मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

👉 सच्चा सद्भाव

पुत्र की उम्र पचास को छूने लगी। पिता पुत्र को व्यापार में स्वतन्त्रता नहीं देता था, तिजोरी की चाबी भी नहीं। पुत्र के मन में यह बात खटकती रहती थी। वह सोचता था कि यदि मेरा पिता पन्द्रह-बीस वर्ष तक और रहेगा तो मुझे स्वतन्त्र व्यापार करने का कोई अवसर नहीं मिलेगा। स्वतन्त्रता सबको चाहिये। मन में चिढ़ थी, कुढ़न थी। एक दिन वह फूट पड़ी। पिता-पुत्र में काफी बकझक हुई। सम्पदा का बँटवारा हुआ। पिता अलग रहने लगा। पुत्र अपने बहू-बच्चोंक साथ अलग रहने लगा।

पिता अकेले थे। उनकी पत्नी का देहान्त हो चुका था। किसी दूसरे को सेवा के लिए नहीं रखा; क्योंकि उनके स्वभावमें किसी के प्रति विश्वास नहीं था, यहाँ तक कि पुत्र के प्रति भी नहीं था। वे स्वयं ही अपने हाथ से रुखा-सूखा भोजन बनाकर कर लेते, कभी भूखे सो जाते। जब उनकी पुत्रवधू को यह बात मालूम पड़ी तो उसे बहुत दु:ख हुआ। आत्मग्लानि भी हुई। उसे बाल्यकाल से ही धर्म का संस्कार था- बड़ों के प्रति आदर एवं सेवा का भाव था। उसने अपने पति को मनाने का प्रयास किया, परंतु वे नहीं माने। पिता के प्रति पुत्र के मन में कोई सद्भाव नहीं था। अब बहू ने एक विचार अपने मन में दृढ़ कर लिया और कार्यान्वित किया। वह पहले रोटी बनाकर अपने पति-पुत्र को खिलाकर दूकान और स्कूल भेज देती। स्वयं श्वसुर के गृह चली जाती। वहाँ भोजन बनाकर श्वसुर को खिला देती और सायंकाल के लिए पराठे बनाकर रख देती।

कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। जब पति को मालूम पड़ा तो उन्होंने रोका- ‘ऐसा क्यों करती हो? बीमार पड़ जाओगी। आखिर शरीर ही तो है, कितना परिश्रम सहेगा!’ बहू बोली- ‘मेरे ईश्वर के समान आदरणीय श्वसुर भूखे रहें’; इसके बिना मुझे कुछ संतोष नहीं है, बड़ी ग्लानि है। मैं उन्हें खिलाये बिना खा नहीं सकती। भोजन के समय उनकी याद आने पर मुझे आँसू आने लगते हैं। उन्होंने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया है, तब तुम मुझे पति के रुप में मिले हो। तुम्हारे मन में कृतज्ञता का भाव नहीं है तो क्या हुआ; मैं उनके प्रति कैसे कृतघ्न हो सकती हूँ?

पत्नी के सद्भाव ने पतिकी निष्ठुरता पर विजय प्राप्त कर ली। उसने जाकर पिता के चरण छुये, क्षमा माँगी, घर ले आये- पति-पत्नी दोनों पिताकी सेवा करने लगे। पिता ने व्यापार का सारा भार पुत्र पर छोड़ दिया। वे अब पुत्रके किसी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते थे।

परिवार के किसी भी व्यक्ति में यदि सच्चा सद्भाव हो तो वह सबके मन को जोड़ सकता है। मन का मेल ही सच्चा पारिवारिक सुख है।

👉 सब कुछ आपके अंदर ही है।


👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 4)

Q. 6. Does one himself benefit by doing Jap-Anusthan for others?

Ans. It is true that like helping the needy through one’s own resources, a person reaps spiritual benefits while performing Upasana-Tap for others (“Distant therapy”). The only condition is that it should be carried out to support a deserving cause. On the contrary, if divine powers are sought to further some misdeed, it becomes a sinful act. Purity of motive is, therefore, a pre-requisite for an Anusthan.

Q.7. Is acceptance of a donation or gift in cash or kind is permissible in lieu of an Anusthan done for others?
Ans. It is sanctioned to the extent of minimum amount for bare sustenance. Very little benefit accrues when an Anusthan is performed for others with an eye on deriving maximum personal benefit.

Q.8. What is the time of the day recommended for Jap during an Anusthan? Is it necessary to complete  Jap at a stretch?

Ans. Mornings are best suited. Otherwise, one may complete the count in instalments at different periods of the day.

Q.9. What to do if there is some irregularity during the Anusthan?


Ans. There should not be any apprehension about incurring any divine displeasure as a consequence of an unavoidable irregularity during the Anusthan. Nevertheless, it is advisable to seek protection of a competent Guru toward off possible disturbances and to take care of advertent or inadvertent errors. This service is also provided free from Shantikunj, Hardwar, Uttar Pradesh, India. One is advised to send details of personal introduction and time proposed for the Anusthan for receiving spiritual protection and rectification of errors through the power of Guru. It will doubly ensure success of the Anusthan.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 75

👉 जीवन सन्देश

मनुष्य की शक्ति अनन्त है। परन्तु यह अचरज भरे दुःख की बात है कि उसकी ये ज्यादातर शक्तियाँ सोई हुई हैं। यहाँ तक कि हमारे जीवन के सोने की अन्तिम रात्रि आ जाती है, परन्तु इन शक्तियों का जागरण नहीं हो पाता। यदि कहीं कुछ होता भी है, तो बहुत थोड़ा। ज्यादातर लोग तो अपनी अनन्त शक्तियों एवं असीमित सम्भावनाओं के बारे में सोचते भी नहीं। मानव जीवन का यथार्थ यही है कि हममें से ज्यादातर लोग तो आधा-चौथाई ही जी पाते हैं। कोई-कोई तो अपने जीवन का केवल सौवाँ, हजारवाँ या फिर लाखवाँ हिस्सा ही जी पाते हैं। इस तरह हमारी बहुतेरी शारीरिक, मानसिक शक्तियों का उपयोग आधा-अधूरा ही हो पाता है। आध्यात्मिक शक्तियों का तो उपयोग होता ही नहीं। जीवन का सच यही है कि मनुष्य की अग्नि बुझी-बुझी सी जलती है और इसीलिए वह स्वयं की आत्मा के समक्ष भी हीनता में जीता है।
  
इससे उबरने के लिए जरूरी है कि हमारा जीवन सक्रिय और सृजनात्मक हो। अपने ही हाथों दीन-हीन बने रहने से बड़ा पाप और कुछ भी नहीं। जमीन को खोदने से जलस्रोत मिलते हैं, ऐसे ही जीवन को खोदने से अनन्त-अनन्त शक्ति स्रोत उपलब्ध होते हैं। इसलिए जिन्हें अपने आप की पूर्णता अनुभव करनी है, वे सदा-सर्वदा सकारात्मक रूप से सक्रिय रहते हैं। जबकि दूसरे केवल सोच-विचार, तर्क-वितर्क में ही उलझे-फँसे रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता के साधक हमेशा ही अपने विचारों को क्रिया रूप में परिणत करते रहते हैं। वे जो थोड़ा सा जानते हैं, उसका क्रियान्वयन करते हैं। बहुत ज्यादा जानने के लिए वे नहीं रुके रहते।
  
इस विधि से एक-एक कुदाली चलाकर वह स्वयं में अनन्त-अनन्त शक्ति का कुआँ खोद लेते हैं। जबकि तर्क-वितर्क और बहुत सारा सोच-विचार करने वाले बैठे ही रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता और सृजनात्मकता ही अपनी अनन्त शक्तियों की अनुभूति का सूत्र है। इसे अपनाकर ही व्यक्ति अधिक से अधिक जीवित बनता है। और उसकी अपनी पूर्ण सम्भावित शक्तियों को सक्रिय कर लेता है। अपनी आत्म शक्ति की अनन्तता को अनुभव कर पाता है। इसलिए जीवन सन्देश के स्वर यही कहते हैं- कि विचार पर ही मत रुके रहो। चलो और कुछ करो। लाखों-लाख मील चलने के विचार से एक कदम आगे बढ़ चलना ज्यादा मूल्यवान् है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८३

👉 मधुमक्खी बनाम मक्खी-मच्छर प्रकृति

मधुमक्खी से उम्मीद करो कि वह पुष्प पर बैठेगी और उसका चयन करेगी। लेकिन मक्खी से से उम्मीद मत करो कि कचड़ा छोड़कर वह पुष्प चुनेगी, वह तो कचड़े पर ही बैठेगी। गाय व घोड़े साफ स्थान पर चारा चरेंगे व बैठेंगे। सुअर और भैंस से उम्मीद मत करो कि वह कीचड़ में नहीं लौटेंगे।

तुम्हारे भाषण व ज्ञान देने से मक्खी, सुअर व भैस कचड़ा व कीचड़ नहीं छोड़ेंगे। जैसे भगवान कृष्ण के ज्ञान देने से दुर्योधन ने अधर्म नहीं छोड़ा।

अतः इसीप्रकार अपने मक्खी, सुअर, भैंस की प्रवृत्ति के पड़ोसी, रिश्तेदार से यह उम्मीद मत करो कि वह तुम्हारी निंदा, चुगली नहीं करेंगे और तुम पर अपशब्दों व तानों के कीचड़ नहीं फेंकेंगे। अतः उन्हें इग्नोर करें और अपने लक्ष्य की ओर बढ़े।

साथ ही स्वयं पर भी चेकलिस्ट लगाएं कि हम स्वयं मख्खी है या मधुमक्खी?  निंदा-चुगली का कचड़ा पसन्द है? या ध्यान-स्वाध्याय-भजन-सत्संग का पुष्प?

मक्खी रोग उत्तपन्न करती है और मधुमक्खी मीठा शहद उतपन्न करती है। स्वयं के व्यवहार व स्वभाव की चेकलिस्ट चेक कीजिये कि आपका शहद से मीठा व्यवहार है या  कड़वा, दुःख-विषाद व रोग उतपन्न करने वाला मक्खी-मच्छर सा व्यवहार है?

यदि परिवर्तन चाहते तो परिवर्तन का हिस्सा बनो...स्वयं का सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है...

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

👉 कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूँढे बन माँहि!!

एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए। लोगों की बढ़ती साधना वृत्ति से वह प्रसन्न तो थे पर इससे उन्हें व्यावहारिक मुश्किलें आ रही थीं। कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता,तो भगवान के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता। उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता। भगवान इससे दुखी हो गए थे।

अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- देवताओं !! मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता है, जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं,न ही तपस्या कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।

प्रभू के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए।

गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं।

भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में है। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा।

इंद्रदेव ने सलाह दी कि वह किसी महासागर में चले जाएं।"

वरुण देव बोले आप अंतरिक्ष में चले जाइए।

भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा।

भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं है, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं ?

अंत में सूर्य देव बोले- प्रभू !! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं। मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा। पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा।

ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया। वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए। उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को ऊपर, नीचे, दाएं,बाएं,आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहे। मनुष्य अपने भीतर बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पा रहा है।

👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 3)

Q.5. Is it possible to have an Anusthan performed by someone else?

Ans. To get Jap performed by others on payment on one’s behalf amounts to purchasing labour and deriving advantage out of it. This earns no merit. There are some important tasks which require to be carried out by one’s own self. It becomes ridiculous if they are got done by others. Can a servant be appointed to study on one’s own behalf ? Can one entrust his sleep to someone else? Nobody appoints someone else to procreate children on his behalf. How can a disease be cured if a person other than the patient is paid and asked to take treatment on behalf of the patient? In the same way devotional worship of God has to be done in His proximity, attained by  the devotee in person. Self-discipline , penance or endurance are required to be practised and friendship is nurtured by a person himself. Physical exercise is also done by a person himself. The same norm applies to Sadhana.

As for as practicable, one should perform his or her own Anusthan, In specific cases of contingency it can be entrusted to a qualified Brahman. The term Brahman here needs an elaboration. In ancient times individuals considered Brahmans were scholars of the science of Brahma. They possessed a high level of upright character, lived a virtuous life with minimum means of sustenance  and comfort.

Now-a-days, it is difficult to find such Brahmans, who besides having been born in a Brahman family (by caste and heredity) and wearing traditional costumes of Brahmans of yore also have the credibility of Brahmanism in their character, behaviour and thoughts. It is very difficult to find a true Brahman from amongst hordes of hypocrites masquerading as Brahmans.

It is, therefore, recommended that if at all necessary, irrespective of caste and creed, Anusthan may be entrusted to such an individual of high character who has an infallible faith in God and is not desirous of any worldly gains of name, fame or material gain.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 73

👉 जीवन में सुख दुख

जीवन में सुख भी आते हैं, दुख भी आते हैं। सुख आने पर व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है, उछलता कूदता नाचता है। और जब दुख आता है, तो दहाड़ें मार-मार कर रोता भी है। ये सुख दुख भी अनेक स्तर के होते हैं।

पढ़ाई-लिखाई करने में, धन कमाने में, परिवार के पालन में, देश विदेश की यात्रा आदि कार्यों में अनेक प्रकार के कष्ट आते हैं। व्यक्ति इन सारे कष्टों को अच्छी प्रकार से सह लेता है, क्योंकि उसके सामने कुछ लक्ष्य होता है। अपनी उन्नति, परिवार का पालन करना, समाज को सुख देना, धर्म की रक्षा करना, देश की रक्षा करना इत्यादि कारणों से वह इन सारे दुखों को सह लेता है।

परंतु कभी-कभी जब जीवन में उसे धोखा खाना पड़ता है, विश्वासघात का सामना करना पड़ता है, और वह भी कोई अपना निकट का व्यक्ति ही उसे धोखा दे, तब जो उसको दुख होता है, उसे सहन करना बहुत कठिन पड़ता है।

कोई बात नहीं। यह संसार है। यहाँ सब कुछ होता है। अपने पराए सब लोग सुख भी देते  हैं, दुख भी देते हैं। जब भी कोई अपना निकट का व्यक्ति दुख देवे, धोखा देवे, विश्वासघात करे, तब भी आप विचलित न होवें, यही आपकी वीरता है।

उस समय कैसे उस दुख को सहन करें? कैसे धैर्य रखें? इस प्रश्न का उत्तर है, कि तब ऐसा सोचें, यह संसार अनित्य है। यहां सुख आता है, वह चला जाता है। दुख आता है, वह भी चला जाएगा।

इस प्रकार से सोचने से वह दुख आपको हल्का लगेगा। और फिर भी वह दुख  पूरा दूर न हो, तो उस दुख को, उस अन्याय को ईश्वर के न्याय पर, आप छोड़ देवें। और अपने मन में तीन शब्द बोलें, "ईश्वर न्याय करेगा। ऐसा सोचने से आपका दुख हल्का हो  जाएगा। आपका मन बुद्धि विचलित नहीं होगा। आप अपना जीवन ठीक प्रकार से चला पाएंगे।

👉 शान्ति

शान्ति में स्वतः ही समस्त सुखों का अनुभव होता है, जबकि अशान्ति के क्षणों में समूचा जीवन दुःखमय हो जाता है। अन्तर्मन में शान्ति प्रगाढ़ हो तो दुःखमय परिस्थितियाँ, बाहरी जीवन के सारे आघात मिलकर भी अन्तस में दुःख को अंकुरित नहीं कर पाते। लेकिन यदि अपना अन्तःकरण अशान्त हो, तो सुख साधन, बाह्य जगत् का सुखद व्यवहार सिमटकर भी मन को सुख का अनुभव नहीं दे पाते। यह सच निरन्तर अनुभव होने के बावजूद भी प्रायः सभी का मन इस बोध से वीरान रहता है। सत्य यही है कि अन्तरात्मा शान्ति चाहती है, परन्तु जो हम करते हैं, उससे अशान्ति ही बढ़ती है। याद रहे कि अशान्ति की जड़ महत्त्वाकांक्षा है, जिसे शान्ति की चाहत है, उसे महत्त्वाकांक्षा छोड़नी पड़ेगी। क्योंकि शान्ति का प्रारम्भ वहाँ से होता है, जहाँ से महत्त्वाकांक्षा समाप्त होती है।
  
सन्त इमर्सन ने लिखा है- ‘युवावस्था में मेरे अनेकों सपने थे। उन्हीं दिनों मैंने एक सूची बनायी थी कि जीवन में मुझे क्या-क्या पाना है। इस सूची में वे सारी चीजें थीं, जिन्हें पाकर मैं धन्य होना चाहता था। स्वास्थ्य, सौन्दर्य, सुयश, सम्पत्ति, सुख इसमें सभी कुछ था। इस सूची को लेकर मैं बुजुर्ग सन्त थॉरो के पास गया। और उनसे कहा क्या मेरी इस सूची में जीवन की सभी उपलब्धियाँ नहीं आ जाती हैं? उन्होंने मेरी बातों को ध्यान से सुना और उनकी आँखों में हँसी की चमक गहरी हो उठी। उनके होंठ मुस्करा उठे और वे बोले- मेरे बेटे! तुम्हारी यह सूची बड़ी सुन्दर है। बहुत विचारपूर्वक तुमने इसे बनाया है। फिर भी तुमने इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात छोड़ दी है, जिसके बिना सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। मैंने पूछा- वह क्या है? उत्तर में उन वृद्ध अनुभवी सन्त ने मेरी सम्पूर्ण सूची को बुरी तरह से काट दिया। और उसकी जगह उन्होंने केवल एक शब्द लिखा- शान्ति।

यह शान्ति कोई बाहरी वस्तु नहीं है, यह तो स्वयं का ही एक ऐसा निर्माण है कि हर परिस्थिति में अन्तःकरण में शान्ति की मधुर सरगम प्रवाहित होती रहे। यह विचार की नहीं अनुभव की अवस्था है। यह कोई रिक्त, खाली, खोखली मनःस्थिति नहीं है, बल्कि अन्तर्मन के सकारात्मक संगीत की मुधरता है

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८२

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

👉 श्रेष्ठ शासक की कसौटी


👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 2)

Q.4. What are the basic rules of an Anusthan?

Ans. The set of rules to be followed are :-

(1) As far as practicable, regularity of time and number in the Jap should be maintained in the routine with minimum possible deviations.

(2) The five basic principles i.e. (i) fasting (ii) abstention from sex (iii) self-service (iv) sleeping on ground (v) refraining from leather-ware like shoes etc., are to be followed. (One may instead use synthetics, rubber etc.) If sleeping on ground is not safe because of dampness, insects etc., a hard wooden bed may be used. Self service is essential in making shaves, (avoid the barber) cleaning of clothes (don’t send them to the laundry) personal and for other physical requirements. In case it is inconvenient to cook one’s own food, help of a close family member- wife, mother, sister etc. may be taken. Prepared food items from market (restaurants, dhabas etc.) are strictly forbidden. Sex is taboo during an Anusthan. Not only one should avoid physical sex, stimulation of sex impulse through even casual thoughts and sight should also be checked. Ladies coming in contact should be treated as mother, sister or daughter. The same is applicable to the behaviour of women towards men.

Fasting can be done in one of the following ways:        (a) Only liquid food like buttermilk, milk, fruit juice etc.(b) Subsisting on fruits and vegetables only (c) taking tasteless food items devoid of salt, sugar and spices (d) partaking only one meal a day (e) choosing only two food items during the period of Anusthan.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 72

👉 "एक ले दूजी डाल"

चींटी चावल ले चली, बीच में मिल गई दाल।
कहत कबीर दो ना मिले, एक ले दूजी डाल।।

एक चींटी अपने मुंह में चावल लेकर जा रही थी, चलते चलते उसको रास्ते में दाल मिल गई, उसे भी लेने की उसकी इच्छा हुई लेकिन चावल मुंह में रखने पर दाल कैसे मिलेगी। दाल लेने को जाती है तो चावल नहीं मिलता । चींटी का दोनों को लेने का प्रयास था।
कबीर कहते हैं-- "दो ना मिले इक ले " चावल हो या दाल।

कबीर दास जी के इस दोहे का भाव यह है कि हमारी स्थिति भी उसी चींटी -जैसी है। हम भी संसार के विषय भोगों में फंस कर अतृप्त  ही रहते हैं, एक चीज मिलती है तो चाहते हैं कि दूसरी भी मिल जाए, दूसरी मिलती है तो चाहते हैं कि तीसरी मिल जाए। यह परंपरा बंद नहीं होती और हमारे जाने का समय आ जाता है।

यह हमारा मोह है, लोभ है। हमको लोहा मिलता है, किंतु हम सोने के पीछे लगते हैं। पारस की खोज करते हैं ताकि लोहे को सोना बना सकें। काम, क्रोध, लोभ यह तीनों प्रकार के नरक के द्वार हैं। यह आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात अधोगति में ले जाने वाले हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

"दो ना मिले एक ले दूजी डाल "इस कथन में मुख्य रूप से संतोष की शिक्षा है जो लोभ, मोह आदि से बचने का संदेश है।

वस्तुतः प्रारब्ध से जो कुछ प्राप्त है, उसी में संतोष करना चाहिए। क्योंकि जो प्राप्त होने वाला है उसके लिए श्रम करना व्यर्थ है, और जो प्राप्त होने वाला नहीं है उसके लिए भी श्रम करना व्यर्थ है। अपने समय की हानि करनी है। यह समझना चाहिए कि हमारे कल्याण के लिए प्रभु ने जैसी स्थिति में हमको रखा है। वही हमारे लिए सर्वोत्तम है, उसी में हमारी भलाई है, मन के अनुसार न किसी को कभी वस्तु मिली है, और न मिलने वाली है। क्योंकि तृष्णा  का, कामना का,  कोई अंत नहीं है।
हम भगवान को पसंद करते हैं, तो क्या मांगते हैं। इस पर विचार करना चाहिए, कबीर जी कहते हैं --- "एक ले दूजी डाल"।

हमारा मन भी चींटी सरीखा है। बुद्धि हमारा सारथी है, किंतु उस पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। हम मन के हिसाब से चलते हैं और दुखी होते हैं। अतः "एक ले दूजी डाल" अर्थात जो मिल जाए उसे प्रभु प्रसाद मानकर ग्रहण करें और अधिक की लालसा कदापि न करें।

👉 खुशियों का खजाना

खुशियाँ चाहते हो? तो सबसे पहले अन्तस् में खोजो। इन्हें बाह्य परिस्थिति में नहीं आन्तरिक मनःस्थिति में ढूँढो। जो खुशियों की खोज अन्तस् में करता है, उसे फिर इन्हें कहीं अन्यत्र नहीं खोजना पड़ता। और जो यहाँ खोजने की कोशिश न करके बाहर खोजता है, वह सदा खोजता ही रहता है, किन्तु पाता कुछ भी नहीं है।
  
एक भिखारी था, वह जिन्दगी भर एक ही जगह पर बैठकर भीख माँगता रहा। उसकी ख्वाहिश थी कि वह भी धनवान् बने। इसलिए वह दिन में ही नहीं रात में भी भीख मांगता। जो कुछ उसे भीख में मिलता उसे खर्च करने की बजाय जोड़ता रहता। अपनी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए उसने दिन-रात भरपूर कोशिश की। लेकिन वह कभी भी धनवान न हो सका। वह भिखारी की ही तरह जिया और भिखारी की ही तरह मरा। जब वह मरा तो उसके कफन के लायक भी पूरे पैसे उसके पास नहीं थे। उसके मर जाने के बाद आस-पास के लोगों ने उसका झोपड़ा तोड़ दिया। फिर सबने मिलकर वहाँ की जमीन साफ की। सफाई करने वाले इन सभी को तब भारी अचरज हुआ, जब उन्हें उस जगह पर बड़ा भारी खजाना गड़ा हुआ मिला। यह ठीक वही जगह थी, जिस जगह पर बैठकर वह भिखारी जिन्दगी भर भीख माँगा करता था। जहाँ पर वह बैठता था, उसके ठीक नीचे यह भारी खजाना गड़ा हुआ था।
  
जो खुशियों की तलाश में बाहर भटकते हैं, उनकी हालत भी कुछ ऐसी ही है। क्या हममें से हर एक के भीतर ही वह खुशियों का खजाना नहीं छुपा हुआ है, जिसे कि हम सब उम्र भर बाहर खोजते रहते हैं। इसके पहले कि खुशियों के खजाने की तलाश में, आनन्द और आलोक की खोज में, शान्ति और समृद्धि की चाहत में तुम यात्रा की शुरुआत करो, सबसे पहले तो उस जगह को खोज लेना, वहीं पर खोद लेना, जहाँ कि तुम खड़े हो। क्योंकि बड़े से बड़े खोजियों ने, यात्रियों ने सारी दुनियां में, सारी उम्र भटक कर अन्ततः यह खुशियों का खजाना अपने ही अन्तस् में पाया है। इसलिए अन्यत्र इसकी खोज व्यर्थ ही है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८२

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

👉 सम्मान

एक  वृद्ध माँ रात को 11:30 बजे रसोई में बर्तन साफ कर रही है, घर में दो बहुएँ हैं, जो बर्तनों की आवाज से परेशान होकर अपने पतियों को सास को उल्हाना देने को कहती हैं

वो कहती है आपकी माँ को मना करो इतनी रात को बर्तन धोने के लिये हमारी नींद खराब होती है साथ ही सुबह 4 बजे उठकर फिर खट्टर पट्टर शुरू कर देती है सुबह 5 बजे पूजा

आरती करके हमे सोने नही देती ना रात को ना ही सुबह जाओ सोच क्या रहे हो जाकर माँ को मना करो

बड़ा बेटा खड़ा होता है और रसोई की तरफ जाता है रास्ते मे छोटे भाई के कमरे में से भी वो ही बाते सुनाई पड़ती जो उसके कमरे हो रही थी वो छोटे भाई के कमरे को खटखटा देता है छोटा भाई बाहर आता है।

दोनो भाई रसोई में जाते हैं, और माँ को बर्तन साफ करने में मदद करने लगते है, माँ मना करती पर वो नही मानते, बर्तन साफ हो जाने के बाद दोनों भाई माँ को बड़े प्यार से उसके कमरे में ले जाते है, तो देखते हैं पिताजी भी जागे हुए हैं

दोनो भाई माँ को बिस्तर पर बैठा कर कहते हैं, माँ सुबह जल्दी उठा देना, हमें भी पूजा करनी है, और सुबह पिताजी के साथ योगा भी करेंगे

माँ बोली ठीक है बच्चों, दोनो बेटे सुबह जल्दी उठने लगे, रात को 9:30 पर ही बर्तन मांजने लगे, तो पत्नियां बोलीं माता जी करती तो हैं आप क्यों कर रहे हो बर्तन साफ, तो बेटे बोले हम लोगो की शादी करने के पीछे एक कारण यह भी था कि माँ की सहायता हो जायेगी पर तुम लोग ये कार्य नही कर रही हो कोई बात नही हम अपनी माँ की सहायता कर देते है

हमारी तो माँ है इसमें क्या बुराई है, अगले तीन दिनों में घर मे पूरा बदलाव आ गया बहुएँ जल्दी बर्तन इसलिये साफ करने लगी की नही तो उनके पति  बर्तन साफ करने लगेंगे साथ ही सुबह भी वो भी पतियों के साथ ही उठने लगी और पूजा आरती में शामिल होने लगी

कुछ दिनों में पूरे घर के वातावरण में पूरा बदलाव आ गया बहुएँ सास ससुर को पूरा सम्मान देने लगी ।

कहानी का सार।
माँ का सम्मान तब कम नही होता जब बहुवे उनका सम्मान नही करती, माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे माँ का सम्मान नही करे या माँ के कार्य मे सहयोग ना करे ।

जन्म का रिश्ता हैं।
माता पिता पहले आपके हैं।  

👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 1)

Q.1. What is the difference between daily Upasana, Anusthan and Purascharan?

Ans. Daily worship is a part of routine day to day living. Anusthan is a worship of a higher order in which the devotee is bound by many restrictions and has to follow specified rules and regulations. Consequently, in the latter case, special benefits accrue. Purascharan, however, is a still higher specialised form of Sadhana. For Purascharan a number of specific Mantras and rituals are to be followed. Thus, only an individual with an advance of training is capable of performing a Purascharan. For a layman, therefore, Anusthans are recommended, which are easy to perform.

Q.2. What are the types of Anusthans? How much time is required for each?

Ans. There are three types of Anusthans small (Laghu) medium (madhyam) and Big (Uchch). The counts are as follows :
1) Small Anusthan: 24000 Japs to be completed in 9 days at the rate of 27 cycles of rosary per day. Time taken: on an average, 3 hours per day (with about 10 to 11 Malas per hour).
2) Medium Anusthan: 1,25000 Japs to be completed in 40 days at the rate of 33 Malas per day. Time taken: 3-4 hours per day.
3) Major Anusthan: 24,00,000 Japs to be completed in a year at the rate of 66 Malas per day. Time taken: about 6 hours per day.

Q.3. What are the pre-requisites for an Anusthan?

Ans. Cleansing of body, clothes and implements of worship; the six rituals; ‘Panchopchar’; Jap; Meditation ; ‘Suryarghdan’; (A small Kalash with water and incense are kept along with a photograph or idol of the deity.) Oblations of : water, ‘Akchat’, ‘Chandan’, ‘Flowers’ and ‘Naivedya’. ‘Avahan’ and ‘Visarjan’ at the beginning and end are associated with Gayatri Mantra; Yagya and Brahmbhoj.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 71

👉 सहनशीलता

सहनशीलता में अद्भुत शक्ति है। इसमें आत्मचेतना की अजेयता है, अमरत्व है। जिसमें सहनशीलता नहीं है, वह जल्दी टूट जाता है। जबकि जिसने सहनशीलता के अभेद्य सुरक्षाकवच को ओढ़ लिया है, उसे जीवन में प्रतिक्षण पड़ती चोटें और भी मजबूत और दृढ़ करती है।
  
सन्त तिलोपा अपने शिष्यों को एक सच्ची घटना सुनाते थे; एक युवक किसी लुहार के घर के पास से गुजरता था। उसने निहाई पर पड़ते हथौड़ों की चोटों की आवाज सुनी। कौतुकवश उसने लुहार के घर के भीतर झाँक कर देखा। उसे दिखाई दिया कि एक कोने में बहुत से हथौड़े टूटकर विकृत होकर पड़े हैं। उसे थोड़ा अचरज तो हुआ, फिर भी उसने सोचा कि समय और उपयोग ने उनकी ऐसी गति बनायी होगी। उस युवक ने जिज्ञासावश लुहार से पूछा; इतने सारे हथौड़ों को इस दशा तक पहुँचाने के लिए आपको कितनी निहाइयों की जरूरत पड़ी?
  
इस सवाल के जवाब में लुहार जोर से हँस पड़ा और बोला; अरे भाई, एक ही निहाई केवल एक ही। अब तो वह युवक और भी गहरे अचरज में डूब गया। उसके गणितीय मन में सवालों के अनेकों समीकरण उभरे। निहाई एक और वह भी सर्वथा अविजित और सुरक्षित। जबकि हथौड़े अनेक और वे सबके सब टूटे हुए। आखिर इस अचरज भरे सच का रहस्यात्मक आधार क्या है? युवक अभी कुछ और सोच पाता इतने में वह लुहार बोल पड़ा, ऐसा इसलिए है मित्र क्योंकि हथौड़े चोट करते हैं और निहाई धैर्य से, सर्वथा अविचलित भाव से सभी चोटों को सहती है। इसीलिए एक ही निहाई सैकड़ों हथौड़ों को तोड़ डालती है।
  
इस कथा का समापन करते हुए सन्त तिलोपा ने अपने शिष्यों से कहा; जीवन का सत्य सहनशीलता है। अन्त में वही जीतता है जो चोटों को धैर्यपूर्वक सहता और स्वीकार करता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८१

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 5)

Q.9. Is Akhand Yagya permissible?

Ans. Scriptures do not permit Akhand Yagya.  Yagya should
be completed in a fixed time during the day only. The reason being the possibility of insects, worms etc. getting killed in the sacred fire, which makes it a violent and profane act.

Q.10. How are ‘Tantrik Mukhs’ different from Vedic Yagyas?

Ans. As opposed to Vedic Yagya performed during the day, Tantrik Mukhs are executed at night. ‘Holika Dahan’, burning of ‘funeral pyre’ etc. fall in the category of Mukh.
Mukhs are performed during night for various reasons. The oblations consist of non-eatable and untouchable objects. The sight too is not pleasant. The associated rituals are predominantly full of Tamogun. There is also no consideration for violence or non-violence during the performance. For all these considerations and to avoid interference from prying, Mukhs are organized at solitary, unknown places in utmost privacy.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 69

👉 दुखी नहीं प्रसन्न होवें

बहुत बार लोग इस बात से दुखी रहते हैं, कि हमारे कई मित्र संबंधी रिश्तेदार हमें सिर्फ उसी दिन याद करते हैं, जिस दिन उनको हमारी आवश्यकता होती है। साल भर हमें पूछते भी नहीं। जिस दिन काम पड़ता है, उस दिन खूब आगे पीछे घूमते हैं।

तो इस बात से वे लोग दुखी, परेशान रहते हैं। मेरा आप सब से निवेदन है कि इस बात से परेशान न होवें। जरा सोचिए, अगर एक व्यक्ति मुसीबत में है, और वह आपको याद करता है, तो इसका अर्थ हुआ, कि वह आपको अपनी समस्या के समाधान के रूप में देखता है। अर्थात आपके पास उसकी समस्या का समाधान है। तो इसमें बुरा क्या है?
वह आपको याद करता है, यह तो आप के लिए सौभाग्य की बात है।

जरा सोचिए, क्या कोई व्यक्ति हर रोज मोमबत्ती को याद करता है? नहीं न! वह उसी दिन याद करता है, जिस दिन लाइट चली जाती है। तो इसी प्रकार से समस्या उत्पन्न होने पर,कोई आपको समाधान के रूप में याद करता है, तो आपके लिए तो खुशी की बात है। आप उससे ऊंचे हैं। इसलिए दुखी न हों, बल्कि ऐसा सोचकर प्रसन्न होवें,  कि किसी को मेरी जरुरत है। मैं भी किसी से ऊंची स्थिति में हूँ, जिस को मेरी जरुरत है।

👉 पूर्णता का प्रत्यावर्तन

गुरु पूर्णिमा- पूर्णता के प्रत्यावर्तन का महोत्सव है। इन पुण्य-पलों में सद्गुरु अपनी पूर्णता सुपात्र-सत्शिष्य में उड़ेलते हैं। परन्तु यह विरल सौभाग्य मिलता उन्हीं को है, जो अपने अस्तित्त्व को पूर्ण रूप से सद्गुरु के श्री चरणों में अर्पित करने का साहस जुटाते हैं। शिष्य का सम्पूर्ण समर्पण ही सद्गुरु द्वारा प्रत्यावर्तित की जाने वाली पूर्णता का आधार बनता है।
  
समर्पण ही पूर्णता के प्रत्यावर्तन की साधना है। हालांकि साधना की यह डगर कठिन है। जो शिष्य इस पर चलने का साहस कर रहे हैं, वे जानते हैं कि अपने ही अस्तित्त्व में छुपे हुए जड़ता-वासना और अहंता के दुर्गम शैल शिखरों को पार करना आसान नहीं है। और इन्हें पार किए बिना समर्पण सम्भव नहीं है। समर्पण की डगर पर चलने पर अपना ही मन अनेक मायावी खेल रचता है।
  
प्रारम्भिक क्षणों में तो कई बार शिष्य साधक अपनी जड़ता व निष्क्रियता को ही समर्पण समझ लेते हैं। परन्तु जब गुरु कृपा से विवेक की किरणें झिलमिलाती हैं तो बोध होता है कि समर्पण जड़-निष्क्रियता में नहीं बल्कि सद्गुरु के लिए निरन्तर कर्मरत रहने में है। इस अवरोध को पार कर लेने पर वासना अगला अवरोध बनती है। लेकिन जब गुरु कृपा शिष्य में बोध बनकर प्रकट होती है, तो शिष्य की चेतना में यह रहस्य उजागर होता है कि वासना के दुर्गम शैल शिखर को लांघने का रहस्य भक्तिपूर्ण तप में है।
  
इसके बाद अहंता का अन्तिम अवरोध बचा रहता है। समर्पण की डगर पर सतत् चलते रहने वाले शिष्य सद्गुरु कृपा से यह जान लेते हैं कि निष्काम सेवा की निरन्तरता से यह अन्तिम अवरोध भी विलीन हो जाता है। इस विलीनता के साथ ही पूर्णता की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८१

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 Aug 2026

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