रविवार, 12 अगस्त 2018

👉 पिंजरा निकालना बाकी है

निकाल लाया हूँ एक
पिंजरे से मैं एक परिंदा
परिंदे के तनहा दिल से 
पिंजरा निकालना बाकी है

परिंदे तेरा एक घरोंदा
जिसमें बसता तेरा दिल
हाड़ माँस के पुतले से
तुझको निकालना बाकी है

नाहक पाले रिश्ते नाते
झूठे है यह विष के प्याले
सांसों की इस सरगम से
आठवाँ सुर निकालना बाकी है

रे ! पंछी यह है रैन बसेरा
क्यों समेटा मिटटी का ढेरा
पत्थरों की इस जमघट में
रूह को निकालना बाकी है

अब तो सुध ले ले अपनी
आयेगी सिर्फ तेरी करनी
शख्सियत की नुमाइएश में
अहम् को निकालना बाकी है

छोड़ दे ओ ! नादाँ परिन्दे
इंसानों के ये मोह के पिंजरे
उम्मीदों की पैमाइएश में
यादों को निकालना बाकी है


विचार क्रांति अभियान  शांतिकुंज हरिद्वार 

👉 स्वाध्याय-सन्दोह

🔶 “जो ब्रह्मचारी बनने की कोशिश कर रहा है उसके लिये अनेक बन्धनों (नियमों) की जरूरत है। आम के छोटे पेड़ को सुरक्षित रखने के लिये उसके चारों तरफ बाड़ लगानी पड़ती है। छोटा बच्चा पहले माँ की गोद में सोता है, फिर पालने में और फिर चालन-गाड़ी लेकर चलता है। जब बड़ा होकर खुद चलने लगता है तब सब सहारा छोड़ देता है। ब्रह्मचर्य पर भी यही चीज लागू होती हैं। ब्रह्मचर्य एकादश व्रतों में से एक व्रत बतलाया गया है। इस पर से यह कहा जा सकता है कि ब्रह्मचर्य की मर्यादा या रक्षा करने वाली बाड़ एकादश व्रतों का पालन है। वास्तव में ब्रह्मचर्य मन की स्थिति है। बाहरी आचार या व्यवहार उसकी निशानी है।

🔷 जिस पुरुष के मन में जरा भी विषय-वासना नहीं रही है, वह कभी विकार के वश में नहीं होगा। वह किसी स्त्री को चाहे जिस हालत में देखे, चाहे जिस रूप-रंग में देखे, तो भी उसके मन में विकार उत्पन्न नहीं होगा। इसलिए ब्रह्मचारी को अपनी मर्यादा स्वयं ही बना लेनी चाहिये। उद्देश्य यही है कि हम सच्चे ब्रह्मचर्य को पहिचानें, उसकी कीमत जान लें और ऐसे कीमती ब्रह्मचर्य का पालन करें।”

✍🏻 महात्मा गाँधी
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 सफल वही होता है जो लक्ष्य का निर्धारण कर उसपर अडिग रहता है!

🔶 एक बार की बात है, एक निःसंतान राजा था, वह बूढा हो चुका था और उसे राज्य के लिए एक योग्य उत्तराधिकारी की चिंता सताने लगी थी। योग्य उत्तराधिकारी के खोज के लिए राजा ने पुरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि अमुक दिन शाम को जो मुझसे मिलने आएगा, उसे मैं अपने राज्य का एक हिस्सा दूंगा। राजा के इस निर्णय से राज्य के प्रधानमंत्री ने रोष जताते हुए राजा से कहा, "महाराज, आपसे मिलने तो बहुत से लोग आएंगे और यदि सभी को उनका भाग देंगे तो राज्य के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। ऐसा अव्यावहारिक काम न करें।" राजा ने प्रधानमंत्री को आश्वस्त करते हुए कहा, ''प्रधानमंत्री जी, आप चिंता न करें, देखते रहें, क्या होता है।' 

🔷 निश्चित दिन जब सबको मिलना था, राजमहल के बगीचे में राजा ने एक विशाल मेले का आयोजन किया। मेले में नाच-गाने और शराब की महफिल जमी थी, खाने के लिए अनेक स्वादिष्ट पदार्थ थे। मेले में कई खेल भी हो रहे थे।

🔶 राजा से मिलने आने वाले कितने ही लोग नाच-गाने में अटक गए, कितने ही सुरा-सुंदरी में, कितने ही आश्चर्यजनक खेलों में मशगूल हो गए तथा कितने ही खाने-पीने, घूमने-फिरने के आनंद में डूब गए। इस तरह समय बीतने लगा। 

🔷 पर इन सभी के बीच एक व्यक्ति ऐसा भी था जिसने किसी चीज की तरफ देखा भी नहीं, क्योंकि उसके मन में निश्चित ध्येय था कि उसे राजा से मिलना ही है। इसलिए वह बगीचा पार करके राजमहल के दरवाजे पर पहुंच गया। पर वहां खुली तलवार लेकर दो चौकीदार खड़े थे। उन्होंने उसे रोका। उनके रोकने को अनदेखा करके और चौकीदारों को धक्का मारकर वह दौड़कर राजमहल में चला गया, क्योंकि वह निश्चित समय पर राजा से मिलना चाहता था। 

🔶 जैसे ही वह अंदर पहुंचा, राजा उसे सामने ही मिल गए और उन्होंने कहा, 'मेरे राज्य में कोई व्यक्ति तो ऐसा मिला जो किसी प्रलोभन में फंसे बिना अपने ध्येय तक पहुंच सका। तुम्हें मैं आधा नहीं पूरा राजपाट दूंगा। तुम मेरे उत्तराधिकारी बनोगे।

🔷 सफल वही होता है जो लक्ष्य का निर्धारण करता है, उसपर अडिग रहता है, रास्ते में आने वाली हर  कठिनाइयों का डटकर सामना करता है और छोटी-छोटी कठिनाईयों को नजरअंदाज कर देता है।

👉 आज का सद्चिंतन 12 August 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 26)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔶 सड़क पर मोटर के पहिए दौड़ते दीखते हैं, पर इंजन का परदा उठाकर देखने पर प्रतीत होगा कि उसके भीतर तेल जलकर ऊर्जा उत्पन्न कर रहा है। उस उत्पादन में भी बैटरी और डायनेमो की अपनी-अपनी भूमिका है। उसी शक्ति से अनेक कलपुर्जे अपने-अपने ढंग से घूमते और मोटर को सड़क पर दौड़ाते रहते हैं। मानवी सत्ता के संबंध में भी यही बात है। उसकी प्रत्यक्ष हलचलें हाथ, पैर, सिर, धड़, आँख, मुँह आदि के माध्यम से कार्य करती दीख पड़ती हैं, पर त्वचा का ढक्कन उठाकर देखने से कुछ और ही प्रतीत होता है।

🔷 हृदय का रक्त संचार, माँस पेशियों का आकुंचन-प्रकुँचन श्वास-प्रश्वास आदि हरकतें भीतरी अवयव करते हैं और उनके घर्षण से ऊर्जा का वह उत्पादन होता है, जिसके माध्यम से शरीर के सभी अंग अपनी-अपनी निर्धारित क्रिया-प्रक्रिया संपन्न करते रहने में समर्थ होते हैं। इन सबके भीतर भी एक गहरी परत है, जो मस्तिष्क के मध्य भाग ब्रह्मरंध्र में, विद्युत प्रवाह के उद्गम स्रोत का काम करती है। इस उद्गम का भी स्वतंत्र कर्तृत्व नहीं है। वह अखिल ब्रह्मांड में संव्याप्त महाऊर्जा से संबंध जोड़कर जितना आवश्यक है, ग्रहण करती रहती है।
  
🔶 अंग-अवयवों की बनावट तो रक्त, माँस अस्थि, मज्जा, वसा आदि से विनिर्मित प्रतीत है, किंतु वस्तुतः इनके बीच अरबों-खरबों जीवकोषों ऊतकों की ऐसी क्रियाशीलता विद्यमान दिखाई देती है, मानो किसी स्वतंत्र विश्व का उद्भव, अभिवर्धन, परिवर्तन उनके बीच हो रहा हो। यों जीवकोष अपने स्थान पर व्यवस्थित रूप से विद्यमान दीखते हैं, पर वे तेजी से अपना काम करते हुए, अपनी सीमित सत्ता को समाप्त कर लेते हैं। साथ ही वे एक और आश्चर्य प्रस्तुत करते हैं कि अपना समानांतर उत्तराधिकारी कोष बनाकर, अपने मरण से पूर्व स्थानापन्न कर देते हैं, ताकि रिक्तता उत्पन्न न होने पाए। मृतक कोष कचरे के रूप में बहिर्गमन छिद्रों द्वारा बाहर निकलते रहते हैं। जीवित कोष अन्न, जल, वायु जैसे पोषक माध्यमों को ग्रहण करने से लेकर पचाने तक में लगे रहते हैं।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 35

👉 Amrit Chintan 12 Aug

🔶 "He has achieved success who has lived well, laughed often, and loved much; Who has enjoyed the trust of pure women, the respect of intelligent men and the love of little children; Who has filled his niche and accomplished his task; Who has never lacked appreciation of Earth's beauty or failed to express it; Who has left the world better than he found it, Whether an improved poppy, a perfect poem, or a rescued soul; Who has always looked for the best in others and given them the best he had; Whose life was an inspiration; Whose memory a benediction."

Bessie Anderson Stanley

👉 अहंकार का तो उन्मूलन ही किया जाय (भाग 1)

🔶 मनुष्य के भीतर की जो प्रवृत्ति अध्यात्म मार्ग में प्रधान रूप से बाधक होती है, वह है “अहंकार”। संसार में हमारे जो तरह-तरह के सम्बन्ध है उनके कारण हम अनेक बन्धनों में बँध जाते है। उनके घात-प्रतिघात से हमारे मन में सदैव द्वन्द्व की भावनायें उत्पन्न होती रहती हैं और उन्हीं के परिणाम स्वरूप हमको हर्ष-शोक सुख-दुःख स्तुति-निन्दा हानि-लाभ आदि के विचार उत्पन्न होकर अस्थिर बनाते रहते है।

🔷 इस प्रकार अहंकार तीन प्रकार का बतलाया गया है- सात्विक, राजसिक और तामसिक। अधिकांश मनुष्यों में राजसिक अहंकार की ही प्रधानता होती है, क्योंकि यह विषय वासना के फल से उत्पन्न होता है। इसी के चक्कर में पड़कर हम दिखावटी धर्म-कर्म के चक्कर में फँस जाते है। यदि हमको ऐसे बन्धन से छुटकारा पाना है तो गीता के “मा कर्मफल हेतुर्भूः” वचन को सदैव स्मरण रखना चाहिये। इसके अनुसार यदि हम अपने समस्त धर्म-कर्म का फल भगवान के चरणों में अर्पित कर देंगे तो हमारा अहंकार स्वयं ही जाता रहेगा।

🔶 तामसिक प्रवृत्ति मानसिक दुर्बलता की उत्पत्ति होती है। इसके प्रभाव से हम सदैव आलसी, सुस्त, अकर्मण्य बने रहते है, हमारा तेज क्षीण हो जाता है, और निराशा की भावना हमारे मानसिक क्षेत्र को ढक लेती है। किसी कार्य के लिये दिल में उत्साह नहीं होता। छोटे-छोटे कामों में भी भय लगता है और यही इच्छा होती है कि हम बिना कुछ उद्योग और परिश्रम के बैठे-बैठे मौज उड़ाते रहें। ऐसे लोगों में किसी उत्तम कार्य के लिये स्फूर्ति नहीं देखी जाती और वे समझते हैं कि हम में ऐसे कार्यों के लिये शक्ति और योग्यता ही नहीं है।

🔷 यह अवस्था बड़ी भयंकर और पतन मार्ग पर ले जाने वाली है। ऐसी ही अवस्था वालों के लिये गीता में “मा ते संगोऽत्सव कर्मणि” और “योगस्थः कुरु कर्माणि” आदि वाक्य लिखे गये हैं। इनका आशय यही है कि अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्य को अपने भीतर कभी अकर्मण्यता की भावना को टिकने नहीं देना चाहिये और योग युक्त होकर कर्म करते रहना चाहिये। अर्थात् प्रत्येक काम को अपना ईश्वर-प्रेरित कर्तव्य समझ कर करे, उससे क्या लाभ और क्या हानि होगी इसकी चिन्ता सर्वथा त्याग दे। केवल ‘संगत्यक्त्वा’ के उपदेश को अपना मूल-मंत्र बनाकर मोह और आसक्ति रहित भाव से कार्य करता चला जाय। भगवान की यही आज्ञा है कि कर्म करो पर उसमें आसक्त मत हो जाओ। जब तुम यह समझ लोगे कि हम जो कुछ कर रहे हैं वह भगवान की प्रेरणा से करते हैं, तो फिर हजारों विघ्न-बाधाओं के सम्मुख आने पर भी तुम घबराओगे नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1961 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.8

👉 सुसंस्कारी आत्माएँ चेतें

🔶 अखण्ड ज्योति परिवार के परिजनों में अधिकांश बहुत सुसंस्कारी आत्माएँ हैं। उन्हें प्रयत्नपूर्वक ढूँढ़ा और परिश्रमपूर्वक एक टोकरी में संग्रह किया गया है। वही हमारा परिवार है। इनसे नव निर्माण की भूमिका संपादन करने की, अग्रिम मोर्चा सँभालने की हमारी आशा अकारण नहीं है। उसके पीछे एक तथ्य है कि उत्कृष्ट आत्माएँ कैसे ही मलीन आवरण में क्यों न फँस जाएँ, समय आने पर वे अपना स्वरूप और कर्त्तव्य समझ लेती हैं और दैवी प्रेरणा एवं संदेश को पहचानकर सामयिक कर्त्तव्यों की पूर्ति में विलंब नहीं करतीं। फायर ब्रिगेड वाले वैसे महीनों पड़े सोते रहें पर जब कहीं आग लगने की सूचना मिलती है, तो उनकी तत्परता देखने को ही मिलती है। अपने परिवार को भी यही सब करना है।

🔷 घंटों अँगड़ाई लेते रहने में वक्त की बरबादी होती है, सोने का समय चला गया। जगना-उठना पड़ेगा ही। फिर व्यर्थ करवटें बदलते रहने और अँगड़ाई मात्र लेते रहने, समय गँवाते रहने से क्या लाभ? जब जग ही गए तो उठ खड़ा होना ही उचित है। जो काम प्रतीक्षा कर रहे हैं उन्हें समय पर निपटा लेने में ही खूबसूरती और प्रशंसा है। रोते-झींकते, देर-सवेर में जब करना ही पड़ेगा, तो आत्मग्लानि और लोकनिंदा का कलंक ओढ़ने की क्या आवश्यकता? असामयिक आलस्य प्रमाद को छोड़ ही क्यों न दिया जाए?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अगस्त 1969 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.42

शनिवार, 11 अगस्त 2018

👉 मिसाल: तय किया गोशाला में रहने से लेकर एशियाड मेडलिस्ट बनने तक का सफर

🔷 एशियाड मेडलिस्ट खुशबीर कौर की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। उनका परिवार आज भी उस दिन को याद करता है जब वे लोग गौशाला में रहा करते थे और देश की टॉप रेस वॉकर का परिवार एक टूटी चारपाई पर सोता था। 2014 एशियन गेम्स में रजत पदक जीतने वाली खुशबीर का परिवार तंगी के चलते दिन में एक या दो बार का खाना नहीं खाता था। गोशाला से वे किसी तरह एक टूटे-फूटे घर तक आए, जहां बारिश में छत टपकने लगती थी।

🔶 25 साल की खुशबीर अब पंजाब पुलिस में डीएसपी हैं और आज भी उस मुश्किल वक्त की यादें ताजा हैं। उनकी मां जसबीर कौर अमृतसर के रसूलपुर कलान गांव में रहती हैं। आने वाले एशियन गेम्स के लिए बेंगलुरु में एक कैंप का हिस्सा बनीं खुशबीर बताती हैं, 'यह बहुत मुश्किल सफर रहा।' खुशबीर ने छह साल की उम्र में ही अपने पिता बालकर सिंह को खो दिया था। इसके बाद उनकी मां ने पूरी हिम्मत से चार बेटियों और एक बेटे को कपड़े सिलकर और पास के गांवों में दूध बेचकर पाला।

 
गांव के घर में रहता है खुशबीर का परिवार।

🔷 आंखों में आंसू भरकर उनकी मां जसबीर कौर बताती हैं, 'बारिश के वक्त मैं, मेरी बच्चियां-बेटा और गायें सब एक कमरे के अंदर रहा करते थे। आज गांव में किसी से भी पूछो कि डीएसपी जसबीर के घर जाना है तो हर कोई रास्ता बता देगा।' पति के जाने के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी जहां जसबीर पर आई थी, जल्द ही बेटी ने उनका हाथ थाम लिया। खुशबीर ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में मेडल जीतने की शुरुआत की और परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले ली।

🔶 जसबीर कहती हैं, 'खुशबीर ने उस वक्त मेडल जीतने शुरू किए जब हमारे पास अच्छा खाने के लिए भी नहीं था। 2014 एशियन गेम्स में 20 किलोमीटर रेसवॉक में सिल्वर जीतने के बाद हमें सीमेंट से बनी छत मिल पाई।' खुशबीर की दो बहनें हरजीत और करमजीत भी स्पॉर्ट्स में हैं तो वहीं तीसरी धरमजीत स्पॉर्ट्स से जुड़ना चाहती है। उसका भाई बिक्रमजीत सेना में जाना चाहता है।

👉 कुछ ऐसे थे देश के पहले शहीद खुदीराम बोस

खुदीराम बोस का जन्म बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। 3 दिसंबर 1889 को जन्मे बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उनकी बड़ी बहन ने ही उनको पाला था। बंगाल विभाजन (1905 ) के बाद खुदीराम बोस स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था। हालांकि, वह अपने स्कूली दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने लगे थे। वे जलसे-जलूसों में शामिल होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। नौवीं कक्षा के बाद ही उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और सिर पर कफन बांधकर जंग-ए-आजादी में कूद पड़े। बाद में वह रेवलूशन पार्टी के सदस्य बने।

उनका बचपन बस बीता ही था, उनके साथी जब पढ़ाई और परीक्षा के बारे में सोच रहे थे, वह क्रांति की मशाल रौशन कर रहे थे, जिस उम्र में लोग जिंदगी के हसीन ख्वाब बुनते हैं, वह वतन पर निसार होने का जज्बा लिए हाथ में गीता लेकर फांसी के फंदे की तरफ बढ़ गए और देश की आजादी के रास्ते में अपनी शहादत का दीप जलाया। यह थे अमर शहीद खुदीराम बोस। खुदीराम के बगावती तेवरों से घबराई अंग्रेज सरकार ने मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी पर लटका दिया, लेकिन उनकी शहादत ऐसा कमाल कर गई कि देश में स्वतंत्रता संग्राम के शोले भड़क उठे। आज ही के दिन यानी 11 अगस्त, 1908 को ब्रिटिश सरकार ने सिर्फ 18 साल की उम्र में उन्हें फांसी पर लटका दिया था। आइये इस मौके पर उनसे जुड़ीं कुछ खास बातें जानते हैं...

🔷 ​परिचय

खुदीराम बोस का जन्म बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। 3 दिसंबर 1889 को जन्मे बोस जब बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उनकी बड़ी बहन ने ही उनको पाला था। बंगाल विभाजन (1905 ) के बाद खुदीराम बोस स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था। हालांकि, वह अपने स्कूली दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने लगे थे। वे जलसे-जलूसों में शामिल होकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। नौवीं कक्षा के बाद ही उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और सिर पर कफन बांधकर जंग-ए-आजादी में कूद पड़े। बाद में वह रेवलूशन पार्टी के सदस्य बने।

​🔶 पहली गिरफ्तारी

वह वंदेमातरम के पर्चे बांटते थे। पुलिस ने 28 फरवरी, सन 1906 को सोनार बंगला नामक एक इश्तहार बांटते हुए बोस को दबोच लिया। लेकिन बोस पुलिस के शिकंजे से भागने में सफल रहे। 16 मई, सन 1906 को एक बार फिर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, लेकिन उनकी आयु कम होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था। 6 दिसंबर, 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर किए गए बम विस्फोट की घटना में भी बोस भी शामिल थे।

​🔷 किंग्सफर्ड की हत्या की योजना

कलकत्ता (अब कोलकाता) में किंग्सफर्ड चीफ प्रेजिडेंसी मैजिस्ट्रेट को बहुत सख्त और क्रूर अधिकारी माना जाता था। क्रांतिकारियों का मानना था कि वह अधिकारी देशभक्तों खासतौर पर क्रांतिकारियों को तंग करता था। क्रांतिकारियों ने उसकी हत्या का फैसला किया। युगांतर क्रांतिकारी दल के नेता वीरेंद्र कुमार घोष ने घोषणा की कि किंग्सफोर्ड को मुजफ्फरपुर (बिहार) में ही मारा जाएगा। इस काम के लिए खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चंद को चुना गया।

​🔶 किंग्सफर्ड की जगह कैनेडी और उसकी बेटी की हत्या

ये दोनों क्रांतिकारी सूझबूझ वाले माने जाते थे। दोनों मुजफ्फरपुर पहुंचकर एक धर्मशाला में आठ दिन रहे। इस दौरान उन्होंने किंग्सफर्ड की दिनचर्या और गतिविधियों पर पूरी नजर रखी। उनके बंगले के पास ही क्लब था। अंग्रेजी अधिकारी और उनके परिवार के लोग शाम को वहां जाते थे। 30 अप्रैल, 1908 की शाम किंग्सफर्ड और उसकी पत्नी क्लब में पहुंचे। रात के साढे़ आठ बजे मिसेज कैनेडी और उसकी बेटी अपनी बग्घी में बैठकर क्लब से घर की तरफ आ रहे थे। उनकी बग्घी का रंग लाल था और वह बिल्कुल किंग्सफर्ड की बग्घी से मिलती-जुलती थी। खुदीराम बोस तथा उनके साथी ने किंग्सफर्ड की बग्घी समझकर उसपर बम फेंका, जिससे उसमें सवार मां-बेटी की मौत हो गई। वे दोनों यह सोचकर भाग निकले कि किंग्सफर्ड मारा गया है।

​🔷 फांसी की सजा

दोनों करीब 25 मील भागने के बाद एक रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। बोस पर पुलिस को शक हो गया और पूसा रोड रेलवे स्टेशन (अब यह स्टेशन खुदीराम बोस के नाम पर है) पर उन्हें घेर लिया। अपने को घिरा देख प्रफुल्ल चंद ने खुद को गोली मार ली पर खुदीराम पकड़े गए। खुदीराम बोस पर हत्या का मुकदमा चला। उन्होंने अपने बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने तो किंग्सफर्ड को मारने का प्रयास किया था। लेकिन, इस बात पर बहुत अफसोस है कि निर्दोष कैनेडी तथा उनकी बेटी गलती से मारे गए। यह मुकदमा केवल पांच दिन चला। 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त, 1908 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया।

🔶 ​स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा

मुजफ्फरपुर जेल में जिस मैजिस्ट्रेट ने उन्हें फांसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निडर होकर फांसी के तख्ते की ओर बढ़े थे। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे, जिसके किनारे पर ‘खुदीराम’ लिखा रहता था। स्कूल कालेजों में पढ़ने वाले लड़के इन धोतियों को पहनकर सीना तानकर आजादी के रास्ते पर चल निकले। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में जान न्योछावर करने वाले प्रथम सेनानी खुदीराम बोस माने जाते हैं। 

👉 किरायेदार की दास्तान


🔷 एक नगर मे एक बहुत ही आलीशान भवन बना हुआ था उस भवन मे एक सेठजी रहते थे दो खाली कमरे थे वहाँ दो किरायेदार आये और सेठजी से प्रार्थना करने लगे की हमें अपना मकान किराये पर दे दीजिये उनकी हालत देखकर सेठजी को रहम आ गया सेठजी बहुत भोले और भले पुरूष थे!

🔶 सेठजी ने कहा की मैं मकान किराये पर तो दे दुं पर देता हुं निश्चित अवधि के लिये और कोर्ट से लिखापढ़ी कराकर देता हुं ताकि बाद मे कोई लफड़ा न हो और जब मैं चाहूं तब आपको मकान खाली करना पड़े यदि मॆरी ये शर्ते स्वीकार है तो आ जाओ नही तो दुनियाँ बहुत लम्बीचौड़ी है आप जा सकते है! और हाँ मुझे गन्दगी पसंद नही है यदि आप साफ सफाई रख सकते हो तो लेना बाकी मत लेना ! किरायेदार ने शर्तों पर मकान ले लिया!

🔷 हर महीने वो किराया देते थे धीरे धीरे बहुत समय व्यतीत हुआ एक दिन मकान मालिक ने उन दोनो से कहा की आप मकान खाली कीजिये तो एक ने तत्काल मकान खाली कर दिया और वहाँ से आगे चला गया!

🔷 पर वो जो दूसरा था वो कहे की मकान तो मेरा है क्यों खाली करूँ तो सेठजी अपने साथ पहलवानों को लाये और उसकी खुब पिटाई की और पिटाई करते करते उसे मकान से बाहर निकाल दिया!

🔶 अब वो थाने मे हवलदार साब के पास पहुँचा सेठजी के खिलाप मुकदमा दर्ज करवाया और थानेदार सेठजी को लेने पहुँचे पर जब थानेदार जी को हकीकत पता चली तो उस किरायेदार को डंडे से पिटा और जेल मे डाल दिया!

🔷 पहले और दुसरे किरायेदार मे कितना अन्तर था!

🔶 एक ने किराये के मकान को अपना समझा साफ सफाई भी रखी और जैसै ही सेठजी का आदेश हुआ तत्काल मकान खाली भी कर दिया! और दुसरा मकान को भी गंदा किया और मालिक भी बनना चाहा तो डंडे पड़े!

🔷 यदि वो दुसरा भी किरायेदार बनकर रहता मालिक बनने की कोशिश न करता तो उसे यु डंडे न पड़ते और कारावास की सजा न होती!

🔶 हम सब यहाँ एक किरायेदार ही है इससे ज्यादा और कुछ नही! ये काया और ये माया इन्हे व्यवहार मे अपना कह लिजिये पर अधिकारपूर्वक मत कहना क्योंकि पता नही मकान मालिक कब मकान खाली करवा दे!

🔷 ये कभी नहीं भुलना चाहिये की हम सब किरायेदार है और किरायेदार बनकर रहेंगे तो सदा लाभ मे रहेंगे मालिक बनने की कोशिश की तो डंडे पडेंगे! मालिक बनने की कोशिश कभी नहीं करनी चाहिये क्योंकि ये काया किराये का एक मकान है और हम केवल एक किरायेदार है और एक दिन किराये के इस मकान को खाली करना ही पड़ेगा।

🔶 राम सुमिरन और राम सेवा से इसका ईमानदारी से किराया अदा करते हुये चले!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 11 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 25)

👉 प्रतिभा संवर्धन का मूल्य भी चुकाया जाए
  
🔷 व्यक्ति और समाज अब इस कदर गुँथ गए हैं कि दोनों का पारस्परिक तालमेल पानी और मछली जैसा अविच्छिन्न हो गया है। कोई निजी उन्नति से, निजी सुविधा संपादन भर से सुखी नहीं रह सकता। संबद्ध वातावरण यदि विपन्न है तो किसी सज्जन की भी शांति सुरक्षित नहीं रह सकती! अग्नि और महामारी किसी घर विशेष तक सीमित नहीं रहती। गुंडागर्दी एक जगह पनपेगी तो समूचे क्षेत्र में विग्रह खड़ा करने का निमित्त कारण बनेगी। बढ़ी हुई जनसंख्या और आधुनिक प्रगति के फलस्वरूप अब निजी जीवन को सही बना भर लेने से काम चलने वाला नहीं। इसलिए जनमानस के गिरे हुए स्तर को उभारना प्रकारांतर से अपनी और अपने परिकर की सुरक्षा करना है। सामूहिक जीवन मनुष्य की नियति है। इन दिनों सामूहिकता और भी अनिवार्य हो गई है। अपने मतलब से मतलब रखने की नीति अपनाने वाले यह नहीं समझते कि समुन्नत समाज के घटक ही वास्तव में सुखी रह सकते हैं।
  
🔶 प्रतिभा संपादन के लिए विशेषतया उच्चस्तरीय वातावरण में एक साथ रहना, उत्कृष्ट सोचना और आदर्शवादी क्रियाकलापों में निरत रहना चाहिए। निजी सुधार एवं अभ्युदय भी इसके बिना नहीं हो सकता। अपनी स्थिति लोकसेवी और उदारचेता सद्गुणी रखे बिना, किसी को भी शारीरिक बनावट मात्र से प्रभावशाली होने का अवसर नहीं मिल सकता। सद्गुणों का बाहुल्य एवं अभ्यास ही किसी को इस योग्य बनाता है कि वह अन्यान्यों का सम्मान एवं सहयोग अर्जित कर सके। इसी सफलता के आधार पर किसी की प्रतिभा और गरिमा का वास्तविक मूल्यांकन हो सकता है।
  
🔷 आवश्यक है कि संकीर्ण स्वार्थपरता की पूति में ही अपनी समूची क्षमताएँ न खपा दी जाएँ। इसमें जितना लाभ दिखाई पड़ता है उसकी तुलना में घाटा अधिक है। व्यापक स्तर का सार्वजनीन स्वार्थ ही परमार्थ है। परमार्थ परायण अपना निज का हितसाधन तो निश्चित रूप से करते ही हैं, साथ ही चंदन वृक्ष की तरह निकटवर्ती लोगों को भी गरिमा प्रदान करते हैं। प्रतिभा संपादन के लिए जिस प्राथमिक कक्षा में पढ़े बिना काम नहीं चलता वह है-सेवासाधना उच्चस्तरीय सेवासाधना में दो ही तत्त्व प्रमुख है-एक सत्प्रवृत्ति संवर्धन, दूसरा दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। इन दो प्रयासों को अपनाने के लिए अपने समय साधनों का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहने का महत्त्व समझा जाना चाहिए। एक सुनिश्चित व्रतधारण कर उसका निर्वाह करते रहने में अपनी श्रद्धा-निष्ठा एवं मनस्विता का परिचय देना चाहिए। इसे ‘प्रतिभा परिवर्धन’ की अनिवार्य फीस मानकर चलना चाहिए। युग परिवर्तन का सरंजाम इसी माध्यम से संपन्न होगा।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 31
http://awgpskj.blogspot.com/2018/08/1-24_9.html

👉 Do Not Panic or Perplex

🔷 Life is full of challenges and testing moments! Many a times the adverse circumstances are so intense that one just can’t bear  them, he loses patience, gets anxious and panicked; cries on his destiny and helplessness… But this doesn’t solve the problem. The only source of definite support in such cases is – prudence and patience.

🔶 Ups and downs, good and bad experiences are natural phases of human life. We must remember this fact and convince ourselves of the truth that wisdom and pure knowledge (gyana) are the only keys to conquer the agonies caused by the tides of adversities or tragedies. Firm faith in God’s grace and justice is a must in such testing moments of sufferings. We must understand that our knowledge is too limited to grasp the system of God. Whether we realize it at that time or not, the circumstances and experiences that appear so painful to us also occur in fact for our welfare only.

🔷 Because of our half or illusory knowledge and narrow attitude, we cannot grasp the real cause or purpose behind the happenings in our life. We must accept it that major cause of our agonies and anxiety is our ignorance; we want everything to conform to our expectation, our favor. But the course of life has many dimensions, beyond our perception. Faith in absolute justice and mercy of the Omniscient God is all the more important in the moments of hardships and pains. This gives us instant courage and light and helps maintain our calm without which we can’t even think properly. All religious scriptures preach the importance of the feeling of content and peace in all circumstance. It is indeed the nectar source of annulling all worries and panics even in the difficult, tragic
situations. Adoption of peace, patience and satisfaction does not mean that you should not transact your duties or progress in your life. Rather, it implies that you should complete all your tasks, all duties, with mental stability and calm and a sense of inner faith in all circumstances.

📖 Akhand Jyoti, April 1943

👉 आन्तरिक निकटता चाहिए

🔷 दूसरों की तरह हमारे भी दो शरीर हैं, एक हाड़-मांस का, दूसरा विचारणा एवं भावना का। हाड़-मांस से परिचय रखने वाले करोड़ों हैं। लाखों ऐसे भी हैं जिन्हें किसी प्रयोजन के लिए हमारे साथ कभी सम्पर्क करना पड़ा है। अपनी उपार्जित तपश्चर्या को हम निरन्तर एक सहृदय व्यक्ति की तरह बाँटते रहते हैं। विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों एवं उलझनों में उलझे हुए व्यक्ति किसी दलदल में से निकलने के लिए हमारी सहायता प्राप्त करने आते रहते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका भार हलका करने में कोई कंजूसी नहीं करते।

🔶 इस संदर्भ में अनेक व्यक्ति हमारे साथ संपर्क बनाते और प्रयोजन पूरा होने पर उसे समाप्त कर देते हैं। कितने ही व्यक्ति साहित्य से प्रभावित होकर पूछताछ एवं शंका समाधान करने के लिए, कितने ही आध्यात्मिक साधनाओं के गूढ़ रहस्य जानने के लिए, कई अन्यान्य प्रयोजनों से आते हैं। इनकी सामयिक सेवा कर देने से हमारा कर्त्तव्य पूरा हो जाता है। उनके बारे में न हम अधिक सोचते हैं और न उनकी कोई शिकायत या चिंता करते हैं।

🔷 हमारे मन में भावनाएँ उनके लिए उफनती हैं जिनकी पहुँच हमारे अंतःकरण एवं भावना स्तर तक है। भावना शरीर ही वास्तविक शरीर होता है। हम शरीर से जो कुछ हैं, भावना की दृष्टि से कहीं अधिक है। हम शरीर से किसी  की जो भलाई कर सकते हैं उसकी अपेक्षा अपनी भावनाओं, विचारणाओं का अनुदान देकर कहीं अधिक लाभ पहुँचाते हैं। पर अनुदान ग्रहण वे ही कर पाते हैं जो भावनात्मक दृष्टि से हमारे समीप हैं। जिन्हें हमारे विचारों से प्रेम है, जिन्हें हमारी विचारणा, भावना एवं अंतःप्रेरणा का स्पर्श करने में अभिरुचि है उन्हीं के बारे में यह कहना चाहिए कि वे तत्त्वतः हमारे निकटवर्ती एवं स्वजन संबंधी हैं। उन्हीं के बारे में हमें कुछ विशेष सोचना है, उन्हीं के लिए हमें कुछ विशेष करना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जुलाई 1966 पृष्ठ 42

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

👉 सहकारिता

🔶 राजा ने मंत्री से कहा- "मेरा मन प्रजाजनों में से जो वरिष्ठ हैं उन्हें कुछ बड़ा उपहार देने का हैं। बताओ ऐसे अधिकारी व्यक्ति कहाँ से और किस प्रकार ढूंढ़ें जाय?"

🔷 मंत्री ने कहा - "सत्पात्रों की तो कोई कमी नहीं, पर उनमें एक ही कमी है कि परस्पर सहयोग करने की अपेक्षा वे एक दूसरे की टाँग पकड़कर खींचते हैं। न खुद कुछ पाते हैं और न दूसरों को कुछ हाथ लगने देते हैं। ऐसी दशा में आपकी उदारता को फलित होने का अवसर ही न मिलेगा।"

🔶 राजा के गले वह उत्तर उतरा नहीं। बोले! तुम्हारी मान्यता सच है यह कैसे माना जाय? यदि कुछ प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हो तो करो। मंत्री ने बात स्वीकार करली और प्रत्यक्ष कर दिखाने की एक योजना बना ली। उसे कार्यान्वित करने की स्वीकृति भी मिल गई।

🔷 एक छः फुट गहरा गड्ढा बनाया गया। उसमें बीस व्यक्तियों के खड़े होने की जगह थी। घोषणा की गई कि जो इस गड्ढे से ऊपर चढ़ आवेगा उसे आधा राज्य पुरस्कार में मिलेगा।

🔶 बीसों प्रथम चढ़ने का प्रयत्न करने लगे। जो थोड़ा सफल होता दीखता उसकी टाँगें पकड़कर शेष उन्नीस नीचे घसीट लेते। वह औंधे मुँह गिर पड़ता। इसी प्रकार सबेरे आरम्भ की गई प्रतियोगिता शाम को समाप्त हो गयी। बीसों को असफल ही किया गया और रात्रि होते-होते उन्हें सीढ़ी लगाकर ऊपर खींच लिया गया। पुरस्कार किसी को भी नहीं मिला।

🔷 मंत्री ने अपने मत को प्रकट करते हुए कहा - "यदि यह एकता कर लेते तो सहारा देकर किसी एक को ऊपर चढ़ा सकते थे। पर वे ईर्ष्यावश वैसा नहीं कर सकें। एक दूसरे की टाँग खींचते रहे और सभी खाली हाथ रहे। संसार में प्रतिभावानों के बीच भी ऐसी ही प्रतिस्पर्धा चलती हैं और वे खींचतान में ही सारी शक्ति गँवा देते है। अस्तु उन्हें निराश हाथ मलते ही रहना पड़ता है।"

👉 उपकार का बदला चुकाना

🔶 च्यवन ऋषि बहुत बड़े तपस्वी थे और वर्षों तक एक ही स्थान पर ध्यान में बैठे रहने के कारण उनका शरीर मिट्टी से ढक गया था। एक बार अयोध्या के राजा शर्याति अपनी कन्या को जिसका नाम सुकन्या था, लेकर उसी स्थान में भ्रमण करते हुए पहुँच गये। जिस समय सुकन्या घूमते हुए उस मिट्टी के ढेर के पास जा पहुँची, जिसमें दबे हुए च्यवन ऋषि ध्यानमग्न थे। उनके नेत्रों को मिट्टी के भीतर से चमकते देखकर सुकन्या को कौतूहल हुआ और उसने अज्ञानवश परीक्षा करने के अभिप्राय से उनमें काँटे चुभा दिये। जब राजा को इस दुर्घटना का समाचार मिला तो वे बड़े दुखी हुए और ऋषि से क्षमा माँगने लगे।

🔷 अज्ञान में किये गये अपराध के कारण ऋषि ने क्षमा तो कर दिया पर अन्धे हो जाने के कारण अपनी सेवा के लिए सुकन्या को माँग लिया। सुकन्या ने भी अपना अपराध समझ कर इसमें किसी प्रकार की आपत्ति न की और उसका विवाह च्यवन के साथ कर दिया गया । कुछ काल पश्चात् देवताओं के वैध अश्विनी कुमार च्यवन ऋषि के आश्रम में आये और दिव्य औषधियों के प्रभाव से उन्होंने उनके नेत्र ही ठीक न कर दिये वरन उनका कायाकल्प करके उनको सर्वथा नवयुवक बना दिया। इससे प्रसन्न होकर च्यवन ने उनसे कुछ माँगने का आग्रह किया तो उन्होंने कहा कि हमको वैद्य का धन्धा करने के कारण यज्ञ के समय देवताओं के साथ सोमपान करने से रोका जाता है, इस निषेधाज्ञा को आप दूर करा दें।

🔶 च्यवन ने इसका वचन दिया और कुछ समय पश्चात् अपने श्वसुर शर्याति नरेश द्वारा आयोजित एक बृहत यज्ञ में उन्होंने अश्विनी कुमारों को सोमपान कराया। इस अवसर पर इन्द्र ने उस नई परम्परा का घोर विरोध किया और च्यवन के मारने को वज्र फेंका पर शिवाजी के प्रताप से अन्त उसी की पराजय हुई। इस विषम परिस्थिति को देखकर देवगुरु बृहस्पति ने दोनों पक्षी में समझौता करा दिया और अश्विनी कुमारों को यज्ञ में सोमपान का अधिकार स्थायी रूप से प्राप्त हो गया। इस प्रकार च्यवन ने अपने ऊपर किये हुए उपकार का बदला चुकाने के लिए प्राणों को जोखिम में डालकर भी अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति की।

📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 आज का सद्चिंतन 10 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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