रविवार, 3 सितंबर 2023

👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (भाग 3)

व्यक्तित्व क्या है- आस्था। मनुष्य क्या है- श्रद्धा। चेष्टाएँ क्या हैं- आकांक्षा की प्रतिध्वनि। गुण, कर्म स्वभाव अपने आप ने बनते हैं न बिगड़ते हैं। आस्थाएँ ही आदतें बनकर परिपक्व हो जाती हैं तो उन्हें स्वभाव कहते हैं। अभ्यासों को ही गुण कहते हैं। कर्म आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए शरीर और मन को संयुक्त रूप से जो श्रम करना पड़ता है, उसी को कर्म कहते हैं। इन तथ्यों को समझ लेने के उपरान्त यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्तित्व के स्तर और उसकी प्रतिक्रिया के रूप में आने वाले सुख-दुःखों की अनुभूति होती रहती है।

प्रसन्नता और उद्विग्नता को यों परिस्थितियों के उतार-चढ़ावों से जोड़ा जाता है, पर वस्तुतः वे मनःस्थिति के सुसंस्कृत और अनगढ़ होने के कारण सामान्य जीवन में नित्य ही आती रहने वाली घटनाओं से ही उत्पन्न अनुभूतियाँ भर होती हैं। कोई घटना न अपने आप में महत्वपूर्ण है और न महत्व हीन। यहाँ सब कुछ अपने ढर्रे पर लुढ़क रहा है। सर्दी-गर्मी की तरह भाव और अभाव का, जन्म-मरण और हानि-लाभ का क्रम चलता रहता है। हमारे चिन्तन का स्तर ही उनमें कभी प्रसन्नता अनुभव करता और कभी उद्विग्न हो उठता है। अनुभूतियों में परिस्थितियाँ नहीं, मनःस्थिति की भूमिका ही काम करती है।

जीवन के सफेद और काले पक्ष को समझ लेने के उपरान्त, सहज ही यह प्रश्न उठता है कि- क्या ऐसा सम्भव नहीं है कि परिस्थितियों के ढाँचे में ढले- लोक-प्रवाह में बहते हुए, संग्रहीत कुसंस्कारों से प्रेरित, वर्तमान अनगढ़ जीवन को; अपनी इच्छानुसार- अपने स्तर का फिर से गढ़ा जाय और प्रस्तुत निकृष्टता को उत्कृष्टता में बदल दिया? उत्तर ‘ना’ और ‘हाँ’ दोनों में दिया जा सकता है। ‘ना’ उस परिस्थिति में जब आन्तरिक परिवर्तन की उत्कट आकांक्षा का अभाव हो और उसके लिए आवश्यक साहस जुटाने की उमंगें उठती न हों। दूसरों की कृपा सहायता के बलबूते उज्ज्वल भविष्य के सपने तो देखे जा सकते हैं, पर वे पूरे कदाचित ही कभी किसी के होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


शनिवार, 2 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 2 Sep 2023

🔷 जब तक नारी वस्त्रों में, बनाव, शृंगार में, फैशन में, जेवर-आभूषणों में अपना व्यक्तित्व देखती रहेगी, पुरुषों के लिए कामिनी बनकर उनकी वासनाओं की तृप्ति के लिए ही अपना जीवन समझती रहेगी या खा-पीकर घर की चहारदीवारी में पड़े रहना ही अपना आदर्श समझेंगी, तब तक कोई भी शक्ति, नियम, कानून उसका उद्धार नहीं कर सकेंगे।

🔶 स्त्रियों में सभ्यता के नाम पर बढ़ता हुआ फैशन, बनाव, शृंगार, चमकीले, भड़कीले वस्त्र आदि गृहस्थ जीवन की स्थिति और मर्यादाओं पर बहुत बुरा प्रभाव डाल रहे हैं और इसके प्रभाव से समाज में अनेकों बुराइयाँ फैलती जा रही हंै। हालांकि सौन्दर्य, स्वास्थ्य, स्वच्छता, व्यवस्थित रहन-सहन के आवश्यक अंग हैं, किन्तु कृत्रिमता, बाह्य साधनों के प्रयोग से नित-नूतन मेकअप बनाना अस्वाभाविक और गलत रास्ता है। समाज में बढ़ते अनाचार, दुराचार के प्रोत्साहन में नारी के ये बनाव-शृंगार भी कम जिम्मेदार नहीं है।

🔷 परिवार बसा लेना आसान है, लोग आये दिन बसाते ही रहते हैं, उसका पालन भी कोई विशेष कठिन नहीं। सभी उसका पालन करते हैं, किन्तु परिवार को समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए उसका निर्माण करना एक श्रम साध्य कर्त्तव्य है। अधिकतर लोग परिजनों के लिए अधिकाधिक सुख-सुविधाएँ देने, उनके लिए अच्छा भोजन, वस्त्र तथा आराम की चीजें जुटाना ही पारिवारिक जीवन का उद्देश्य मान बैठे हैं। वे यह कभी नहीं सोच पाते कि भोजन, वस्त्र तथा शिक्षा, स्वास्थ्य के साथ परिवार की एक सर्वोपरि आवश्यकता भी है और वह है उसे सद्गुणी बनाना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (भाग 2)

वस्तुतः जीवन इतना तुच्छ, जटिल और घिनौना है नहीं। उसकी यथार्थता का मूल्यांकन करने के लिए थोड़ा गहराई में प्रवेश करना पड़ेगा। समुद्र की ऊपरी सतह पर तो कूड़ा-करकट, झागफेन, काई शैवाल लहरों की उठक-पटक के अतिरिक्त और कुछ नहीं पाया जा सकता। रत्न राशि तो समुद्र तल में पड़ी होती है। उसे पाने के लिए गहराई में उतरने वाले गोताखोरों जैसा कौशल और साहस सँजोना पड़ता है।

चेतना का स्थूल क्षेत्र पदार्थ- परिस्थिति और आतुरता भरी हलचलों में देखा जा सकता है। यह पशु जीवन है और प्रत्येक प्राणी को समान रूप से उपलब्ध है। जिसे जिस स्तर की काया मिली है वह उतने में ही अपने ढंग से रोता-गाता, गुजर कर लेता है। मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं है। क्रिया में दौड़-धूप की उत्तेजना भर है, नशे में भी उत्तेजना होती है और कई लोग उसे भी आनन्द और सन्तोष का माध्यम बना लेते हैं। समझना एक बात है और यथार्थता दूसरी। कुछ को कुछ भी समझा जा सकता है, पर उस भ्रान्ति से बनता तो कुछ नहीं। स्थिति तो स्थिति ही रहती है। आनन्द सूक्ष्म में है। क्रिया से नहीं विचारणा से हमारा समाधान होता है और भावना की गहराई में उतरने से आनन्द का निर्झर फूट पड़ता है। यदि समाधान- तृप्ति एवं सन्तोष अभीष्ट हो तो क्रियाशील रहते हुए भी हमें ज्ञानवान बनना पड़ेगा। ज्ञान का आश्रय लिए बिना, दिग्भ्रान्त स्थिति में आशंका और उद्विग्नता ही छाई रहेगी। शान्ति तो समाधान में है; वह समाधान सद्ज्ञान का आश्रय लिए बिना अन्य किसी आधार पर हो नहीं सकता।

🔷 क्रिया स्थूल है और ज्ञान सूक्ष्म। क्रिया तक सीमित न रहकर, तत्व चिन्तन की गहराई में उतरने के प्रयत्न में, हमें चैन और सन्तोष मिलता है। एक परत इससे भी गहरी है- जिसे अन्तरात्मा कहते हैं। यहाँ आस्थाएँ रहती हैं। अपने सम्बन्ध में, प्रिय और अप्रिय के, उचित और अनुचित के, आदतों और प्रचलनों के, पक्ष और सिद्धान्तों के सम्बन्ध में अनेकानेक मान्यताएँ; इसी केन्द्र में गहराई तक जड़ें जमाये बैठी रहती हैं। व्यक्तित्व का समूचा ढाँचा, यहीं विनिर्मित होता है। मस्तिष्क और शरीर को तो व्यर्थ ही दोष या श्रेय दिया जाता है। वे दोनों ही वफादार सेवक की तरह हर आत्मा की ड्यूटी ठीक तरह बजाते रहते हैं। उनमें अवज्ञा करने की कोई शक्ति नहीं। आस्थाएँ ही प्रेरणा देती हैं और उसी पैट्रोल से धकेले जाने पर जीवन स्कूटर के दोनों पहिये- चिन्तन और कर्तृत्व सरपट दौड़ने लगते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 3

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.3

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 1 Sep 2023

🔶 अपने उद्धार के लिए नारी को स्वयं भी जागरूक होना पड़ेगा। अपने आपको आत्मा, वह आत्मा जो पुरुषों में भी है समझना होगा। मातृत्व के महान् पद की प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित रखने के लिए उसे सीता, गौरी, मदालसा, देवी, दुर्गा, काली की सी शक्ति, क्षमता और कर्त्तव्य का उत्तरदायित्व ग्रहरण करना होगा। कामिनी, विलास की सामग्री  न बनकर अपने आपको आदर्श, पूजनीय गुणों का आधार बनाना होगा, तभी वह गिरी हुई अवस्था से उठ सकती है।

🔷 नारी का उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। पुरुष से भी अधिक कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। वह गृहिणी है, नियत्री है, अन्नपूर्णा है। नारी में ममतामयी माँ का अस्तित्व निहित है, तो नारी पुरुष की प्रगति, विकास की प्रेरणा स्रोत जाह्नवी है। नारी अनेकों परिवारों का संगम स्थल है। नारी मनुष्य की आदि गुरु है, निर्मात्री है, इसमें कोई संदेह नहीं कि मानव समाज में नारी का बहुत बड़ा स्थान है और नारी की उन्नत अथवा पतित स्थिति पर ही समाज का भी उत्थान-पतन निर्भर करता है।

🔶 शालीनता सादगी में ही निवास करती है। नारी जाति का गौरव सादगी, प्रकृत्त सौन्दर्य और लज्जायुक्त नम्रता में ही है और इसी से वह मानव जीवन में सत् तत्त्वों की प्रेरणा स्रोत देवी बन सकती है, पूज्य बन सकती है। मनुष्य की भावनाओं को पुरोगामी बना सकती है। वस्तुतः नारी का कार्य क्षेत्र घर है। इसी काम को नारियाँ भलीभाँति कर सकती है यह उनकी प्राकृतिक और स्वाभाविक जिम्मेदारी है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ (भाग 1)

ब्रह्म सूक्ष्म और प्रकृति स्थूल है। जीव सूक्ष्म और काया स्थूल है। चिन्तन को सूक्ष्म और क्रिया को स्थूल कहा जा सकता है। इस युग्म समन्वय से ही यौगिकों, रासायनिक पदार्थों, तत्वों एवं निर्जीव अणुओं से बने पदार्थों की शोभा-सुषमा दृष्टिगोचर होती। भौतिकी अत्यन्त कुरूप, कर्कश और निष्ठुर है, उसे जीवन्त बनाने का भार तो कला ही वहन करती है।

शरीर क्या? मल-मूत्र से भरा और हाड़-मांस से बना घिनौना किन्तु किन्तु चलता-फिरता पुतला। जीव क्या है- आपाधापी में निरत, दूसरों को नोंच खाने की कुटिलता में संलग्न- चेतना स्फुल्लिंग। जीवन क्या है- एक लदा हुआ भार जिसे कष्ट और खीज के साथ ज्यों-त्यों करके वहन करना पड़ता है। बुलबुले की तरह एक क्षण उठना और दूसरे क्षण समाप्त हो जाना यही है जीवन की विडम्बना; जिसे असन्तोष और उद्वेग की आग में जलते-बलते गले में बाँधे फिरना पड़ता है। स्थूल तक ही सीमित रहना हो तो इसी का नाम जीवन है पेट और प्रजनन ही इसका लक्ष्य है। लिप्सा और लोलुपता की खाज खुजाते रहना ही यहाँ प्रिय प्रसंग है।

आत्म-रक्षा, अहंता, मुक्ति की आतुरता, स्वामित्व की तृष्णा यही हैं वे सब मूल प्रवृत्तियाँ जिनसे बँधा हुआ प्राणी कीट-मरकट की तरह नाचता देखा जाता है। स्थूल जीवन को यदि देखना, परखना हो तो इन प्रपंचना प्रवंचना के अतिरिक्त यहाँ और कुछ दिखाई नहीं पड़ता। भूल-भुलैयों की उलझनें इतनी पेचीदा होती हैं कि उन्हें सुलझाने का जितना प्रयत्न किया जाता है उलटे उतनी ही कसती चली जाती है। रोते जन्म लेता है और रुलाते हुए विदा होता है- यही है वह सब जिसे हम जीवन के नाम से पुकारते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 3


गुरुवार, 31 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 31 Aug 2023

यदि नारी की क्षमता को जगाया जाय, उसे योग्य बनाने की ओर ध्यान दिया जाय तो न केवल हमारे परिवार में स्वर्गीय वातावरण की सृष्टि हो सकेगी, वरन् समाज के लिए भी कई दृष्टियों से लाभकर स्थिति बन सकती है। गृह-व्यवस्था को सँभालने के बाद उसके पास जो समय बचता है वह बाहरी प्रयोजनों में ही तो लगेगा और जाग्रत् शक्ति क्षमतावान् नारी अपनी योग्यता से समाज के लिए सुखद परिस्थितियाँ तथा प्रगतिशील वातावरण बना सकेगी।

परिवार निर्माण का परोक्ष अर्थ है-नारी जागरण। अर्द्ध मूर्छि, पददलित, आलस्य, प्रमाद और पिछड़ेपन से ग्रस्त नारी अपने लिए और परिवार के लिए भार ही रहती है। रोटी, कपड़ा, पाती और बदले में रसोईदारिन, चौकीदारिन, जननी, धात्री और चलती-फिरती गुड़िया की हलकी भारी भूमिका निभाती है। इस पिछड़ेपन के रहते वह परिवार निर्माण जैसे असाधारीण कार्य को संपन्न कैसे कर सकेगी। इसके लिए सूझबूझ, संतुलन, अनरवत प्रयास की आवश्यकता पड़ती है। योजना का स्वरूप, परिमाण एवं अवरोधों का समाधान भी उसके सामने आना चाहिए।

महिलाएँ शिक्षा प्राप्त करें, ज्ञानार्जन करें, विचारवान् बनें तभी तो उनसे यह आशा की जा सकती है कि वे परिवार में और समाज समें अपने उत्तरदायित्वों को भलीभाँति निबाह सकेंगी।  यदि इन आवश्यक तत्त्वों की ओर से ध्यान हटाकर आभूषण प्रियता की संकीर्ण विचारधारा को ही अपनाया जाता रहा तो कर्त्तव्य पालन में व्यवधान आना स्वाभाविक है। नारी के विकास में बाधा स्वरूप इस कुरीति के प्रति अब अरुचि उत्पन्न होनी चाहिए और विचारशील महिलाओं को इस दिशा में कुछ करने के लिए तत्पर होना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 30 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 30 Aug 2023

जिन लोगों को सामाजिक नव निर्माण की इच्छा है, उन्हें अपने परिवार में सादगी को सर्वप्रथम प्रतिष्ठित करना चाहिए। परिवार के सदस्यों को डण्डे और डाँट के बल पर नहीं, अपितु तथ्यों और सच्चाइयों से अवगत कराकर देश, समाज की वास्तविकताओं से परिचित कराकर सादगी भरे जीवनक्रम को अपनाने की प्रेरणा देनी चाहिए। प्रबुद्ध जनों का यही सर्वोपरि दायित्व है और ऐसा करना स्वयं अपना उदाहरण उपस्थित करके ही संभव है, मात्र उपदेश द्वारा नहीं।

जातीय पतन के दौर में उच्च आदर्शों को विकृत रूप दे दिया गया। समर्पण की व्याख्या स्वार्थी मनुष्यों ने इस प्रकार की कि भारतीय नारी के इस उच्च आदर्श को चरणदासी बनने के रूप में ढाल दिया, पर अब ऐसी धूर्ततापूर्ण चालबाजियों और शाब्दिक मायाजाल का युग नहीं रहा। अतः अब यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि पुरुष के प्रति नारी का समर्पण अंधा और अविवेकपूर्ण नहीं होना चाहिए। प्रत्येक पुरुष न तो ईश्वर है और न देवदूत। श्रेष्ठता के लिए उसे प्रयास करना होगा। समर्पण कोई विवेशता नहीं, व्यक्तित्व की उत्कृष्टता है। अतः वह पुरुष के लिए भी साध्य और इष्ट होनी चाहिए।

मांसलता के उभार-अश्लील अभि-व्यंजनाएँ और सम्मोहक विन्यास में ही नारी जीवन की कृतकृत्यता बताने वाला एक वातावरण मानव द्रोही बधिकों द्वारा तैयार किया जा रहा है। प्रत्यक्ष नारी निन्दा से उसे शिक्षा की अपात्र तथा अवगुणों की खान बताने से जब दानवी भोग-लालसा अधिक समय तक तृप्त होने की आशा नहीं रही तो पशुता की उसी पतित प्रवृत्ति ने नये पैतरे बदल लिए हैं। नारी देह के भोग्या स्वरूप की प्रतिष्ठा को ही नारी जीवन की सार्थकता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। जाग्रत् नारी को इस नये षड्यंत्र का निरीह शिकार बनना अस्वीकार करना होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परिवारिक संतुलन

कुटुम्ब में सब लोग एक प्रकृति के नहीं होते। जन्म-जन्मान्तरों से संग्रहीत उनके अपने स्वभाव-संस्कार होते हैं इसलिए अपनी रूचि के ढॉंचे में सबको मिट्टी के खिलौने की तरह नहीं ढाला जा सकता, अस्तु, बुद्धिमान लोग उस व्यक्ति को स्वीकार करते हैं जिससे अधिकाधिक सामंजस्य बना रहे। स्नेह-सदभाव और सहयोग की सौम्य-श्रृंखला में वे परस्पर बॅंधे-जकड़े रहें। अवांछनीय दोष-दुर्गुणों के निराकरण और सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन का उत्तरदायित्व चतुर लोग इस प्रकार निबाहते हैं कि साँप मरे न लाठी टूटे। सुधार की उग्रता इतनी न हो कि जिससे स्नेह-सद्भाव का धागा टूटने और दाने बिखरने की ही स्थिति बन जाय। उतनी उपेक्षा भी न बरती जाय कि हर कोई अनियन्त्रित होकर मनमानी करने लगे और परिवार-संस्था का उद्देश्य ही नष्ट हो जाय।

कुटुम्ब के छोटे समूह को स्नेहसिक्त, संतुलित, प्रगतिशील, और सुसंस्कारी बनाने के लिए मध्यमार्गी किन्तु आदर्शवादी विधि-व्यवस्था अपनानी पड़ती है। जो इस सन्तुलन का अभ्यस्त है उसे परिवार सुख की कमी नहीं रहती। भले ही सम्बद्ध व्यक्ति उतने सुसंस्कारी एवं सुविकसित नहीं भी हों।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.३५)


मंगलवार, 29 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 29 Aug 2023

स्त्रियों को स्वतंत्रता देने का अर्थ यह नहीं है कि उनको कुछ भी करते रहने की छूट मिले और उनके उचित-अनुचित कार्यों की कोई आलोचना या टिप्पणी न की जाय। यह व्यवस्था-मर्यादा तो पुरुष के लिए भी लागू है। कोई व्यक्ति यदि अनुचित कार्य करता है तो आलोचना और निन्दा-भर्त्सना उसकी भी होती है। स्त्रियों को स्वतंत्रता देने का अर्थ यह है कि उन्हें भी अपनी क्षमताओं के विकास की छूट  दी जाय तथा उन पर दासी-बाँदी जैसे बंधन न कसे जायँ।

आत्म विकास और पारिवारिक जीवन की सुख-शान्ति के लिए स्त्री की ही तरह पुरुष में चारित्रिक दृढ़ता की आवश्यकता है। प्रेम तथी स्थायी रह सकता है, जब दोनों का अंतःकरण शुद्ध हो और कोई भी नाटक न करता हो। घर में पत्नी से निष्ठा की आकांक्षा रखना और बाहर स्वेच्छाचार के फेर में रहना प्रेम को वास्तविक नहीं रहने दे सकता। जहाँ ऐसी दोहरी मानसिकता और बनावटीपन है, वहाँ आत्मीयता का सूत्र निश्चय ही खण्डित होता रहेगा।

वस्तुतः पति-पत्नी दो इकाई मिलकर एक सम्मिलित व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं और जीवन यात्रा का उत्तरदायित्व इस सामूहिक व्यक्तित्व पर ही निर्भर करता है। दोनों का एक-दूसरे के काम में सहयोग आवश्यक अनिवार्य है। पति-पत्नी के कार्यों का विभाजन, उसकी सीमा रेखा कभी निश्चित नहीं की जा सकती। दाम्पत्य जीवन का सार इसी में है कि एक दूसरे के कामों में मदद करें, योग दें, चाहे वह काम घर के अन्दर का हो या बाहर का।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 28 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 28 Aug 2023

🔷 आज भड़कीला शृंगार फैशन कहा जाता है और उसे कला, सुरुचि एवं सभ्यता का चिह्न कहकर पुकारा जाता है। कहा और माना जो कुछ भी जाय वास्तविकता ज्यों की त्यों रहेगी। हमारे उठती उम्र के बच्चे और बच्ची इस पतन पथ पर कदम न बढ़ाएँ इसका ख्याल रखा जाना चाहिए। उत्तेजक शृंगार की जड़ में वासना का विकार स्पष्ट है इससे देखने वालों के मन में विक्षोभ उत्पन्न होता है। इसलिए हम सफाई से रहें, स्वच्छता पसंद करें, सादगी से रहें और सभ्य वेशभूषा धारण करें।

🔶 वर्तमान परिस्थितियों में प्रजनन कर्म में प्रवृत्त होने से पूर्व हर विवेकशील नर-नारी को हजार बार विचार करना चाहिए कि क्या वह सचमुच समुन्नत स्तर की संतान का निर्माण करने की मनःस्थिति और परिस्थिति में है? यदि नहीं, तो बुद्धिमत्ता इसी में है कि अपनी आर्थिक जननी की शारीरिक स्थिति को, बच्चों के भविष्य और देश की प्रगति को बर्बादी से बचाने के लिए संतानोत्पादन पर विराम लगाकर ही रखा जाय।

🔷 आज उस समय की उन मान्यताओं का समर्थन नहीं किया जा सकता जिनमें संतान वालों को सौभाग्यवान और संतानरहित को अभागी कहा जाता था। आज तो ठीक उलटी परिभाषा करनी पड़ेगी। जो जितने अधिक बच्चे उत्पन्न् करता है, वह संसार में उतनी ही अधिक कठिनाई उत्पन्न करता है और समाज का उसी अनुपात से भार बढ़ाता है, जबकि करोड़ों लोगों को आधे पेट सोना पड़ता है, तब नई आबादी बढ़ाना उन विभूतियों के ग्रास छीनने वाली नई भीड़ खड़ी कर देना है। आज के स्थित में संतानोत्पादन को दूसरे शब्दों में समाज द्रोह का पाप कहा जाय तो तनिक भी अत्युक्ति नहीं होगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 धैर्य

मनु भगवान ने धर्म के दस लक्षणों का वर्णन करते हुए धृति (धैर्य) को पहला स्थान दिया है। वास्तव में धैर्य का स्थान जीवन में इतना ही ऊँचा है कि उसे प्रारम्भिक सद्गुण माना जाए। हर एक कार्य कुछ समय उपरान्त फल देता है, हथेली पर सरसों जमते नहीं देखी जाती, किसान खेत बोता है और फसल की प्रतीक्षा करता रहता है। यदि हम अधीर होकर बोये हुए दानों का फल उसी दिन लेना चाहे तो उसे निराश ही होना पड़ेगा।

लोग किसी कार्य को उत्साहपूर्वक आरम्भ कर हैं किन्तु फल की शीघ्रता के लिए इतने उतावले होते हैं कि थोड़े समय तक प्रतीक्षा करना या धैर्य धारण करना उन्हें सहन नहीं होता, फलस्वरूप निराश होकर वे उस काम को छोड़ देते हैं और दूसरा काम आरम्भ करते हैं, फिर वह दूसरा काम छोड़ना पड़ता है, इसी प्रकार अनेकों अधूरे कार्य छोड़ते जाते हैं, सफलता किसी में भी प्राप्त नहीं होती। असफलताओं की एक लम्बी सूची अपने साथ लिये फिरते हैं, अयोग्य और मूर्ख बनते हैं तथा लोक हँसाई कराते हैं। प्रतिभा, योग्यता, कार्यशीलता, बुद्धिमत्ता सभी कुछ उनमें होती है पर अधीरता और उतावलेपन का एक ही दोष उन सारे गुणों पर पानी फेर देता है।

धर्म का आरम्भिक लक्षण धैर्य है। हमें चाहिए कि किसी कार्य को खूब आगा-पीछा सोच-समझने के बाद आरम्भ करें किन्तु जब आरम्भ कर दें तो दृढ़ता और धैर्य के साथ उसे पूरा करने में लगे रहें। विषम कठिनाइयाँ, असफलताएं, हानियाँ प्रायः हर एक अच्छे कार्य के आरम्भ में आती देखी गई हैं पर यह बात भी निश्चय है कि कोई व्यक्ति शान्त चित्त से उस मार्ग पर डटा रहे तो एक दिन पथ के वे काँटे फूल बन जाते हैं और सफलता प्राप्त होकर रहती है।

📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 9

रविवार, 27 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 27 Aug 2023

आज दहेज का असुर भाषण-लेखों और प्रस्तावों की मार खाकर भी दहेज का असुर मरता नहीं। रक्तबीज की तरह वह चोट खाकर और भी अधिक विकराल बनता चला जा रहा है। इसका अंत ऐसे होगा कि युग निर्माण योजना के सदस्य बच्चे यह प्रतिज्ञा करेंगे कि वे विचारशील साथी से ही विवह करेंगे। दहेज और विवाहोन्माद में होने वाले भारी अपव्यय को हटाकर बिना खर्च की विधि से विवाह करेंगे। यदि अभिभावक इस निश्चय को मान्यता न देंगे तो वे आजीवन कुमार या कुमारी ही रहकर पवित्र जीवन व्यतीत करेंगे।

हम गायत्री उपासक भगवान् की सर्वश्रेष्ठ सजीव प्रतिमा नारी के रूप में ही मानते हैं। नारी में भगवान् की अनन्त करुणा, पवित्रता और सदाशयता का दर्शन करना हमारी भक्ति-भावना का दार्शनिक आधार है। उपासना में ही नहीं, व्यावहारिक जीवन में भी हमारा दृष्टिकाण यही रहना चाहिए। नारी मात्र को हम पवित्र दृष्टि से देखें, वासना की दृष्टि से न उसे सोचें, न उसे देखें और न उसे छुएँ।

नारी को वासना के उद्देश्य से सोचना या देखना उसकी महानता का वैसा ही तिरस्कार करना है जैसे किसी देव मंदिर की प्रतिमा को चुराकर पत्थर को अपनी किसी आवश्यकता को पूर्ण करने के उद्देश्य से देखना। यह दृष्टि जितनी निन्दनीय और घृणित है उतनी ही हानिकारक और विग्रह उत्पन्न करने वाली भी। हमें उस स्थिति को अपने भीतर से और सारे समाज से हटाना होगा और नारी को उस स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित करना होगा। जिस की एक दृष्टि मात्र से मानव प्राणी धन्य होता रहा है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 26 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 26 Aug 2023

🔶 परमार्थ के लिए स्वार्थ को छोड़ना आवश्यक है। आत्म-कल्याण के लिए भौतिक  श्री-समृद्धि की कामनाओं से मुँह मोड़ना पड़ता है। दोनों हाथ लड्डू मिलने वाली उक्ति उस क्षेत्र में चरितार्थ नहीं हो सकती। उन बाल बुद्धि लोगों से हमें कुछ नहीं कहना जो थोड़ा सा पूजा-पाठ करके विपुल सुख-साधन और स्वर्ग-मुक्ति दोनों ही पाने की कल्पनाएँ करते रहते हैं।

🔷 साधु-ब्राह्मणों का यह एक परम पवित्र कर्त्तव्य है कि इस समय जिस धर्म के आश्रय में वे अपनी आजीविका चलाते हैं और पूजा-सम्मान प्राप्त करते हैं उस धर्म रक्षा के लिए उन्हें कुछ काम भी करना चाहिए-कष्ट भी उठाना चाहिए। आज जबकि धर्म संकट में है, देश की सुरक्षा एवं प्रगति का प्रश्न है तब तो उन्हें उन आदर्शों को परिपुष्ट करने के लिए अपना समय लगाना ही चाहिए। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी दक्षिणा बटोरने और पैर पुजाने का ही धंधा करते रहे, कर्त्तव्य की तिलांजलि दिये बैठे रहे तो आगामी पीढ़ियँ उन्हें क्षमा न करेंगी।

🔶 ईश्वर और धर्म की मान्यताएँ केवल इसीलिए है कि इन आस्थाओं को हृदयंगम करने वाला व्यक्ति निजी जीवन में सदाचारी और सामाजिक जीवन में परमार्थी बने। यदि यह दोनों प्रयोजन सिद्ध न होते हों-इन दोनों कसौटियों पर वास्तविकता सिद्ध न होती हो तो यही कहना पड़ेगा कि यह तथाकथित ईश्वर भक्ति और धर्मात्मापन दम्भ मात्र था।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "विचार कर के देखें"

एक व्यक्ति को रास्ते में यमराज मिल गये वो व्यक्ति उन्हें पहचान नहीं सका। यमराज ने पीने के लिए पानी मांगा उस व्यक्ति ने उन्हें पानी पिलाया। पानी पीने के बाद यमराज ने बताया कि वो उसके प्राण लेने आये हैं लेकिन चूँकि तुमने मेरी प्यास बुझाई है इसलिए मैं तुम्हें अपनी किस्मत बदलने का एक मौका देता हूँ।

यह कहकर यमराज ने उसे एक डायरी देकर कहा तुम्हारे पास 5 मिनट का समय है इसमें तुम जो भी लिखोगे वही होगा लेकिन ध्यान रहे केवल 5 मिनट। उस व्यक्ति ने डायरी खोलकर देखा तो पहले पेज पर लिखा था कि उसके पड़ोसी की लाॅटरी निकलने वाली है और वह करोड़पति बनने वाला है। उसने वहाँ लिख दिया कि पड़ोसी की लाॅटरी ना निकले।

अगले पेज पर लिखा था उसका एक दोस्त चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाला है उसने लिख दिया कि वह चुनाव हार जाये। इसी तरह वह पेज पलटता रहा और अंत में उसे अपना पेज दिखाई दिया। जैसे ही उसने कुछ लिखने के लिए अपना पैन उठाया यमराज ने उसके हाथों से डायरी ले ली और कहा वत्स तुम्हारा 5 मिनट का समय पूरा हुआ अब कुछ नहीं हो सकता।

तुमने अपना पूरा समय दूसरों का बुरा करने में निकाल दिया और अपना जीवन खतरे में डाल दिया अतः तुम्हारा अन्त निश्चित है। यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत पछताया लेकिन सुनहरा समय निकल चुका था।

यदि ईश्वर ने आपको कोई शक्ति प्रदान की है तो कभी किसी का बुरा न सोचो न करो। दूसरों का भला करने वाला सदा सुखी रहता है और ईश्वर की कृपा सदा उस पर बनी रहती है।

प्रण लें आज से हम किसी का बुरा नहीं करेंगे।

गुरुवार, 24 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 24 Aug 2023

मनुष्य शरीर में प्रसुप्त देवत्व का जागरण करना ही आज की सबसे बड़ी ईश्वर पूजा है। युगधर्म इसी के लिए प्रबुद्ध आत्माओं का आवाहन कर रहा है। नवयुग निर्माण की आधारशिला यही है। जिस असुरता की दुष्प्रवृत्तियों ने संसार को दुःख दारिद्रय भरा नरक बनाया, जिस अविवेक ने परमात्मा के पुत्र आत्मा को निकृष्टतम कीड़े से गये गुजरे स्तर पर ला पटका, उसका उन्मूलन देवत्व के अभिवर्धन से ही होना है। अंधकार को मिटाने के लिए प्रकाश उत्पन्न करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।

देवत्व का जागरण एवं पोषण करने की तैयारी ही वह प्रयत्न है जिसके फलस्वरूप वर्तमान असुर अंधकार का निराकरण होगा। परिपुष्ट देवत्व से वह व्यापक प्रभाव उत्पन्न होगा जिससे प्रभावित होकर लोग पशुता और पिशाच वृत्ति का दुष्परिणाम समझ सकने योग्य विवेक एवं उन दुष्प्रवृत्तियों को त्याग सकने योग्य साहस कर सकें।

आशा करनी चाहिए कि वह दिन हम लोग अपनी इन्हीं आँखों से इसी जीवन में देखेंगे, जबकि अगणित देव प्रवृत्ति के व्यक्ति अपने-अपने स्वार्थों को तिलांजलि देकर विश्व के नवनिर्माण में ऐतिहासिक महापुरुषों की तरह प्रवृत्त होंगे और इन दिनों जिस पशुता एवं पैशाचिक प्रवृत्ति ने लोकमानस पर अपनी काली चादर बिछा रखी है उसे तिरोहित करेंगे। अनाचार का अंत होगा और हर व्यक्ति अपने चारों ओर प्रेम, सौजन्य, सद्भाव, न्याय, उल्लास, सुविधा एवं सज्जनता से भरा सुख-शान्तिपूर्ण वातावरण अनुभव करेगा। उस शुभ दिन को लाने का उत्तरदायित्व देव वर्ग का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 22 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 22 Aug 2023

🔶 जीवन जीने की कला, संसार में दृष्टिगोचर होने वाली कलाओं में सर्वश्रेष्ठ है। जिसको सही रीति से जिन्दगी जीना आ गया उसे अत्यन्त उच्चकोटि का कलाकार कहना चाहिए। वह दूसरों को प्रभावित, आकर्षित करने से लेकर अन्तःकरण को प्रमुदित करने तक के उन समस्त लाभों को कहीं अधिक मात्रा में प्राप्त करता है जो भौतिक विशेषताओं से सम्पन्न कलाकारों में से किसी-किसी को कभी-कभी या कठिनाई से ही उपलब्ध होते हैं।

🔷 बालकों जैसा स्वच्छ हृदय छल, कपट से सर्वथा रिक्त सरल व्यवहार सौम्य सादगी से भरी सरलता-विनम्र सज्जनता-निर्दोष क्रिया-कलाप-मधुरता और ममता से भरे वचन व्यवहार किसी भी व्यक्तित्व को इतना सुकोमल बना देते हैं कि उसका आन्तरिक सौंदर्य देखते-देखते दर्शकों की आंखें ही तृप्त नहीं ऐसे पारिजात पुष्प पर न जाने कितने मधु लोलुप कीट-पतंग मंडराते रहते हैं और उसके पराग से लाभान्वित होकर धन्य बनते रहते हैं।

🔶 संयम की शोभा देखते ही बनती है। इन्द्रिय संयम की महिमा पर जिसे विश्वास है, उसकी आँखों का तेज, वाणी का प्रभाव, चेहरे का ओज, संपर्क में आने वालों को सहज ही प्रभावित करेगा। बुद्धि की प्रखरता और विवेकशील दूरदर्शिता की कमी न रहेगी। वासना और तृष्णा पर नियंत्रण करने वाला व्यक्ति सहज ही इतने साधन और अवसर प्राप्त कर लेता है जिससे महानता के उच्च-शिखर पर चढ़ सकना तनिक भी कष्टकर न रहकर अत्यन्त सरल बन जाय। ऐसे लोग शरीर और मन के दोनों ही क्षेत्रों में समुचित समर्थता से सम्पन्न रहते हैं। न तो वे रुग्ण रहते हैं और न दीन दुर्बल। उन्हें कभी भी कातर स्थिति में नहीं देखा जा सकता है। विपत्तियाँ भी उनके धैर्य और साहस को चुनौती नहीं दे सकतीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रतिकूल परिस्थिति में विचलित न हों

हमें चाहिए कि हम अपने आप को परिस्थितियों के अनुरूप ढालें और जिस परिस्थिति में हों, उससे असंतोष या घृणा न प्रकट करें। दिन कभी एक से नहीं रहते। हमें चाहिए कि हम दु:ख के विषम पथ पर धैर्य न खो बैठें। प्रत्येक परिस्थिति की अपनी-अपनी हानि होती है और अपना-अपना लाभ। संसार की कोई भी ऐसी परिस्थिति नहीं, जिसका कुछ-न-कुछ लाभ न हो।

हमें लाभ की ओर ही ध्यान देना चाहिए। जिन मजदूरों को मिट्ïटी में कार्य करना पड़ता है, स्वास्थ्य भी तो उन्हीं का बढ़ता है। ज्ञान तो केवल यही है कि हमें प्रतिकूल परिस्थिति में हिम्मत नहीं खो बैठना चाहिए और जब हम देखें कि परिस्थिति में तब्दीली आती ही नहीं, तो हमें उस परिस्थिति से संतोष करना चाहिए। नीच वह नहीं, जिसका कार्य आप नीच बतलाते हैं, बल्कि नीच वह है जो अपने कार्य में, चाहे वह कार्य कितना ही छोटा हो, दिलचस्पी नहीं लेता और केवल काम चलाऊ काम करता है। इस जिंदगी में कभी पक्की सडक़ें आती है और कभी कच्ची।

हमें दोनों प्रकार की सडक़ों को अपनाना है, सहर्ष और एक जैसे उत्साह से। कभी फूलों के बिछौने पर सोना है, तो कभी कंटकों की सेज भी अपनानी है। शांति प्राप्त करने का यही प्रथम साधन है कि हम अपने को प्रतिकूल परिस्थिति में विचलित न होने दें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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