गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 Feb 2017

🔵 अपने उद्धार के लिए नारी को स्वयं भी जागरूक होना पड़ेगा। अपने आपको आत्मा, वह आत्मा जो पुरुषों में भी है समझना होगा। मातृत्व के महान् पद की प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित रखने के लिए उसे सीता, गौरी, मदालसा, देवी, दुर्गा, काली की सी शक्ति, क्षमता और कर्त्तव्य का उत्तरदायित्व ग्रहरण करना होगा। कामिनी, विलास की सामग्री  न बनकर अपने आपको आदर्श, पूजनीय गुणों का आधार बनाना होगा, तभी वह गिरी हुई अवस्था से उठ सकती है।

🔴 नारी का उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। पुरुष से भी अधिक कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। वह गृहिणी है, नियत्री है, अन्नपूर्णा है। नारी में ममतामयी माँ का अस्तित्व निहित है, तो नारी पुरुष की प्रगति, विकास की प्रेरणा स्रोत जाह्नवी है। नारी अनेकों परिवारों का संगम स्थल है। नारी मनुष्य की आदि गुरु है, निर्मात्री है, इसमें कोई संदेह नहीं कि मानव समाज में नारी का बहुत बड़ा स्थान है और नारी की उन्नत अथवा पतित स्थिति पर ही समाज का भी उत्थान-पतन निर्भर करता है।

🔵 शालीनता सादगी में ही निवास करती है। नारी जाति का गौरव सादगी, प्रकृत्त सौन्दर्य और लज्जायुक्त नम्रता में ही है और इसी से वह मानव जीवन में सत् तत्त्वों की प्रेरणा स्रोत देवी बन सकती है, पूज्य बन सकती है। मनुष्य की भावनाओं को पुरोगामी बना सकती है। वस्तुतः नारी का कार्य क्षेत्र घर है। इसी काम को नारियाँ भलीभाँति कर सकती है यह उनकी प्राकृतिक और स्वाभाविक जिम्मेदारी है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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