सोमवार, 8 मार्च 2021

👉 शान्ति और सुव्यवस्था का आधार

आज के समय में मनुष्य के बाहर भीतर शांति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने के लिए आध्यात्मिक प्रयास ही सार्थक हो सकते हैं। श्रद्धा, भावना, तत्परता एवं गहराई इन्हीं में समाहित है। हर मानव का धर्म, सामान्य से ऊपर, वह कर्त्तव्य है, जिसे अपनाकर लौकिक-आत्मिक उत्कर्ष के मार्ग प्रशस्त हो जाते हैं। धर्म अर्थात् जिसे धारण करने से व्यक्ति एवं समाज का सर्वांगीण हित साधन होता है।
    
आस्तिकता और कर्त्तव्य परायणता को मानव जीवन का धर्म-कर्त्तव्य माना गया है। इनका प्रभाव सबसे पहले अपने समीपवर्ती स्वजन शरीर पर पड़ता है। इसलिए शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर, आत्मसंयम और नियमितता द्वारा उसकी सदैव रक्षा करनी चाहिए। शरीर की तरह मन को भी स्वच्छ रखना आवश्यक है। इसे कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखनी पड़ती है।
    
मन और शरीर के बाद व्यक्ति जिस समाज में रहता है, अपने आपको उसका एक अभिन्न अंग मानना चाहिए। सबके हित में अपना हित समझना सामाजिक न्याय का अकाट्य सिद्धान्त है। एक वर्ग के साथ अन्याय होगा, तो दूसरा वर्ग कभी भी शांतिपूर्ण जीवनयापन न कर सकेगा। इसलिए इस सिद्धान्त की कभी भी उपेक्षा हितकर नहीं। सुख केवल हमारी मान्यता और अभ्यास के अनुसार होता है, जबकि हित शाश्वत सिद्धान्तों से जुड़ा है।
    
संसार एक दर्पण के समान है। हम जैसे हैं, वैसी ही छाया दर्पण में दिखाई पड़ती है। सन्तों, सज्जनों का सम्मान होता है, तो दुर्जन, स्वार्थी, कुकर्मियों की घृणा तथा प्रताड़ना की जाती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर नागरिकता-नैतिकता, मानवता, सच्चरित्रता, सहिष्णुता-श्रमशीलता जैसे सद्गुणों को सच्ची सम्पत्ति समझकर इन्हें व्यक्तिगत जीवन में निरन्तर बढ़ाना जरूरी है। शास्त्रों में आत्मनिर्माण हेतु साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा यह चार साधन बताये गये हैं। ईश्वर उपासना को दैनिक जीवन में स्थान देना साधना है।
    
मनुष्य के पास सर्वोत्तम विशेषता उसकी बुद्धि की ही है। विचारों का सही एवं सुसंस्कृत बनना स्वाध्याय पर निर्भर है। शक्तियों एवं विभूतियों को निरर्थक, हानिकारक तथा कम महत्त्व के प्रसंगों से हटाकर उन्हें सार्थक हितकारी तथा  अधिक उपयोगी विषयों में ठीक प्रकार नियोजित करना ही संयम कहलाता है। मनुष्य का विकास कितना हुआ, इसका प्रमाण उसकी सेवावृत्ति से लगाया जा सकता है। अतः सेवा को अनिवार्य रूप से जीवन में स्थान देना चाहिए।
    
सामान्य स्थिति में व्यक्ति वातावरण से प्रभावित होता है, पर अन्तरंग श्रेष्ठता का विकास होने पर वह वातावरण को प्रभावित करने लगता है। उसके व्यक्तित्व में जादू जैसा प्रभाव आ जाता है। चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करने से सभ्य समाज की रचना होने लगती है।
    
लोगों की  दृष्टि में सफलता का ही मूल्य है। जो सफल हो गया उसी की प्रशंसा की जाती है। बल्कि अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करने वालों की ही सम्मान एवं प्रशंसा होनी चाहिए। मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, बल्कि उनके सद्विचारों और सत्कर्मों को माना जाय।
    
दूसरों के साथ वह व्यवहार नहीं करना चाहिए, जो हमें अपने लिए पसन्द नहीं। इस व्यवहार में ईमानदारी का स्थान सर्वोपरि है, अतः ईमानदारी और परिश्रम की कमाई ही ग्रहण करना उचित समझेंगे।
    
पुरुषार्थ एक नियम है और भाग्य उसका अपवाद। हमें यह जानना चाहिए कि ब्रह्माजी किसी का भाग्य नहीं लिखते, हर मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं आप है। इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनायेंगे, तो वर्तमान की अशांति और अव्यवस्था की स्थिति को शांति और सुव्यवस्था में बदला जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मैं नारी हूँ।


मैं नारी हूँ, मैं शक्ति हूँ ,मैं देवी हूँ, अवतारी हूँ मैं।
अबला कभी समझ मत लेना,ज्वाला हूँ,चिंगारी हूँ मैं ।।
 
कल्याणी, भवानी, सीता भी मैं,गायत्री गंगा गीता भी मैं।
माँ हूँ तो कन्या भी हूँ मैं, भगिनी,बहु,परिणीता भी मैं।।
मुझको डरना मत सिखलाना, मैं दुर्गा हूँ, काली हूँ मैं।
अबला कभी समझ मत लेना, ज्वाला हूँ,चिंगारी हूँ मैं।।
 
वसुंधरा सी सहिष्णुता और सागर की गहराई मुझमें।
सृष्टि चक्र की धुरी हूँ मैं, जीवन मूल समायी मुझमें।।
प्रलय के झंझावातों में भी, शीतलता हूँ,फुलवारी हूँ मैं।
अबला कभी समझ मत लेना, ज्वाला हूँ,चिंगारी हूँ मैं।।
 
मरू का निर्झर, शांत प्रखर,उन्मुक्त प्रवाह की सरिता हूँ मैं।
सबके हित जीती मैं औरत, सहचरी,श्रीमती,वनिता हूँ मैं।।
किसी का भी नहीं मैं दुश्मन, हर दुश्मन पर भारी हूँ मैं।
अबला कभी समझ मत लेना, ज्वाला हूँ,चिंगारी हूँ मैं।।
 
रण में हूँ मैं ,धन में  हूँ मैं, कला,कौशल,विधान में मैं हूँ।
अभिनय,खेल,विज्ञान में हूँ मैं,तकनीकी अभियान में मैं हूँ।।
सम्पूर्ण जगत की जननी मैं हूँ, स्त्री हूँ मैं,न्यारी हूँ मैं।
अबला कभी समझ मत लेना, ज्वाला हूँ,चिंगारी हूँ मैं।।
मैं नारी हूँ, मैं शक्ति हूँ ,मैं देवी हूँ, अवतारी हूँ मैं।।

उमेश यादव

👉 उठो नारियों आगे आओ

सभी नारी शक्तियों को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

उठो नारियों आगे आओ
संस्कृति के उत्थान के लिए, उठो नारियों आगे आओ।
राष्ट्र धर्म को जागृत करने,नए सृजन का शंख बजाओ।।

भूल रहें हैं नीति धर्म सब,व्यसनों में हम फंसे हुए हैं।
दान पुण्य से  दूर  हो रहे, पाप पंक में धंसे  हुए हैं।।
ममता,शुचिता,करुणामय हो,सब में प्रेम-भाव विकासाओ।
संस्कृति के उत्थान के लिए, उठो नारियों आगे आओ।।
 
संस्कारों से  दूर हो  रहे, मानवता को यूँ ही खो रहे।
जीर्ण-शीर्ण हो रही सभ्यता,भ्रम-रूढ़ियाँ अब भी ढो रहे।।
शक्ति हो,पहचानो खुद को,बढकर आगे शौर्य दिखाओ।
संस्कृति के उत्थान के लिए, उठो नारियों आगे आओ।।
 
महिला का अपमान हो रहा,कन्या का बलिदान हो रहा।
वनिता अब चीत्कार रही है,पशुता का सम्मान हो रहा।।
मातृ रूप में हे अम्बे तुम, स्नेह, प्यार, सहकार बढ़ाओ।
संस्कृति के उत्थान के लिए, उठो नारियों आगे आओ।।
 
जननी हो सम्पूर्ण जगत की,सब तेरे बालक बच्चे हैं।
इन्हें नीति सिखलाओ घर से,भटक गए तेरे बच्चे हैं।।
संस्कारों से इन्हें सुधारो,निर्दयी नहीं अब देव बनाओ।
संस्कृति के उत्थान के लिए, उठो नारियों आगे आओ।।

उमेश यादव

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें (अंतिम भाग)

विचार- क्रान्ति का मूल यही रत्रतन्त्र चिन्तन है। जन- मानस को उसी की प्राथमिक शिक्षा दी जानी है। अभी हमारी योजना का प्रथम चरण यही है। अगले चरणों में तो अनेक रचनात्मक और अनेक संघर्षात्मक काम करने को पड़े हैं। युग परिवर्तन और घरती पर स्वर्ग का अवतरण अगणित प्रयासों की अपेक्षा रखता है। वह बहुत व्यापक और बहुमुखी योजना हमारे मस्तिष्क में है। उसकी एक हलकी- सी झाकी गत दिनों योजना में करा भी चुके हैं। बह हमारा रचनात्मक प्रयास होगा। संघर्षात्मक पथ एक और ही जिसके अनुसार अवांछनीयता, अनैतिकता एवं अरामाजिकता के विरुद्ध प्रचलित 'घिराव' जैसे भाध्यमों से लेकर समग्र बहिष्कार तक और उतनी अधिक दबाव देने की प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं जिससे दुष्टुता भी बोल जाय और उच्छ्खनता का कचू- मर निकल जाय। सजग, समर्थ लोगों की एक सक्रिय  स्वय- सेवक सेना प्राण हथेली पर रखकर खड़ी हो जाय तो आज जिन अनैतिकताओं का चारों और बोलबाला है और जो न हटने वालो न टलने वाली दीखती हैं। आंधी में उड़ते तिनकों की तरह तिरोहित हो जाँयगी।

वे बातें पीछे की हैं आज तो बिचार- क्रान्ति का प्रथम चरण उठाया जाना आवश्यक है ! अभी तो गहरी खुमारी में अवांछनीय रूप से देखने वालों को जगाया जाना ही प्रथम कार्य है जिसके बाद और कुछ सोचा और किया जाना सम्भव है। इसलिए लोक- शिक्षण को अनिवार्य आव श्यकता की पूर्ति के लिए अभी अपना प्रथम अभियान चल रहा है। इसके अन्तर्गत हमें अशुद्ध विचारों के दुष्परिणाम और सद्विचारों की उपयोगिता तथा स्वतन्त्र चिन्तन को पद्धति मात्र मिखानी बतानी है। इसी का क्षेत्र व्यापक बनाना है। परिजनों के समक्ष इस अंक में प्रस्तुत योजना इसी उद्देश्य के लिए उपस्थित की गई है जो सचमुच हमें प्यार करते हों- जो सचमुच हमारे निकट हों- जिन्हें सचमुच हमसे दिलचस्पी हो- उन्हें इसके लिए प्रस्तुत योजना को कार्यान्वित करने के लिए बीस महीने की इम तप- साधना में संलग्न होना ही चाहिये। हमारे लिए यदि कोई कुछ विदाई उपहार देना चाहते हों तो वह इस योजना में सम्मिलित होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकता।

विचार- क्रान्ति के प्रथम चरण की प्रस्तुत योजना के दो आधार हैं। प्रति दिन थोड़ा- थोड़ा अथवा छुट्टी के दिन पूरा समय देना। दूसरी अपनी आजीविका का एक अंश इस पुण्य प्रयोजन में नियमित रूप से लगाना। महीने में एक दिन उपवास ही क्यों न करना पड़े- चाहे किसी आवश्यकता में कटौती ही क्यों न करनी पड़े पर इतना त्याग बलिदान तो किया ही जाना चाहिये। नियमितता से स्वभाव एवं अभ्यास का निर्माण होता है इसलिए एक बार थोड़ा समय या थोड़ा पैसा दे देने से काम न चलेगा इसमें नियमितता जुड़ी रहनी चाहिये। लगातार की नियमितता को ही साधना कहते हैं। जो कम ज्यादा समय या धन खर्च करना चाहें वे वैसा कर सकते हैं। पर होना सब कुछ नियमित हो चाहिये। लगातार चलने से मंजिल पार होती है। एक क्षण की उछाल चमत्कृत तो करती है पर उससे लम्बी मंजिल का पार होना सम्भव नहीं। इसलिए किसी से बड़ी धन राशि की याचना नहीं की है भले ही योड़ा- थोड़ा हो पर नियमित रूप से कुछ करते रहने के लिए कहा गया है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1986

👉 चिंतन के क्षण Chintan Ke Kshan 5 Mar 2021

◆ समय की चूक पश्चाताप की हूक बन जाती है। जीवन में कुछ करने की इच्छा रखने वालों को चाहिए कि वे अपने किसी भी कर्त्तव्य को भूलकर भी कल पर न डालें जो आज किया जाना चाहिए। आज के काम के लिए आज का ही दिन निश्चित है और कल के काम के लिए कल का दिन निर्धारित है। आज का काम कल पर डाल देने से कल का भार दो-गुना हो जाएगा जो निश्चय की कल के समय में पूरा नहीं हो सकता। इस प्रकार आज का कल पर और कल का परसों पर ठेला हुआ काम इतना बढ़ जाएगा कि वह फिर किसी प्रकार पूरा नहीं किया जा सकता। जिस स्थगनशील स्वभाव तथा दीर्घसूत्री मनोवृत्ति ने आपका काम आज नहीं करने दिया, वह कल करने देगी ऐसा नहीं माना जा सकता। स्थगन-स्थगन को और क्रिया-क्रिया को प्रोत्साहित करती है यह प्रकृति का एक निश्चित नियम है।

◇ जीवन में सफलता के लिए जहाँ परिश्रम एवं पुरुषार्थ की अनिवार्य आवश्यकता है, वहाँ सामयिकता का सामंजस्य उससे भी अधिक आवश्यक है। जिस वक्त को बरबाद कर दिया जाता है उस वक्त में किया जाने के लिए निर्धारित श्रम भी निष्क्रिय रहकर नष्ट हो जाता है। श्रम तभी सम्पत्ति बनता है, जब वह वक्त से संयोजित कर दिया जाता है और वक्त तभी संपदा के रूप में सम्पन्नता एवं सफलता ला सकता है, जब उसका श्रम के साथ सदुपयोग किया जाता है। समय का सदुपयोग करने वाले स्वभावत: परिश्रमी बन जाते हैं जबकि असामयिक परिश्रमी, आलसी की कोटि का ही व्यक्ति होता है। वक्त का सदुपयोग ही वास्तविक श्रम है और वास्तविक श्रम, अर्थ, धर्म, काम मोक्ष का संवाहन पुरुषार्थ एवं परमार्थ है।

◆ यदि हम दिनचर्या नियत निर्धारित कर लें और उस पर सावधानी के साथ चलते रहें तो देखा जाएगा कि शरीर ही नहीं मन भी उसके लिए पूरी तरह तैयार रहता है। पूजा-उपासना, साहित्य-सृजन, व्यायाम आदि के लिए यदि समय निर्धारित हो तो देखा जाएगा कि सारा कार्य बड़ी सुंदरता और सफलतापूर्वक सम्पन्न होता चला जाता है। इसके विपरित यदि आए दिन दिनचर्या में उलट-पुलट की जाती रहे तो अंतरंग की स्वचालित प्रक्रिया अस्त-व्यस्त एवं अभ्यस्त हो जाएगी और हर कार्य शरीर से बलात्कारपूर्वक ही कराया जा सकेगा और वह औंधा-सीधा ही होगा, उसकी सर्वांग पूर्णता की संभावना आधी-अधूरी ही रह जाएगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 4 मार्च 2021

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें (भाग २)

कभी हमने पूर्व जन्मों के सत् संस्कार वालों और अपने साथी सहचरों को बड़े प्रयत्नपूर्वक ढूंढा है और 'अखण्ड- ज्योति परिवार की शृद्खला में गूंथकर एक सुन्दर गुलदस्ता तैयार किया था। मंशा थी इन्हें देवता के चरणों में चढ़ा येंगे। पर अब जब जब कि बारीकी से नजर डालते हैं कि कभी के अति सुरम्य पुष्प अब परिस्थितियों ने बुरी तरह विकृत कर दिये है। वे अपनो कोमलता, शोभा और सुगंध तोनों ही खोकर बुरी तरह इतनी मुरझा गये कि हिलाते- दुलाते हैं तो भी सजीवता नहीं आती उलटी पंखड़ियाँ भर जाती हैं। ऐसे पुष्पों को फेंकना तो नहीं है क्योंकि मूल संस्कार जब तक विद्यमान हैं तब तक यह आशा भी है कि कभी समय आने पर इनका भी कुछ सदुपयोग सम्भव होगा, किसी औषधि में यह मुरझाये फूल भी कभी काम आयेंगे। पर आज तो देव देवो पर चढ़ाये जाने योग्य सुरभित पुष्पों की आवश्यकता है सो उन्हीं की छांट करनी पड़ रही है। 

अभी आज तो सजीवता ही अभीष्ट है और वस्तुस्थिति की परख तो कहने- सुनने- देखने- मानने से नहीं वरन् कसौटी पर कसने से ही होता है। सो परिवार को सजोवता- निर्जीवता- आत्मीयता, विडम्बना के अंश परखने के लिए यह वर्तमान प्रक्रिया प्रस्तुत की है। अगले बीस महीनों में यथार्थता आजायगो और जन- सम्पर्क की दिशा में किये हुए अपने  प्रयासों की सफलता- असफलता का एक सही निष्कर्ष साथ लेकर हम विदा हो सकेंगे यह इसलिए भी आवश्यक है कि यहाँ से जाने के बाद हमें किसके लिए क्या और कितना करना है इसके सम्बन्ध में भी अपनी दृष्टि साफ हो जायगी। बेकार की घचापच छट जाने से अपने अन्तरिम परिवार को एक छोटी सीमा अपने लिए भी हलकी पड़ेगी बौर अधिक ध्यान से सींचे- पोसे जाने के कारण वे पौधे भी अधिक लाभान्वित होंगे 

नव- निर्माण के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है। विचार- प्रसार तो उसका बीजारोपण है। इसके बिना कोई गति नहीं। अक्षर ज्ञान की शिक्षा पाये बिना ऊंची पढ़ाई की न तो आशा है न सम्भावना है। इसलिए प्रारम्भ में हर किसी को अक्षर ज्ञान कराना अनिवार्य है। पीछे जिसकी जैमी अभिरुचि हो शिक्षा के विषय चुनना रह सकता है पर अनिवार्य में छूट किसी को नहीं मिल सकती। प्रारम्भिक अक्षर सबको समान रूप में  पढ़ने पड़े गे। विचारों की उप- योगिता, महत्ता, शक्ति और प्रमुखता का रहस्य हर किसी के मस्तिष्क में कूट- कूट कर भरा जाना है और बताया जाना है कि व्यक्ति की महानता और समाज की प्रखरता उसमें सक्षिप्त विचार पद्धति पर ही सन्निहित है। परिस्थितियों के बिगड़ने- बनने का एकमात्र आधार विचारणा ही है। विवेक के प्रकाश में यह परखा जाना चाहिये कि हमने अपने ऊपर कितने अवांछनीय और अनुपयुक्त  विचार अंट रखे है और उनने हमारी कितनी लोमहर्षक दुर्गति की है। हमें तत्त्वदर्शी की तरह वस्तुस्थिति का विश्लेषण करना होगा और निर्णय करना होगा कि किन आदर्शों और उत्कृष्टताओं को अपनाने के लिए कठिबद्ध हों ताकि वर्तमान के नरक को हटाकर उज्ज्वल भविष्य की स्वर्गीय सम्भावनाओं को मूर्तिमान् बना सकना सम्भव हो सके। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1986 

👉 चिंतन के क्षण Chintan Ke Kshan 4 Mar 2021

आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने वाले भी जब समय का ठीक-ठाक उपयोग नहीं कर पाते, इस सम्बन्ध में जागरूक और विवेकशील नहीं होते तो बड़ा आश्चर्य होता है। इससे अच्छे तो वे लोग ही है, जो बेचारे किसी प्रकार जीवन-निर्वाह के साधन और आजीविका जुटाने में ही लगे रहते हैं। उन्हें यह पछतावा तो नहीं होता है कि जीवन के बहुमूल्य क्षणों का पूर्ण उपयोग नहीं कर सके। आजीविका भी अध्यात्म का एक अंग है, अतएव सम्पूर्ण न सही, कुछ अंशों में तो उन्होंने मानव-जीवन का सदुपयोग किया। हाथ पर हाथ रखकर आलस्य में समय गँवाने वाले सामाजिक जीवन में गड़बड़ी ही फैलाते हैं, भले ही वे कितने ही बुद्धिमान, भजनोपदेशक, कथावाचक, पण्डित या संत-सन्यासी ही क्यों न हों। समय का सदुपयोग करने वाला घसियारा बेकार बैठे रहने वाले पण्डित से बढक़र है, क्योंकि वह समाज को किसी न किसी रूप में समुन्नत बनाने का प्रयास करता ही है।

रस्किन के शब्दों में- ‘‘जवानी का समय तो विश्राम के नाम पर नष्ट करना ही घोर मूर्खता है क्योंकि यही वह समय है जिसमें मनुष्य अपने जीवन का, अपने भाग्य का निर्माण कर सकता है। जिस तरह लोहा ठण्डा पड़ जाने पर घन पटकने से कोई लाभ नहीं, उसी तरह अवसर निकल जाने पर मनुष्य प्रयत्न भी व्यर्थ चला जाता है। विश्राम करें, अवश्यक करें। अधिक कार्यक्षमता प्राप्त करने के लिए विश्राम आवश्यक है, लेकिन उसका भी समय निश्चित कर लेनाचाहिए और विश्राम के लिए ही लेटना चाहिए।’’

मनुष्य कितना ही परिश्रमी क्यों न हो यदि वह अपने परिश्रम के साथ ठीक समय का सामंजस्य नहीं करेगा तो निश्चय ही उसका श्रम या तो निष्फल चला जाएगा अथवा अपेक्षित फल न ला सकेगा। किसान परिश्रमी है, किंतु यदि वह अपने श्रम को समय पर काम में नहीं लाता तो वह अपने परिश्रम का पूरा लाभ नहीं उठा सकता। वक्त पर न जोतकर असमय  पर जोता खेत अपनी उर्वरता को प्रकट नहीं कर पाता। असमय बोया हुआ बीज बेकार चला जाता है, वक्त पर न काटी गई फसल नष्ट हो जाती है। संसार में प्रत्येक काम के लिए निश्चित वक्त  पर न किया हुआ काम कितना भी परिश्रम करने पर भी सफल नहीं होता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 2 मार्च 2021

👉 स्फटिक मणि सा बनाइये मन

असंभव को संभव बनाने वाला अन्तर्यात्रा का विज्ञान उनके लिए ही है जो अंतर्चेतना के वैज्ञानिक होने के लिए तत्पर हैं। योग साधक भी रहस्यवेत्ता वैज्ञानिक होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि सामान्य पदार्थ वैज्ञानिक बाह्य प्रकृति एवं पदार्थों को लेकर अनुसंधान करते हैं, जबकि योग साधक आंतरिक प्रकृति एवं चेतना को लेकर अनुसंधान करते हैं। जिस जीवन को साधारण लोग दुःखों का पिटारा या फिर सुख-भोग का साधन समझते हैं, उसमें से वह अलौकिक आध्यात्मिक विभूतियों के मणि-मुक्तकों का अनुसंधान कर लेता है। 
 
ध्यान की परम प्रगाढ़ता संस्कारों की काई-कीचड़ को धो डालती है। हालाँकि यह सब होता मुश्किल है, क्योंकि एक-एक संस्कार को मिटने-हरने में भारी श्रम, समय एवं साधना की जरूरत पड़ती है। इन तक पहुँचने से पहले मन की उर्मियों को शान्त करना पड़ता है। मन की लहरें जब थमती हैं, मन की शक्तियाँ जब क्षीण होती हैं, तभी साधना गहरी व गहन होती है। 
मन का अपना कोई विशेष अस्तित्व नहीं। यह तो बस विचारों-भावों की लहरों का प्रवाह है। इन लहरों की गति एवं तीव्रता कुछ ऐसी है कि मन का अस्तित्व भासता है। सारी उम्र ये लहरें न तो थमती है और न मिटती है।  आम जन के लिए तो मन को नियंत्रित करना कठिन है, पर ध्यान इन कठिन को सम्भव बनाता है। ध्यान ज्यों-ज्यों गहरा होता है, मन की लहरें शान्त पड़ती जाती हैं और इस शान्ति के साथ प्रकट होती है-एक अद्भुत स्वच्छता, जिसे महर्षि शुद्ध स्फटिक की भाँति कहते हैं। मन-मन में भेद है। मन कोयला भी है और हीरा भी। विचारों के शोरगुल, विचारों के धूल भरे तूफान में इसका शुद्ध स्वरूप प्रकट नहीं होता है। ध्यान की गहनता इसे सम्भव बनाती है। जो ध्यान करते हैं, इसे अनुभव करते हैं। यह अनुभूति उन्हें शान्ति भी देती है और ऊर्जा भी। इसी से ज्ञान की नवीन किरणें भी फूटती और फैलती हैं। 
यह मन की विशेष अवस्था है, जिसका अहसास केवल उन्हीं को हो सकता है, जिन्होंने इसे जिया हो-अनुभव किया हो। क्योंकि यह मन की वर्तमान अवस्था एवं व्यवस्थता से एकदम उलट है। जहाँ वर्तमान में अज्ञान, अशान्ति एवं असक्ति छायी रहती है। वही इसमें ज्ञान, शान्ति एवं ऊर्जा के नये-नये रूप भासते हैं। जीवन का हरपल-हरक्षण ज्ञानदायी, शान्तिदायी एवं ऊर्जादायी होता है। और यह सब होता है बिना किसी बाहरी साधन-सुविधाओं की बैशाखी का सहारा लिये। 
अभी तो स्थिति है कि ज्ञान चाहिए तो पढ़ो, सीखो, शान्ति चाहिए तो शान्त वातावरण तलाशो और शक्ति चाहिए तो शरीर व मन को स्वस्थ रखने की कवायद करो। पर इस अद्भुत अवस्था वाला मन तो जब, जहाँ, जिस वस्तु, विषय अथवा विचार पर एकाग्र होता है, वही वह उससे तदाकार हो जाता है।
यही नहीं वह जिसे भी अपने ध्यान का विषय बना ले, उसी के सभी रहस्यों को अनुभव कर सकता है। तदाकार होने की यह अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि है। इसके अवलम्बन से किसी भी वस्तु, व्यक्ति, विषय, विचार के यथार्थ को जाना जा सकता है। ऐसे व्यक्ति के ध्यान की एकाग्रता में सब कुछ बड़े स्पष्ट रीति से साफ-साफ प्रतिबिम्बित होता है। ऐसा सम्प्रज्ञात समाधि पाने वाला योगी जब जो चाहे देख-जान सकता है। 
योग साधक जिसका चित्त स्फटिक की भाँति स्वच्छ है, उसके संकल्प मात्र से, तनिक सा एकाग्र होने पर उसे सब कुछ अनुभव होने लगता है। परन्तु इसमें अभी तर्क की सीमाएँ बनी रहती हैं। विकल्प की अवस्था बनी रहती है। वह इस अवस्था को पाने के बाद भी भेदों के पार नहीं जा पाता। सीमाबद्ध होता है, उसका ज्ञान। सीमाओं से मुक्त होने के लिए तो समाधि की निर्वितर्क अवस्था चाहिए। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें (भाग १)

जीवन की गति एक ही दिशा में चलते- चलते -- विचार और प्रक्रिया का एक ही प्रवाह बहते रहने- आत्मा और परमात्मा की एक ही सम्मिलित प्रेरणा अनुभव करते- करते कर्तव्य और धर्म का एक ही निर्देश- संकेत देखते- देखते अब हमारा व्यक्तित्व निर्दिष्ट लक्ष्य में एक प्रकार से तन्मय एवं सघन हो गया है। अलग से अपनी कोई हस्ती कोई सत्ता सही नहीं। जो हमें प्यार करता हो- उसे हमारे मिशन से भी प्यार करना चाहिए। जो हमारे मिशन की उपेक्षा, तिरस्कार करता है लगता है वह हमें ही उपेक्षित तिरस्कृत कर रहा है। व्यक्तिगत रूप से कोई हमारी कितनी ही उपेक्षा करे पर यदि हमारे मिशन के प्रति श्रद्धावान् उनके लिए कुछ करता, सोचता है तो लगता है मानो हमारे ऊपर अमृत बिखेर रहा है और चन्दन लेप रहा है। किन्तु यदि केवल हमारे व्यक्तित्व के प्रति ही श्रद्धा है- शरीर से ही मोह है- उसी की प्रशिस्त पूजा को जाती है। यदि मिशन की बात उठाकर ताक पर रख दी जाती है तो लगता है हमारे प्राण का तिरस्कार करते हुए केवल शरीर पर पंखा रुलाया जा रहा हो। 

अपनी- अपनी मनोदशा हो तो है। लोगों की दृष्टि में व्यक्ति पूजा पर्याप्त है- मिशन के झंझट में पड़ने की जरूरत नहीं। अपनी दृष्टि में शरीर- पूजा बुत परस्ती मात्र है, देव- पूजा तो श्रद्धास्पद प्राण प्रवाह के साथ बहने से है लोग अपनी जिस अभिव्यंजना को पर्याप्त मानते हैं हमारे लिए वह निरर्थक है क्योंकि शरीर के साथ किये हुए सद्व्यवहार आत्मा के गहरे परतों तक पहुँचते- पहुँचते बीच में ही क्षीण विलीन हो जाते हैं। अपनी मनोदशा मिशन को आगे बढ़ते देख कर प्रसन्न और सन्तुष्ट होने की है, अब उसी में अपना सारा आनन्द, उल्लास केन्द्रीभूत हो गया है। सो जो कोई उस दिशा में आगे बढ़ता दीखता है, लगता है अपने कर्तव्य के लिए ही नहीं हमारे लिए भी बहुत कुछ करने में संलग्न है। ऐसे लोगों के प्रति हमारी श्रद्धा, कृतज्ञता, ममता और सहानुभूति का अन्तः प्रवाह अनायास ही प्रवाहित होने लगता है। बाहर से संकोचवश कुछ न कह सकें पर भीतर ही भीतर ऐसा कुछ उमड़ता उमड़ता रहता है जो कहता है कि इस पर कितना प्यार बखेर दें, कितनी आत्मीयता उड़ेल दें, जो कुछ अपने पास है सो सब कुछ उसके ऊपर निछावर करने को जी करता है। 

वस्तुतः अब शरीर की सेवा समीपता से नहीं भावना और आदर्शों की प्रखरता ही से अपने को शान्ति और सन्तुष्टि मिलती है किसी से हमारी कितनों निकटता है उसकी परख अब इसी कसौटी पर कसने हैं कि उसने हमारे कन्धे से कन्धा मिलाकर कितना भार बँटाया और हमारे कदमों से कदम मिलाकर कितनी सह यात्रा की। निन्दा, स्तुति अपने लिए समान हैं। जब व्यक्तित्व रहा ही नहीं- मिशन में घुल गया तो उस मृतप्राय सत्ता से शरीर कलेवर से अपना मोह हो क्या है ?? फिर उसकी पूजा- प्रशंसा और अभ्यर्थना का अपने ऊपर क्या प्रभाव पड़े। कामनाओं, आकांक्षाओं और अभावों की सांसारिक सीमा समाप्त हो गई तो उसकी उपलब्धि में रस भी क्या ?? अपनी सारी सरसता अब अपने लक्ष्य मिशन में है, उसी क्षेत्र की उत्साहवर्धक हलचल आशा, उल्लास और सन्तोष की भूमिका प्रस्तुत करती है। सो अपने विशाल परिवार में कहीं सच्ची आत्मीयता का कितना अंश विद्यमान है यह जानने की इच्छा होती है तो इसी कसौटी पर कसकर वस्तुस्थिति जान लेते हैं कि हमारा दर्द किस- किस की नसों में और कितनी मात्रा में भर चला और हमारी आग की कितनी चिनगारियाँ कितने अंशों में किसके कलेजे में सुलगने लगीं। अपनी- अपनी मनोदशा ही तो है। लोगों के सोचने का ढंग जो भी हो अपनी- अपनी तो यही प्रकृति बन गई। मजबूरी अपनी भी है जो अपने को हमारे सम्मुख अपने लौकिक व्यवहार से प्रियजन सिद्ध करना चाहते हैं वे हमें निरर्थक लगते हैं किन्तु जो कभी मिलते भी नहीं, पत्र भी नहीं लिखते, प्रशंसा- पूजा का हलका- सा भी प्रयत्न नहीं करते वे प्राणप्रिय और अति समीप लगते हैं यदि मिशन के लिए कुछ काम कर रहे हैं। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1969 

सोमवार, 1 मार्च 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (अंतिम भाग)

सारे नियंत्रणों पर नियंत्रण है—निर्बीज समाधि
इस सम्बन्ध में युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव एक गुरुभक्त के जीवन की सच्ची घटना सुनाते थे। इन महाभाग का नाम ‘रामलगन’ था। मध्य प्रदेश के छोटे से गाँव में छोटी सी दूकान और जमीन के छोटे से टुकड़े पर गुजर-बसर करने वाला यह रामलगन साधारण सा गरीब गृहस्थ था। किन्हीं शुभ संस्कारों के उदय होने से उसे ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका मिली और वह परम पूज्य गुरुदेव के सम्पर्क में आ गया। रामलगन की पढ़ाई-लिखाई बस साधारण अक्षर ज्ञान तक सीमित थी। हाँ, उसमें इतनी योग्यता जरूर थी कि वह अखण्ड ज्योति पढ़ सकता था और अपने गुरुदेव को चिट्ठी लिख सकता था। गुरुदेव बताते थे कि अखण्ड ज्योति संस्थान के दिनों में रामलगन का पत्र रोज आता था। वह रोज रात सोने के पहले गुरुदेव को पत्र लिखता और सुबह जागने पर उसे पास के लेटर बॉक्स में डाल देता। यही उसकी आत्म-बोध और तत्त्वबोध की साधना थी।
जैसा नाम-वैसा गुण। रामलगन की लगन तो केवल अपने श्रीराम में थी। गुरुदेव बताते थे कि उसने अपने पत्रों में कभी भी अपने और अपने परिवार या किसी भी सगे-सम्बन्धी के किसी कष्ट-कठिनाई की चर्चा नहीं की। मथुरा आने पर भी उसने कभी कोई परेशानी नहीं बतायी। बहुत पूछने पर केवल इतना कह देता कि गुरुदेव मैं तो केवल माताजी के हाथ का बना प्रसाद पाने और आपका चरण स्पर्श करने आता हूँ। जैसी उसकी अपूर्व भक्ति थी-वैसी ही उसकी कर्मनिष्ठा थी। छोटी सी सामर्थ्य के बावजूद गुरुकृपा के बलबूते बड़े आयोजन करा लेता था। अंशदान-समयदान उसके जीवन में नियमित अंग थे।
एक दिन गुरुदेव अपने इस अद्भुत भक्त पर प्रसन्न होते हुए बोले-तुम क्या चाहते हो रामलगन? तुम जो भी चाहोगे, मैं वह सब दूँगा-बोलो! रामलगन अपने परम समर्थ गुरु की कृपा पर थोड़ी देर तक मौन रहा। फिर बोला-गुरुदेव! मेरी वैसी कोई सांसारिक चाहत तो नहीं है, बस एक जिज्ञासा है, निर्बीज समाधि को जानने की जिज्ञासा। जैसे समर्थ गुरु वैसा ही दृढ़निष्ठ जिज्ञासु शिष्य। गुरुदेव ने उत्तर में कहा-रामलगन क्या तुम अपने जीवन में भयानक कष्ट सहने के लिए तैयार हो? इस सवाल पर गहराई से सोच लो। यदि तुम्हारा जवाब हाँ में होगा, तो तुम्हारी जिज्ञासा पूरी हो जायेगी।
अपनी बात पूरी करते हुए गुरुदेव ने उसे बताया-निर्बीज समाधि के लिए चित्त के सभी संस्कारों का दहन-शोधन जरूरी है और यह प्रक्रिया कठिन एवं दीर्घ है। काम कई जन्मों का है। यदि इसे एक जन्म में पूरा करें, तो कठिन स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। चित्त से संस्कार तीव्रतापूर्वक निकालने पर जीवन में बड़ी तीव्रता से परिवर्तन आते हैं। शरीर भी इसे तभी सहन कर पाता है, जबकि निरन्तर तपरत रहे। अन्यथा बीच में इसके छूट जाने की स्थिति बन जाती है। गुरुभक्त रामलगन को बात समझ में आयी। उसके हाँ कहते ही गुरुदेव के संकल्प के प्रभाव से उसके जीवन की परिस्थितियों में तीव्र परिवर्तन आने लगे। गायत्री साधना, चन्द्रायण व्रत, अलोना भोजन, गुरुदेव का ध्यान और नियमित काम-काज उसका जीवन बन गया।  धैर्य और मौन ही उसके साथी थे। गुरुभक्ति ही उसका सम्बल थी। इस प्रक्रिया में उसे कई दशक गुजरे और अंत में उसे गुरु भक्ति का प्रसाद निर्बीज समाधि के रूप में मिला। उसके जीवन की अंतिम मुस्कान में चेतना के सर्वोच्च शिखर का परम सौन्दर्य झलक रहा था। 

॥ ॐ तत्सत् इति प्रथमः समाधिपादः समाप्तः॥

.... समाप्त
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

👉 गुरु रैदास (संत रविदास)


‘जाति वंश’हो एक समान,के भावों का विस्तार किया।
गुरु रैदास‘जगतगुरु’ थे, ‘दुखियों हित अवतार’ लिया।।

‘कुल वर्ण’नहीं, सद्कर्म श्रेष्ठ है, गुरु ने हमें बताया था। 
‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’,जाति-पाति मिटाया था।। 
‘भक्ति प्रेम’ की अविरल धारा, से जग का उद्धार किया।
गुरु रैदास जगतगुरु  थे,  दुखियों हित अवतार लिया।।

बचपन से ही ‘बैरागी’ थे,  ‘रामजानकी  अनुरागी’थे। 
पारस पत्थर पाकर भी वे,सौम्य सहज थे त्यागी थे।।
जनसेवक अभिमान रहित बन,प्रभु का साक्षात्कार किया। 
गुरु रैदास जगतगुरु थे, दुखियों हित अवतार लिया।।

अहं छोड़ मिलजुल कर रहना, गुरु ने हमें सिखाया है।
कृष्ण करीम हरि राम एक सब,गुरु ने हमें बताया है।।
‘मानव धर्म के संस्थापक’ने, जगती पर उपकार किया। 
गुरु रैदास जगतगुरु थे,  दुखियों  हित अवतार लिया।।

प्रभु भक्ति के लिए हमारे,मन निर्मल अति पावन हो।
सदाचार और सद्व्यवहार का,शुद्ध ह्रदय से पालन हो।।
उर  पवित्र  करके  भक्तों ने, ईश्वर  को साकार किया।
गुरु  रैदास  जगतगुरु थे, दुखियों हित अवतार लिया।।

कवि ज्ञानी गुरु संत रूप में, रविदास विख्यात हुए।
लगन परिश्रम भक्ति भावना,‘जगतगुरु’ प्रख्यात हुए।।
कुरीतियों में फंसे राष्ट्र को, नूतन श्रेष्ट विचार दिया। 
गुरु रैदास जगतगुरु थे, दुखियों हित अवतार लिया।।

- उमेश यादव

👉 खरे व्यक्तित्व की कसौटी (अन्तिम भाग)

व्यक्तित्ववानों की परख का एक और भी तरीका है कि उनने अपने सगे सम्बन्धियों के साथ न्यायोचित व्यवहार का निर्वाह किया या नहीं। जिनके साथ निरन्तर रहना पड़ता है उन्हीं के साथ आदमी की असलियत खुलती है। बाहर के लोगों के साथ तो बनावटी सज्जनता भी दिखाई जा सकती है, पर मुखौटा पहनकर दिनचर्या का निर्वाह नहीं हो सकता। चकमे में डालने की कला कभी-कभी ही काम देती है और वह प्रायः अजनबी लोगों पर ही सफल होती है। जिनसे लगातार वास्ता पड़ता है उनसे किसी के स्वभाव या चरित्र की वस्तुस्थिति छिपी नहीं रहती।

व्यक्तित्ववानों को सदा अपनी गरिमा का ध्यान रहता है। स्वाभिमान गँवाने वाले कामों में वे हाथ नहीं डालते। ऐसी दशा में चतुर लोग उनसे उदास रहते हैं और घनिष्ठता स्थापित नहीं करते। किसकी घनिष्ठता किन से है, यह देखकर सहज ही जाना जा सकता है कि इस व्यक्ति का स्तर क्या होना चाहिए? इसी प्रकार यदि पिछले दिनों के कार्यों पर दृष्टि डाली जाय और यह देखा जाय कि वे किस स्तर के थे तो भी समझा जा सकता है कि इसका व्यक्तित्व क्या है। इस स्तर की प्रतिभा अर्जित करने के लिए उच्चस्तरीय स्वाध्याय सत्संग आवश्यक है। जिसे बाहरी स्थिति ऐसी मिलेगी वही चिन्तन और मनन भी ऊंचे स्तर का कर सकेगा। उसके द्वारा अन्यान्यों को भी ऊंचे स्तर का परामर्श एवं सहयोग मिलेगा। इन्हीं कसौटियों पर कसकर यह देखा जा सकता है कि किसका व्यक्तित्व किस स्तर का है।

व्यक्तित्व सच्चे अर्थों में मनुष्य की महती और चिरस्थायी सम्पदा है। इसी के सहारे वह अपना और दूसरों का भला कर सकता है। किन्हीं पर उपयोगी प्रभाव डालने में भी ऐसे ही लोग सफल होते हैं। अन्यथा जिनकी कथनी और करनी में अन्तर होता है। वे सर्वत्र सन्देह की दृष्टि से देखे जाते हैं और पोल खुलने पर उपहासास्पद बनते हैं।

ऊंचे उठने, सफल बनने एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए जिस सौभाग्य को सराहा जाता है वह वस्तुतः खरा व्यक्तित्व ही है। सोने की जब कसौटी और अँगीठी पर परख हो जाती है तो उसकी उपयुक्त कीमत मिलती है। यही बात व्यक्तित्व के सम्बन्ध में भी वह जब खरा होने की स्थिति तक पहुँच जाता है तो मनुष्य को ऐसा सौभाग्यशाली बनाता है। जिसकी चिरकाल तक सराहना होती रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1986 अप्रैल पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1986/April.25

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११६)

सारे नियंत्रणों पर नियंत्रण है—निर्बीज समाधि

नित नये अनुभव कराती अंतर्यात्रा के विज्ञान के प्रयोग चेतना के रहस्यमय शिखरों की झलक दिखाते हैं। इन चेतना शिखरों में हर एक शिखर सम्मोहक है। प्रत्येक का सौन्दर्य अद्वितीय है। चेतना के हर शिखर पर बोध की नयी अनुभूति है, योग की नयी शक्ति की प्राप्ति है। अंतर्यात्रा विज्ञान के इन प्रयोगों में प्रत्येक स्तर पर सर्वथा नयापन है। यह नयापन प्रयोग की प्रक्रिया में भी है और परिणाम की प्राप्ति में भी। जो पहले किया जा चुका है, अगली बार उससे कुछ अलग हटकर करना पड़ता है और इसकी परिणति भी कुछ अलग ही होती है। ज्यों-ज्यों यह सिलसिला चलता है, चित्त के विकार मिटते हैं। प्रत्येक विकार के मिटते ही एक नयी अनुभूति की किरण फूटती है। इन विकारों के मिटने के बाद विचारों के मिटने का क्रम आता है। साथ ही साधक की योग अनुभूति सघन होती है और सबसे अंत में मिटते हैं-संस्कार। सभी तरह के संस्कारों के मिटने के साथ ही योग साधक निर्विचार से निर्बीज की ओर छलांग लगाता है।
 
अनासक्ति स्वाभाविक होती है। अंतस् में न तो विकारों की कीचड़ जमती है और न विचारों का शोर होता है। ऐसे में संस्कारों की छाया और छाप भी स्वभावतः ही हटती-मिटती है। अंतश्चेतना निर्बीज में छलांग लगाने के लिए तैयार होती है।
इस तथ्य का खुलासा करते हुए महर्षि पतंजलि कहते हैं-
तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः॥ १/५१॥
शब्दार्थ- तस्य = उसका; अपि = भी; निरोधे = निरोध हो जाने पर; सर्वनिरोधात् = सबका निरोध हो जाने के कारण निर्बीजः = निर्बीज; समाधिः = समाधि (हो जाती है)।
भावार्थ- जब सारे नियंत्रणों पर का नियंत्रण पार कर लिया जाता है, तो निर्बीज समाधि फलित होती है और उसके साथ ही उपलब्धि होती है-जीवन-मरण से मुक्ति।

योगर्षि पतंजलि ने इस सूत्र में जिस अनुभूति का संकेत किया है, वह व्यक्तित्व की अद्भुत घटना है। यह है-सृष्टि और जीवन में होने वाले सभी चमत्कारों का सार। यह चेतना का अंतिम शिखर है, जहाँ कोई नियंत्रण और संयम न होने के बावजूद प्रकाश और ज्ञान अपनी सम्पूर्णता में फलित होते हैं। यह वही आलोक लोक है-जिसकी चर्चा करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता (१५.६) में कहा है-
‘न तद्भासयते सूर्यो शशांको न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥’

जहाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि का प्रकाश होने के बावजूद प्रकाश है। जहाँ पहुँचकर फिर से वापस नहीं आना पड़ता है, वही मेरा परम धाम है। यही शिव भक्तों का महाकैलाश है और विष्णु भक्तों का वैकुण्ठ। निर्गुण उपासकों को यही ब्रह्म सायुज्य मिलता है। परम योगियों का सत्यलोक यही है।
जीवन में भली-बुरी परिस्थितियाँ हमारे अपने ही किन्हीं भले-बुरे संस्कारों का परिणाम है। इन परिस्थितियों के प्रति हमारे मन में उठने वाले भली-बुरी भाव विचार की प्रतिक्रियाएँ अपनी प्रगाढ़ता में नये संस्कारों को जन्म देती है। इस तरह संस्कारों से परिस्थितियाँ और परिस्थितियों से संस्कार यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। आचार्य शंकर की भाषा में ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्’ यानि कि फिर से जन्म और फिर मरण और फिर दुबारा माँ की कोख में आगमन-शयन। इसका कोई अंत-विराम नहीं। जन्म-मरण का यह सिलसिला अनवरत-अविराम चलता रहता है। यदि इसे कहीं विराम देना है, तो स्वयं ही चेतना पड़ता है और योग साधक को अनासक्ति, सहनशीलता और ध्यान की त्रिवेणी में गोते लगाने पड़ते हैं। इस त्रिवेणी में स्नान करने वाला चित्त ही जन्म-मरण के कालव्यूह से बाहर आ पाता है।

.... कल के अंक में समाप्त
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Khare Vyaktitva Ki Kasuti खरे व्यक्तित्व की कसौटी (भाग 2)

शालीनता उपार्जित करने के लिए शिक्षा की भी जरूरत पड़ती है। अशिक्षित आमतौर से गँवार या मूर्ख होते हैं। उनके व्यवहार में दूसरों को हानि पहुँचा कर अपना लाभ कमा लेने की नीति का समावेश होता है। ऐसा ही वे स्वयं करते हैं और ऐसा ही कर गुजरने के लिए वे दूसरों को परामर्श देते हैं। कारण कि उनका ज्ञान समीप वर्ती, साधारण लोगों तक ही सीमित होता है और औसत आदमी सफल बनने के लिए ऐसे ही तरीके अपनाता है। उनमें से अपवाद रूप में ही भलमन साहत पाई जाती है। जिस पर इस समुदाय का प्रभाव है वे यही समझते हैं कि दुनिया का रीति-रिवाज यही है और इसी रीति-नीति को अपनाने में कोई हर्ज नहीं है।

सुशिक्षित-स्वाध्यायशील व्यक्तियों के सामने ही आदर्श वादियों की कार्य पद्धति होती है। इतिहास में ही ऐसे श्रेष्ठ पुरुष खोजे जा सकते हैं। वे कभी-कभी और कहीं-कहीं ही होते हैं। उन्हें आदर पूर्वक पढ़ने, सुनने और समझने में ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि कितने ही लोगों ने प्रत्यक्ष घाटा उठाते हुए भी आदर्शों का परिपालन किया है और सर्व साधारण के सामने अनुकरणीय पथ प्रदर्शन प्रस्तुत किया है। ऐसे लोग यदि भावनाशील हुए और आदर्शों को अपनाने से किस प्रकार महान बना जा सकता है यह समझ सके तो फिर अपने को ढाँचे में ढालता है और समय-समय पर दूसरों को भी वैसी ही सलाह देते हैं। इसी परख पर यह जाना जा सकता है कि यह व्यक्तित्ववान है या नहीं। उसकी शालीनता परिपक्व स्तर की है या नहीं।

व्यक्तित्ववान दूसरों का विश्वास अर्जित करते हैं, साथ ही सम्मान एवं सहयोग भी। ऐसे लोगों को बड़े उत्तरदायित्व सौंपे जाते हैं और वे उन्हें उठाने में प्रसन्न भी होते हैं। क्योंकि महत्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने में अनेक लोगों का विश्वास और सहयोग अर्जित करने में ऐसे ही लोग सफल होते हैं। निश्चित है कि महत्वपूर्ण कामों को पूरा करने में सद्गुणी साथी अनिवार्य रूप से आवश्यक होते हैं और वे हर किसी का साथ नहीं देते। कारण कि उन्हें यह देखना पड़ता है कि कहीं ओछे लोगों की मंडली में शामिल होकर हमें भी बदनामी न ओढ़नी पड़े।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1986 अप्रैल पृष्ठ 25

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११५)

जब मिलते हैं व्यक्ति और विराट्

संसार वस्तुओं एवं व्यक्तियों का भी है और ऊर्जाओं का भी और सम्भव है इनमें पारस्परिक परिवर्तन भी, परन्तु यह बात कोई वैज्ञानिक ही समझेगा। ठीक इसी भाँति दुनिया अहंता की भी है, जहाँ मैं-मेरे और तू-तेरे की दीवारें हैं और आत्म-व्यापकता, ब्रह्मनिष्ठता की भी, जहाँ ये काल्पनिक लकीरें ढहती नजर आती हैं, बल्कि ऐसा लगता है कि ये भेद कभी था हीं नहीं। पर ये बात कोई अध्यात्मतत्त्व का अनुभवी ही समझेगा और कोई नहीं।
कहते हैं कि एक बड़े धनपति को अपने धन का भारी अहं था। उसे गर्व था अपनी बड़ी फैक्ट्री का। ये धनाड्य महोदय राजस्थान के थे और परम पूज्य गुरुदेव से मिलने के लिए गायत्री तपोभूमि मथुरा पहुँचे थे। अपनी बातों के बीच-बीच में फैक्ट्री एवं हवेली की चर्चा जरूर कर देते, परन्तु गुरुदेव ने उनकी इन बातों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। थोड़ी देर तक वार्तालाप यूँ चलता रहा। तभी गुरुदेव हँसते हुए उठे और एक बड़ा सा नक्शा सामने लाकर बिछा दिया। यह नक्शा विश्व का था। इसे दिखाते हुए वह उन सेठ जी से बोले-सेठ जी! जरा इसमें ढूँढ़िये तो सही कि अपना भारत देश कहाँ है। थोड़े से आश्चर्यचकित सेठ ने जैसे-तैसे एक जगह पर अंगुली रखकर भारत देश बताया।
अब गुरुदेव ने उनसे राजस्थान की बात पूछी, बड़ी मुश्किल से बेचारे राजस्थान बता पाये और अपना शहर जयपुर बताने में तो उन्हें पसीना आ गया। कहीं पर उन्हें जयपुर ढूँढे ही न मिला। जब गुरुदेव ने उनसे अपनी फैक्ट्री एवं हवेली बताने को कहा, तो वे चकरा गये और बोले-आचार्य जी! आप तो मजाक करते हैं, भला इसमें मेरी फैक्ट्री-हवेली कहाँ मिलेगी। उन्हें इस तरह परेशान होते देखकर गुरुदेव बोले-सेठ जी! कुछ ऐसे ही ब्रह्माण्ड के नक्शे में अपनी धरती नहीं ढूँढी जा सकती और जब बात भगवान् की हो, तो हमारा अपना अहं बड़ा होने पर भी कहीं नजर नहीं आता। इस प्रसंग को गुरुदेव ने अपनी चर्चाओं में एक बार बताते हुए कहा था-योग साधक का चित्त जैसे-जैसे शुद्ध होता है-वैसे ही उसके अहं का अस्तित्व विलीन होता है। कुछ वैसे ही जैसे कि बर्फ का टुकड़ा वाष्पीभूत हो जाता है।
और जब अहं ही नहीं, तब अहंता के संस्कार कैसे? वह तो विराट् में घटने वाली घटनाओं का साक्षी बन जाता है। उसे स्पष्ट अनुभव होता है कि सत्, रज एवं तम के त्रिगुणात्मक ऊर्जा प्रवाह वस्तु, व्यक्ति एवं परिस्थिति में एक आश्चर्यकारी उलटफेर कर रहे हैं। बस एक दिव्य क्रीड़ा चल रही है। एक दिव्यजननी माँ परम प्रकृति के इंगित से सारे परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे में क्रियाएँ तो होती दिखती हैं, पर कर्त्ता नहीं। उसे स्पष्ट अनुभव होता है कि वस्तु, व्यक्ति एवं परिस्थति इन क्रियाओं की घटने वाली घटनाओं का माध्यम है। यह मात्र कल्पना या विचार नहीं, एक अनुभव है, प्रगाढ़ एवं विस्तीर्ण। जो योग साधक में सम्पूर्ण बोध बनकर उतरता है। इस अवतरण के साथ ही उसके चित्त में क्रियाओं, भावों एवं विचारों के प्रतिबिम्ब तो पड़ते हैं, परन्तु उनका कोई निशान उस पर नहीं अंकित हो पाता।
बल्कि अंतश्चेतना की इस अनूठी भावदशा में जो भाव एवं विचार उपजते हैं, वे रहे-बचे संस्कारों का भी नाश करते हैं। इस अनुभव को पाने वाले के बोध में किसी भी वस्तु या व्यक्ति में विराट् घुलता नजर आता है। तभी तो अंग्रेजी भाषा के कवि वर्ड्सवर्थ ने यह बात कही कि यदि मैं एक फूल को जान लूँ, तो परमात्मा को जान लूँगा। लोगों ने उस महाकवि से सवाल किया भला यह कैसे? तो जवाब में वह हँसा और बोला कि इस एक के बिना परमात्मा का अस्तित्व जो नहीं है। सुनने वाला कोई पादरी था, उसने कहा-यह कैसे बात करते हो? तो उस कवि ने अपनी रहस्यमयी वाणी में कहा-तुम यह भी जान लो कि परमात्मा का अस्तित्व तो मेरे बिना भी नहीं है। पादरी को लगा कि यह कवि पागल हो गया है, पर सच्चाई यह थी कि वह महाकवि उस भावदशा को पा चुका था, जहाँ व्यक्ति एवं विराट् घुलते हुए अनुभव होते हैं। इस अनुभव की व्यापकता में देह के प्रति ममता नहीं रह पाती और न बचता है मन का कोई पृथक् अस्तित्व। अहंता यहाँ अस्तित्व को खो देती है। और चित्त के दर्पण में झाँकी होती है ब्रह्म की। ऐसे में किसी नये संस्कारों का उपजना सम्भव नहीं। यह ऐसी रहस्य कथा है, जिसे अनुभवी कहते हैं और अनुभवी ही समझते हैं। जो अनुभव पाने की डगर पर हैं, वे इस सूत्र को पकड़कर अपना नया अनुभव पा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Khare Vyaktitva Ki Kasuti खरे व्यक्तित्व की कसौटी (भाग 1)

व्यक्तित्ववान से तात्पर्य रंग रूप की सुन्दरता, कपड़ों की सज-धज, घुंघराले केश या साज-सज्जा के सामान से नहीं लगाया जाना चाहिए। यह विशेषताएं तो रंगमंच के नट नटियों में भी हो सकती हैं। पर इसके कारण उन्हें आकर्षक मात्र समझा जा सकता है। उन्हें व्यक्तित्ववान नहीं कहा जा सकता। ऐसे लोगों के प्रति किसी को श्रद्धा होती है न सम्मान। उन्हें कोई उत्तरदायित्वपूर्ण काम भी नहीं सौंपे जा सकते और न उनसे आशा की जा सकती है कि वे जीवन में कोई महत्वपूर्ण काम कर सकेंगे।

व्यक्तित्व से तात्पर्य शालीनता से है। जो सद्गुणों के उत्तम स्वभाव से सज्जनता से और मानवी गरिमा के अनुरूप अपनी वाणी, शैली, दिशाधारा एवं विधि-व्यवस्था अपनाने में है। यह सद्गुण स्वभाव के अंग होने चाहिए और चरित्र तथा व्यवहार में उनका समावेश गहराई तक होना चाहिए। अन्यथा दूसरों को फँसाने वाले ठग भी कुछ समय के लिए अपने को विनीत एवं सभ्य प्रदर्शित करते हैं। 

कोई जब उनके जाल में फँस जाता है तो अपने असली रूप में प्रकट होते हैं। धोखे में डालकर बुरी तरह ठग लेते हैं। विश्वासघात करके उसकी बुरी तरह जेब काटते हैं। कोई आदमी वस्तुतः कैसा है इसे थोड़ी देर में नहीं समझा जा सकता। उसकी पिछली जीवनचर्या देखकर वर्तमान संगति एवं मित्र मण्डली पर दृष्टिपात करके समझा जा सकता है कि उसका चरित्र कैसा है। यह चरित्र ही व्यक्तित्व की परख का प्रधान अंग है।

इसके अतिरिक्त, शिक्षा एवं विचार पद्धति भी देखने योग्य है। कुछ समय के वार्त्तालाप में मनुष्य की शिक्षा एवं आस्था का पता चल जाता है। चिन्तन वाणी में प्रकट होता है। ठग आदर्शवादी वार्त्तालाप कर सकने में देर तक सफल नहीं हो सकते। वे किसी को जाल में फँसाने के लिए ऐसी बातें करते हैं मानों उसके हितैषी हों और उसे अनायास ही कृपा पूर्वक कोई बड़ा लाभ कराना चाहते हैं। 

नीतिवान ऐसी बातें नहीं करते वे अनायास ही उदारता नहीं दिखाते और न अनुकम्पा करते हैं। न ऐसा रास्ता बताते हैं जिसमें नीति गँवाकर कमाई करने का दाँव बताया जा रहा है। व्यक्तित्ववान स्वयं नीति की रक्षा करते हैं भले ही इसमें उन्हें घाटा उठाना पड़ता हो। यही नीति उनकी दूसरों के सम्बन्ध में होती है। जब भी, जिसे भी वे परामर्श देंगे वह ऐसा होगा जिसमें चरित्र पर आँच न आती हो, भले ही सामान्य स्तर का बना रहना पड़े।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1986 अप्रैल पृष्ठ 25

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११४)

जब मिलते हैं व्यक्ति और विराट्

अंतर्यात्रा विज्ञान के रहस्यमय प्रयोगों का प्रभाव चित्त पर स्पष्ट दिखाई देता है। इसका सूक्ष्म, सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम परिशोधन होने से कर्मबीज, संस्कार, आसक्ति एवं अहंता हटते-मिटते हैं। जहाँ पहले प्रत्येक कर्म एवं भाव व विचार अपनी प्रगाढ़ स्थिति में चित्त पर अपनी अमिट छाप छोड़ते थे, वहीं अब यह स्थिति बदल जाती है। अब तो केवल चित्त पर उनका प्रतिबिम्ब पड़ता है और वह भी क्षणिक। जब तक कर्म अथवा भव-विचार की प्रगाढ़ क्रियाशीलता रहती है, तब तक चित्त के दर्पण पर उसकी झाँकी दिखती है, परन्तु जैसे ही इनकी स्थिति बदली, वैसे ही यह झलक भी मिट जाती है। इस परिशोधन से न केवल चित्त की क्रियाविधि, बल्कि उसका स्वरूप भी बदलता है। इसमें पारदर्शिता के साथ व्यापकता भी आती है। इसके संवेदन योग साधक के अंतस् में अतीन्द्रिय संवेदन एवं ब्रह्माण्डीय अनुभूतियों के रूप में उभरते हैं।

अब ऋतम्भरा प्रज्ञा के एक अन्य विशिष्ट गुण की चर्चा करते हुए महर्षि पतंजलि अपने एक नये सूत्र को प्रकट करते हैं-
‘तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी॥ १/५०॥’

शब्दार्थ- तज्जः = उससे उत्पन्न होने वाला; संस्कारः = संस्कार; अन्यसंस्कार प्रतिबन्धी = दूसरे संस्कारों का बाध करने वाला होता है।
भावार्थ- जो प्रत्यक्ष बोध निर्विचार समाधि में उपलब्ध होता है, वह सभी सामान्य बोध संवेदनाओं के पार होता है-प्रगाढ़ता मे भी, विस्तीर्णता में भी। यही वजह है कि इससे उत्पन्न संस्कार में अन्य सभी संस्कार विलीन हो जाते हैं।

यह भावदशा सामान्य अनुभव से परे है। यह बूझो तो जाने की स्थिति है, परन्तु साथ ही वैज्ञानिक भी है। संतों की उलटबासियाँ यहीं से शुरू होती है। अध्यात्मवेत्ताओं के कथन यहीं रहस्यमय हो जाते हैं, क्योंकि चेतना की इसी अवस्था में व्यक्ति एवं विराट् यहीं मिलते हैं, बल्कि यूँ कहें कि घुलते हैं। संक्षेप में यह मिलन बिन्दु है, घुलन बिन्दु है-व्यक्ति का विराट् में। जिसके साथ ऐसा हुआ अथवा हो रहा है वही इसे समझेगा। शेष को तो अविश्वास करना ही है। अब जैसे बर्फ के ठोस आकार को देखकर पारखी उसके पानी बनने की बात कह सकता है। उसके व्यापक होने की सम्भावनाएँ उसे उस बर्फ के टुकड़े में नजर आयेगी और साथ उससे आगे की अवस्था जबकि यह जल वाष्प बन जायेगा, उसके अपने मानसिक नेत्रों में झलकने लगेगी। लेकिन कोई गैर जानकार बर्फ के वाष्प होने की कहानी पर आश्चर्ययुक्त अविश्वास ही करेगा।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Do Not Panic or Perplex

Life is full of challenges and testing moments! Many a times the adverse circumstances are so intense that one just can’t bear them, he loses patience, gets anxious and panicked; cries on his destiny and helplessness… But this doesn’t solve the problem. The only source of definite support in such cases is – prudence and patience.

Ups and downs, good and bad experiences are natural phases of human life. We must remember this fact and convince ourselves of the truth that wisdom and pure knowledge (gyana) are the only keys to conquer the agonies caused by the tides of adversities or tragedies. Firm faith in God’s grace and justice is a must in such testing moments of sufferings. We must understand that our knowledge is too limited to grasp the system of God. Whether we realize it at that time or not, the circumstances and experiences that appear so painful to us also occur in fact for our welfare only.

Because of our half or illusory knowledge and narrow attitude, we cannot grasp the real cause or purpose behind the happenings in our life. We must accept it that major cause of our agonies and anxiety is our ignorance; we want everything to conform to our expectation, our favor. But the course of life has many dimensions, beyond our perception. Faith in absolute justice and mercy of the Omniscient God is all the more important in the moments of hardships and pains.

This gives us instant courage and light and helps maintain our calm without which we can’t even think properly. All religious scriptures preach the importance of the feeling of content and peace in all circumstance. It is indeed the nectar source of annulling all worries and panics even in the difficult, tragic situations. Adoption of peace, patience and satisfaction does not mean that you should not transact your duties or progress in your life. Rather, it implies that you should complete all your tasks, all duties, with mental stability and calm and a sense of inner faith in all circumstances.

📖 Akhand Jyoti, April 1943

👉 किसी परिस्थिति में विचलित न हों

जीवन में कई अवसरों पर बड़ी विकट परिस्थितियाँ आती हैं, उनका आघात असह्य होने के कारण मनुष्य व्याकुल हो जाता है और अपनी विवशता पर रोता-चिल्लाता है। प्रिय और अप्रिय घटनाएँ तो आती हैं और आती ही रहेंगी।

ऐसे अवसरों पर हमें विवेक से काम लेना चाहिए। ज्ञान के आधार पर ही हम उन अप्रिय घटनाओं के दु:खद परिणाम से बच सकते हैं। ईश्वर की दयालुता पर विश्वास रखना, ऐसे अवसरों पर बहुत ही उपयोगी है। हमारा ज्ञान बहुत ही स्वल्प है इसलिए हम प्रभु की कार्यविधि का रहस्य नहीं जान पाते जिन घटनाओं को हम आज अप्रिय देख-समझ रहे हैं, वे यथार्थ में हमारे कल्याण के लिए होती हैं।

हमें समझ लेना चाहिय कि हम अपने मोटे और अधूरे ज्ञान के आधार पर परिस्थितियों का असली हेतु नहीं जान पाते, तो भी उसमें कुछ-न-कुछ हमारा ति अवश्य छिपा होगा, जिसे हम समझ नहीं पाते। कष्टों के समय हमें ईश्वर की न्यायपरायणता और दयालुता पर अधिकाधिक विश्वास करना चाहिए। इससे हम घबराते नहीं और उस विपत्ति के हटने तक धैर्य धारण किए रहते हैं। संतोष करने का शास्त्रीय उपदेश ऐसे ही समय के लिए है। कर्त्तव्य करने में प्रमाद करना, संतोष नहीं वरन् आई हुई परिस्थिति में विचलित न होना, संतोष है। संतोष के आधार पर कठिन प्रसंगों का आधार पर हल्का हो जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति -अप्रैल 1943

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११३)


बिन इन्द्रिय जब अनुभूत होता है सत्य
    
इस सूत्र में उलट बासी तो है, थोड़ा अटपटा सा भी है। पर है एक दम खरा। पर जो समझे उसके लिए। यहाँ तक कि वैज्ञानिकों के लिए भी यह काफी दिनों तक एक गणितीय पहेली बना रहा। हालाँकि इन दिनों उन्होंने फोटान की भाषा सीख ली है और कम्प्यूटर नेटवर्क के जरिए वे उसका इस्तेमाल करने लगे हैं। फिर भी एक पहेली तो उनके सामने बची हुई है ही कि एक साथ सब कुछ एक समय में कैसे जाना जा सकता है। फोटान की भाषा सीखने के बाद उनकी मानसिक चेतना तो सीमित ही है। यदि उनसे आत्मविकास की साधना हो सके, तो शायद जान पाएंगे कि आध्यात्मिक अनुभव में आत्मचेतना के विस्तार में सब कु छ एक साथ एक समय में जान लिया जाता है।
    
योगियों को ऐसे अनुभव होते रहे हैं। स्वामी विवेकानंद जी महाराज के जीवन का एक आध्यात्मिक प्रसंग है, उन दिनों वे अल्मोड़ा में रहकर साधना कर रहे थे। निपट एकाकी वन में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए थे। इन्द्रिय चेतना प्रत्याहार में विलीन हो गयी थी। निराकार सर्वव्यापी परम सत्ता क ी धारणा ध्यान की लय पा चुकी थी। यह ध्यान उत्तरोत्तर प्रगाढ़ होता हुआ कब समाधि के सोपान चढ़ने लगा यह काल को भी पता न चला। और उन्हें इसी मध्य एक अनुभव हुआ पिण्ड के ब्रह्माण्ड का। व्यक्ति चेतना में समष्टि चेतना का अनुभव और धीरे-धीरे यह अनुभव ब्रह्माण्ड बोध में बदल गया।
    
जब उच्चस्तरीय समाधि की भाव भूमि से दैहिक चेतना में लौटे तो उन्होंने अपने गुरूभाई स्वामी तुरीयानंद से इसकी चर्चा की। बोले-हरी भाई मैं जान लिया। मुझे हो गया अनुभव अस्तित्व व्यापी चैतन्यता का। इसी को तो योगेश्वर कृ ष्ण कहते है, कि क ोई इसे आश्चर्य से सुन कहता है और कोई इसे आश्चर्य से सुनता है और कोई विरला इस आश्चर्य को सम्पूर्ण रूप से जानता है। योगी के उल्लास में से ये सभी आश्चर्य एक साथ अंकुरित-पल्लवित होते है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११२)

बिन इन्द्रिय जब अनुभूत होता है सत्य 
सच की सम्पूर्णता तो तभी सम्भव है, जब वह सम्पूर्ण अस्तित्व की अनन्तत्व के कण-कण में समाया हो। मनीषी वैज्ञानिक आइन्सटीन के इस सिद्घांत का दूसरा पहलू क्वाण्टम् सिद्घांत में हैं। इसका प्रवर्तन मैक्सप्लैंक एवं हाइजेनबर्ग आदि वैज्ञानिकों ने किया था। उनका कहना था कि पदार्थ का सच ज्यादा टिकाऊ नहीं है। उन्होंने बताया- पदार्थ एवं ऊर्जा निरन्तर एक-दूसरे में बदलते रहते हैं और जिस तरह से पदार्थ का सबसे छोटा कण परमाणु है, उसी तरह से ऊर्जा का सबसे छोटा पैकेट क्वाण्टा है। इस क्वाण्टा की स्थिति अनिश्चित है। इसमें वस्तु जैसा कुछ भी नहीं है। ऊपर इनमें परस्पर गहरा जुड़ाव है। यह जुड़ाव इतना अधिक है कि अभिन्न भी कहा जा सकता है। 
विज्ञान के इन दोंनों सिद्घांतों ने ज्ञान- के खोजियों के सामने एक बात बड़ी साफ कर दी है कि अनुभव यदि पदार्थ के, वस्तु के , व्यक्ति के अथवा स्थिति के हैं और यदि इन्हें इन्द्रियों के झरोखों से पाया गया है, तो कभी सम्पूर्ण नहीं हो सकते। इतना ही नहीं, इन्हें सन्देह एवं भ्रम से परे भी नहीं कहा जा सकता। इस तरह के अनुभव में तो कई दीवारें है, अनेकों पर्दे हैं। एक दीवार इन्द्रियों की- एक पर्दा स्नायु जाल का। फिर एक दीवार मस्तिष्क की। फिर एक पर्दा विचार तंत्र का। हम ही सोच लें—कितनी अपूर्णता होगी इस अनुभव में। 
परम पूज्य गुरूदेव कहते थे कि अनुभव वह,जिसमें कोई दीवार या पर्दा न हो। अब यह क्या बात है कि आँख का देखा कुछ और, और यदि किसी सूक्ष्मदर्शी या दूरदर्शी यंत्र से देखा तो और। कानों ने एक खबर सुनायी और बुद्घि ने कुछ अनुमान सुझाए, पर अन्तःकरण अनुभव से रीता रहा। चेतना वैसी ही कोरी व सूनी बनी रही। लेकिन जिसकी प्र्रज्ञा ऋतम्भरा से संपूरित हो गयी उसके साथ ऐसी कोई समस्या नहीं। निर्विकार समाधि की भाव दशा में अस्तित्व व्यापी चेतना की अनन्तता में सत्य अपने सम्पूर्ण रूप से प्रकाशित होता है। इसी अनुभव को पाकर सन्त कबीर बोल उठे-कहत कबीर मैं पूरा पाया अर्थात् मैने पूरा पा लिया। पूर्णिमा की चाँदनी से उद्भासित हो गया अन्तःकरण।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 कैसे भूलें अपनी गलतियों को: स्वयं को माफ़ करने के 5 तरीके


कभी कभी हम कुछ ऐसा कर बैठते है या बोल देते हैं जिसके लिए हमें बाद में बेहद पश्चाताप होता है।
खासकर तब जब आपने किसी अपने का दिल दुखाया हो।

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर  ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय।

अपने आप को और अपनी गलतियों को माफ़ करने में कुछ बातें बेहद सहायक होती हैं।

◆ 1. दूसरों को दोष देना बंद करें:

अपने आप को माफ़ करने से पहले ये जान लेना जरुरी है कि आखिर आपने किया क्या था। आपके साथ हुयी घटना को विस्तार से लिख लें और अपने उन बातों  को भी लिखें जिससे उस घटना के घटने में मदद मिली हो। किसी और व्यक्ति या परिस्थितियों को दोष देने से बचें और सिर्फ अपने आप पर ध्यान केंद्रित करें। हो सकता है ऐसे करते समय आप असहज महसूस करें।

■ 2. माफ़ी मांगने में संकोच न करें:

कुछ इस तरह हमने अपनी जिंदगी आसान कर ली ,
कुछ को माफ़ कर दिया और कुछ से माफ़ी  मांग ली।


हालाँकि माफ़ी मांगना इतना आसान नहीं होता लेकिन अगर आप किसी से माफ़ी मांगने के लिए पहल करते हैं तो ये दर्शाता है कि आपसे गलती हुयी थी और आप उसके लिए शर्मिन्दा हैं, और इस तरह आप वैसी गलतियों को दोहराने से बच जाते हैं।

3. नाकारात्मक विचारों को उत्पन्न होते ही त्याग दें:

कभी कभी माफ़ किये जाने पर भी हम अपने आप को माफ़ नहीं कर पाते।  स्वयं को माफ़ करना एक बार में ही संभव नहीं है, यह धीरे-धीरे समय के साथ परिपक्व होता है। इसलिए जब भी आपके मन में नाकारात्मक विचार आये गहरी सांस लेकर उसे उसी समय निकल दें और अपना ध्यान कहीं और लगायें, या इस तरह की कोई प्रक्रिया जिसे आप पसंद करते हों अपनाएँ।

4. शर्म के मरे छुपने की वजाय सामने आईये:

अपनी किसी भयंकर गलती के बाद शर्म से छुप जाना बिलकुल भी अच्छा नहीं है। अपनी गलती के बाद हम अपने दोस्त से नजरें मिलाने में झिझकते है क्यूंकि हमें डर होता है की कहीं वह मुझे पिछली बात को याद न करा दे, लेकिन जैसे ही हम उनसे मिलने की हिम्मत जुटाते है  महसूस होगा कि हमारा डर गलत था।

5. अपनी गलतियों के लिए आभारी बने:

अपनी गलतियों के प्रति आभारी होना आपको बिलकुल विचित्र लगेगा खासकर वैसी गलतियां जिनसे आपको शर्मिंदगी महसूस हुयी हो या दुःख पहुंचा हो लेकिन अगर आप गौर से एनालाइज करेंगे तो पाएंगे कि ऐसी की गयी गलतियों ने आपको कितना मजबूत और सुदृढ़ किया है।  आप ये देख पाएंगे कि इन्ही गलतियों की वजह से ही आप अधिक बुद्धिमान, मजबूत और विचारशील हो पाये हैं।  

👉 स्वर्ण जयंती मना रहा है



शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।
धर्मतंत्र का स्वर्ण  गान यह, सारे जग को सुना रहा है।।

गुरुवर ने निज कर कमलों से, शांतिकुंज निर्माण किया।
विश्वामित्र की तपस्थली में, ऋषियों का आह्वान किया।।
महा पुरश्चरणों से माँ ने, तपः क्षेत्र  विकसाया था ।
प्राणों का प्रत्यावर्तन करके, आश्रम दिव्य बनाया था।।
बीजारोपण वर्ष  इकहतर, से तरु बन लहलहा रहा है ।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।1

कल्प और चान्द्रायण से ही, साधकों को बल दिया है।
साधना से  सिद्धि पा, हर समस्या का हल दिया है ।।
देव कन्याओं के तप ने, वातावरण बनाया  था।
युग शक्ति ही नारी शक्ति है, माताजी ने तपाया था।।
सिद्धियों की दिव्य प्रभा अब,अम्बर तक झिलमिला रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।2

वानप्रस्थ से ज्ञान क्रांति का,सतत अभियान चलाया था।
महिला जाग्रति शंख बजाकर, ब्रह्मवादिनी बनाया था।।
वैज्ञानिक अध्यात्मवाद को, ब्रह्मवर्चस निर्मित किया।
धर्म के शाश्वत स्वरुप को, जनहित में प्रस्तुत किया।।
शक्तिपीठ हैं शक्तिकेंद्र अब, दीप्त हो जगमगा रहा है ।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।3

सूक्ष्मीकरण साध गुरुवर ने, वीरभद्र उत्पन्न किये ।
पांच शरीर से एक साथ में, असंभव सम्पन्न किये।।
गुरुवर के हीरक जयंती पर,यज्ञ अभियान चलाया था।
राष्ट्रीय एकता यज्ञों से, भारत को श्रेष्ट बनाया  था।।
मत्स्यावतार अपनी काया को, हरपल हरक्षण बढ़ा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।4

महाप्रयाण कर स्थूल देह को, पंचतत्व में लीन किया ।
सबकी आँखों से ओझल हो, गुरुवर ने ग़मगीन किया।।
ब्रह्म्वेदी यज्ञों से गुरु ने, सोया राष्ट्र जगाया है।
सूक्ष्म रूप में गुरु चेतना, शांतिकुंज में समाया है।।
शांतिकुंज का कोना कोना, गुरु-गान गुनगुना रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।5

श्रद्धांजलि देकर शिष्यों ने, अपना फर्ज  निभाया है ।
देश धर्म संस्कृति रक्षा को, माटी ले शपथ उठाया है।।
अश्वमेधों का दौर चल पड़ा, धर्म तंत्र  मजबूत  हुआ।
दिग्दिगंत तक धर्म ध्वजा ले, क्रांति का अग्रदूत गया ।।
देव संस्कृति का परचम अब, अपने जलवे दिखा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।6

माताजी के महा प्रयाण से, पुत्रों ने दुःख पाया था ।
स्नेह सलिला जीजी ने हम, सबको गले लगाया था।।
गुरु अभियानों को श्रधेय ने, गति देकर आश्वस्त किया।
जन मानस के अंध तमस को, प्रखर-ज्ञान से ध्वस्त किया।।
अखंड ज्योति के दिव्य ज्ञान से, अज्ञानता को मिटा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।7

पूर्णाहुति कर महाकुम्भ सा, जन सैलाब जुटाया था।
धरती के कोने कोने तक, धर्म ध्वजा फहराया था।।
चेतना केन्द्रों की स्थापना, का संकल्प जगाया था।
गंगा को निर्मल करने का, जन अभियान चलाया था।।
प्रौढ़ शांतिकुंज स्वर्ण रश्मियों, से देखो जगमगा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है ।।8

कन्या कौशल शिविरों से, नारी सम्मान जगाया है।
‘दीया’ जलाकर युवा मनों में, नव विश्वास जगाया है।।
गाँव गाँव में नशा निवारण, का अभियान चलाया है।
स्वस्थ शरीर स्वच्छ मन सबका, सभ्य समाज बनाया है।।
पर्यावरण  को शुद्ध  कराने, वृक्षारोपण करा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।9

संस्कारों की परिपाटी को, फिर से जीवनदान मिला।
तीर्थ क्षेत्र में संस्कारों को पुनः उचित स्थान मिला।।
शिक्षा,स्वास्थ्य, साधना जैसे, क्रांति का आगाज हुआ।
सप्त क्रांतियों की धूम मची, अश्वमेधों का प्रयाज हुआ।।
नवल विश्व के नव समाज में, नवीन चेतना जगा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।10

भाषांतर कर शांतिकुंज से, साहित्य का विस्तार किया ।
हर भाषा में  हर लोगों तक, गुरु का श्रेष्ठ विचार दिया ।।       
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम, युग निर्माण का नारा है।
अखिल विश्व में दिग्दिगंत तक शांतिकुंज अति प्यारा है।।  
लक्ष एक से कोटि कोटि तक अपना परिकर बढ़ा रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है ।11

विश्व विद्यालय गुरुवर के, सपनों का विद्यालय  है।
देव संस्कृति जग में फैले, मानवता का आलय है।।
तकनीकों का प्रयोग हम, जन हित में ही करते है।
प्राचीन विद्या का प्रसार हम, तकनीकों  से करते हैं।।
एकहतर की छोटी बगिया, कोटि-कोटि फूल खिला रहा है।

शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है ।।12
संकट की घड़ियाँ है बीती, नया सूर्य अब चमक रहा है।
स्वर्णमयी आभा है इसकी, शांतिकुंज अब दमक रहा है ।।
स्वर्ण जयंती संग महाकुम्भ का, दिव्य संयोग सुहाना है।
धरती पर ही स्वर्ग सृजन में, जन-जन को लग जाना है।।
घर घर गंगा जल पहुचाकर, कुम्भ घरों में मना रहा है।
शांतिकुंज अब स्थापना के, स्वर्ण जयंती मना रहा है।।13      

उमेश यादव

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

👉 बसंत पर्व


गुरुवर का शुभ जन्मदिवस है, शुभ  मंगल कर दे।
बसंत पर्व पर हम शिष्यों को, माँ गायत्री वर दे।।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ गायत्री वर दे।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ भारती वर दे।।

ठिठुरन बीत गया है अब तो, मधुर मास है आया।
प्रकृति ने की नव श्रृंगार, सर्वत्र उल्लास है छाया।।
युग-निर्माण  को आतुर हैं हम, शक्ति सुधा भर दे।
बसंत पर्व पर हम शिष्यों को, माँ गायत्री वर दे।।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ गायत्री वर दे।

पक्षियों का कलरव कहता है,नया समय अब आया।
पतझर बीता, पुष्प खिले, कोयल ने तान सुनाया।।
खुशियों की चल पड़े बयार अब,जग में सुख भर दे।
बसंत पर्व पर हम  शिष्यों  को, माँ गायत्री वर दे।।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ गायत्री वर दे।

पीत पवित्र पुष्पों की चादर, मन हर्षित करता है।
भंवरों का गुंजार ह्रदय को, अभिमंत्रित करता है।।
माँ  शारदा दिव्य ज्ञान दे, वाणी को नव स्वर दे।
बसंत पर्व पर हम शिष्यों को, माँ गायत्री वर दे।।
वर दे,वर दे,वर दे, माँ गायत्री वर दे।

नव वसंत के, नयी उषा से, नया सूर्य चमकेगा।
नवयुग के इस नवल व्योम में,नव विहंग चहकेगा।।
हे युग ऋषि नव शक्ति भक्ति दे,मन निर्मल कर दे।
बसंत पर्व पर हम शिष्यों को, माँ गायत्री वर दे।।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ गायत्री वर दे।
वर दे, वर दे, वर दे, माँ भारती वर दे।

उमेश यादव

👉 राजा बड़ा या संत

एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य ...