रविवार, 3 अप्रैल 2022

👉 आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 9

बेटे, सही क्रिया के प्रति मैं निराशा क्यों उत्पन्न करूँगा? मैंने क्रियाशीलता को जीवन में उतारा है। मैंने माला जपते जपते सन् १९५१ में इतना बड़ा तंत्र खड़ा किया है। मैंने अपने जीवन देवता को सँवारा है। मेरा बेशकीमती समय, सबसे बढ़िया और बेहतरीन समय पूजा में खर्च हुआ है, कर्मकाण्डों में खर्च हुआ है। सबसे बेहतरीन समय और सबसे बढ़िया सवेरे का समय होता है, जो मेरा पूजा में खर्च हुआ है, कर्मकाण्डों में खर्च हुआ है।

सवेरे वाले प्रातःकाल के समय जब गुरुदीक्षा दी जाती है, पढ़ने वाले विद्यार्थी पढ़ाई किया करते हैं और पहलवान लोग अखाड़े में पहलवानी किया करते हैं। संसार के इस सबसे बेहतरीन समय को मैंने कर्मकाण्डों में लगाया है। कर्मकाण्डों के प्रति आपकी आस्था को मैं क्यों कम करूँगा? आपके मन को क्यों डगमगाऊँगा और यह कहूँगा कि फेंक दो माला? न, मैं नहीं कह सकता।

मित्रो! माला मेरे प्राणों से प्यारी है। इसको मैं अपने सीने से लगाए रखता हूँ, हृदय में रखता हूँ। हनुमान् जी के पास भी यह माला थी। सीताजी ने जब उन्हें मोती की माला पहनाई, तो हनुमान् जी ने उसके मोती को तोड़ तोड़कर, घुमा घुमाकर देखा कि इस माला में मेरे रामजी कहाँ हैं।

सीता जी घबराईं। उन्होंने कहा कि राम कहीं माला में होते हैं क्या? हनुमान् जी ने कहा कि वह मेरे हृदय में रहते हैं। उन्होंने कहा कि हृदय चीरकर दिखाओ? हनुमान् जी ने अपना हृदय चीरकर दिखाया। हृदय में सीताराम बैठे हुए थे।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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