बुधवार, 20 मई 2020

👉 कलंक और आक्रमण से निष्कलंक की सुरक्षा (भाग ३)

दुरभिसंधियों के रचने वाले हर सफलता के बाद साहस के साथ अपने दुष्कर्मों को निर्द्वंद्व होकर बढ़ाते है। निष्ठावानों से टकराने पर उनके दाँत खट्टे होते है। आक्रमण महंगा पड़ता है और भविष्य के लिए उनकी हिम्मत टूट जाती हैं। लोक तिरस्कार के कारण वे मुँह दिखाने लायक नहीं रहते। यह उदाहरण दूसरों के सामने भी प्रस्तुत होता हैं और श्रेष्ठता से अकारण टकराने का प्रतिफल क्या होता हैं इसका पता न केवल आततायियों को वरन् उस वर्ग के अन्य लोगों का साहस तोड़ने के लिए भी पर्याप्त होता हैं। अपयश और तिरस्कार का दण्ड जेल फाँसी से भी महंगा पड़ता है। ऐसी स्थिति श्रेष्ठ व्यक्तियों या आन्दोलनों से ही टकराने पर बनती हैं। सामान्य लोगों के बीच तो आक्रमण प्रत्याक्रमण के क्रम आये दिन चलते ही रहते हैं।

अन्ध श्रद्धाओं का समर्थन भी जोखिम भरा हैं। किसी के साथ अनगढ़ अधकचरे, अपरिपक्वों की मण्डली हो तो वह उसे जन-शक्ति समझने की भूल करता रहता है। किसकी श्रद्धा एवं आत्मीयता कितनी गहरी है, इसका पता चलाने का एक मापदण्ड यह भी हैं कि अफवाहों या आरोपों पर तो विश्वास कर लिया जाय, किन्तु सदाशयता पक्षधर अनेकानेक घटनाओं का क्षण भर में भुला दिया जाय। जो अफवाहों की फूँक से उड़ सकते हैं वे वस्तुतः बहुत ही हलके और उथले होते है। ऐसे लोगों का साथ किसी बड़े ही प्रयोजन के लिए कभी कारगर सिद्ध नहीं हो सकता। उन्हें कभी भी, कोई भी, कुछ भी कहकर विचलित कर सकता है। ऐसे विवेकहीन लोगों की छँटनी कर देने के लिए कुचक्रियों द्वारा लगाये गये आरोप या आक्रमण बहुत ही उपयोगी सिद्ध होते है।

योद्धाओं की मण्डली में शूरवीरों का स्तर ही काम आता है, शंकालु, अविश्वास, कायर प्रकृति के सैनिकों की संख्या भी पराजय का एक बड़ा कारण होती हैं। ऐसे मूढ़मतियों को अनाज में से भूसा अलगकर देने की तरह यह आक्रमणकारिता बहुत ही सहायक सिद्धा होती हैं। दूरभिसंधियां के प्रति जन-आक्रोश उभरने से सहयोगियों का समर्थन और भी अधिक बढ़ जाता हैं उस उभार से सुधारात्मक आन्दोलनों का पक्ष सबल ही होता है। कुसमय पर ही अपने पराये की परीक्षा होती हैं। इस कार्य को आततायी जितनी अच्छी तरह सम्पन्न करते हैं उतना कोई और नहीं। अस्थिर मति और प्रकृति के साथियों से पीछा छूट जाना और विवेकवानों का समर्थन सहयोग बढ़ना जिन प्रतिरोधों के कारण सम्भव होता हैं वह आक्रमणों को उत्तेजना उत्पन्न हुए सम्भव ही नहीं होता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1979 पृष्ठ 54

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 चन्दन का कोयला तो न बनायें

एक राजा वन विहार के लिए गया। शिकार का पीछा करते-करते राह भटक गया। घने जंगल में जा पहुँचा। रास्ता साफ नहीं दीख पड़ता था। साथी कोई रहा नहीं। र...