बुधवार, 17 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Jan 2024

🔶 जो काम अभी हो सकता है, उसे घंटे भर बाद करने की मनोवृत्ति आलस्य की निशानी है। एक एक कार्य हाथ में लिया और करते चले गये, तो बहुत से कार्य पूर्ण कर सकेंगे, पर बहुत से काम एक साथ लेने से किसे पहले किया जाय, इस में समय बीत जाता है और एक भी काम पूरा और ठीक से नहीं हो पाता। अतः पहली बात ध्यान में रखने की यह है कि जो कार्य आज अभी हो सकता है, उसे कल के लिए न छोड़े, तत्काल उसे करें ।।

🔷 एक साथ अधिक कार्य हाथ में न लिये जायें क्योंकि इससे किसी भी काम में पूरा मनोयोग एवं उत्साह नहीं रहने से सफलता नहीं मिल सकेगी। अतः एक एक कार्य को  हाथ में लिया जाए और क्रमशः सबको कर लिया जाये अन्यथा सभी कार्य अधूरे रह जायेंगे और पूरे हुए बिना कार्य का फल नहीं मिल सकता।

🔶 आत्मा अनंत शक्तियों का भांडागार है। उसमें अपने उद्गम केन्द्र परमेश्वर की समस्त शक्तियाँ बीज रूप में सन्निहित हैं। उन्हें उगाने और बढ़ाने के लिए योग साधना एवं  तपश्चर्या का खाद- पानी लगाना पड़ता है, साथ ही साथ उच्चस्तरीय चरित्र निष्ठा एवं उदार सेवा -- सहायता का अवलंबन करना पड़ता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


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मंगलवार, 16 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 Jan 2024

🔶  ब्रह्मचर्य का अभाव - प्राणशक्ति, स्फूर्ति बुद्धि और ओज यह वस्तुएं वीर्य से ही बनती हैं इसलिए उसे अमूल्य रत्न समझते हुए जी-जान इसकी रक्षा का प्रयत्न करना चाहिये। शरीर और मन का स्वास्थ्य वीर्य की शक्ति से प्राप्त होता है इसलिए क्षणिक इन्द्रिय सुख के लिए नष्ट करना धूति के बदले हीरा बेचना है। अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण कीजिये। यदि विवाहित हैं तो केवल सन्तान उत्पन्न करने के उद्देश्य से धर्मपूर्वक उसका उपयोग कीजिए। इससे आपकी शक्ति सुरक्षित रहेगी।

🔷 कुसंग- मनुष्य शरीर एक प्रभावशाली विद्युत धारण किये हुए है जो अपने पास वालों पर अनिवार्य रूप से असर डालती है मजबूत विचारों से दूसरों पर जरूर असर पड़ता है अगर आप आरम्भिक अभ्यासी हों तो बुरे चरित्र और अपने दुष्ट विचार वालों से दूर रहिये उनके कार्यों में कोई दिलचस्पी मत लीजिये। हो सके तो अरुचि प्रकट कीजिये इससे आप उनके संक्रामक असर से बचे रहेंगे। सत्संग की महिमा अपार है श्रेष्ठ पुरुषों का साथ गंगा के समान है जिसमें गोता लगाने से क्लेश कटते हैं श्रेष्ठ पुरुषों के साथ रहने से, उनके मौखिक या लेखबद्ध विचारों के मनन करने से आत्मोत्थान होता है। हाँ, यदि आप अपने को अत्यन्त सुदृढ़ समझते हैं तो सुधार की दृष्टि से बुरे विचार वाले को अपने साथ ले सकते हैं परन्तु सावधान! कहीं उसका उलटा असर आप पर न हो जाय।

🔶 परदोष दर्शन - दूसरे के अवगुण देखना अपनी बुद्धि को दूषित करना है। फोटो खींचने के कैमरे के सामने जो चीज रखी जाती है उसी का अक्ष भीतर प्लेट पर खिंच जाता है। यदि आप दूसरों की बुराइयाँ ही देखेंगे तो उनके चित्र अपने अन्दर अंकित करके उन्हें खुद भी ग्रहण कर लेंगे। इसलिए दूसरों के सद्गुणों पर ही दृष्टि रखिये। सब में परमात्मा का स्वरूप देखिये और उन्हें प्रेम की दृष्टि से देखिये आपका हृदय प्रसन्न रहेगा। यदि किसी में बुराई दिखाई पड़े तो उससे घृणा मत कीजिये और जहाँ तक हो सके सुधारने का प्रयत्न कीजिये। परदोष दर्शन के कारण जो घृणा और द्वेश मन में उत्पन्न होते हैं वह भीतर ही भीतर अशान्ति उत्पन्न करके मन को निश्चित पथ से डिगा देते हैं। साधना को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है कि किसी की गन्दगी टटोलकर अपनी नाक को दुर्गन्धित न किया जाय।

🔷 संकीर्णता - अपने मजहब, विचार या विश्वासों पर दृढ़ रहना उचित है। परन्तु दूसरों के विश्वासों को घृणा की दृष्टि से देखना या झूठा समझना अनुचित है। हम सब सत्य के आस-पास चक्कर काट रहे हैं किन्तु कोई पूर्ण सत्य तक नहीं पहुँच सका है। इसलिए हमें एक दूसरे के दृष्टिकोण को ध्यानपूर्वक देखना चाहिए। कट्टरता एक ऐसा दुर्गुण है जिसके कारण आदमी न तो अपनी बुराइयों को छोड़ सकता है और न अच्छाइयों को ग्रहण कर सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 15 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Jan 2024

🔵 परस्पर प्रोत्साहन न देना हमारे व्यक्तिगत सामाजिक जीवन की एक बहुत बड़ी कमजोरी है। किसी को प्रोत्साहन भरे दो शब्द कहने के बजाय लोग उसे खरी-खोटी असफलता की बातें कर निरुत्साहित करते हैं, हिम्मत तोड़ते हैं, जिससे दूसरों को निराशा, असंभावनाओं का निर्देश मिलता है और हमारे सामाजिक विकास में गतिरोध पैदा हो जाता है।

🔴 असंख्यों बार यह परीक्षण हो चुके हैं कि दुष्टता किसी के लिए भी लाभदायक सिद्ध नहीं हुई। जिसने भी उसे अपनाया वह घाटे में रहा और वातावरण दूषित बना। अब यह परीक्षण आगे भी चलते रहने से कोई लाभ नहीं। हम अपना जीवन इसी पिसे को पीसने में-परखे को परखने में न गँवायें तो ही ठीक है। अनीति को अपनाकर सुख की आकाँक्षा पूर्ण करना किसी के लिए भी संभव नहीं हो सकता तो हमारे लिए ही अनहोनी बात संभव कैसे होगी?

🔵 इस संसार में अच्छाइयों की कमी नहीं। श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति भी सर्वत्र भरे पड़े हैं, फिर हर व्यक्ति में कुछ अच्छाई तो होती ही है। यदि छिन्द्रान्वेषण छोड़कर हम गुण अन्वेषण करने का अपना स्वभा बना लें, तो घृणा और द्वेष के स्थान हमें प्रसन्नता प्राप्त करने लायक भी बहुत कुछ इस संसार में मिल जायेगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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रविवार, 14 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 Jan 2024

🔴 जिस काम को मनुष्य अपने आन्तरिक मन से नहीं करना चाहता, पर दिखावे के रूप में उसे बाध्य होता है तो उसे अनेक प्रकार की रुकावटें उत्पन्न होती हैं। ये रुकावटें उसे दर्शाती हैं कि तुम्हारा आन्तरिक मन उक्त काम के प्रतिकूल है। शान्त होकर यदि मनुष्य अपनी किसी प्रकार की भूल अथवा कार्य की विफलता पर विचार करें तो वह उसका कारण अपने आप ही पावेगा। जो काम अनुद्विग्न मन होकर किया जाता है, उसमें आत्म-विश्वास रहता है और उसमें सफलता अवश्य मिलती है। शान्त मन द्वारा विचार करने से स्मृति तीव्र हो जाती है। और इन्द्रियाँ स्वस्थ हो जाती हैं।

🔵 शान्त विचारों का चेतन मन नहीं होता। शान्त विचार ही आत्मनिर्देश शक्ति हैं। इन विचारों को प्राप्त करने के लिए वैयक्तिक इच्छाओं का नियन्त्रण करना पड़ता है। जिस व्यक्ति की इच्छायें जितनी ही नियंत्रित होती हैं, जिस मनुष्य में जितनी वैराग्य की अधिकता होती है उसके शान्त विचारों की शक्ति उतनी ही अधिक प्रबल होती है। जो मनुष्य अपने भावों के वेगों को रोक लेता है वह उन वेगों की शक्ति को मानसिक शक्ति के रूप में परिणत कर लेता है।

🔴 इच्छाओं की वृद्धि से इच्छा शक्ति का बल कम होता है और उसके विनाश से उसकी शक्ति बढ़ती है। इच्छाओं की वृद्धि शान्त विचारों का अन्त कर देती है जिस मनुष्य की इच्छायें जितनी ही अधिक होती हैं उसे भय, चिन्ता, सन्देह और मोह भी उतने ही अधिक होते हैं। भय, चिन्ता, सन्देह और मोह से मनुष्य की आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास होता है। अतएव ऐसे व्यक्ति से संकल्प फलित नहीं होते। वह जो काम हाथ में लेता है उसे पूरे मन से नहीं करता। अधूरा काम अथवा आधे मन से किया गया काम कभी सफलता नहीं लाता। अधिक मन से किये गये कार्य में मनुष्य का चेतन मन से कार्य करता है पर अचेतन मन उसकी सहायता के लिये अग्रसर नहीं होता। ऐसी अवस्था में मनुष्य को शीघ्रता से थकावट आ जाती है। और वह अपने कार्य को अधूरा छोड़ने के लिये बाध्य हो जाता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शनिवार, 13 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 Jan 2024

🔴 जीवन को प्रगतिशील दिशा देने वाली प्रतिभा को सुविकसित करने हेतु स्वतः स्वर्णिम सूत्र-

(1) मस्तिष्क से असफल होने के विचारों को निकाल फेंके और अपनी अन्तर्निहित क्षमताओं को समझें।

(2) स्व-सहानुभूति को पृथक करके अपने दोष दुर्गुणों अथवा दुर्बलताओं को निरीक्षण-परिक्षण करें।

(3) अपने ही स्वार्थ के विषय में सोच-विचार बन्द करें, दूसरों की सेवा-सहायता को भी सोचें और कार्य रूप में परिणत करें।

(4) ईश्वर-प्रदत्त इच्छा शक्ति का सही समुचित प्रयोग करें। उसकी दिशा धारा को व्यर्थ-निरर्थक न बहने दें।

(5) जीवन लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ही जीवनचर्या का निर्धारण करें।

(6) मानसिक ऊर्जा को नियंत्रित करके उपयोगी दिशा में नियोजित करें। चिन्तन की दिशा को सदैव सृजनात्मक बनाए रखें।

(7) जीवन के प्रत्येक दिन सुबह और शाम उस परब्रह्म की समर्थसत्ता के साथ संपर्क-

(8) सान्निध्य बिठाने का अभ्यास किया जाय, जो असंभव दिखने वाले कार्य को भी संभव बना सकने की शक्ति प्रदान करती है।

(9) ये वे महत्वपूर्ण सूत्र हैं जिनका अवलम्बन लेकर हर कोई अपनी प्रतिभा को कुण्ठित होने से बचा कर स्वयं को प्रगति के परम शिखर तक पहुँचा सकता है। प्रतिभा ही तो सफलता का बीज है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 12 Jan 2024

हम अपने आपको प्यार करें ताकि ईश्वर से प्यार कर सकने योग्य बन सकें। हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करें ताकि ईश्वर के निकट बैठ सकने की पात्रता प्राप्त कर सकें। जिसने अपने अन्तःकरण को प्यार से ओत-प्रोत कर लिया, जिसके चिन्तन और कर्तृत्व में प्यार बिखरा पड़ा है ईश्वर का प्यार केवल उसी को मिलेगा, जो दीपक की तरह जलकर प्रकाश उत्पन्न करने को तैयार है, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी पर होगा।” 

आत्म विश्वास न हो तो व्यक्ति को पराधीनता की ही बात सूझती है। वह दूसरों के ही शिकंजे में कसा रहता है। कठपुतली की तरह जिस-तिस के इशारे पर नाचता रह सकता है। किन्तु जिन्हें अपनी शक्ति का ज्ञान है, अपने ऊपर भरोसा है, उन्हें दूसरों की चिन्ता नहीं करनी पड़ती। वे सहयोग दें या असहयोग करें, साथियों के साथ वह बंधा रहकर या तो उनको अनुकूल बना लेता है या अपने लिए दूसरा रास्ता बना लेता है।

लोगों की आँखों से हम दूर हो सकते हैं, पर हमारी आँखों से कोई दूर न होगा। जिनकी आँखों में हमारे प्रति स्नेह और हृदय में भावनाएँ हैं, उन सबकी तस्वीरें हम अपने कलेजे में छिपाकर ले जायेंगे और उन देव प्रतिमाओं पर निरन्तर आँसुओं का अध्र्य चढ़ाया करेंगे। कह नहीं सकते उऋण होने के लिए प्रत्युपकार का कुछ अवसर मिलेगा या नहीं, पर यदि मिला तो अपनी इन देवप्रतिमाओं को अलंकृत और सुसज्जित करने में कुछ उठा न रखेंगे। लोग हम भूल सकते हैं, पर हम अपने किसी स्नेही को नहीं भूलेंगे।      

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 11 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Jan 2024

वस्तुओं और व्यक्तियों में कोई आकर्षण नहीं है अपनी आत्मीयता जिस किसी से भी जुड़ जाती है वही प्रिय लगने लगती है यह तथ्य कितना स्पष्ट किन्तु कितना गुप्त है लोग अमुक व्यक्ति या अमुक वस्तु को रुचिर मधुर मानते हैं और उसे पाने लिपटाने के लिए आकुल व्याकुल रहते हैं। प्राप्त होने पर वह आकुलता जैसे ही घटती है वैसे ही वह आकर्षण तिरोहित हो जात ह। किसी कारण यदि ममत्व हट या घटा जाय तो वही वस्तुतः जो कल तक अत्यधिक प्रिय प्रतीत होती थी और जिसके बिना सब कुछ नीरस लगता था। बेकार और निकम्मी लगने लगेंगी वस्तु या व्यक्ति वही किन्तु प्रियता में आश्चर्यजनक परिवर्तन बहुधा होता रहता है। इसका कारण एक मात्र यही है कि उधर से ममता का आकर्षण कम हो गया।

हमारा अज्ञान ही है जो अकारण हर्षोन्मत्त एवं शोक आवेश के ज्वार भाटे में उछलता भटकाता रहता है। यदि मायाबद्ध अशुद्ध चिंतन से छुटकारा मिल जाय और सृष्टि के अनवरत जन्म बुद्धि विनाश के अनिवार्य क्रम को समझ लिया तो मनुष्य शान्त सन्तुलित स्थिर सन्तुष्ट एवं सुखी रह सकता है। ऐसी देवोपम मनोभूमि पल पल में पग पग में स्वर्गीय जीवन की सुखद संवेदनाएं सम्मुख प्रस्तुत किये रह सकती है। चिन्तन में बैठे अज्ञानी बालक के ज्वार से प्रसन्न और भाटा से अप्रसन्न होने की तरह हमें उद्विग्न बनाये रहता है।

🌹 ~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य

🔴 मुझे रास्ता मालूम है। वह तंग किन्तु सीधा है वह खांड़े की धार जैसा है। उस पर चलने में मुझे आनन्द आता है। जब फिसल जाता हूँ तो जी भरकर रोता हूँ। भगवान् का वचन है-कल्याण पथिक की दुर्गति नहीं होती। इस आश्वासन पर मुझे अटूट श्रद्धा है। इस श्रद्धा को गँवाऊँगा नहीं। जिस दिन काया पूर्णतः वश में आ जायगी उस दिन उस दिव्य ज्योति के दर्शन पाऊँगा, इस पर मेरा अविचल विश्वास है।

🌹 ~महात्मा गाँधी

मंगलवार, 9 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 09 Jan 2024

 🔴 खेद का विषय है कि आज के युग में भाषा विज्ञान का जितना विकास हुआ है, वाणी को प्रभावशाली वैज्ञानिक रूप देने में जितना अन्वेषण हुआ है, उतना ही वाणी का व्यभिचार बढ़ गया है। आजकल शब्द ज्ञान के स्रोत न रहकर वाणी विलास, तथाकथित वाक्चातुरी या छल दूसरों को उल्लू बनाने का साधन बनते जा रहे हैं। सच को झूठ और झूठ को सच बनाने के लिए किया जाने वाला शब्दों का जोड़ वाणी व्यभिचार नहीं तो क्या है?

🔵 मौलिक चिंतन के लिए-स्वतंत्र विचारों की साधना के लिए सबसे आवश्यक और महत्त्वपूर्ण जो बात है वह यह कि अपनी अंतरात्मा की वाणी सुनें। हमारी आत्मा निरन्तर बोलती है, कहती है, हमें परामर्श देती है। उसे सुनने का यदि हम प्रयत्न करें तो कोई कारण नहीं कि हम अपनी समस्याओं और शंकाओं का समाधान न कर सकें, हम अपना मार्ग न ढूँढ सकें।

🔴 किसी भी बात का समाज में प्रचार करने के लिए पहले उसे अपने जीवन में अपनाना आवश्यक है। समाज के अगुवा लोग जैसा आचरण करते हैं, उसका अनुकरण दूसरे लोग करते हैं। सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक कार्यकर्त्ता और नेता लोग जब अपने प्रत्यक्ष आचरण और उदाहरण के द्वारा जनता को चरित्र निर्माण का मार्ग दिखायेंगे तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब भ्रष्टाचार हमारे समाज से दूर हट जाएगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 8 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 Jan 2024

🔴 बुरे विचार और बुरे कार्य भी नींद के शत्रु माने गये हैं। ऊपर कहा जा चुका है—सदाचारी को, सन्तोषी को, स्वस्थ नींद आए बिना नहीं रह सकती। गन्दे विचार, उन्हें पैदा करने वाला गन्दा साहित्य, उपन्यास अश्लील वार्तालाप, अभद्र व्यवहार गन्दे चित्रों से मनुष्य को बचना चाहिए। चरित्र का संयमी सदाचारी होना भी आवश्यक है। आधुनिक युग में हम लोगों का चारित्रिक पतन और दुराचार पूर्ण, गन्दा जीवन, गन्दे विचार अश्लील कल्पनाएँ एवं द्वेष, आवेश, संशय, भय अविश्वास आदि अनिद्रा की बीमारी के मुख्य कारण हैं।

🔵 सुन्दर बनने के लिए बाहरी साधन जरूरी नहीं है। इस भ्रान्त धारणा को-कि अधिक बनाव शृंगार करेंगे तो अधिक लोग आकर्षित होंगे—अपने मस्तिष्क से निकाल कर अपने अंतःकरण के सौंदर्य को खोजने का प्रयत्न कीजिए। आपकी प्रसन्नता में, आपके सुखद विचारों में सुन्दरता भरी हुई है उसे जागृत कीजिए। सच्चा सौंदर्य मनुष्य के सद्गुणों में है। हम गुणवान् बनें, तेजस्वी बनें तो सौंदर्य हमारा साथ कभी न छोड़ेगा।

🔴 आज सम्पूर्ण नारी जाति का कर्त्तव्य है कि निन्दनीय वातावरण छोड़कर आगे बढ़े, और समाज सुधार, नैतिक उत्थान तथा धार्मिक पुनर्जागरण का संदेश मानवता को दें। उन्हें इस ढंग से कार्य करना होगा कि पुरुषों को बल मिले, उनकी खोई हुई शक्तियाँ जागें। इसके लिए उन्हें पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ना होगा। अपने कार्यक्षेत्र का सफलतापूर्वक निर्वाह किये बिना विकास की गति को स्त्रियाँ प्रवाहमान नहीं रख सकतीं। उन्हें सारे उत्तरदायित्व समझदारी से निभाने पड़ेंगे।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य


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रविवार, 7 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Jan 2024

🔵  प्रतिभा, कुशलता, विशिष्टता से संपन्न कई विभूतिवान व्यक्ति इस स्थिति में होते हैं कि अनिवार्य प्रयोजनों में संलग्न रहने के साथ- साथ ही इतना कुछ कर या करा सकते हैं कि उतने से भी बहुत कुछ बन पड़ना संभव हो सके। उच्च पदासीन, यशस्वी, धनी- मानी अपने प्रभाव का उपयोग करके भी समय की माँग पूरी करने में अपनी विशिष्ट भूमिका निभा सकते हैं। विभूतिवानों का सहयोग भी अनेक बार कर्मवीर समयदानियों जितना ही प्रभावोत्पादक सिद्ध हो सकता है।

🔴  जो कार्य अगले दिनों करने हैं, वे पुल खड़े करने, बाँध बाँधने, बिजली घर तैयार करने जैसे विशालकाय होंगे। इसके लिए इंजीनियर नहीं होंगे, और न ऊँचे वेतन पर उनकी क्षमता को खरीदा जा सकेगा। वे अपने ही रीछ वानरों में से होंगे। समुद्र पर पुल बाँधने जैसे कार्य में नल- नील जैसे प्रतिभावान भावनाशील ही चाहिए। इसके लिए बुद्ध, गाँधी, विनोबा जैसे चरित्र भी चाहिए और प्रयास भी।

🔵 हमारी आंतरिक अभिलाषा एक ही है कि जो हमें अपना समझते हैं, जिन्हें हम अपना समझते हैं, वे युग नेतृत्व करें। अपने आपको आदर्शों के राजमार्ग पर चलाएँ और नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक क्षेत्र में प्रगतिशीलता की क्रिया- प्रक्रिया अपनाएँ। समर्थ नाविक की तरह अपनी मजबूत पतवार वाली नाव पर बिठाकर स्वयं पार हों, अन्यान्य असंख्यों को पार लगाएँ, ऊँचा उठाएँ और ऐसा वातावरण बनाएँ जिससे सर्वत्र वसंत- सुषमा बिखरी दृष्टिगोचर हो।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

 
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शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Jan 2024

🔶 आध्यात्मिक दृष्टिकोण का अर्थ है मन की उच्च भूमिका में प्रवेश करना। आध्यात्मिक दृष्टिकोण को प्रकट करने वाला एक अत्यन्त संक्षिप्त साधना है- और वह है अपनी आत्मा का विकास। शक्ति का एक वृहत् परिमाण इस भण्डार में एकत्रित है, उसे संकल्प, सूचना तथा मनोबल से विकसित करना पड़ता है। हमारी आत्मा में महान् शक्ति इसीलिए दी गई है कि हम उसका जितना भी सम्भव हो सदुपयोग करें, उससे यथेष्ट लाभ उठावें और उस अनन्त चेतन तत्व की समीचीन रूप से अभिवृद्धि करें।

🔷 गुरु- शिष्य संबंध बड़ा कोमल, किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु शिष्य को पुत्रवत् समझकर, उसे टेढ़े- मेढ़े मागों से निकाल ले जाते हैं, जिन्हें शिष्य के लिए समझ पाना कठिन होता है ।। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान में आकर गुरु की अवज्ञा कर जाता है, इच्छा तथा आदेश की अवहेलना करता है। यद्यपि गुरु उसे कुछ भी न कहें, किन्तु फिर भी वह संभावित लाभ से वंचित रह जाता है। इसके लिए शिष्य में गुरु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की आवश्यकता है।

🔶 कुविचारों और दुःस्वभावों से पीछा छुड़ाने का तरीका यह है कि सद्विचारों के सम्पर्क में निरन्तर रहा जाये उनका स्वाध्याय, सत्संग और चिंतन- मनन किया जाये। साथ ही अपने सम्पर्क क्षेत्र में सुधार कार्य जारी रखा जाये। सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन का सेवा कार्य किसी न किसी रूप में कार्यान्वित करते रहा जाये। इतना करने पर ही मन को स्वच्छ, निर्मल व स्वयं को प्रगति के पथ पर अग्रगामी बनाए रखा जा सकता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
 
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गुरुवार, 4 जनवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 4 Jan 2024

जीवन की महत्ता और सफलता उसकी आत्मिक प्रगति पर निर्भर है, यह विश्वास मन में रखना चाहिए व नित्य सुदृढ़ बनाना चाहिए। भौतिक सफलताएं तो उतनी ही देर आनन्द देती हैं, जब तक कि उनकी प्राप्ति नहीं हो जाती। मिलते ही आनन्द समाप्त हो जाता है व और अधिक के लिए व्याकुलता, बेचैनी आरंभ हो जाती है। जो मानव जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर उस आनन्द की प्राप्ति के इच्छुक हैं, जिसके लिए यह जन्म मिला है, उन्हें आत्मिक प्रगति के लिए तत्पर होना चाहिए और उसके दोनों आधारों उपासना और साधना का अवलम्बन लेना चाहिए।

निष्ठुरता, एकाकीपन, अलगाव से भरे आज के समाज में सतयुगी संभावनाएँ तभी साकार होंगी जब मानव के अन्दर ब्राह्मणत्व जागेगा। सादा जीवन, उच्च विचार की परम्परा का विस्तार होगा। गरीबी को जानबूझकर ओढ़ने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाएगा। बड़प्पन की कसौटी एक ही होगी, विकसित भावसंवेदना, श्रेष्ठ-उदात्त चिन्तन व समाज को ऊंचा उठाने वाले सत्कर्म। संधि वेला में ऐसे अनेक नव ब्राह्मण उभरकर आएँगे। जाति, वंश के भेद से परे इन महामानवों की जीवनचर्या परमार्थ पारायण होगी। सतयुग की वापसी तब ही तो होगी।

ईश्वर एक नियम, मर्यादा एवं व्यवस्था का नाम है। स्वयं को भी उसने अपने को इन अनुशासनों में आबद्ध कर रखा है। फिर मनुष्य के साथ व्यवहार करते समय वह अपनी सुनिश्चित रीति-नीति से पीछे कैसे हट सकता है। उसे चापलूसी के आधार पर किस तरह अपनी ओछी मनोकामनाएँ पूरी कराने के लिए सहमत किया जा सकता है। उस निष्पक्ष न्यायाधीश से कुछ अनुपयुक्त करा लेने की बात किसी को भी नहीं सोचनी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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मंगलवार, 2 जनवरी 2024

👉 ईर्ष्या न करें, प्रेरणा ग्रहण करें। भाग १

हृदय में ईर्ष्या का भाव पाल लेने का अर्थ है, अपने अच्छे-खासे जीवन में आग लगा लेना। जंगल में आग लग जाने से जिस प्रकार हरे-भरे पेड़ जलकर राख हो जाते हैं, उसी प्रकार ईर्ष्या का भाव भर जाने से मानव-जीवन भी जल-भुनकर समाप्त हो जाता है। ईर्ष्या से हानि के सिवाय कोई लाभ नहीं। किसी से ईर्ष्या करके मनुष्य उसका तो कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। हाँ अपनी निद्रा, अपना सुख और अपना सुख-सन्तोष अवश्य खो देता है। ऐसे भाव को, जिससे केवल अपनी ही हानि होती रहे, अपने हृदय में जमा लेना किसी प्रकार हित कर नहीं। यह आत्म-घात के समान अबोधता है।

ईर्ष्या की उत्पत्ति दूसरों की उन्नति देखकर होती है। और होती केवल उन्हीं व्यक्तियों को है जो अक्षम और अशक्त होते हैं। वे स्वयं तो कोई उन्नति करने योग्य होते नहीं और न अपनी मानसिक निर्बलता के कारण प्रयत्न ही करते हैं, लेकिन औरों का अभ्युदय देखकर जलने अवश्य लगते हैं। किन्तु इससे किसी का क्या बनता-बिगड़ता है। केवल अपने हृदय में एक ऐसी आग लग जाती है, जो गीली लकड़ी की तरह जीवन को दिन रात सुलगाती रहती है।

संसार में एक से एक अच्छे श्रेष्ठ, सफल और उन्नतिशील व्यक्ति पड़े हैं। एक से एक बढ़कर धनवान, ऐश्वर्यवान और सम्मानित व्यक्ति मौजूद हैं। उनसे यदि व्यर्थ में ईर्ष्या की जाने लगे तो उससे उनका क्या बिगड़ सकता है। किसी की उन्नति किसी के ईर्ष्या अथवा प्रेम पर तो निर्भर होती नहीं। हर आदमी अपने परिश्रम, पुरुषार्थ और प्रयत्न के बल पर आगे बढ़ता और ऊँचे चढ़ता है। यदि कोई व्यक्ति उससे मन ही मन ईर्ष्या करता रहे तो उसका प्रभाव उस पर क्या पड़ सकता है। वह अपनी ओर से जब तक अपने परिश्रम और प्रयत्न को सक्रिय रखेगा, प्रगति के पथ पर बढ़ता जायेगा। उसे न तो किसी की ईर्ष्या रोक सकती है और न द्वेष।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1970 

👉 सत्य के लिए सर्वस्व त्याग

यदि मेरी मित्रतायें मेरा साथ नहीं देतीं तो न दें। प्रेम मुझे छोड़ देता है तो छोड़ दे। मेरा तो एक ही आग्रह है कि मैं उस सत्य के प्रति सच्ची रह सकूँ, जिसकी सेवा और परिपालन के लिये, मैंने अपनी इच्छाओं का, वैभव विलास से परिपूर्ण पाश्चात्य जीव−पद्धति तक का बहिष्कार कर दिया है। जब तक मेरे शरीर में रक्त की अन्तिम बूँद और अन्तिम श्वास विद्यमान है, मैं एकमेव सत्य की प्राप्ति के हित तिल−तिल जलती रहूँगी। सत्य ही तो मनुष्य जीवन का सार है।

यदि वह सत्य मुझ से रेगिस्तान में चलने को कहेगा तो मैं उसके पीछे−पीछे जाऊँगी, मुझे उसे प्राप्त करने के लिये पर्वतों पर चढ़ना पड़ा, समुद्र की थाह लेनी पड़ी तो भी मैं पीछे नहीं हटूँगी। उसने माँग की मैं प्रेम से वंचित हो जाऊँ तो मुझे वह भी स्वीकार होगा पर सत्य का आश्रय मैं छोड़ नहीं सकती। मैं तो सत्य से चिपकी रहूँगी, भले ही मुझे यह दिखाई दे कि मुझे अपना कहने वाला भी कोई नहीं रहा। मेरी हार्दिक कामना है कि जब मैं मरूँ और मेरी समाधि बनाई जाये तो उस पर लिखा जाये—“उसने सब कुछ छोड़कर भी सत्य के पीछे चलने का प्रयत्न किया।”

~ एनी बेसेंट
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1970 पृष्ठ 1

रविवार, 31 दिसंबर 2023

👉 अहिंसा

अहिंसा एक रहस्यमय शब्द है, जिसे कम ही लोग समझते हैं। अधिकतर लोग यही मानते हैं कि शरीर से किसी की पिटाई मत करो, किसी को घायल मत करो, किसी की जान मत लो, यह अहिंसा है। अहिंसा का यह अर्थ तो प्रसिद्ध है ही। परंतु यह अधूरा अर्थ है। यह तो शारीरिक अहिंसा हुई।

इसके अतिरिक्त, यदि किसी निर्दोष व्यक्ति पर आप कठोर भाषा बोलते हैं, उसकी खिल्ली उड़ाते हैं, उस पर व्यंग्य कसते हैं, उसको व्यर्थ में अपमानित करते हैं, उसे छोटा सिद्ध करने की कोशिश करते हैं, तो यह भी हिंसा है। यह वाणी के द्वारा की गई हिंसा है। इसी प्रकार से दूसरों के प्रति मन में बुरी भावना रखना, यह भी हिंसा है। यह मानसिक स्तर की हिंसा है। जैसे कि कोई व्यक्ति मन में ऐसा सोचे, कि हे भगवान! मेरे पड़ोसी की टांग टूट जाए। इस का मकान गिर जाए, इसके गोदाम में आग लग जाए, इसका बेटा दुर्घटना में मर जाए, यह व्यक्ति न्यायालय में मुकद्दमा हार जाए, इत्यादि। इस प्रकार का अनिष्ट चिंतन मानसिक हिंसा कहलाती है। तो यह तीन प्रकार की हिंसा हुई शारीरिक, वाचनिक और मानसिक।

इन तीनों प्रकार की हिंसा को न करना, किसी पर शरीर से अन्याय न करना, वाणी से भी निर्दोष को न डाँटना, मन में भी किसी का बुरा ना सोचना, यह पूर्ण अहिंसा कहलाती है। जो अहिंसा का पालन करता है, वह सदा प्रसन्न रहता है। उसे ईश्वर का आशीर्वाद मिलता है। हां, यदि कोई आपके ऊपर आक्रमण करे, तो आप अपनी रक्षा अवश्य करें। यदि आप अपनी रक्षा नहीं करते और व्यर्थ में दूसरों से पिटते रहते हैं, तो यह अहिंसा नहीं है।

स्वामी विवेकानंद

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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 31 Dec 2023

अनेक प्रकार के मन होते हैं। विचारने की शैली अनेक प्रकार की हुआ करती है विचारने के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हुआ करते हैं। अतएव हर एक दृष्टिकोण निर्दोष है, लोगों के मत के अनुकूल बनो। उनके मत को भी ध्यान तथा सहानुभूति पूर्वक देखो और उसका आदर करो। अपने अहंकार चक्र के क्षुद्र केन्द्र से बाहर निकलो और अपनी दृष्टि को विस्तृत करो। अपना मत सर्वग्राही और उदार बना सब के मत के लिए स्थान रखो। तभी आपका जीवन विस्तृत और हृदय उदार होगा। आपको धीरे-धीरे मधुर और नम्र होकर बातचीत करनी चाहिए। मितभाषी बनो।

अवाँछनीय विचारों और सम्वेदनाओं को निकाल दो। अभिमान या चिड़चिड़ेपन को लेश मात्र भी बाकी नहीं रहने दो। अपने आपको बिल्कुल भुला दो। अपने व्यक्तित्व का भी अंश या भाव न रहने पावे। सेवा कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है यदि आप में उपरोक्त सद्गुण मौजूद हैं तो आप संसार के लिये पथ प्रदर्शक और अमूल्य प्रसाद रूप हो। आप एक अलौकिक सुगन्धित पुष्प हो जिसकी सुगन्ध देश भर में व्याप्त हो जायेगी। आपने बुद्धत्व की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लिया।

नम्र, दयालु, उपकारी और सहायक बनो। यही नहीं कि कभी-कभी यथावकाश इन गुणों का उपयोग किया जावे बल्कि सर्व काल में आपके सारे जीवन में इन्हीं गुणों का अभ्यास होना चाहिये। एक भी शब्द ऐसा मत कहो जिससे दूसरों को ठेस पहुँचे। बोलने से पहले भली प्रकार विचार करो और देख लो कि जो कुछ आप कहने लगे हो वह दूसरों के चित्त को दुखी तो नहीं करेगा-क्या वह बुद्धिसंगत मधुर सत्य तथा प्रिय तो है। पहले से ही ध्यानपूर्वक समझ लो कि आपके विचार शब्दों और कार्यों का क्या प्रभाव होगा। प्रारम्भ में आप कई बार भले ही असफल हो सकते हो परंतु यदि आप अभ्यास करते रहे तो अंतः में आप अवश्य सफल हो जाओगे।
                                        
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 राजा बड़ा या संत

एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य ...