गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 April

🔴 वस्तुओं और व्यक्तियों में कोई आकर्षण नहीं है अपनी आत्मीयता जिस किसी से भी जुड़ जाती है वही प्रिय लगने लगती है यह तथ्य कितना स्पष्ट किन्तु कितना गुप्त है लोग अमुक व्यक्ति या अमुक वस्तु को रुचिर मधुर मानते हैं और उसे पाने लिपटाने के लिए आकुल व्याकुल रहते हैं। प्राप्त होने पर वह आकुलता जैसे ही घटती है वैसे ही वह आकर्षण तिरोहित हो जात ह। किसी कारण यदि ममत्व हट या घटा जाय तो वही वस्तुतः जो कल तक अत्यधिक प्रिय प्रतीत होती थी और जिसके बिना सब कुछ नीरस लगता था। बेकार और निकम्मी लगने लगेंगी वस्तु या व्यक्ति वही किन्तु प्रियता में आश्चर्यजनक परिवर्तन बहुधा होता रहता है। इसका कारण एक मात्र यही है कि उधर से ममता का आकर्षण कम हो गया।

🔵 हमारा अज्ञान ही है जो अकारण हर्षोन्मत्त एवं शोक आवेश के ज्वार भाटे में उछलता भटकाता रहता है। यदि मायाबद्ध अशुद्ध चिंतन से छुटकारा मिल जाय और सृष्टि के अनवरत जन्म बुद्धि विनाश के अनिवार्य क्रम को समझ लिया तो मनुष्य शान्त सन्तुलित स्थिर सन्तुष्ट एवं सुखी रह सकता है। ऐसी देवोपम मनोभूमि पल पल में पग पग में स्वर्गीय जीवन की सुखद संवेदनाएं सम्मुख प्रस्तुत किये रह सकती है। चिन्तन में बैठे अज्ञानी बालक के ज्वार से प्रसन्न और भाटा से अप्रसन्न होने की तरह हमें उद्विग्न बनाये रहता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

🔴 मुझे रास्ता मालूम है। वह तंग किन्तु सीधा है वह खांड़े की धार जैसा है। उस पर चलने में मुझे आनन्द आता है। जब फिसल जाता हूँ तो जी भरकर रोता हूँ। भगवान् का वचन है-कल्याण पथिक की दुर्गति नहीं होती। इस आश्वासन पर मुझे अटूट श्रद्धा है। इस श्रद्धा को गँवाऊँगा नहीं। जिस दिन काया पूर्णतः वश में आ जायगी उस दिन उस दिव्य ज्योति के दर्शन पाऊँगा, इस पर मेरा अविचल विश्वास है।

🌹 ~महात्मा गाँधी

👉 धैर्य से काम

🔶 बात उस समय की है जब महात्मा बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे। 🔷 एक ब...