लाईनों से भी हृदय परिवर्तन हो सकता है। बस, केवल थोड़ा धैर्य रखकर चिन्तन करने की आवश्यकता है।

प्रशंसा से पिंघलना मत, आलोचना से उबलना मत, नि:स्वार्थ भाव से कर्म करते रहो, क्योंकि इस धरा का, इस धरा पर, सब धरा रह जायेगा।

👉 Kuritiyon Ke Viruddh कुरीतियों के विरूद्ध पुरुषार्थ की आवश्कता

बुराइयों में कितनी ही ऐसी हैं जिन्हें एक दिन भी सहन नहीं किया जाना चाहिए। नशेबाजी इनमें प्रमुख है। स्वास्थ्य, पैसा, इज्जत और अक्ल यह चारों ही वस्तुएँ इस कारण बर्बाद होती हैं। पीढ़ियाँ खराब होती हैं और रुग्णता बढ़ती है। नशा न कोई उगाए न कोई पिए इसके लिए प्रायः गाँधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन जैसा ही रोकथाम कर सकने वाला मोर्चा खड़ा करना होगा।

विवाह-शादियों में होने वाला अपव्यय-दहेज अपने देश में एक बुरी किस्म का अभिशाप है। उसी से मिलती-जुलती मृतक-भोज जैसी अन्य कुरीतियाँ प्रचलित हैं। इन सबको एक बार में ही एक साथ उखाड़ फेंकने की आवश्यकता है। भिक्षा-व्यवसाय भी एक ऐसी ही लानत है जिसके कारण समर्थ व्यक्ति भी स्वाभिमान खोकर वेश्या वेष की आड़ में भिखारियों की पंक्ति में जा बैठता है। तलाश करने पर हर क्षेत्र में अपने अपने ढंग की चित्र-विचित्र कुरीतियों का प्रचलन है। आलस्य और प्रमाद ऐसा दुर्गुण है जिसके कारण अच्छे-खासे प्रगतिशील मनुष्य भी अपंग असमर्थों की स्थिति में जा पहुँचते हैं और दरिद्रता का पिछड़ेपन का अभिशाप भुगतते हैं। इन मुद्दतों से जन-जीवन में घुसी हुई बुराइयों की जड़ उखाड़ फेंकना एक व्यक्ति का काम नहीं है। इसके लिए मोर्चा बंदी करनी होगी और देखना होगा कि इस कुचक्र में फँसे हुए जन-जीवन को किस तरह मुक्त कराया जाए।

सृजन से संबंधित हजारों काम हैं और उससे भी अधिक उन्मूलन स्तर के। इन्हें कर सकना मात्र जीभ चलाने या विरोध व्यक्त करने भर से नहीं हो सकता। कितने लोगों द्वारा व्यवहार में लाए जाने पर यह कुरीतियाँ प्रथा बन चुकी हैं। इन्हें स्थानांतरित करने के लिए उससे कम नहीं वरन् अधिक ही पुरुषार्थ की अपेक्षा होगी।

अपने भारत की तरह ही हर देश की हर क्षेत्र की अपने-अपने ढंग की अनगिनत समस्याएँ हैं। उनके समाधान में आगे आगे कदम बढ़ा सकने वाले शूरवीरों की पग-पग पर आवश्यकता पड़ेगी। यह कहाँ से आएँ? आज तो उनका अभाव दीखता है। रात्रि के सन्नाटे को चीरती हुई प्रातःकाल में जिस प्रकार चिड़ियों की चहचहाट सुनाई पड़ती है वैसा ही कुछ अगले दिनों सर्वत्र माहौल बनेगा। जन-जन को इसका पाठ कौन पढ़ायेगा? हर किसी को स्वार्थ में कटौती करके परमार्थ में हाथ डालने के लिए कौन विवश करेगा? इसका उत्तर आज तो नहीं दिया जा सकता। किन्तु कल-परसों ऐसा समय अवश्य ही आवेगा जिसमें सत्प्रवृत्ति संवर्धन और दुष्प्रकृति उन्मूलन की आँधी-तूफान जैसी हवा चलेगी। आँधी चलती है तो तिनके, पत्ते और धूल कण तक आकाश चूमने लगते हैं। अगले ही दिनों ऐसी बासंती बयार चलेगी जिससे ठूंठ कोपलें फोड़ने लगें और कोपलों पर फूल आने लगें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 21

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/July/v1.26

👉 Generous Like the Clouds

Stingy fellows, who keep their resources only to themselves and remain apathetic to others’ sufferings, are in fact accounting sins for their future destiny. Those who have stocked heaps of wealth in their possession but never use it are mere ‘guards’ of money. Such fellows are burden on this earth that can do nothing for anyone. Even materialistically, they don’t enjoy anything; the thirst of gaining more, the worries and tensions of safeguarding the possession and the miserly attitude do not let them live in peace; they neither eat well nor can give anything to others. Despite having millions or billions of riches, they remain poor, beggars… Thirst for more and more of selfish possession does not even let one see what are the right or wrong means of piling the stocks of wealth. Prosperity earned by unfair means cannot let one prosper… One dies empty handed and later one all that ‘dead property’ possessed by him does no good to even to those who grabs it afterwards…

On the contrary, those who earn honestly and spend magnanimously and wisely in good, constructive and auspicious activities are always prospering. They are like clouds, which enshower generously; even if emptied today, the clouds are filled again and return back tomorrow with same dignity.

Integrity, benevolence, caring and helping sociability – are virtues of greatness, which can make the entire world your own. No one can forget the warmth of meeting such amicable personalities. But, the selfish fellows, howsoever talented and affluent they might be, remain aloof and virtually isolated; their state is like that of milk kept in a dirty pot, which is thrown without use…

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1943

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 15 May 2020

■ हमें सफलता के लिए शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए, पर असफलता के लिए जी में गुंजाइश रखनी चाहिए। प्रगति के पथ पर चलने वाले हर व्यक्ति को इस धूप-छाँव का सामना करना पड़ा है। हर कदम सफलता से ही भरा मिले, ऐसी आशा केवल बाल बुद्धि वालों को शोभा देती है, विवेकशीलों को नहीं।  जीवन विद्या का एक महत्त्वपूर्ण पाठ यह है कि हम न छोटी-मोटी सफलताओं से हर्षोन्मत्त हों और न असफलताओं को देखकर हिम्मत हारें।

□ हर आदमी की अपनी मनोभूमि, रुचि, भावना और परिस्थिति होती है। यह उसी आधार पर सोचता, चाहता और करता है। हमें इतनी उदारता रखनी ही चाहिए कि  यदि दूसरों की भावनाओं का आदर न कर सकें तो कम से कम उन्हें सहन कर ही लें। असहिष्णुता मनुष्य का एक नैतिक दुर्गुण है  जिसमें अहंकार की गंध आती है।  हर किसी को अपनी मर्जी का बनाना-चलाना चाहें तो यह एक मूर्खता भरी बात ही होगी।

◆ अपने को असमर्थ, अशक्त एवं असहाय मत समझिये। ऐसे विचारों का परित्याग कर दीजिए कि साधनों के अभाव में हम किस प्रकार आगे बढ़ सकेंगे। स्मरण रखिए, शक्ति का स्रोत साधन में नहीं, भावना में है। यदि आपकी आकाँक्षाएँ आगे बढ़ने के लिए व्यग्र हो रही हैं, उन्नति करने की तीव्र इच्छाएँ बलवती हो रही हैं, तो विश्वास रखिये साधन आपको प्राप्त होकर रहेंगे।

◇ बड़प्पन की इच्छा सबको होती है, पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि उसे कैसे प्राप्त किया जाय। जो जानते हैं वे उस ज्ञान को आचरण में लाने का साहस नहीं करते। आमतौर से यह सोचा जाता है कि जिसका ठाटबाट जितना बड़ा है वह उसी अनुपात से बड़ा माना जाएगा। मोटर, बंगला, सोना, जायदाद, कारोबार, सत्ता, पद आदि के अनुसार किसी को बड़ा मानने का रिवाज चल पड़ा है। इससे प्रतीत होता है कि लोग मनुष्य के व्यक्तित्व को नहीं, उसकी दौलत को बड़ा मानते हैं- यह दृष्टिदोष ही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 1)

सब कुछ साधन सम्पन्न और सूक्ष्म होने पर भी एक नहीं असंख्यों व्यक्ति संसार में चिन्तित और उद्विग्न दिखाई देते हैं। यदि और अधिक गहराई से देखा ज...