सोमवार, 5 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 5 June 2023

🔶 गई गुजरी स्थिति में पड़े हुए लोग जब ऊँची सफलताओं के सपने देखते हैं तो स्थिति और लक्ष्य के बीच भारी अन्तर होने से लगता है कि इतनी चौड़ी खाई पाटी न जा सकेगी, किन्तु अनुभव से यह देखा गया है कि कठिनाई उतनी बड़ी थी नहीं जितनी कि समझी गई थी। धीमी किन्तु अनवरत चाल से चलने वाली चींटी भी पहाड़ों के पार चली जाती है, फिर धैर्य, साहस, लगन, मनोयोग और विश्वास के साथ कठोर पुरुषार्थ में संलग्न व्यक्ति को प्रगति की मंजिलें पार करते चलने से कौन रोक सकेगा?

🔷 ज्ञानयोग की साधना यह है कि मस्तिष्कीय गतिविधियों पर-विचारधाराओं पर विवेक का आधिपत्य स्थापित किया जाय। मस्तिष्क को चाहे जो कुछ सोचने की छूट न हो, चाहे जिस स्तर की चिन्तन प्रक्रिया अपनाने न दी जाय। मात्र औचित्य ही चिंतन का आधार हो सकता है, यह निर्देश मस्तिष्क को लाख बार समझाया जाय और उसे सहमत अथवा बाध्य किया जाय कि इसके अतिरिक्त उसे और किसी अनुपयुक्त प्रवाह में बह चलने की छूट न मिल सकेगी।

🔶 असत्य से किसी प्रकार के लाभ, सुख अथवा संतोष की आशा करना मृगतृष्णा में भटकने के समान है। असत्य से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र किसी का भी हित नहीं होता। असत्य आत्मिक और भौतिक दोनों प्रकार का दोष है। इससे आत्मा का पतन होता है और समाज में विघटन। असत्यवाद के स्वभाव को बलपूर्वक त्याग देने में ही कल्याण है। सत्य का आश्रय ईश्वर का आश्रय है। इसको स्वीकार कर चलने वाला व्यक्ति जीवन में न तो कभी अशान्त होता है और न अपमानित।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 4)

किसी मित्र सम्बन्धी अथवा आत्मीयजन ने मानिये जन्म-दिन अथवा किसी अन्य शुभ अवसर पर अपनी योग्यता एवं समाज के अनुसार कोई उपहार दिया अथवा भेजा। कोई भी व्यक्ति इस सम्मान और स्नेह से पुलकित हो उठता और आभार भरा धन्यवाद देते-देते न अघाता। किन्तु दोषदर्शी तो अपने रोग से मजबूर ही रहता है। यद्यपि वह आभार एवं धन्यवाद न प्रकट करने की असभ्यता नहीं करता तथापि और कुछ नहीं उसमें इतना ही शामिल कर देता कि आपने बेकार यह चीज भेजी। यह तो मेरे पास पहले से ही थी और मुझे ऐसा रंग यह डिजाइन पसन्द नहीं है। यह रंग और प्रकार उपहार के रूप में बहुत आम और सस्ते हो गये हैं। इससे अच्छा यह होता कि आप सद्भावना और बधाई के ही दो शब्द दे देते। बात भले ही सही रही हो। किन्तु इस भावना ने, इस दोष-दृष्टि ने उसको स्वयं तो प्रसन्न नहीं ही होने दिया साथ ही अपने मित्र और स्वजन की प्रसन्नता भी छीन ली।

यही बात नहीं कि दोष-दृष्टा केवल दूसरों में ही बुराई और कमियाँ देखता हो। स्वयं अपने प्रति भी उसका यही अत्याचार रहा करता है। उदाहरण के लिये वह बाजार से अपने लिये कोई वस्तु खरीदने जाती है। पहले तो वह कितनी ही प्रकार की चीजें क्यों न दिखलाई जायें, उसे पसन्द ही नहीं आती, सबमें कोई-न-कोई दोष दिखलाई देता है। वस्तु के निर्दोष होने पर भी वह अपनी और से किसी दोष का आरोपण कर ही लेगा। अपनी इस प्रक्रिया से थक जाने के बाद जब चीज लेकर घर आता है। तब भी उसका पेट अप्रशंसा से भरा नहीं होता। चीज डाली और कहना आरम्भ कर दिया- ‘‘खरीदने को खरीद तो अवश्य लाया लेकिन कुछ पसन्द नहीं आई। यदि पत्नी इस बात को नहीं मानती और चुनाव की प्रशंसा करती है, तो झूठी प्रशंसा का करने का आरोप पाती है। जब तक वह अपनी पसन्द, बाजारदारी, चीज की पहचान के विषय में आलोचना नहीं कर लेता, बुराई नहीं निकाल लेता, अपनी अकल और अनुभव को कोस नहीं लेता चैन नहीं पड़ता। इस प्रकार वह इस प्रसन्नता के छोटे अवसर को भी खिन्नता से कडुआ बना ही लेता है।

तात्पर्य यह है कि दोष-दर्शी कितने ही सुन्दर स्थान, वस्तु और व्यक्ति के संपर्क में क्यों न आये अपने अवगुण के प्रभाव से उससे मिलने वाले आनन्द से वंचित ही रहता है। निदान इस लम्बे-चौड़े संसार में उसे न तो कहीं आनन्द दीखता है और न किसी वस्तु में सामंजस्य का सुख प्राप्त होता है। उसे हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण अपनी रुचि के साथ असमंजस उत्पन्न करती ही दीखती है। जबकि गुण-ग्राहक हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण में सामंजस्य और सुन्दरता ही खोज निकालता है। यही कारण है कि गुण-ग्राहक सदैव प्रसन्न और दोषान्वेषक सदा खिन्न बना रहता है।

वस्तुतः बात यह है कि संसार की प्रत्येक वस्तु गुण-दोषमय ही है। कोई भी वस्तु एवं व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता कि जिसमें या तो गुण-ही-गुण भरे हों अथवा दोष-ही-दोष। अपनी दृष्टि के अनुसार हर व्यक्ति उसमें गुण या दोष देख कर प्रसन्न अथवा खिन्न हुआ करता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/May/v1.23
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रविवार, 4 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 4 June 2023

अवांछनीय विचारों को मस्तिष्क में स्थान देने और उन्हें वहाँ जड़ जमाने का अवसर देने का अर्थ है भविष्य में हम उसी स्तर का जीवन जीने की तैयारी कर रहे हैं। भले ही यह सब अनायास ही हो रहा हो, पर उसका परिणाम तो होगा ही। उचित यही है कि हम उपयुक्त और रचनात्मक विचारों को ही मस्तिष्क में प्रवेश करने दें। यदि उपयोगी और विधायक विचारों का आवाहन करने और अपनाने का स्वभाव बना लिया जाये तो निःसंदेह प्रगति पथ पर बढ़ चलने की संभावनाएँ आश्चर्यजनक गति से विकसित हो सकती हैं।

समय गतिशील है। हाथ से निकला हुआ आज बीता हुआ कल हो जाता है। मनुष्य का जीवन काल ईश्वर ने निर्धारित करके उसे बताया नहीं है। जाने किस दिन बुलावा आ जाय। इसलिए समझदार व्यक्तियों ने यह सुझाव दिया है कि आज का काम कल पर नहीं रखना चाहिए, वरन् प्रयास यह करना चाहिए कि कल किया जाने वाला काम भी आज ही पूरा कर लिया जाये। हो सकता है कि कल जियें या न जियें।

शंकालु व्यक्ति अपने को चारों ओर से विपत्तियों के चक्रव्यूह में फँसा अनुभव करते हैं और हर व्यक्ति पर संदेह करते हैं। ऐसे लोग न तो किसी का प्यार पाते हैं, न सहयोग। उनकी अपनी आशंकाएँ ही इतनी बड़ी विभीषिका बन जाती है जो वास्तविक विपत्ति से भी अधिक अहितकर परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देती है। आशंकाओं से ग्रसित व्यक्ति उस साहस, उत्साह और शुभ चिंतन से वंचित ही रह जाते हैं, जो प्रगति के लिए नितान्त आवश्यक है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 3)

अब दोष-दृष्टा को ले लीजिये। उसकी स्थिति बिल्कुल विपरीत होती है। जहाँ अन्य लोग उक्त महात्मा में गुण ही देख सके वहाँ उसे केवल दोष ही दिखाई दिये। उसका हृदय महात्मा के प्रशंसकों के बीच, उनकी कुछ खामियों के रखने के लिये बेचैन हो जाता। जब अवकाश अथवा अवसर न मिलता तो प्रशंसा में सम्मिलित होकर उनके बीच बोलने का अवसर निकाल कर कहना प्रारम्भ कर देता- ‘‘हाँ, महात्मा जी का व्याख्यान था तो अच्छा- लेकिन उतना प्रभावोत्पादक नहीं था, जितना कि लोग प्रभावित हुए अथवा प्रशंसा कर रहे हैं। कोई मौलिकता तो थी नहीं। यही सब बातें अमुक नेता ने अपनी प्रचार-स्पीच में शामिल करके देशकाल के अनुसार उसमें धार्मिकता का पुट दे दिया था। अजी साहब क्या नेता, क्या महन्त सबके-सब अपने रास्ते जनता पर नेतृत्व करने के सिवाय और कोई उद्देश्य नहीं रखते। यह सब पूजा, प्रतिष्ठा व पेट का धन्धा है।”

यदि लोग सच्चाई से विमुख होकर उससे सहमत न हुए तब तो वह वाद-विवाद के लिये मैदान पकड़ लेता है और अन्त में अपना दोषदर्शी चित्र दिखा कर लोगों की हीन दृष्टि का आखेट बन कर प्रसन्नता खो कर और विषण्ण होकर लौट आता है। जहाँ गुण ग्राहकों ने उस दिन महीनों काम आने वाली प्रसन्नता प्राप्त की, वहाँ दोष-दृष्टा ने जो कुछ टूटी-फूटी प्रसन्नता उस समय पास में थी वह भी गवाँ दी।

दोष-दर्शन की प्रक्रिया जोर पकड़ ही चुकी थी, उसकी सखी-सहेली झल्लाहट, खीझ, कुढ़न, कुण्ठा, अरुचि आदि सब साथ ही लगी हुई थीं। निदान घर आकर भोजन अच्छा न लगा पत्नी निहायत बेसऊर दिखाई देने लगी। बच्चे यदि सोते मिले तो नालायक हैं। शाम से ही सो जाते हैं। और यदि जगते मिले तो लापरवाह और तन्दुरुस्ती का ध्यान न रखने वाले बन गये। तात्पर्य यह कि उस दिन जहाँ अन्य सब लोग अधिक-से-अधिक प्रसन्नता के अधिकारी बने वहाँ दोषदर्शी के लिये हर बात खेदजनक और दुःखदायी बन गई।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 23


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शनिवार, 3 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 3 June 2023

🔷 श्रम में शर्म, आलस्य या प्रमाद अधिक घर करते गये तो हमारी प्रगति अवरुद्ध होना निश्चित है। आलस्य की बढ़ती हुइ्र्र प्रवृत्ति व श्रम से जी चुराने की आदत हमें ऐसी स्थिति में ले जायेगी, जहाँ जीवन जीना भी कठिन होगा। प्रगति की किसी भी दिशा में अग्रसर होने के लिए सबसे पहला साधन श्रम ही है। जो जितना परिश्रमी होगा, उतना ही उन्नतिशील होगा।

🔶 जीवन एक संग्राम है, जिसमें विजय केवल उन्हें ही मिलती है, जो दृढ़ और उन्नत मनोबल का कवच धारण किये रहते हैं और जो अपने निहित पराक्रम तथा पौरुष की उत्कृष्टता सिद्ध करते हैं। शारीरिक स्वास्थ्य ठीक हो, पर मनोबल न हो तो आदमी मानसिक आघात से अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है। अविकसित मनोबल के कारण हमारी योजनाएँ सफल नहीं होतीं। हमारा मन हारा रहता है तो शरीर भी हारता है।

🔷 मनुष्य सामर्थ्य का पुंज  और साहस का धनी है। उसमें न योग्यता की कमी है, न प्रतिज्ञा की। उसे विकसित किया जा सके तो छोटा दिखने वाला व्यक्ति अगले दिनों बड़ा बन सकता है। जिम्मेदारी समझने के लिए तैयार हो और जिम्मेदारी उठाने का साहस करे तो उसका निर्वाह करने का बल भी भीतर से ही प्रकट होगा। दूसरे लोग सहायता भी करेंगे और यह सिद्ध होगा कि अपनी तुच्छता और असमर्थता की आशंका निरर्थक थी और सफलता का डर जो बार-बार संकोच में डालता था सर्वथा निराधार था।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 2)

देखिये और जरा ध्यान से देखिये कि आपके अन्दर ‘दोष-दर्शन’ करने की दुर्बलता, तो नहीं घर पर बैठी है। क्योंकि ‘दोष-दर्शन’ का दृष्टिकोण भी जीवन को कुछ-कुछ ऐसा ही बना देता है। दोष-दर्शन और संतोष, दोष-दर्शन और प्रसन्नता, दोष-दर्शन तथा सामंजस्य का नैसर्गिक विरोध है। दोष-दृष्टि मनुष्य के हृदय पर उसके मानस पर एक ऐसा आवरण है, जो न हो बाहर की प्रसन्न- किरणों को भीतर प्रतिबिम्बित होने देता है और न भीतर का उल्लास बाहर ही प्रकट होने देता है। इसे मनुष्य एवं आनन्द के बीच एक लौह दीवार ही समझना चाहिये। लीजिये दोषदर्शी व्यक्तियों की दशा से अपना मिलान कर लीजिये और यदि अपने में दोष पायें तो तुरन्त सुधार कर डालिये, जिससे, अगले दिनों में आप भी उस प्रकार प्रसन्न रह सकें, जिस प्रकार लोग रहते हैं और उन्हें रहना ही चाहिये।

दोष-दर्शन से दूषित व्यक्ति जब किसी व्यक्ति के संपर्क में आता है, तब अपने मनोभाव के अनुसार उसके अन्दर बुराइयाँ ढूँढ़ने लगता है और हठात् कोई न कोई बुराई निकाल ही लेता है। फिर चाहे वह व्यक्ति कितना ही अच्छा क्यों न हो। उदाहरण के लिये किसी विद्वान महात्मा को ही ले लीजिये। लोग उसे बुलाते, आदर सत्कार करते और उसके व्याख्यान से लाभ उठाते हैं। महात्मा जी का व्याख्यान सुन कर सारे लोग पुलकित, प्रसन्न व लाभान्वित होते हैं।

उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते और अपने उतने समय को बड़ा सार्थक मानते। अनेक दिनों, सप्ताहों तथा मासों तक उस सुखद घटना का स्मरण करते और ऐसे संयोग की पुनरावृत्ति चाहने लगते। अधिकाँश लोग उस व्याख्यान का लाभ उठा कर अपना ज्ञान बढ़ाते, कोई गुण ग्रहण करते और किसी दुर्गुण से मुक्ति पाते हैं। वह उनके लिए एक ऐसा सुखद संयोग होता है जो गहराई तक अपनी छाप छोड़ जाता है, ऐसे ही सुव्यक्ति गुणाग्राही कहे जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 22



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शुक्रवार, 2 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 2 June 2023

🔶अनीति को देखते हुए भी चुप बैठे रहना, उपेक्षा करना, आँखों पर पर्दा डाल लेना जीवित मृतक का चिह्न है। जो उसका समर्थन करते हैं, वे प्रकारान्तर से स्वयं ही अनीतिकर्त्ता हैं। स्वयं न करना, किन्तु दूसरों के दुष्ट कर्मों में सहायता, समर्थन, प्रोत्साहन, पथ प्रदर्शन करना एक प्रकार से पाप करना है। इन दोनों ही तरीकों से दुष्टता का अभिवर्धन होता है।

🔷 आत्मा की प्यास बुझाने के लिए,अंतःकरण को पवित्र करने के लिए, आत्म-बल बढ़ाने के लिए प्रेम साधना की अनिवार्य आवश्यकता है। रूखा, नीरस, एकाकी, स्वार्थी मनुष्य कितना ही वैभव संपन्न क्यों न हो, अध्यात्म की दृष्टि से उसे नर-पशु ही कहा जाएगा। जो किसी का नहीं, जिसका कोई नहीं, ऐसा मनुष्य कुछ भी अनर्थ कर सकता है। उसे अपने आपसे डर लगेगा और अपनी जलन में जीवित मृतक की तरह झुलसेगा। प्रेम रहित नीरस जीवन घृणित है, वह मनुष्य जैसे विकासवान् प्राणी के लिए हर दृष्टि से हेय है।

🔶आत्म-विश्वास, श्रम और साहस का प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण स्थान माना गया है, पर वह वास्तविकता पर आधारित होना चाहिए। नशेबाजों की तरह आवेशग्रस्त स्थिति में कुछ भी पाने और कुछ भी बनने के लिए आतुर सपने देखना व्यर्थ है। बेतुकी छलांगें लगाने वाले अपने हाथ-पैर तोड़ लेते हैं। योग्यता, परिस्थिति, साधन, अनुभव आदि का तालमेल बिठाते हुए जो निर्णय किये जाते हैं और नपे-तुले कदम बढ़ाये जाते हैं, वे ही सफल होते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 1)

 क्या कभी अपने यह सोचा कि आप पग-पग पर खिन्न, असंतुष्ट, उद्विग्न अथवा उत्तेजित क्यों रहते हैं? क्यों आपको समाज, संसार मनुष्यों, मित्रों, वस्तुओं, परिस्थितियों यहाँ तक अपने से भी शिकायत रहती है? आप सब कुछ करते, बरतते और भोगते हुए भी वह मजा, आनन्द और प्रसन्नता नहीं पाते, जो मिलनी चाहिये और संसार के अन्य असंख्यों लोग पा रहे हैं। आप विचारक, आलोचक, शिक्षित, और सभ्य भी हैं, किन्तु आपकी यह विशेषता भी आपको प्रसन्न नहीं कर पाती। स्त्री-बच्चे, घर, मकान सब कुछ आपको उपलब्ध है। फिर भी आप अपने अन्दर एक अभाव और एक असंतोष अनुभव ही करते रहते हैं। घर, बाहर, मेले-ठेले, सफर, यात्रा, सभा-समितियों, भाषणों, वक्तव्यों- किसी में भी कुछ मजा ही नहीं आता। हर समय एक नाराजी, नापसन्दी एवं नकारात्मक ध्वनि परेशान ही रखती है। संसार की किसी भी बात, वस्तु और व्यक्ति से आपका तादात्म्य ही स्थापित हो पाता है।

साथ ही आप पूर्ण स्वस्थ हैं। मस्तिष्क का कोई विकार आपमें नहीं है। आपका अन्तःकरण भी सामान्य दशा में है और आस-पास में ऐसी कोई घटना भी नहीं घटी है, जिससे आपकी अभिरुचिता एवं प्रसादत्व विक्षत हो गया हो। ऐसा भी नहीं हुआ कि विगत दिनों में ही किसी ऐसे अप्रिय संयोग से सामंजस्य स्थापित करना है, जिसकी अनुभूति आज भी आपको विषाण बनाये हुए हैं।

🔶 वास्तव में बात बड़ी ही विचित्र और अबूझ-सी मालूम होती है। जब प्रत्यक्ष में इस स्थायी अप्रियता का कोई कारण नहीं दिख पड़ा, फिर ऐसा कौन-सा चोर, कौन-सा ठग आपके पीछे अप्रत्यक्ष रूप से लगा हुआ है, जो हर बात के आनन्द से आपको वंचित किए हुये आपके जन्म-सिद्ध अधिकार प्रसन्नता का अपहरण कर लिया करता है। इसको खोजिये, गिरफ्तार करिये और अपने पास से मार भगाइये। जीवन में सदा दुःखी और खिन्नावस्था में रहने का पाप न केवल वर्तमान ही बल्कि आगामी शत-शत जीवनों तक को प्रभावित कर डालता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 22
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गुरुवार, 1 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 1 June 2023

🔷 ईमानदारी बरतने वाला व्यक्ति भी असफल हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ईमानदारी कोई गलत गुण है, वरन् सफलता के लिए ईमानदारी के साथ अन्य सद्गुणों-परिश्रम, पुरुषार्थ और संगठित शक्तियों के कारण जहाँ बुरे लोग अपने गलत कार्यों में भी सफल हो जाते हैं, वहीं अच्छे लोगों को आलस्य, सुस्ती और  प्रमाद के कारण दुःखी, क्लान्त तथा असफलत हो जाना पड़ता है और विडम्बना यह बन जाती है कि ईमानदार लोग भूखे मरते हैं- का फतवा देने लगते हैं, जबकि सच्चाई कुछ और ही होती है।

🔶 अहिंसा को अध्यात्म मर्यादा का अति महत्त्वपूर्ण अंग माना गया है। उसका तात्पर्य इतना ही है कि किसी के उचित अधिकार अथवा सम्मान पर आक्रमण न किया जाय। छल करके अपना स्वार्थ सिद्ध करना एवं दूसरों को हानि पहुँचाना हिंसा है। दूसरों को बहकाना, भ्रम में डालना, अनैतिक परामर्श तथा प्रोत्साहन देना, कुमार्गगामी बनाना, बुरी आदतों में फँसाना, मनोबल गिराना, अंधकारमय भविष्य के चित्र दिखाकर खिन्न-उद्विग्न कर देना, डराना हिंसा है- इस प्रकार की गतिविधियों में खून खराबा या मारपीट नहीं होती, किन्तु दूसरों को भटकने या पतित करने का पथ प्रशस्त होता है।

🔷 भगवान् पर हुकूमत करना और भगवान् के सामने तरह-तरह की फरमाइशें पेश करना यह तो वेश्यावृत्ति का काम है।  उपासना लौकिक कामनाओं के लिए नहीं, बल्कि भगवान् की साझेदारी के लिए, भगवान् को स्मरण रखने के लिए, आज्ञानुवर्ती होने के लिए और अपना समर्पण करने के उद्देश्य से होनी चाहिए। ऐसी उपासना ही फलदायी होती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 सहृदयता में जीवन की सार्थकता (भाग 2)

जिसने अपनी विचार धारा और भावनाओं को शुष्क, नीरस और कठोर बना रखा है, वह मानव जीवन के वास्तविक रस का आस्वादन करने से वंचित ही रहेगा । उस बेचारे ने व्यर्थ ही जीवन धारण किया और वृथा ही मनुष्य शरीर को कलंकित किया। आनन्द का स्त्रोत सरसता की अनुभूतियों में है। परमात्मा को आनन्द मय कहा जाता है। क्यों?- इसलिए कि वह सरस है, प्रेम मय है । श्रुति कहती है- “रसोवैसः” अर्थात्-वह परमात्मा रस मय है । भक्ति द्वारा प्रेम द्वारा-परमात्मा को प्राप्त करना संभव बताया गया है। निस्संदेह जो वस्तु जैसी हो उसको उसी प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। परमात्मा दीनबन्धु करुणासिन्धु, रसिक बिहारी, प्रेम का अवतार, दया निधान, भक्त वत्सल है। उसे प्राप्य करने के लिए अपने अन्दर वैसी ही लचीली, कोमल, स्निग्ध, सरस भावनाएं पैदा करनी पड़ती है। भगवान भक्ति के वश में है जिनका हृदय कोमल है, भावुक है, परमात्मा उनसे दूर नहीं है।

आप अपने हृदय को कोमल, द्रवित, पसीजने वाला, दयालु, प्रेमी और सरस बनाइए। संसार के पदार्थों में जो सरसता का सौंदर्य का अपार भण्डार भरा हुआ है उसे ढूँढ़ना और प्राप्त करना सीखिए। अपनी भावनाओं को जब आप कोमल बना लेते है तो आपके अपने चारों ओर अमृत झरता हुआ अनुभव होने लगता है। जड़ वस्तुओं पर दृष्टि डालिए हर एक वस्तु अपने-2 ढंग की अनूठी है, वह अपने कलाकार की अमर कीर्ति का अपनी मूकवाणी द्वारा बड़ी ही भावुक भाषा में वर्णन कर रही है। मखमल सी घास, दूध के फेन से उज्ज्वल नदी नाले हँसते हुए पुष्प, खिलौने से सुन्दर कीट पतंग माता सी दयालु गौएं, भाई से साथी बैल, वफादार सेवक से घोड़े, स्वामिभक्त कुत्ते, जापानी खिलौने से चलते फिरते पक्षी, आप अपने चारों ओर देख सकते है। सिनेमा की सी चलती बोलती तस्वीरें सब तरफ घूम रही है, नाटक का सा अभिनय स्थान स्थान पर हो रहा है।

प्रकृति के कोमल दृश्यों का कवित्व मय भावुकता के साथ यदि आप निरीक्षण करें तो सर्वत्र सौंदर्य की अजस्र धारायें बहती हुई दिखाई देगी। तस्वीर सा यह सुन्दर संसार आपके दिल की मुरझाई कली को हरी कर देने की परिपूर्ण क्षमता रखता है। भोले भाले मीठी मीठी बातें करते हुए बालक, प्रेम की प्रतिमायें देवियाँ, करुणामय मातृत्व की मूर्तियाँ माताएं, अनुभव ज्ञान और शुभ कामनाओं के प्रतीक वृद्ध जन, यह सब ईश्वर की ऐसी आनन्दमय विभूतियाँ है जिन्हें देखकर मनुष्य का हृदय कमल के पुष्प के समान खिल जाना चाहिए।

पग पग पर आनन्द और उल्लास के ढेर हमारे सामने लगे हुए है, इन दिव्य तत्वों के द्वारा हम अपने को रात दिन आनन्द में सराबोर रख सकते है, फिर भी हाय! हम कैसे अभागे है कि जीवन को दुख शोकों से भरा रखते हैं। मनुष्य अपनी कोमल भावनाओं को जैसे जैसे जागृत करता जाता है वैसे ही उसे अमृत तत्व का रसास्वादन होने लगता है जिसके लिए सत चित आनन्द स्वरूप आत्मा इस हाड़ माँस कि शरीर में रहने को रजामन्द हुआ है, जिसके लोभ को संवरण न करके उसके मनुष्य शरीर धारण किया है। जीवन की सार्थकता कोमल वृत्तियों के मधुरता का रसास्वादन करने में है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जून 1944 पृष्ठ 5


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बुधवार, 31 मई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 31 May 2023

🔷 यह सोचना व्यर्थ है कि पारमार्थिक जीवन में हानि अधिक है। सच तो यह है कि पाप-पंक में फँसे रहने पर पग-पग पर, पल-पल पर जो आत्म-प्रताड़ना तथा बाहरी व्यथा-बाधाएँ सहनी पड़ती हैं। उनकी तुलना में दिव्य जीवन में आने वाली विपत्तियाँ नगण्य हैं। यदि कुछ हैं भी तो आदर्शों के लिए किये जाने वाले त्याग, बलिदान के फलस्वरूप मिलने वाले आत्म-संतोष, लोक-सम्मान एवं ईश्वरीय अनुग्रह की उपलब्धियों को देखते हुए अतीव नगण्य हैं।

🔶 यदि मनुष्यता को जीवित रहना है तो उसे एकता और आत्मीयता की दिशा में बढ़ना होगा। मतभेदों की दीवारें गिरानी पड़ेंगी तथा चिंतन और कर्तृत्व की एकरूपता प्रस्तुत कर सकने वाला राजमार्ग बनाना पड़ेगा। जीवन और मरण के बीच और कोई विकल्प नहीं। सद्भावनापूर्वक निर्वाह करने या मर-कट कर नष्ट हो जाने के अतिरिक्त शान्ति का और कोई मार्ग नहीं। मतभेद जितने भी बने रहेंगे विनाश का असुर उतना ही भयावह होता चलेगा।

🔷 सत्य-असत्य का भेद करने के लिए मनोभूमि निष्पक्ष होनी चािहए। उसमें किसी प्रकार के पूर्वाग्रह नहीं होने चाहिए। किसी मान्यता पर आग्रह जमा हो तो मनोभूमि पक्षपात से ग्रसित हो जाएगी, तब अपनी ही बात को किसी न किसी प्रकार सिद्ध करने के लिए बुद्धि-कौशल चलता रहेगा। बुरी से बुरी बात को भली सिद्ध करने के लिए तर्क ढूँढे जा सकते हैं और अपने पक्ष के समर्थन में कितने ही तथ्य तथा उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं। इस तरह के विवादों का कभी अंत नहीं होता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 सहृदयता में जीवन की सार्थकता (भाग 1)

रूखापन जीवन का सबसे बड़ा दुश्मन है। कई आदमियों का स्वभाव बड़ा नीरस, रूखा शुष्क, निष्ठुर, कठोर और अनुदार होता है। उनका आत्मीयता का दायरा बहुत ही छोटा और संकुचित होता है । उस दायरे से बाहर के व्यक्तियों तथा पदार्थों में उन्हें कुछ दिलचस्पी नहीं होती, किसी की हानि लाभ, उन्नति अवनति, खुशी रंज, अच्छाई बुराई से उन्हें कुछ मतलब नहीं होता। अपने अत्यन्त ही छोटे दायरे में स्त्री, पुत्र, तिजोरी, मोटर, मकान आदि में उन्हें थोड़ा रस जरूर होता है। बाकी की अन्य वस्तुओं के प्रति उनके मन में बहुत ही अनुदारता पूर्ण रुखाई होती है।

कोई कोई तो इतने कंजूस होते है कि अपने शरीर के अतिरिक्त अपनी छाया पर भी उदारता या कृपा नहीं दिखाना चाहते। इससे भी महान कंजूस इतने बड़े चढ़े होते है कि ये कंजूसी में ही तन्मय हो जाते है, आत्मा के साथ कृपा करना तो दूर शरीर के साथ में भी उदारता दिखाना नहीं चाहते। अच्छे भोजन, अच्छे वस्त्र, अच्छे मकान आदि आवश्यक वस्तुओं में भी आवश्यकता से अधिक कठोरता करते है। ऐसे रूखे आदमी यह समझ ही नहीं सकते कि मनुष्य जीवन में कोई आनन्द भी है, अपने रूखेपन के अत्युत्तर में दुनिया उन्हें बड़ी रूखी, नीरस, कर्कश, खुदगर्ज, कठोर और कुरूप मालूम पड़ती है।

रूखापन जीवन की बड़ी भारी कुरूपता है रूखी रोटी में क्या मजा है, रूखे बाल कैसे खराब लगते है, रूखी मशीन में बड़ी आवाज होती है और पुर्जे जल्दी ही टूट जाते है रूखे रेगिस्तान में जहाँ रेत का सूखा हुआ समुद्र पड़ा है कौन रहना पसंद करेगा। वैसे तो प्राणिमात्र ही विशेष रूप से ऐसे तत्वों से निर्मित है जिसके लिए सरसता की, स्निग्धता की, आवश्यकता है। मनुष्य का अन्तःकरण रसिक है, कवि है भावुक है सौंदर्य उपासक है, कला प्रिय है प्रेम मय है। हृदय का यही गुण है, सहृदयता का अर्थ कोमलता, मधुरता,आर्द्रता है जिसमें यह गुण नहीं उसे हृदय हीन कहा जाता है। हृदय हीन का तात्पर्य है जड़ पशुओं से भी नीचा। नीतिकार का कथन है कि “संगीत साहित्य कला विहीन साक्षात पशुः पुच्छविषाण हीनः” इस उक्ति में कला विहीन-नीरस मनुष्य को पशुओं से भी नीचा ठहराया गया है क्योंकि पशुओं में तो सींग पूछ की दो विशेषताएं तब भी है उस मनुष्य में तो इसका भी अभाव है। 

.... शेष कल
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जून 1944 पृष्ठ 5


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सोमवार, 29 मई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 29 May 2023

गीता एक ऐसे समाज की कल्पना करती है, जिसमें प्रत्येक मानव को स्वतंत्रता और समानता का अधिकार है। मनुष्य और मनुष्य के बीच धर्म, जाति, वर्ण, लिंग और धन की दीवारें नहीं हैं। प्रत्येक मानव अपने स्वभाव के अनुसार अनासक्त और निष्काम होकर मानव जाति की सेवा में लगा रहना अपना कर्त्तव्य समझता है तथा अकर्मण्यता, आलस्य और असुरता को त्याज्य मानता है। उसकी अपनी कामनाएँ नहीं हैं। समाज की प्रगति और संपन्नता ही उसकी प्रगति और संपन्नता है।

परिवार का संतुलन सही रखना हो तो मोह से बचते हुए कर्त्तव्य तक सीमित रहना होगा। परिवार के लोगों के प्रति असाधारण मोह ही उनका स्तर गिराने और अपने कर्त्तव्य च्युत होने का प्रधान कारण होता है। यदि परिजनों की उचित-अनुचित माँगों को, प्रसन्नता-अप्रसन्नता को महत्त्व न दिया जाय और विवेक दृष्टि रखते हुए उनके कल्याण एवं अपने कर्त्तव्य भर की बात सोची जाय तो प्रत्येक परिवार का स्तर ऊँचा रह सकता है और उसमें से नर-रत्नों के उत्पन्न होने का आधार बन सकता है।

आदर्शवादी जीवन जीने का-महानता के प्रगति पथ पर चलने का हर किसी को अवसर मिल सकता है, यदि वासना, तृष्णा पर अंकुश रखा जाय और श्रेष्ठता अभिवर्धन की साध को जीवन्त, ज्योतिर्मय बनाया जाय। यह अति सरल है व कठिन भी। सरल इन अर्थों में कि निर्वाह के साधन सरल हैं, वे महानता के मार्ग पर चलते हुए भी सहज ही उपलब्ध होते रह सकते हैं। कठिन इसलिए कि पशु प्रवृत्तियों से पिण्ड छुड़ाना अति साहस का काम है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 जिन्दगी जीनी हो तो इस तरह जिये (अन्तिम भाग)

उत्साह और उल्लास बना रहने के लिए यह आवश्यक है कि अपने सामने कोई दूरगामी लक्ष्य रहे और यहाँ तक पहुँचने के लिए सोचने और करने के लिए बहुत कुछ काम सामने रहे। जीवन का आनन्द तभी तक है जब तक उसने सामने कुछ काम है। जिस दिन व्यक्ति पूर्णतया निश्चित होता है उस दिन या तो वह परमहंस होता है या जड़ मध्यवृत्ति के व्यक्ति के लिए यह स्थिति निरानन्द है और उसमें निराशा एवं निष्क्रियता मिश्रित थकान की ही अनुभूति होगी। उसे सोचना या करना भले ही कुछ न पड़े पर साथ ही आशा एवं तत्परता की ओर प्रेरित करने वाले उल्लास भरे प्रकाश से वंचित ही रहना पड़ेगा

जिम्मेदारियाँ दूसरों पर डालने की इच्छा इसलिए होती है कि उत्तरदायित्व का वजन उठाना कायर और कमजोरों को बहुत भारी प्रतीत होता है। वे पगडंडी ढूँढ़ते हैं और ऐसे सरल रास्ते बच निकलने की बात सोचते हैं जिसमें अपने ऊपर कुछ बोझ न पड़े पर वस्तुतः इसमें भटकाव के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। उत्थान और पतन का ही नहीं।, सुख और दुःख का उत्तरदायित्व भी हमें अपने ऊपर लेना चाहिए और सफलता असफलता की अपनी ही जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं है।

वर्तमान में जो परिस्थितियाँ सामने खड़ी है उनमें यत्किंचित् दूसरे भी निमित्त हो सकते हैं पर अधिकतर अपनी ही रीति-नीति और गतिविधियों की प्रतिक्रिया सामने रहती है। भविष्य में भी जो कुछ होना या बनना है उस में भी अपने ही क्रिया-कलापों के प्रतिफल सामने होगे। दूसरों का सहयोग अवरोध एक सीमा तक ही हमारा भला बुरा कर सकता है। तथ्य यह है कि अपना व्यक्तित्व ही हर दिशा में प्रतिध्वनि की तरह गूँजता है।

किन्हीं असफलताओं के लिए दूसरों को दोष देने की अपेक्षा यह अधिक लाभदायक है कि हम अपनी उन त्रुटियों को ढूँढ़े जिनके कारण सफलता से वंचित रहना पड़ा इसी तरह प्रगति की दिशा में जितने कदम बढ़ सके उनके पीछे उस सुव्यवस्थित रीति-नीति को समझे जिसे अपना कर हम स्वयं ही नहीं और भी कितने ही लोग आगे बढ़ सकने में समर्थ हुए हैं। सद्गुण ही किसी को ऊँचा उठा सकते ओर आगे बढ़ा सकते हैं। यह रहस्य जिन्हें विदित हो सका वे अपने को परिष्कृत करने में जुटते हैं ताकि एक के बाद दूसरी उत्कर्ष की परतें खुलती चलें।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जनवरी 1973 पृष्ठ 35

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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