भक्ति को किसी प्रमाण की आवश्यकता नही
महात्मा सत्यधृति के मुख से भक्त विमलतीर्थ के अनुभव सुनकर सभी भावलीन हो गए। भावनाएँ-भावनाओं को छूती हैं, इनके स्पर्श से अस्तित्त्व व व्यक्तित्त्व के केन्द्र में एक रहस्यमय हिलोर उठती है, जो समूचे व्यक्तित्व को स्पन्दित करती चली जाती है। भक्तिमन्त्र के द्रष्टा ऋषि नारद भक्तितत्त्व के परम अनुभवी व मर्मज्ञ थे। वे जानते थे कि भक्ति-भावनाओं का परिमार्जन-परिष्कार व रूपान्तरण करने में समर्थ है। बस आवश्यकता इसके सम्यक प्रयोग की है। जिसने भी जब यह प्रयोग जहाँ कहीं भी किया उसे सफलता अवश्य मिली। इसमें कहीं किसी तरह की विकलता, असफलता की कोई गुंजाइश ही नहीं।
देवर्षि नारद अपनी लय में सोचे जा रहे थे। अन्य सभी भी अपनी विचारविथियों में भ्रमण कर रहे थे। बाहर सब ओर मौन छाया था। पर्वत शिखर, उत्तुंग वृक्ष, औषधीय वनस्पत्तियाँ, यहाँ तक वन्य पशु सभी शान्त व स्थिर थे। कहीं से कोई स्वर नहीं था। ऐसा लग रहा था कि सारे रव, नीरव में समाहित हो गए हैं। काफी देर तक ऐसा ही बना रहा। पल-क्षण बीतते गए, परन्तु भक्ति की भावसमाधि यथावत बनी रही। लेकिन तभी अब तक स्तम्भित रही वायु मन्दगति से बह चली और धीरे-धीरे उसमें हिमपक्षियों के स्वर घुलने लगे। थोड़ी देर बाद हिमालयी वन्य पशुओं ने भी उसमें अपना रव घोला। वातावरण में ऐसी चैतन्यता अचानक उभरी, जैसे कि समूची प्रकृति अपनी समाधिलीनता त्यागकर अपने बाह्य जगत के कर्त्तव्यों के प्रति सजह, सचेष्ट हो गयी हो।
इस नयी स्थिति को अपने अनुभव में समेटते हुए महर्षि पुलह मुस्करा उठे। उनकी यह मुस्कराहट ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के मन को बेध गयी। उन्होंने बड़े मन्द स्वर में ऋषि पुलह से पूछा- ‘‘महर्षि अचानक आपकी इस मुस्कराहट का कोई प्रयोजन तो नहीं?’’ उत्तर में ऋषि पुलह ने पुनः अपनी उसी मुस्कान में स्वरों को घोलते हुए कहा- ‘‘लगता है हम सभी को मौन देखकर स्वयं प्रकृति मुखर हो उठी है।’’ महर्षि पुलह के इस अटपटे उत्तर को सुनकर ऋषि विश्वामित्र भी मुस्करा दिये। इन दोनों ऋषियों की मुस्कान ने वातावरण को और भी चैतन्य बना दिया। देवर्षि नारद के साथ अन्य सब अपनी विचार वीथियों से बाहर निकलकर जीवन की सामान्य सतह पर आ गए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३४
शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए
Shantikunj WhatsApp 8439014110





























