मंगलवार, 22 मार्च 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग ११७)

श्रेष्ठ ही नहीं, सुलभ भी है भक्ति

महात्मा सत्यधृति ने भक्त विमलतीर्थ की यह बात सुनाते हुए कहा- ‘‘उन परमभक्त की बात ने उन दिनों मुझमें नया विश्वास जगाया। मुझे उन्हें सुनकर उस समय ऐसा लगा था कि सब प्रकार की आध्यात्मिक अयोग्यताओं के बावजूद मैं भी भगवान की कृपा का अधिकारी बन सकता हूँ अन्यथा मैं तो स्वयं की ही सोच में डूबकर पूर्णतया निराश हो बैठा था। मुझे लगने लगा था कि जैसे मेरे लिए कोई आशा ही नहीं है लेकिन भक्त विमलतीर्थ ने मेरे अस्तित्त्व में अपनी बातों से नयी चेतना का संचार किया।’’

इतना कहते हुए सत्यधृति ने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ आदि महर्षियों की ओर देखा और बोले- ‘‘हे ऋषिगण! मेरे पास अपना कहने जैसा तो कुछ नहीं है, लेकिन यदि आप अनुमति दें, तो उन परमभक्त की कही हुई बातें आप लोगों के सामने रखने का प्रयास करूँ?’’ ‘‘अवश्य महात्मन्!  हम सब अवश्य सुनना चाहेंगे।’’ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के इस कथन का सभी ने हृदय से अनुमोदन किया। पिछले दिनों से महात्मा सत्यधृति के मुख से उनकी भक्तिगाथा सुनते हुए सभी को उनसे एक विचित्र सी निजता हो गयी थी। उपस्थित सभी जनों को वे अपने स्वजन लगने लगे थे। भक्त विमलतीर्थ की बातों को सभी और अधिक सुनना चाहते थे।

सबकी इस उत्कण्ठा से महात्मा सत्यधृति को तो जैसे मनमांगी मुराद मिल गयी। उन्होंने बड़े मीठे स्वर में कहना शुरू किया- ‘‘भक्त विमलतीर्थ का कहना था- यदि पुण्य अथवा पाप प्रबल हो तो आध्यात्मिक साधनाएँ सम्भव नहीं बन पड़तीं क्योंकि पुण्य अपने परिणाम में सुख-समृद्धि के साथ इतने दायित्व ला देता है कि इनके चलते साधनाएँ सम्भव नहीं हो पातीं। इसी तरह पाप अपने परिणाम में विपदाओं के इतने झंझावात खड़े कर देता है कि आध्यात्मिक साधना के बारे में सोचना तक सम्भव नहीं हो पाता। इन दोनों ही स्थितियों में सम्भव और सुगम है- भगवान का स्मरण। इस स्मरण से पाप हो अथवा पुण्य, दोनों का कर्मभार हल्का होने लगता है।

भगवान का स्मरण जैसे-जैसे गहरा व प्रगाढ़ होता है, वैसे-वैसे भगवान के प्रति भाव गहरे होते जाते हैं और उनके मिलने की अभिलाषा भी तीव्र होने लगती है। यह तीव्र अभिलाषा जब विरह का रूप धारण करने लगे तो समझो कि अस्तित्त्व व अन्तःकरण में भक्ति का उदय हो गया। विरह की वेदना के साथ स्मरण व समर्पण दोनों ही गहरे हो जाते हैं। इनकी गहराई में जीवात्मा के पाप व पुण्य, दोनों ही गहरे डूब जाते हैं। जीवन समस्त कर्मभार से मुक्त होने लगता है। यह मार्ग सभी के लिए सुलभ है। इस सर्वसुलभ पथ पर कोई भी चल सकता है। जैसे-जैसे भक्त अपने भक्तिपथ पर चलता है, स्वयं भगवान आगे बढ़कर उसके अवरोध हटा देते हैं। फिर न कोई सम्पदा बाधा बनती है और न ही कोई आपदा। बस मन प्रभुनाम के मनन में लीन होता चला जाता है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३२

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