सोमवार, 16 जनवरी 2017

👉 धैर्य

🔵 मनु भगवान ने धर्म के दस लक्षणों का वर्णन करते हुए धृति (धैर्य) को पहला स्थान दिया है। वास्तव में धैर्य का स्थान जीवन में इतना ही ऊँचा है कि उसे प्रारम्भिक सद्गुण माना जाए। हर एक कार्य कुछ समय उपरान्त फल देता है, हथेली पर सरसों जमते नहीं देखी जाती, किसान खेत बोता है और फसल की प्रतीक्षा करता रहता है। यदि हम अधीर होकर बोये हुए दानों का फल उसी दिन लेना चाहे तो उसे निराश ही होना पड़ेगा।

🔴 लोग किसी कार्य को उत्साहपूर्वक आरम्भ कर हैं किन्तु फल की शीघ्रता के लिए इतने उतावले होते हैं कि थोड़े समय तक प्रतीक्षा करना या धैर्य धारण करना उन्हें सहन नहीं होता, फलस्वरूप निराश होकर वे उस काम को छोड़ देते हैं और दूसरा काम आरम्भ करते हैं, फिर वह दूसरा काम छोड़ना पड़ता है, इसी प्रकार अनेकों अधूरे कार्य छोड़ते जाते हैं, सफलता किसी में भी प्राप्त नहीं होती। असफलताओं की एक लम्बी सूची अपने साथ लिये फिरते हैं, अयोग्य और मूर्ख बनते हैं तथा लोक हँसाई कराते हैं। प्रतिभा, योग्यता, कार्यशीलता, बुद्धिमत्ता सभी कुछ उनमें होती है पर अधीरता और उतावलेपन का एक ही दोष उन सारे गुणों पर पानी फेर देता है।

🔵 धर्म का आरम्भिक लक्षण धैर्य है। हमें चाहिए कि किसी कार्य को खूब आगा-पीछा सोच-समझने के बाद आरम्भ करें किन्तु जब आरम्भ कर दें तो दृढ़ता और धैर्य के साथ उसे पूरा करने में लगे रहें। विषम कठिनाइयाँ, असफलताएं, हानियाँ प्रायः हर एक अच्छे कार्य के आरम्भ में आती देखी गई हैं पर यह बात भी निश्चय है कि कोई व्यक्ति शान्त चित्त से उस मार्ग पर डटा रहे तो एक दिन पथ के वे काँटे फूल बन जाते हैं और सफलता प्राप्त होकर रहती है।

🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 9

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें