मंगलवार, 15 अगस्त 2023

👉 जिन्दगी जीने की समस्या (भाग 1)

जिन्दगी जीना भी एक महत्वपूर्ण विद्या हैं। इसके अभाव में असंख्य लोग रोते-झींकते मौत के दिन तो पूरे कर लेते है पर वह लाभ प्राप्त नहीं कर पाते जिसके लिए यह बहुमूल्य जीवन उपलब्ध हुआ है।

अनाड़ी ड्राइवर के हाथ में कीमती मोटर दे दी जाय तो उसकी दुर्गति ही होगी। जिन्दगी एक मोटर है, उसे ठीक प्रकार चलाने के लिए उसका चलाना जानना आवश्यक है। संसार में जितने भी महत्वपूर्ण कार्य है उन्हें आरम्भ करने से पूर्व तत्सम्बन्धी ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। कारखानों में, उद्योगों में, सरकारी नौकरियों में हर जगह ट्रेन्ड आदमियों की ही नियुक्ति होती है। खेद है कि जिन्दगी जीने जैसे महान उत्तरदायित्व को हाथ में लेने वाले उस की ट्रेनिंग आवश्यक नहीं समझते।

हम सब किसी प्रकार जिन्दगी काटते तो है पर उसमें अव्यवस्था ही भरी होती है। कहते है कि बेताल नाम का पिशाच अपने बालों को बुरी तरह बिखेरे रहता है जिससे उसकी भयंकरता और भी बढ़ जाती है। बहुधा हमारा जीवन क्रम भी बेताल के बालों की तरह फूहड़पन के साथ अस्त-व्यस्त तथा बिखरा होता है। फलस्वरूप न जीने वाले को आनन्द आता है और न उससे संबंधित लोगों को कोई प्रसन्नता होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति,  जून 1961 पृष्ठ 5


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सोमवार, 14 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 14 Aug 2023

प्रतिकूलता से जूझे बिना जीवन के शस्त्र पर धार नहीं धरी जा सकती, चमक और पैनापन लाने के लिए उसे पत्थर पर घिसा ही जाता है। मनुष्य समर्थ, सबल और प्रखर बना रहे इसके लिए संघर्षरत रखने की सारी व्यवस्था प्रकृति ने कर रखी है। इसी व्यवस्था क्रम में एक भयंकर लगने वाली रोग कीटाणु संरचना भी है जो जीवन को मृत्यु में बदलने के लिए निरन्तर चुनौती देती रहती है।

मरण से भयभीत होकर आतुर लोग ऐसा सोचते हैं कि इन्हीं क्षणों जितना अधिक आनन्द उठा लिया जाय उतना ही उत्तम है। वे इन्द्रिय लिप्सा एवं मनोविनोद के लिए अधिकाधिक साधन जुटाते हैं और उसके लिए जो भी उचित-अनुचित करना पड़े उसे करने में नहीं चूकते। यह उपभोग की आतुरता कई बार तो इतनी बढ़ी-चढ़ी ओर इतनी अदूरदर्शी होती है कि उपभोग का आरम्भ होते-होते विपत्ति का वज्र सिर पर टूट पड़ता है। अपराधियों और कुकर्मियों की दुर्गति होती आये दिन देखी जाती है।

जब तक जीना तब तक मौज से जीना-ऋण करके मद्य पीने वाली नास्तिकतावादी नीति मरण की भयंकरता के अनुरूप जीवन को भी भयानक बना लेने की मूर्खता करना है। असीम उपभोग चाहा गया और अप्रत्याशित संकट उभरा यह कहाँ की समझदारी हुई। उच्छृंखल भोगलिप्सा मन में उठने से लेकर तृप्ति का अवसर आने तक हर घड़ी आशंका, व्यग्रता, जुगुप्सा, चिन्ता की इतनी भयानकता अपने साथ जुड़ी रखती है कि उपभोग की तृप्ति बहुत भारी पड़ती है। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शनिवार, 12 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 12 Aug 2023

मुद्दतों को देव परम्पराएँ अवरुद्ध हुई पड़ी हैं। अब हमें अपना सारा साहस समेटकर तृष्णा और वासना के कीचड़ से बाहर निकलना होगा और वाचालता एवं विडम्बना से नहीं, अपनी कृतियों से अपनी उत्कृष्टता का प्रमाण देना होगा। हमारा उदाहरण ही दूसरे अनेक लोगों को अनुकरण का साहस प्रदान करेगा। वाणी और लेखनी के माध्यम से लोगों को किसी बात की-अध्यात्मवाद की भी जानकारी कराई जा सकती है इससे अधिक भाषणों का कोई उपयोग नहीं। दूसरों को यदि कुछ सिखाना हो तो उसका एकमात्र तरीका अपना उदाहरण प्रस्तुत करना है।

नर पशुओं और नर पिशाचों का बाहुल्य जब कभी भी संसार में होगा तो विपत्तियाँ आयेंगी और अगणित प्रकार की विभीषिकाएँ उत्पन्न होगी। यह अभिवृद्धि जब चिन्ताजनक स्तर तक पहुँच जाती है तो ईश्वर की इस परम प्रिय सृष्टि के लिए सर्वनाश का खतरा उत्पन्न हो जाता है। इसी को बचाने के लिए उन्हें हस्तक्षेप करना पड़ता है, अवतार लेना पड़ता है।

अगले दिनों देवासुर संग्राम होने वाला है उसमें मनुष्य और मनुष्य आपस में नहीं लड़ेंगे, वरन् आसुरी और दैवी प्रवृत्तियों में जमकर अपने -अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष होगा। असुरता अपने पैर जमाये रहने के लिए देवत्व अपनी स्वर्ग संभावनाएँ चरितार्थ करने के लिए भरसक चेष्टा करेंगे। इस विचार संघर्ष में देवत्व के विजयी हो जाने पर वे परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी जिनमें हर व्यक्ति को उचित न्याय, स्वातन्त्र्य, उल्लास, साधन और संतोष मिल सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 पिशाच प्रेमी या पागल (भाग 1)

देखते हैं कि आजकल गली कूचों में प्रेम की आँधी सी आई हुई है। मुहब्बत के तूफान उड़ रहे हैं। सिनेमाबाज, मनचले, शौकीन फिल्म अभिनेत्रियों से प्रेम करते हैं, उनकी तस्वीरों को आँखों में छिपाये फिरते हैं। सूरत मन में बसी हुई है, उनके हाव-भाव और भाव-भंगी का ऐसा स्मरण करते रहते हैं मानो ये ही इनकी उपास्य देवता हैं। “प्रेम का घर हो प्रेम की छत हो” के गीत उनकी जबान पर गुनगुनाते रहते हैं, उन्हीं की प्रतिध्वनि उनके कानों में गूँजती रहती है।

देखते हैं कि गलियों में कमर लचकाकर चलने वाले छैल चिकनियाँ पराई बहिन-बेटियों पर कुदृष्टि डालते हैं। उन्हें बहकाकर पाप पंक में घसीटने का प्रयत्न करते हैं, मौका लगे तो उनका धन, धर्म ले भागते हैं। कलेजा थामे फिरते हैं, कोई नयन बाण से बिधा हुआ बनता है, किसी को इश्क का ज्वर है, किसी को मुहब्बत मर्ज। बुलबुल के तराने, सैयाद कफस, शमा, परवाना, कातिल, शमशीर दिल, छुरी और न जाने क्या-क्या उन्हें याद आता है। वेश्याओं के उपासक, दुराचारिणी स्त्रियों के गुलाम, यह रंगीले मनचले इधर से उधर मटर-गश्ती करते हैं और अपने को प्रेमी बताते हैं।

देखते हैं कि घासलेटी कथाकार, आशिक माशूकी के अफसाने कहने वाले, लैला मजनू के नवीन संस्करण तैयार करते हैं। भोगेच्छा को अनियंत्रित रूप से भड़काने के लिए प्रेम को बन्धन रहित बताते हैं। “काबू में जिसका दिल न हो-वह गरीब क्या करे?” का नारा इसलिए लगाया जाता है कि इनकी शोहदाई को छूट मिल जाय, दुनिया इन्हें निर्दोष समझे। चार मनचले मिले कि गन्दी-गन्दी चर्चा चली, खूबसूरत औरतों की चर्चा, अपने कुकर्मों का बढ़ा-चढ़ा वर्णन, इन्द्रिय सुख की अनर्गल कल्पनाएं करने वाले अपने को प्रेमी मानते हैं।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1942 पृष्ठ 11

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शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 11 Aug 2023

इतिहास अपनी पुनरावृत्ति कर रहा है। अपना परिवार एक ईश्वरीय महान् प्रयोजन की पूर्ति में सहायक बनने के लिए पुनः इकट्ठा हुआ है। अच्छा हो हम अपने को पहचानें और अतीत काल की सूखी स्मृतियों को फिर हरी कर लें। निश्चित रूप से हम एक अत्यन्त घनिष्ठ और निकटवर्ती आत्मीय परिवार के चिर आत्म्ीय सदस्य रहते चले आ रहे हैं।

ध्वसं एक आपत्ति धर्म है और सृजन सनातन प्रक्रिया। इसलिए ध्वंस को रूकना पड़ता है, थककर लेट जाना और सो जाना पड़ता है। तब सृजन को दुहरा काम करना पड़ता है। एक तो स्वाभाविक सृष्टि संचालन की रचनात्मक प्रक्रिया का संचालन और दूसरे ध्वंस के कारण हुई विशेष क्षति की विशेष पूर्ति का आयोजन।

जिसके भीतर जितनी ईश्वरीय प्रयोजनों में सहयोगी बनने की तड़फन है, वह उतना ही दिव्य आत्मा है। तड़फन पानी के स्रोतों की तरह है जो पहाड़ जैसी कठोरता को चीरकर बाहर निकल आती है। साधारण परिस्थिति के लोग भी उपयुग अवसर पर अपनी तड़फन क्रियान्वित करने का साहस कर बैठते हैं तब वह साहस ही ईश्वरीय अवतरण के रूप में उन्हें सूर्य-चंद्रमा की तरह चमका देता है। तड़फन का फूट पड़ना इसी का नाम अवतरण है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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गुरुवार, 10 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 10 Aug 2023

जमाना खराब है, लोग बुरे हैं, कोई हमारी सुनता नहीं आदि शब्दों के पीछे कार्यकर्त्ता की निराशा, उदासीनता और लगन की कमी की ही झाँकी मिलती है। लगनशील व्यक्ति हर स्थिति में हर काम कर सकता है। बातों का युग अब बहुत पीछे रह गया। अब कार्य से किसी व्यक्ति के झूठे या सच्चे होने की परख की जाएगी।

सद्विचार निर्माण के लिए यदि संसार का सारा धन खर्च हो जाये या सारा समय लग जाये तो भी उसे कुछ घाटे की बात नहीं माननी चाहिए। वर्तमान विचार क्रान्ति महाकाल का तीसरा नेत्र ही है। जो प्रचण्ड दावानल का रूप धारण कर अज्ञान युग की सारी विडम्बनाओं को भस्मसात कर स्वस्थ और स्वच्छ दृष्टिकोण प्रदान करेगी। इन उपलब्धियों के बाद विश्व शान्ति के मार्ग में कोई कठिनाई शेष न रह जायेगी।

अपने परिवार में एक से एक बढ़कर उत्कृष्ट स्तर की आत्माएँ इन दिनों मौजूद हैं। वे जन्मी भी इसी प्रयोजन के लिए हैं। ऐसे महान् अवसरों पर उत्कृष्टता संपन्न सुसंस्कारी आत्माएँ ही बड़ी भूमिकाएँ प्रस्तुत करने का साहस करती हैँ। हममें से अनेकों परिजन अभी अपनी ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करने की बात सोच रहे हैं। कई उसके लिए कदम बढ़ा रहे हैं, कई दुस्साहसपूर्वक अग्रगामी होने की स्थिति को छू रहे हैं यह शुभ लक्षण है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दुःखों का स्वागत कीजिये।

दुःख से लोग बहुत डरते हैं और चाहते है कि वह न आवे, फिर भी न चाहते हुए भी वह आ ही जाता है, इसमें महान ईश्वरीय प्रयोजन है। मनुष्य के अहंकार और दुर्भावों का शमन शोधन करने के लिए दुःख का आगमन ऐसी रामबाण औषधि की तरह साबित होता है जो पीने में कड़वी होते हुए भी व्याधि का नाश कर डालती है। जब नाना प्रकार की यंत्रणाएं, घोर दुःख, संकटों का अपार समूह उमड़ता चला आता है और बाहुबल कुछ काम नहीं करता, शक्तियाँ असमर्थ हो जाती हैं, तब मनुष्य सोचता है कि मुझसे भी ऊँची कोई शक्ति मौजूद है और उस शक्ति का विधान इतना प्रबल है जिसे मैं तोड़ नहीं सकता।

नास्तिकता से आस्तिकता की ओर, अधर्म से धर्म की ओर, अहंकार से नम्रता की ओर ले चलने की क्षमता दुःखों में है। जो मनुष्य हजार उपदेशों से भी कुपथ पर चलने से बाज नहीं आते थे वे विपत्ति की एक करारी ठोकर खाकर तिलमिला गये और ठीक रास्ते पर आ गये। विपत्ति में ईश्वर का स्मरण आता है और अधर्म के दुखद परिणामों को देखकर सुपथ पर चलने की इच्छा होती है। कष्टों की खराद पर घिसे जाने के उपरान्त मनुष्य की बुद्धि, सावधानी, क्रियाशीलता सभी तेज हो जाती हैं। संसार में जितने महापुरुष हुए हैं, वे विपत्तियों की खराद पर खूब रगड़-रगड़ कर घिसे गये हैं तब उनका उज्ज्वल स्वरूप दुनिया को दिखाई पड़ा हैं।

विपत्ति से डरने की कोई बात नहीं है, कष्टों में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जो अन्ततः हानिकर सिद्ध हो। एक पहुँचे हुए ईश्वर भक्त का कहना है कि “ईश्वर जिसे अपनी शरण में लेना चाहते हैं उसके पास दुख भेजते हैं ताकि वह मोह को छोड़कर प्रेम के, भक्ति के मार्ग पर पदार्पण करे।”

अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 13



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बुधवार, 9 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 9 Aug 2023

धर्मक्षेत्र को आज हेय इसलिए समझा जाता है कि उसमें ओछे और अवांछनीय व्यक्तित्व भरे पड़े हैं। उन्होंने धर्म को बदनाम कियाहै। इतनी उपयोगी एवं उत्कृष्ट आस्था के प्रति लोगों को नाक-भों सिकोड़ने पड़ रहे हैं। इस स्थिति को बदलने का एक ही उपाय है कि बढ़िया लोग उस क्षेत्र में प्रवेश करें। इससे धर्म के प्रति फैली हुई अनास्था भी दूर होगी और उसे ढोंग न समझकर आस्थाओं का प्रशिक्षण समझा जाने लगेगा।

योजनाएँ कितनी ही आकर्षक क्यों न हों उनको आगे धकेलने वाले लोग जब आदर्शहीन, स्वार्थी और संकीर्ण दृष्टिकोण के हों तो उनकी दृष्टि उस योजना से अधिकाधिक अपना लाभ लेने की होगी। इस विचित्रता में कोई योजना सफल नहीं हो सकती। कोई भी महान् कार्य सदा आदर्शवादी आस्था लेकर चलने वाले लोग ही पूरा करते हैं। यदि इसी विशेषता का अभाव रहा तो फिर योग्यता, शिक्षा तथा कौशल कितना ही बढ़ा-चढ़ा हो वह व्यक्तिगत लाभ की ओर ही झुकेगा और वह समाज को हानि पहुँचाकर ही संभव हो सकता है।

एक लगनशील व्यक्ति अपने अनेक साथी-सहचर पैदा कर सकता है। जुआरी, शराबी, व्यभिचारी जब अपने कई साथी पैदा कर सकते हैं तो प्रबुद्ध व्यक्ति वैसा क्यों नहीं कर सकते? डाकुओं के छोटे-छोटे गिरोह जब एक बड़े क्षेत्र को आतंकित कर सकते हैं तो सही लोगों का संगठन क्या कुछ नहीं कर सकते? लगन की आग बड़ी प्रबल है। यह जिधर भी लगती है दावानल का रूप धारण करती है। युग निर्माता महापुरुष अकेले ही चले हैं, लोगों ने उनका विरोध-प्रतिरोध भी खूब किया फिर भी वे अपनी लगन के आधार पर अद्भुत सफलता प्राप्त कर सके-यही मार्ग हर लगनशील के लिए खुला पड़ा है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 छोटी शक्ति से ही कार्य आरम्भ करो!

यदि आपके पास मनचाही वस्तुएं नहीं हैं तो निराश होने की कुछ आवश्यकता नहीं। अपने पास जो टूटी-फूटी चीजें है उन्हीं की सहायता से अपनी कला को प्रदर्शित करना आरम्भ कर दीजिये, जब चारों ओर घोर घन अन्धकार छाया हुआ होता है तो वह दीपक जिसमें छदाम की मिट्टी, आधे पैसे का तेल और दमड़ी को बत्ती है। कुल मिलाकर एक पैसे की भी पूँजी नहीं है—चमकता है और अपने प्रकाश से लोगों के रुके हुए कामों को चालू कर देता है।

जब कि हजारों पैसे के मूल्य वाली वस्तुएं चुपचाप पड़ी होती हैं, यह एक पैसे की पूँजी वाला दीपक प्रकाशवान होता है, अपनी महत्ता प्रकट करता है, लोगों का प्यारा बनता है, प्रशंसित होता है और अपने आस्तित्व को धन्य बनाता है। क्या दीपक ने कभी ऐसा रोना रोया है कि मेरे पास इतने मन तेल होता, इतने सेर रुई होती, इतना बड़ा मेरा आकार होता तो ऐसा बड़ा प्रकाश करता?

दीपक को कर्महीन नालायकों की भाँति, बेकार शेखचिल्लियों जैसे मनसूबे बाँधने की फुरसत नहीं है, वह अपनी आज की परिस्थिति हैसियत और औकात को देखता है, उसका आदर करता है और अपनी केवल मात्र एक पैसे की पूँजी से कार्य आरम्भ कर देता है। उसका कार्य छोटा है, बेशक; पर उस छोटेपन में भी सफलता का उतना ही महत्व है जितना के सूर्य और चन्द्र के चमकने की सफलता का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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मंगलवार, 8 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 8 Aug 2023

हमें मूक सेवा को महत्त्व देना चाहिए। नींव के अज्ञात पत्थरों की छाती पर ही विशाल इमारतें तैयार होती हैं। इतिहास के पन्नों पर लाखों परमार्थियों में से किसी एक का नाम संयोगवश आ पाता है। यदि सभी स्वजनों का नाम छापा जाने लगे तो दुनिया का सारा कागज इसी काम में समाप्त हो जाएगा। यह सोचकर हमें प्रशंसा की ओर से उदास ही नहीं रहना चाहिए, वरन् उसको तिलांजलि भी देनी चाहिए। नामवरी के लिए जो लोग आतुर हैं उनको निम्न स्तर का स्वार्थी ही माना जाना चाहिए।

युग परिवर्तन का श्रीगणेश इस प्रकार होगा कि जिनकी अंतरात्मा में भगवान् ने देश, धर्म की बात सोचने-समझने की दूरदृष्टि दी हो वे अपना जीवन लक्ष्य भोग से बदलकर त्याग कर लें। समृद्ध बनने की महत्त्वाकाँक्षा को पैरों तले कुचल दें और प्रबुद्ध बनने में गर्व गौरव अनुभव करने लगे।

आज प्रबुद्ध लोगों की स्थिति भी यह है कि वे लम्बी चौड़ी योजनाएँ बनाने, वाद-विवाद एवं आलोचना करने में तो बहुत सिर खपाते हैं, पर रचनात्मक कार्य करने के लिए जब समय आता है तो बगलें झाँकते हैं, दाँत निपोरते हैं और तरह-तरह के बहाने बनाते हैं। इस स्थिति को बदला जाना चाहिए। भावनाशील लोगों को आदर्शवाद की चर्चा करते रहने की परिधि तोड़कर अब कुछ करने के लिए आगे आना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आकांक्षाएँ उचित और सोद्देश्य हों

न जाने किस कारण लोगों के मन में यह भ्रम पैदा हो गया है कि ईमानदारी और नीतिनिष्ठा अपनाकर घाटा और नुकसान ही हाथ लगता है। संभवतः इसका कारण यह है कि लोग बेईमानी अपनाकर छल-बल से, धूर्तता और चालाकी द्वारा जल्दी-जल्दी धन बटोरते देखे जाते हैं। तेजी से बढ़ती संपन्नता देखकर देखने वालों के मन में भी वैसा ही वैभव अर्जित करने की आकांक्षा उत्पन्न होती है। वे देखते हैं कि वैभव संपन्न लोगों का रौब और दबदबा रहता है। किंतु ऐसा सोचते समय वे यह भूल जाते हैं कि बेईमानी और चालाकी से अर्जित किए गए वैभव का रौब और दबदबा बालू की दीवार ही होती है, जो थोड़ी-सी हवा बहने पर ढह जाती है तथा यह भी कि वह प्रतिष्ठा दिखावा, छलावा मात्र होती है क्योंकि स्वार्थ सिद्ध करने के उद्देश्य से कतिपय लोग उनके मुँह पर उनकी प्रशंसा अवश्य कर देते हैं, परंतु हृदय में उनके भी आदर भाव नहीं होता।

इसके विपरीत ईमानदारी और मेहनत से काम करने वाले, नैतिक मूल्यों को अपनाकर नीतिनिष्ठ जीवन व्यतीत करने वाले भले ही धीमी गति से प्रगति करते हों परन्तु उनकी प्रगति ठोस होती है तथा उनका सुयश देश काल की सीमाओं को लांघकर विश्वव्यापी और अमर हो जाता है।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 3

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सोमवार, 7 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 7 Aug 2023

युग निर्माण के सत्संकल्प में विवेक को विजयी बनाने का शंखनाद है। हम हर बात को उचित-अनुचित की कसौटी पर कसना सीखें, जो उचित हो वही करें, जो ग्राह्य हो वही ग्रहण करें, जो करने लायक हो उसी को करें। लोग क्या कहते हैं, क्या कहेंगे इस पर ध्यान न दें।

यदि किसी के दिल में वस्तुतः देश, धर्म, समाज, संस्कृति की दुर्दशा पर दुःख होता हो और यदि वस्तुतः उसकी आकाँक्षा इस विषमता को बदल देने की हो तो उसे अपनी सारी शक्ति लगाकर देश में प्रबुद्ध वर्ग उत्पन्न करने की-जो है उसे संगठित एवं सक्रिय बनाने की चेष्टा करनी चाहिए। यदि ऐसा हो सका तो समझना चाहिए कि अनेक क्षेत्रों में बिखरी हुई एक से एक बढ़कर विपन्नताओं में से प्रत्येक का हल ढूँढ लेना संभव हो गया।

ऐसे परिजन जो हमारी वाणी को सुनना नहीं चाहते, जिन्हें हमारे विचारों और प्रेरणाओं की आवश्यकता नहीं, जो हमारे सुझावों और संदेशों का कोई मूल्य नहीं मानते वे हमसे छल करतेह ैं और उनसे सहयोग की आशा हम नहीं कर सकते। शरीर को पूजने वालों के प्रति नहीं, हमारी आत्मा को संतोष देने के लिए जो प्रयत्न करते हैं, उन्हीं के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा से हमारा मस्तक नत हो सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अहंकार अपने ही विनाश का एक कारण (अन्तिम भाग)

साधन सम्पन्न का पतन होते ही समाज में उसकी असहनीय अप्रतिष्ठा होने लगती है। लोग पहले जितना उसका मान सम्मान और आदर सत्कार किया करते थे, उसी अनुपात से अवमानना करने लगते है। आदर पाकर अपमान मिलने पर कितनी पीड़ा कितना दुख और कितना आत्म संताप मिलता होगा, इसको तो कोई भुक्त भोगी ही जान सकता है। अहंकार भयानक शत्रु के समान होता है। इससे क्या रिक्त और क्या सम्पन्न सभी व्यक्तियों को सावधान रहना चाहिए। यह जिसको अपने वश में कर लेता है, उसे सदा के लिए नष्ट कर डालता है। प्रकट अहंकार की हानियाँ तो प्रकट ही है। गुप्त अहंकार भी कम भयानक नहीं होता। बहुत लोग चतुरता के बली पर समाज में अपने अहंकार को छिपाये रहते हैं। ऊपर से बड़े विनम्र और उदार बने रहते है, किन्तु अन्दर ही अन्दर उससे पीड़ित रहा करते है।

ऐसे मिथ्या लोग उदारता दिखलाने के लिए कभी कभी परोपकार और परमार्थ भी किया करते है। दान देते समय अथवा किसी की सहायता करते समय बडीद्य निस्पृहता प्रदर्शित करते हैं, किन्तु अन्दर ही अन्दर लोकप्रियता, प्रशंसा और प्रकाशन के लिए लाभान्वित बने रहते है। कई बार तो जब उनकी यह कामना, आकांक्षा अपूर्ण रह जाती है, उतनी लोकप्रियता अथवा प्रशंसा नहीं पाते, जितनी कि वे चाहते है, तो वे अपने परोपकार परमार्थ अथवा दानपुण्य पर पश्चाताप भी करने लगते है और बहुधा आगे के लिए अपनी उदारता का द्वार ही बन्द कर देते हैं। ऐसे मानसिक चोर अहंकारियों को अपने परमार्थ का भी कोई फल नहीं मिलता, बल्कि ऐसे मिथ्या दानी प्रायः पाप के ही भागी बनते है। परमार्थ कार्यों में अहंकार का समावेश अमृत में विष और पुण्य में पाप का समावेश करने के समान होता है।

वैसे तो अहंकारी कदाचित ही उदार अथवा पुण्य परमार्थी हुआ करते है। पाप का गट्ठर सिर पर रखे कोई पुण्य में प्रवृत्त हो सकेगा- यह सन्देहजनक है। पुण्य में प्रवृत्त होने के लिए पहले पाप का परित्याग करना होगा। स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए रोगी को पहले रोग से मुक्त होना होगा। रोग से छूटने से पहले ही यदि वह स्वास्थ्यवर्धक व्यायाम में प्रवृत्त हो जाता है तो उसका मन्तव्य पूरा न होगा।

लोक-परलोक का कोई भी श्रेय प्राप्त करने में अहंकार मनुष्य का सबसे विरोधी तत्व है। लौकिक उन्नति अथवा आत्मिक प्रगति पाने के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों में अहंकार का त्याग सबसे प्रथम एवं प्रमुख प्रयत्न है। इसमें मनुष्य को यथाशीघ्र तत्पर हो जाना चाहिए। अहंकार के त्याग से उन्नति का मार्ग तो प्रशस्त होता ही है साथ ही निरहंकार स्थिति स्वयं में भी बड़ी सन्तोष एवं शाँतिदायक होती है।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1969 जून पृष्ठ 60

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रविवार, 6 अगस्त 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 6 Aug 2023

हमारे शरीर को नमस्कार करने वाली भीड़ को हमने लाखों की संख्या में इधर से उधर घूमते-फिरते देखा है, पर जिन्हें हमारे विचारों के प्रति श्रद्धा हो, ऐसे व्यक्ति बहुत थोड़े हैं। भीड़ को हम कौतूहल की दृष्टि से देखते हैं, पर आत्मीय केवल उन्हें ही समझते हैं, जो हमारे विचारों का मूल्यांकन करते हैं, उन्हें प्रेम करते और अपनाते हैं।

किसी भी संगठन का प्राण उसके आदर्शों में अटूट निष्ठा ही होती है। जब तक विचारों में एकता न होगी, आकाँक्षाओं और भावनाओं का प्रवाह एक दिशा में न होगा, तब तक संगठन में मजबूती असंभव है। आस्थावान् व्यक्ति ही युग निर्माण संगठन के रीढ़ हैं।

बुराइयाँ आज संसार में इसलिए बढ़ और फल-फूल रही हैं कि उनका अपने आचरण द्वाराप्रचार करने वाले सच्चे प्रचारक पूरी तरह मन, कर्म और वचन से बुराई करने और फैलाने वाले लोग बहुसंख्यक मौजूद हैं। अच्छाइयाँ आज इसलिए घट रही हैं, क्योंकि अच्छाइयों के प्रचारक आज निष्ठावान् नहीं बातूनी लोग ही दिखाई पड़ते हैं। फलस्वरूप बुराइयों की तरह अच्छाइयों का प्रसार नहीं हो पाता। वे पोथी के बैंगनों की तरह केवल कहने-सुनने भर की बातें रह जाती हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अहंकार अपने ही विनाश का एक कारण (भाग ४)

अकारण अहंकार करने वाले व्यक्ति तो एक प्रकार से अभागे ही होते है। वे अपनी इस अहैतुक विषाग्नि में यों ही जलते रहते है। कोई शक्ति नहीं, कोई सम्पत्ति नहीं, कोई पुरुषार्थ नहीं तब भी शिर पर दम्भ का भार लिए फिरते है। बात बात में ऐंठते रहते है, बात बात में जान बधारते है- ऐसे निरर्थक अहंकारी पग-पग पर असहनीय और तिरस्कार पाते रहते है। अपनी सीमित परिधि में ही जिस पिटकर नष्ट हो जाते हैं न शाँति पा पाते है, और न सन्तोष योग्य कोई स्थिति। विस्तार व्यक्तियों का अहंकार न केवल विकार ही होता है, बल्कि वह एक रोग भी होता है, जो जीवन के विकास पर धरना देकर बैठ जाता है सारी प्रगतियों के द्वार बन्द कर देता है।

इसी प्रकार के निस्तार अहंकारी प्रायः अपराधी बन जाया करते है। प्रगति तो उनकी अपने इस रोग के कारण नहीं होती है और दोश ये समाज के मत्थे मड़ा करते हैं। बुद्धि भ्रम के कारण क्रोध करते हैं और संघर्ष उत्पन्न कर उसमें फँस जाते है। ऐसे अहंकारियों की कामनायें बड़ी चढ़ी होती हैँ, उनकी पूर्ति की क्षमता होती नहीं, वही निदान अपराध पथ पर बढ़ जाया करते है। अकारण अहंकार करने वाला व्यक्ति अपनी जितनी हानि किया करता है, उतनी शायद एक पागल व्यक्ति भी नहीं करता।

किन्तु साधन-सम्पन्न व्यक्ति भी अहंकार की आग में भस्म हुए बिना नहीं रहते। साधनहीन व्यक्ति यदि अहंकार को प्रश्रय देता है तो उसकी हानि उसकी भावी उन्नति की सम्भावना तक ही सीमित रहती है। पर साधन सम्पन्न व्यक्ति जब अहंकार को ग्रहण करता है, तब उसका भविष्य तो भयानक बनता ही है, वर्तमान भी ध्वस्त हो जाता है। इस दोष के कारण समाज का असहयोग होते ही सारे रास्ते बन्द हो जाते है। सम्पत्ति निकम्मी होकर पड़ी रहती है, किसी काम नहीं आती। सम्पत्ति की सक्रियता भी तो समाज के सहयोग पर ही निर्भर रहती है। जब समाज का सहयोग ही उठ जायेगा तो सम्पत्ति ही क्या काम बना सकती है? जीवन में आयात का मार्ग बन्द होते ही निर्यात आरम्भ हो जाता है, ऐसा नियम है। निदान धीरे धीरे सारी सम्पत्ति निकल जाती है। इस प्रकार वर्षों का संचय किया हुआ, अतीत का फल भी नष्ट हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1969 जून पृष्ठ 59

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/June/v1.59


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