मंगलवार, 2 मार्च 2021

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें (भाग १)

जीवन की गति एक ही दिशा में चलते- चलते -- विचार और प्रक्रिया का एक ही प्रवाह बहते रहने- आत्मा और परमात्मा की एक ही सम्मिलित प्रेरणा अनुभव करते- करते कर्तव्य और धर्म का एक ही निर्देश- संकेत देखते- देखते अब हमारा व्यक्तित्व निर्दिष्ट लक्ष्य में एक प्रकार से तन्मय एवं सघन हो गया है। अलग से अपनी कोई हस्ती कोई सत्ता सही नहीं। जो हमें प्यार करता हो- उसे हमारे मिशन से भी प्यार करना चाहिए। जो हमारे मिशन की उपेक्षा, तिरस्कार करता है लगता है वह हमें ही उपेक्षित तिरस्कृत कर रहा है। व्यक्तिगत रूप से कोई हमारी कितनी ही उपेक्षा करे पर यदि हमारे मिशन के प्रति श्रद्धावान् उनके लिए कुछ करता, सोचता है तो लगता है मानो हमारे ऊपर अमृत बिखेर रहा है और चन्दन लेप रहा है। किन्तु यदि केवल हमारे व्यक्तित्व के प्रति ही श्रद्धा है- शरीर से ही मोह है- उसी की प्रशिस्त पूजा को जाती है। यदि मिशन की बात उठाकर ताक पर रख दी जाती है तो लगता है हमारे प्राण का तिरस्कार करते हुए केवल शरीर पर पंखा रुलाया जा रहा हो। 

अपनी- अपनी मनोदशा हो तो है। लोगों की दृष्टि में व्यक्ति पूजा पर्याप्त है- मिशन के झंझट में पड़ने की जरूरत नहीं। अपनी दृष्टि में शरीर- पूजा बुत परस्ती मात्र है, देव- पूजा तो श्रद्धास्पद प्राण प्रवाह के साथ बहने से है लोग अपनी जिस अभिव्यंजना को पर्याप्त मानते हैं हमारे लिए वह निरर्थक है क्योंकि शरीर के साथ किये हुए सद्व्यवहार आत्मा के गहरे परतों तक पहुँचते- पहुँचते बीच में ही क्षीण विलीन हो जाते हैं। अपनी मनोदशा मिशन को आगे बढ़ते देख कर प्रसन्न और सन्तुष्ट होने की है, अब उसी में अपना सारा आनन्द, उल्लास केन्द्रीभूत हो गया है। सो जो कोई उस दिशा में आगे बढ़ता दीखता है, लगता है अपने कर्तव्य के लिए ही नहीं हमारे लिए भी बहुत कुछ करने में संलग्न है। ऐसे लोगों के प्रति हमारी श्रद्धा, कृतज्ञता, ममता और सहानुभूति का अन्तः प्रवाह अनायास ही प्रवाहित होने लगता है। बाहर से संकोचवश कुछ न कह सकें पर भीतर ही भीतर ऐसा कुछ उमड़ता उमड़ता रहता है जो कहता है कि इस पर कितना प्यार बखेर दें, कितनी आत्मीयता उड़ेल दें, जो कुछ अपने पास है सो सब कुछ उसके ऊपर निछावर करने को जी करता है। 

वस्तुतः अब शरीर की सेवा समीपता से नहीं भावना और आदर्शों की प्रखरता ही से अपने को शान्ति और सन्तुष्टि मिलती है किसी से हमारी कितनों निकटता है उसकी परख अब इसी कसौटी पर कसने हैं कि उसने हमारे कन्धे से कन्धा मिलाकर कितना भार बँटाया और हमारे कदमों से कदम मिलाकर कितनी सह यात्रा की। निन्दा, स्तुति अपने लिए समान हैं। जब व्यक्तित्व रहा ही नहीं- मिशन में घुल गया तो उस मृतप्राय सत्ता से शरीर कलेवर से अपना मोह हो क्या है ?? फिर उसकी पूजा- प्रशंसा और अभ्यर्थना का अपने ऊपर क्या प्रभाव पड़े। कामनाओं, आकांक्षाओं और अभावों की सांसारिक सीमा समाप्त हो गई तो उसकी उपलब्धि में रस भी क्या ?? अपनी सारी सरसता अब अपने लक्ष्य मिशन में है, उसी क्षेत्र की उत्साहवर्धक हलचल आशा, उल्लास और सन्तोष की भूमिका प्रस्तुत करती है। सो अपने विशाल परिवार में कहीं सच्ची आत्मीयता का कितना अंश विद्यमान है यह जानने की इच्छा होती है तो इसी कसौटी पर कसकर वस्तुस्थिति जान लेते हैं कि हमारा दर्द किस- किस की नसों में और कितनी मात्रा में भर चला और हमारी आग की कितनी चिनगारियाँ कितने अंशों में किसके कलेजे में सुलगने लगीं। अपनी- अपनी मनोदशा ही तो है। लोगों के सोचने का ढंग जो भी हो अपनी- अपनी तो यही प्रकृति बन गई। मजबूरी अपनी भी है जो अपने को हमारे सम्मुख अपने लौकिक व्यवहार से प्रियजन सिद्ध करना चाहते हैं वे हमें निरर्थक लगते हैं किन्तु जो कभी मिलते भी नहीं, पत्र भी नहीं लिखते, प्रशंसा- पूजा का हलका- सा भी प्रयत्न नहीं करते वे प्राणप्रिय और अति समीप लगते हैं यदि मिशन के लिए कुछ काम कर रहे हैं। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1969 

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 गुरु कौन

बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे। उन के पास शिक्षा लेने हेतु दूर दूर से शिष्य आते थे। एक दिन एक शिष्य न...