मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८४)

राग शमन करता है—वीतराग का ध्यान

अन्तर्यात्रा का विज्ञान योग पथ को प्रकाशित करता है। इसके प्रकाश में योग पथ की सूक्ष्मताएँ, गुह्यताएँ गहरे रहस्य उजागर होते हैं। योग पथ के पथिक इस प्रकाश का सहारा पाकर इधर-उधर अटकने-भटकने से बचते हैं। अन्तर्यात्रा विज्ञान का प्रकाश उन्हें न केवल उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ देता है, बल्कि उनके अन्तस् को पवित्र बनाता है। वे जीवन की अनगिनत भ्रान्तियों से मुक्त होकर समग्र रूपान्तरण की ओर अग्रसर होते हैं। यह एक ऐसा अनुभव है, जिसे अनेकों ने पाया है और वे इसमें जी रहे हैं। जिन्होंने भी अपनी अन्तर्यात्रा के लिए इस योग कथा का अवलम्बन लिया है, वे इसके पुण्य प्रकाश से सदा लाभान्वित हुए हैं। उनकी साधना में आने वाले अँधेरे, इसके प्रभाव से उजाले में बदले हैं। उनकी अटकनों को नये द्वारों की आहट मिली है और उनकी भटकनों ने नई राहें पायी हैं।

कठिनाई बस है कि जिनकी चित्तवृत्तियाँ बर्हिमुखी है, वे अपने आंतरिक प्रकाश को न तो खोज पाते हैं और न पहचान पाते हैं। ऐसों के लिए महर्षि एक नया सूत्र देते हैं।
इस योग कथा का यह अगला सूत्र बहुत ही सुस्पष्ट है। साथ ही सामान्य साधकों के लिए साधना के ढंग से अतिसहज भी। महर्षि का यह सूत्र है-
वीतरागविषयं वा चित्तम्॥ १/३७॥
शब्दार्थ-वीतरागविषयम् = वीतराग को विषय करने वाला; चित्तम् = चित्त; वा = भी (स्थिर हो जाता है)।
    
अर्थात्  वीतरागता को जो उपलब्ध हो चुका है, उसका ध्यान करो।
महर्षि पतंजलि का यह सूत्र उनकी परम करुणा का सुस्पष्ट प्रमाण है। वे मानव चेतना के परम वैज्ञानिक होने के साथ परम करुणावान् भी हैं। एक ओर वे जहाँ अस्तित्व की सूक्ष्मताओं, गुह्यताओं एवं गहरे रहस्यों व भेदों को उजागर करते हैं, तो दूसरी ओर वे यह भी ध्यान रखते हैं कि योग की निर्मल सरिता सभी के लिए बहे। सब इससे लाभान्वित हों, सभी इससे सुख पायें। वे भी  जिनकी प्रज्ञा बहुत समर्थ नहीं है, जिनमें योग की जटिल प्रक्रियाओं को करने-समझने की योग्यता नहीं है। ऐसे साधकों के लिए महर्षि पतंजलि माँ की भाँति हैं। वे उनकी अंगुली पकड़ कर चलाने के लिए, अन्तर्यात्रा पर चलने के लिए एक सूत्र देते हैं। एक नयी प्रक्रिया, एक नयी विधि खोजते हैं।
    
यह विधि है-वीतराग पुरुष का ध्यान। वीतराग वह है, जिसके सभी राग, आसक्तियाँ, आकांक्षाएँ शान्त हो चुके हें। जो इन सभी के पार व परे जा चुका है, ऐसे व्यक्ति का ध्यान। ऐसों में एक तो स्वयं महर्षि पतंजलि हैं, साथ ही उनकी परम्परा में और भी अनेक हैं। बुद्ध पुरुषों की बड़ी समर्थ परम्परा ने इस धरा को धन्य किया है। समय-समय पर अनेक वीतराग विभूतियों ने यहाँ योग की चरम सिद्धि पायी है। इनमें वसिष्ठ, विश्वामित्र, नारद आदि प्राचीन ऋषिगण हैं। भगवान् श्रीकृष्ण, प्रभु श्रीराम, बुद्ध, महावीर, ईसा आदि अवतारी सत्ताएँ हैं। महर्षि अरविन्द, श्रीरामकृष्ण परमहंस, भक्तिमती मीरा आदि संत हैं और इस युग को अपनी तप साधना से प्रेरित-प्रकाशित-प्रभावित करने वाले युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव हैं। ये सभी वीतराग हैं। ये सभी आसक्तियों, आकांक्षाओं से पार हैं।
    
इनके प्रति गहरा लगाव, सहज प्रेम, इनका भावपूर्ण चिंतन साधक की चेतना के तंतुओं को इनकी विराट्ता, पवित्रता से जोड़ता है। ये सभी एकरस हैं, शिवमय हैं, परन्तु जिसका मन जिसमें रमे। गोस्वामी तुलसी बाबा की भाषा में-‘जेहि कर मन रम जाहि सब, सो तेही सतकाम।’ यानि कि जिसका मन जिसमें रमे, उसे तो बस उससे ही काम है। अब योग साधक को अपने अन्तःकरण की छान-बीनकर यह परखना है कि उसका मन कहाँ रमता है। उसे किस वीतराग से राग है। यदि इस सवाल में ज्यादा झंझट लगती हो, तो बड़ी आसान सी राह है-युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव। वे द्वार हैं-परम चेतना का। वे मार्ग हैं-परम धाम का, परम ज्ञान का, निर्विकल्प समाधि का। यह सच उनका ध्यान करके परखा जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १४६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 12 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८३)

ध्यान की गहराई में छिपा है परम सत्य

परम पूज्य गुरुदेव अपनी चर्चाओं व संगोष्ठियों में प्रायः एक बात कहा करते थे कि आध्यात्मिक जीवन की पहली किरण जिसने देख ली, वह स्वतः ही संसार की सभी बुराइयों से दूर हो जाता है। उसका मन अपने आप ही सांसारिक रसों से दूर हो जाता है।  गुरुदेव के अनुसार ज्यों-ज्यों हम स्थूल भोगों को भोगते हैं, हमारी चेतना भी उतनी ही स्थूल एवं संवेदनहीन हो जाती है। इतना ही नहीं, हम इतने ज्यादा बर्हिमुखी हो जाते हैं कि हमारी समूची आन्तरिक योग्यताएँ ही समाप्त हो जाती हैं।
     
इसके विपरीत जब हम सूक्ष्म तत्त्वों के प्रति प्रकाग्र होते हैं तो संवेदना व चेतना भी सूक्ष्म हो जाती है। और साथ ही हमारे सामने सूक्ष्म जगत् की झाँकी झलकने लगती है। जिसने ऐसा किया है, वह आँख बंद करते ही हृदयाकाश में उदित होते हुए सूर्य की झाँकी पा लेता है। यही नहीं हृदय के पास ज्योतित अग्निशिखा भी हमें दिखाई देती है। यद्यपि वह सब समय वहीं पर है, लेकिन हम उसे यूँ ही अभी देख नहीं सकते। दूसरे भी नहीं देख सकते। इसका कारण केवल इतना भर है कि अभी हमारे पास उपयुक्त सूक्ष्म-चेतना का अभाव है। जप की तल्लीनता हो या ध्यान की गहनता इसकी यथार्थ उपलब्धि हमारे अन्तस् की सूक्ष्मता है।
    
गुरुदेव इस क्रम में एक गायत्री साधक की घटना सुनाते हैं। इन साधक का नाम वीरमणि था। वीरमणि पढ़े तो ज्यादा नहीं थे। पर उनकी अनुभूतियों का संसार अनोखा था। उन्होंने ग्यारह साल की उम्र से गायत्री का जप शुरू किया था। प्रातः सायं गायत्री जप यही उनका नियम था। यूँ उनका पेशा तो खेती करना था। खेती के सभी कामों को वह मनोयोगपूर्वक करते थे। इसी के साथ उनका मानसिक जप भी चलता रहता था। बुवाई, निराई, गुड़ाई, सिंचाई आदि कार्यों के साथ उन्होंने गायत्री जप का अच्छा क्रम बिठा लिया था। जप के प्रभाव से उनकी भावचेतना उत्तरोत्तर सूक्ष्म होती गयी। जप की गहराई ने कब ध्यान का रूप ले लिया, यह पता ही न चला। बस गायत्री उनके लिए अजपा हो गयी। और ध्यान की प्रगाढ़ता भाव समाधि में बदल गयी।
    
इस प्रगाढ़ ध्यान में वह आन्तरिक प्रकाश में घण्टों डूबे रहते थे। यहाँ तक कि उनका निद्राकाल भी साधना में परिवर्तित हो गया था। जितनी उनकी साधना प्रगाढ़ होती गयी, उतनी ही शान्ति भी गहन होती गयी। इस साधना क्रम में उनकी रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ, सभी उत्तरोत्तर सूक्ष्म एवं प्रकाशित हो गयी। कभी पूछने पर वह कहते कि मुझे तो बस इतना ही मालूम है कि आँख बन्द करते ही मैं प्रकाश के महासागर में तैरने लगता हूँ। इस प्रकाश से मेरी समूची दुनिया ही बदल गयी है। पहले मैं प्रयास से साधना करता था, अब तो अपने आप ही साधना होती है। सचमुच ही यह बिना किए होती है। मन अपने आप ही स्थिर, एकाग्र व शान्त रहता है। सब कुछ बदल गया है। बस यही अनुभव होता है कि गायत्री ही प्रकाश है और वह प्रकाश स्वयं मैं हूँ।
    
पतंजलि कहते हैं कि इस प्रकाश के भाव चेतना में उदय होते ही सारे शोक विलीन हो जाते हैं। जो इसे अनुभव करता है, वह जानता है कि इससे अधिक आनन्दमय और कुछ भी नहीं। और कुछ भी हृदय के भीतर अनुभव होने वाले इस प्रकाश से ज्यादा संगीतपूर्ण एवं सुसंगत नहीं होता है। इसकी अनुभूति जितनी प्रगाढ़ होती है, हम उतने ही ज्यादा शान्तिपूर्ण, मौन व एकजुट हो जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १४३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८२)

ध्यान की गहराई में छिपा है परम सत्य

योग साधक जैसे-जैसे अन्तर्यात्रा पथ पर आगे बढ़ते हैं, उनकी संवेदनाएँ सूक्ष्म हो जाती है। इस संवेदनात्मक सूक्ष्मता के साथ ही उनमें संवेगात्मक स्थिरता-नीरवता व गहरी शान्ति आती है। और ऐसे में उनके अनुभव भी गहरे, व्यापक व पारदर्शी होते चले जाते हैं। कई बार नए साधक आगे का मार्ग पाने के लिए बेचैन होते हैं। उनमें अध्यात्म की उच्चस्तरीय कक्षा में प्रवेश के लिए त्वरा होती है। यदा-कदा मार्गदर्शक का अभाव उन्हें परेशानी में डालता है। ऐसों के लिए महर्षि पतंजलि के सूत्र एवं परम पूज्य गुरुदेव की अनुभूतियाँ अमृततुल्य औषधि की भाँति है। वह सुझाते हैं, बताते हैं, चेताते हैं कि साधना की अविरामता ही भावी मार्ग की प्राप्ति का कारण है। साधना की अविरामता से उत्तरोत्तर सूक्ष्म होती चेतना स्वतः ही नए मार्ग के द्वार खोलती है। नया पथ प्रशस्त करती है।
    
सच्चाई यह है कि ये अनुभूतियाँ हमारे अन्तःकरण को प्रेरित, प्रकाशित, प्रवर्तित व प्रत्यावर्तित करती हैं। इसमें उच्चस्तरीय आध्यात्मिक चेतना के अवतरण के साथ एक अपूर्व प्रत्यावर्तन घटित होता है। एक गहन रूपान्तरण की प्रक्रिया चलती है। इस प्रक्रिया के साथ ही योग साधक की दिव्य संवेदनाएँ बढ़ती है और उसकी साधना की ज्योति और भी प्रखर होती है।
    
इस अनुभूति कथा के अगले चरण को महर्षि ने अपने अगले सूत्र में प्रकट किया है। यह सूत्र है-
विशोका वा ज्योतिष्मती॥ १/३६॥
शब्दार्थ- वा= इसके सिवा (यदि); विशोका= शोकरहित; ज्योतिष्मती= ज्योतिष्मती प्रवृत्ति (उत्पन्न हो जाय तो वह) भी मन की स्थिति स्थिर करने वाली होती है।
    
अर्थात् अभ्यास के क्रम में उस आन्तरिक प्रकाश का भी ध्यान करो, जो शान्त है और सभी दुःखों से बाहर है।
    
महर्षि अपने इस सूत्र में ध्यान की गहनता की ओर इंगित करते हैं। ध्यान द्वार है—अतीन्द्रिय संवेदना का। जो ध्यान करते हैं, उन्हें काल क्रम में स्वयं ही इस सत्य का अनुभव हो जाता है। यह सच है कि ध्यान में सम्पूर्ण आध्यात्मिक रहस्य समाए हैं। फिर भी इसका अनुभव कम ही लोग कर पाते हैं। और इसका कारण है कि ध्यान के बारे में प्रचलित भ्रान्तियाँ। कतिपय लोग ध्यान को महज एकाग्रता भर समझते हैं। कुछ लोगों के लिए ध्यान केवल मानसिक व्यायाम भर है। ध्यान को एकाग्रता समझने वाले लोग जिस किसी तरह से मानसिक चेतना को एक बिन्दु पर इकट्ठा करने की कोशिश करते हैं हालाँकि उनके इस प्रयास से परामानसिक चेतना के द्वार नहीं खुलते। उन्हें अन्तर्जगत में प्रवेश नहीं मिलता। वे तो बस बाहरी उलझनों में भटकते अथवा मानसिक द्वन्द्वों में अटकते रहते हैं।
    
जबकि ध्यान अन्तर्यात्रा है और यह यात्रा वही साधक कर पाते हैं, जिन्होंने अपनी साधना के पहले चरणों में अपनी मानसिक चेतना को स्थिर, सूक्ष्म व शान्त कर लिया है। अनुभव का सच यही है कि मानसिक चेतना को स्थिरता, सूक्ष्मता व शान्ति ही प्रकारान्तर से परामानसिक चेतना की अनुभूति है। इस अनुभूति में व्यापकता व गुणवत्ता की संवेदना का अतिविस्तार होता है। साथ ही इसे पाने पर अन्तर्चेतना स्वतः ही ऊर्ध्वगमन के लिए प्रेरित होती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १४२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

👉 नालायक

"बेटा , हमारा एक्सीडेंट हो गया है। मुझे ज्यादा चोट नहीं आई पर तेरी माँ की हालत गंभीर है। कछ पैसों की जरुरत है और तेरी माँ को खुन भी देना है। "बासठ साल के माधव जी ने अपने बडे बेटे से फोन पर कहा।

"पापा, मैं बहुत व्यस्त हूँ आजकल। मेरा आना नही हो सकेगा। मुझे विदेश मे नौकरी का पैकेज मिला है तो उसी की तैयारी कर रहा हूँ। आपका भी तो यही सपना था ना? इसलिये हाथ भी तंग चल रहा है। पैसे की व्यवस्था कर लीजिए मैं बाद मे दे दुँगा। "उनके बडे इंजिनियर बेटे ने जबाब दिया।

उन्होनें अपने दुसरे डाॅक्टर बेटे को फोन किया तो उसने भी आने से मना कर दिया। उसे अपनी ससुराल मे शादी मे जाना था। हाँ इतना जरुर कहा कि पैसों की चिंता मत कीजिए मै भिजवा दूँगा।

यह अलग बात है कि उसने कभी पैसे नहीं भिजवाए। उन्होंने बहुत मायुसी से फोन रख दिया। अब उस नालालक को फोन करके क्या फायदा। जब ये दो लायक बेटे कुछ नही कर रहे तो वो नालायक क्या कर लेगा?

उन्होंने सोचा और बोझिल कदमों से अस्पताल मे पत्नी के पास पहूँचे और कुरसी पर ढेर हो गये। पुरानी बातें याद आने लगी।

माधव राय जी स्कुल मे शिक्षक थे। उनके तीन बेटे और एक बेटी थी।बडा इंजिनियर और मझला डाक्टर था। दोनौ की शादी बडे घराने मे हुई थी। दोनो अपनी पत्नियों के साथ अलग अलग शहरों मे रहते थे। बेटी की शादी भी उन्होंने खुब धुमधाम से की थी।

सबसे छोटा बेटा पढाई मे ध्यान नही लगा पाया था। ग्यारहवीं के बाद उसने पढाई छोड दी और घर मे ही रहने लगा। कहता था मुझे नौकरी नही करनी अपने माता पिता की सेवा करनी है पर मास्टर साहब उससे बहुत नाराज रहते थे।

उन्होंने उसका नाम नालायक रख दिया था। दोनों बडे भाई पिता के आज्ञाकारी थे पर वह गलत बात पर उनसे भी बहस कर बैठता था। इसलिये माधव जी उसे पसंद नही करते थे।

जब माधव जी रिटायर हुए तो जमा पुँजी कुछ भी नही थी। सारी बचत दोनों बच्चों की उच्च शिक्षा और बेटी की शादी मे खर्च हो गई थी। शहर मे एक घर्, थोडी जमीन और गाँव मे थोडी सी जमीन थी। घर का खर्च उनके पेंशन से चल रहा था।

माधव जी को जब लगा कि छोटा सुधरने वाला नही तो उन्होंने बँटवारा कर दिया और उसके हिस्से की जमीन उसे देकर उसे गाँव मे ही रहने भेज दिया। हालाँकि वह जाना नही चाहता था पर पिता की जिद के आगे झुक गया और गाँव मे ही झोपडी बनाकर रहने लगा।

माधव जी सबसे अपने दोनो होनहार और लायक बेटों की बडाई किया करते। उनका सीना गर्व से चौडा हो जाता था। पर उस नालायक का नाम भी नही लेते थे।

दो दिन पहले दोनो पति पत्नी का एक्सीडेन्ट हो गया था। वह अपनी पत्नी के साथ सरकारी अस्पताल मे भर्ती थे। डाॅक्टर ने उनकी पत्नी को आपरेशन करने को कहा था।

"पापा, पापा!" सुन कर तंद्रा टुटी तो देखा सामने वही नालायक खड़ा था। उन्होंने गुस्से से मुँह फेर लिया। पर उसने पापा के पैर छुए और रोते हुए बोला "पापा आपने इस नालायक को क्यो नही बताया? पर मैने भी आपलोगों पर जासुस छोड रखे हैं।खबर मिलते ही भागा आया हूँ।"

पापा के विरोध के वावजुद उसने उनको एक बडे अस्पताल मे भरती कराया। माँ का आपरेशन कराया। अपना खुन दिया। दिन रात उनकी सेवा मे लगा रहता कि एक दिन वह गायब हो गया।

वह उसके बारे मे फिर बुरा सोचने लगे थे कि तीसरे दिन वह वापस आ गया। महीने भर मे ही माँ एकदम भली चंगी हो गई। वह अस्पताल से छुट्टी लेकर उन लोगों को घर ले आया। माधव जी के पुछने पर बता दिया कि खैराती अस्पताल था पैसे नही लगे हैं।

घर मे नौकरानी थी ही। वह उन लोगों को छोड कर वापस गाँव चला गया।

धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो गया। एक दिन यूँ ही उनके मन मे आया कि उस नालायक की खबर ली जाए। दोनों जब गाँव के खेत पर पहुँचे तो झोपडी मे ताला देख कर चौंके। उनके खेत मे काम कर रहे आदमी से पुछा तो उसने कहा "यह खेत अब मेरे हैं।"

"क्या? पर यह खेत तो...." उन्हे बहुत आश्चर्य हुआ। "हाँ। उसकी माँ की तबीयत बहुत खराब थी। उसके पास पैसे नही थे तो उसने अपने सारे खेत बेच दिये। वह रोजी रोटी की तलाश मे दुसरे शहर चला गया है। बस यह झोपडी उसके पास रह गई है। यह रही उसकी चाबी। "उस आदमी ने कहा।

वह झोपडी मे दाखिल हुये तो बरबस उस नालायक की याद आ गई। टेबुल पर पडा लिफाफा खोल कर देखा तो उसमे रखा अस्पताल का नौ लाख का बिल उनको मुँह चिढाने लगा।

उन्होंने अपनी पत्नी से कहा - "जानकी तुम्हारा बेटा नालायक तो था ही झुठा भी है।"
अचानक उनकी आँखों से आँसू गिरने लगे और वह जोर से चिल्लाये -"तु कहाँ चला गया नालायक, अपने पापा को छोड कर। एक बार वापस आ जा फिर मैं तुझे कहीं नही जाने दुँगा।" उनकी पत्नी के आँसू भी वहे जा रहे थे।

और माधव जी को इंतजार था अपने नालायक बेटे को अपने गले से लगाने का।
सचमुच बहुत नालायक था वो।।

👉 विचारों से कार्य प्रेरणा

कार्यों का मूल, विचार है। मस्तिष्क में जिस प्रकार के विचार घूमते हैं उसी प्रकार के कार्य होने लगते हैं। जिस वर्ग के लोग स्वार्थपरता, तृष्णा, वासना और अहंता के विचारों में डूबे रहते हैं वहाँ नाना प्रकार के क्लेश, कलह, दुष्कर्म एवं अपराध निरन्तर बढ़ते रहते हैं। पर जहाँ परमार्थ, संयम, संतोष और नम्रता आदर्शवाद को प्रधानता दी जाती है वहाँ सर्वत्र सत्कर्म होते दिखाई पड़ते हैं और उसके फलस्वरूप, सतयुगी सुख शान्ति का वातावरण बन जाता है। जिस प्रकार स्वस्थ शरीर से स्वच्छ मन का संबंध है उसी प्रकार स्वच्छ मन के ऊपर सभ्य समाज की सम्भावना निर्भर है। 

यदि शरीर बीमार पड़ा रहेगा तो मन में निम्न श्रेणी के विचार ही आवेंगे। अस्वस्थ व्यक्ति देर तक उच्च भावनाऐं अपने मन में धारण किये नहीं रह सकता। उसी प्रकार अस्वच्छ मन वाले व्यक्तियों से भरा समाज कभी सभ्य कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता। मानव जाति एकता, प्रेम, प्रगति, शान्ति एवं समृद्धि की ओर अग्रसर हो, इसका एकमात्र उपाय यही है कि लोगों के मन आदर्शवाद, धर्म, कर्तव्यपरायणता, परोपकार एवं आस्तिकता की भावनाओं से ओत-प्रोत रहें। इस दिशा में यदि हमारे कदम उठते रहेंगे तो उन्नति के लिए जिन योग्यताओं एवं क्षमता की आवश्यकता है वे सब कुछ ही समय में अनायास प्राप्त हो जायेंगी। पर यदि दुर्गुणी लोग बहुत चतुर और साधन सम्पन्न बनें तो भी उस चतुरता और क्षमता के दुरुपयोग होने पर विपत्ति ही बढ़ेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ८१)

ध्यान से उपजती है—अतीन्द्रिय संवेदना
    
ऐसे परम पवित्र महान् आचार्य इस श्रीरंगम के पीठ में आसीन थे। श्रीरंगम में मेले की भारी भीड़ थी। दर्शनार्थियों का ताँता लगा था। इन दर्शनार्थियों की भीड़ में एक विचित्र व्यक्ति भी था। लोग उसे भय, घृणा और आतंक मिश्रित नजरों से देख रहे थे। इन देखने वालों के मन में बहुत कुछ उमड़-घुमड़ रहा था; पर किसी में साहस ही नहीं था कि कोई उससे कुछ कहे। यह दृश्य ही कुछ ऐसा था। यह विचित्र व्यक्ति उस इलाके का खूंखार दस्यु दुर्दम था। और वह एक महिला के साथ उस पर छतरी लगाए जा रहा था। उसकी नजरों में उस महिला के लिए भारी वासनात्मक आसक्ति थी। प्रभु मन्दिर में भी इस वासना भरे कुत्सित दृश्य को लोग हज़म नहीं कर पा रहे थे। पर कोई कहता भी क्या?
    
आचार्य रामानुज ने भी यह विचित्र दृश्य देखा। उन्हें भी कुछ अटपटा लगा। असमंजस भरे स्वर में उन्होंने अपने एक शिष्य से पूछा भगवान् श्रीरंगम के पवित्र स्थान में यह कौन है? शिष्य ने डाकू दुर्दम की कथा, उसके अत्याचारों के वीभत्स विवरणों के साथ सुना डाली। आचार्य शिष्य की सारी बातें सुनते रहे। इन बातों में उस महिला का जिक्र भी कई बार आया, जिसके पीछे यह डाकू छतरी लगाए जा रहा था। सारी कथा सुनने के बाद आचार्य ने अपने इस शिष्य से कहा- तुम जाकर उसे बुला लाओ। पर क्यों भगवन्! शिष्य ने लगभग सहमते हुए कहा। प्रश्न न करो वत्स! बस तुम उसे बुला दो। भगवान् उस पर कृपा करना चाहते हैं।
    
आचार्य की रहस्य वाणी शिष्य की समझ में न आयी। फिर भी उसने आदेश का पालन किया। डाकू दुर्दम भी इस अप्रत्याशित बुलावे के लिए तैयार न था। वह भी आचार्य की आध्यात्मिक विभूतियों की कथाएँ सुन चुका था। सो इस बुलावे पर उसे भी थोड़ा डर लगा। क्योंकि अपने मन के किसी कोने में उसे अपने पापों का बोध था। इसलिए अनजाने भय के पाश में बँधकर आचार्य के समीप जा पहुँचा। आचार्य ने उसे देखा। उनकी इस दृष्टि में उसके लिए करुणापूरित वात्सल्य था। बड़े प्यार से उन्होंने उससे पूछा- तुम्हारे साथ में जो देवी हैं, वे कौन हैं वत्स? इस सवाल के उत्तर में दुर्दम ने लज्जा से अपना सिर झुका लिया। वैसे भी आचार्य की अतीन्द्रिय संवेदनाओं से भला क्या छुपता?
    
आचार्य ने फिर से टटोलने वाली नजरों से उसे देखते हुए दुर्दम से पुनः सवाल किया- वत्स, इस स्त्री में तुम्हें क्या अच्छा लगता है? डाकू दुर्दम ने अबकी बार थोड़ा झिझकते हुए उत्तर दिया- भगवन् मैं इसके रूप और सौन्दर्य से मोहित हूँ। और यदि इससे भी श्रेष्ठ सौन्दर्य की झलक तुम्हें मिल जाय तो? तब तो मैं इसे छोड़ दूँगा, दुर्दम ने उत्तर दिया। आचार्य उसके इस उत्तर पर मुस्कराए और बोले- नहीं तुम इसे छोड़ना मत। इससे विवाह करना और एक सद्गृहस्थ की भाँति रहना। ऐसा कहते हुए आचार्य ने उसके सिर पर धीरे-धीरे हाथ फेरा। लगभग तीन पल वे ऐसा ही करते रहे। बाद में उन्होंने उसे तीन थपकियाँ दीं। इतना करते ही दुर्दम जैसे चेतना शून्य हो गया। बस वह निस्पन्द बैठा रहा। उसकी आँखों से आँसू झरते रहे। काफी देर बाद उसकी चेतनता बाह्य जगत् में लौटी। अब तो बस उसकी एक ही रट थी, मुझे वही दृश्य, वही अनुभूति बार-बार चाहिए। मुझे प्रभु का वही सौन्दर्य सतत निहारना है।
    
शान्त स्वर में आचार्य ने कहा- इसके लिए तुम ध्यान करो वत्स! तुमने जो अनुभव किया- वह सब ध्यान का अनुभव था। हाँ बस बात इतनी है कि यह ध्यान तुम्हें मेरे प्रयास से लगा। आगे तुम्हें स्वयं प्रयास करने होंगे। ध्यान करते-करते अतीन्द्रिय संवेदना के जागरण से ये अनुभव तुम्हें नित्य होंगे। आचार्य के वचन दुर्दम के लिए प्रेरणा बन गए और उनकी कृपा से हुए आध्यात्मिक अनुभव उसके लिए ऊर्जा का स्रोत। अतीन्द्रिय संवेदनों से हुई अनुभूति ने डाकू दुर्दम को महान् सन्त में बदल दिया।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १३९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

👉 समर्पण की कथा


"समर्पण" की कथा का त्याग से प्रारंभ है होता,
"समर्पण" में सदा सर्वस्व अर्पण ही सहज होता,
"समर्पण"  वह नहीं  प्रतिफल की जिसमें हो कोई आशा,
"समर्पण"  बीज है जो भूमि में अस्तित्व है खोता |

"समर्पण" धार पर तलवार की निर्भीक हो चलना ,
"समर्पण"  ऋषि दधीचि का जगतहित अस्थियाँ देना,
"समर्पण" में सदा मीरा को प्याला विष का ही लेना ,
"समर्पण" राम के दरबार का हनुमान है बनना |

"समर्पण" बिंदु को भी सिन्धु का सम्मान मिलना है ,
"समर्पण" ओस का इक सीप में मोती सा ढलना है,
"समर्पण" संकटों में द्रौपदी का चीर बन जाना ,
"समर्पण" कष्ट भी आये तो जीना और मुस्काना |

"समर्पण" है किसी सरिता का सागर में समां जाना,
"समर्पण" है नहीं शब्दों का ग्रन्थाकार बन जाना,
"समर्पण" लक्ष्य अर्जुन का, नहीं है ध्यान भटकाना,
"समर्पण" कालनेमि की वृथा बातों  में न आना ।

सुधीर भारद्वाज

सोमवार, 7 दिसंबर 2020

👉 पांचजन्य उदघोष

पांचजन्य उदघोष हुआ है, आओ रण में शौर्य दिखाओ।
रणभेरी बज उठी है वीरों, आलस में न समय गवाओ।।
 
सूरज उग रहा पूरब से, मधुर लालिमा छाई है।
ब्रह्मकमल की सुखद सुगंधि, हिमाद्री से आई है।।
समय अभी है परिवर्तन का,आओ मिलकर शंख बजाओ।
पांचजन्य उदघोष हुआ है, आओ रण में शौर्य दिखाओ ।।
 
पतझर बीत गया है मानों, नव बसंत अब द्वार खड़ा है।
दुरभिसंधि की रातें बीती, संकीर्ण शीत बेसुध पड़ा है।।
नवयुग के शुभ स्वागत हेतु, आओ अर्चन थाल सजाओ।
पांचजन्य उदघोष हुआ है, आओ रण में शौर्य दिखाओ।।
 
नवयुग के इस नये प्रहर में, नव निनाद सुर तान सुनो।
कलरव गूंज रहा चहुदिश है, केशव का आह्वान सुनो।।
उठो, चलो दौड़ो अब वीरों, अकर्मण्यता दूर भगाओ ।
पांचजन्य उदघोष हुआ है, आओ रण में शौर्य दिखाओ।
रणभेरी बज उठी है वीरों, आलस में न समय गवाओ।।

उमेश यादव

👉 भक्ति और संपत्ति

एक बार काशी के निकट के एक इलाके के नवाब ने गुरु नानक से पूछा, ‘आपके प्रवचन का महत्व ज्यादा है या हमारी दौलत का? ‘नानक ने कहा, ‘इसका जवाब उचित समय पर दूंगा।’ 

कुछ समय बाद नानक ने नवाब को काशी के अस्सी घाट पर एक सौ स्वर्ण मुद्राएं लेकर आने को कहा। नानक वहां प्रवचन कर रहे थे। नवाब ने स्वर्ण मुद्राओं से भरा थाल नानक के पास रख दिया और पीछे बैठ कर प्रवचन सुनने लगा। वहां एक थाल पहले से रखा हुआ था। 

प्रवचन समाप्त होने के बाद नानक ने थाल से स्वर्ण मुद्राएं मुट्ठी में लेकर कई बार खनखनाया। भीड़ को पता चल गया कि स्वर्ण मुद्राएं नवाब की तरफ से नानक को भेंट की गई हैं। थोड़ी देर बाद अचानक नानक ने थाल से स्वर्ण मुद्राएं उठा कर गंगा में फेंकना शुरू कर दिया। यह देख कर वहां अफरातफरी मच गई। कई लोग स्वर्ण मुदाएं लेने के लिए गंगा में कूद गए। भगदड़ में कई लोग घायल हो गए।.मारपीट की नौबत आ गई। नवाब को समझ में नहीं आया कि आखिर नानक ने यह सब क्यों किया। तभी नानक ने जोर से कहा, ‘भाइयों, असली स्वर्ण मुद्राएं मेरे पास हैं। गंगा में फेंकी गई मुदाएं नकली हैं। आप लोग शांति से बैठ जाइए।’ जब सब लोग बैठ गए तो नवाब ने पूछा, ‘आप ने यह तमाशा क्यों किया?

धन के लालच में तो लोग एक दूसरे की जान भी ले सकते हैं।’नानक ने कहा, ‘मैंने जो कुछ किया वह आपके प्रश्न का उत्तर था। आप ने देख लिया कि प्रवचन सुनते समय लोग सब कुछ भूल कर भक्ति में डूब जाते हैं। लेकिन माया लोगों को सर्वनाश की ओर ले जाती है। प्रवचन लोगों में शांति और सद्भावना का संदेश देता है मगर दौलत तो विखंडन का रास्ता है।‘ नवाब को अपनी गलती का अहसास हो गया।

👉 अविश्वास और सन्देह

हर किसी पर अविश्वास करने वाले, सब को संदेह और तुच्छता की दृष्टि से देखने वाले व्यक्ति अपने मन में ऐसा सोचते हैं कि हम बहुत बुद्धिमान हैं किसी की बातों में नहीं आते और चौकस रहकर अपनी जरा भी हानि नहीं होने देते पर वस्तुतः यह उनकी भारी भूल है। अविश्वासी को किसी का सच्चा प्रेम नहीं मिल सकता। भावना छिपती नहीं, जब दूसरे को सह मालूम पड़ता है कि यह हमारे प्रति अविश्वास करता है तो वह भी सच्चा प्रेम नहीं कर सकता और न सहानुभूति रखता है। ऐसी प्रकृति के व्यक्ति आमतौर से मित्रविहीन देखे गये हैं। माना कि विश्वास में खतरा है। 

यदि खरे खोटे की परख न करके हर किसी पर विश्वास करने लग जाय तो उसमें ठगे जाने का खतरा भी है। पर साथ ही यह भी निश्चित है कि किसी ने कभी दूसरों को अपना बनाया है तो उसे उस पर पूरा विश्वास अवश्य करना पड़ा है। एक व्यक्ति दूसरे का गुलाम तभी बनता है जब उसमें अपने लिए सच्ची सहानुभूति एवं आस्था अनुभव करता है। दाम्पत्ति जीवन में, भाई-भाइयों में जहाँ भी सच्ची आत्मीयता पाई जायगी वहाँ उसके मूल में विश्वास वफादारी और गहरा आत्म−भाव अवश्य होगा। अविश्वास के वातावरण में एक ऐसी घुटन रहती है कि मनुष्य वहाँ से अलग हटकर ही सन्तोष की साँस ले पाता है। परायों को अपना बनाने और अपनों को पराया बनाने में यह विश्वास एवं अविश्वास ही प्रमुख कारण रहा होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ७९)

बड़ा गहरा है—प्राण व मन का नाता

इस संदर्भ में महर्षि हठयोग में वर्णित प्राणायाम की जटिल प्रक्रियाओं व प्रयोगों में उलझना नहीं चाहते। उनका समूचा आग्रह चित्तशोधन पर है। इसे सुगम बनाया जा सकता है, यदि श्वास को लयबद्ध करने की कोई सुगम-सरल विधि अन्वेषित की जाय। परम पूज्य गुरुदेव द्वारा अन्वेषित व विकसित प्राणाकर्षण प्राणायाम महर्षि के इस सूत्र की बड़ी सुगम व प्रयोगात्मक व्याख्या है। इसमें जटिलता बिल्कुल भी नहीं है, किन्तु प्रभाव व्यापक है। इस प्रक्रिया को बताते हुए गुरुदेव कहते हैं कि प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर साधना के लिए किसी शान्तिदायक स्थान में आसन बिछाकर बैठिये, दोनों हाथों को घुटनों पर रखिये, मेरुदण्ड सीधा रहे, नेत्र बन्द कर लीजिये।
    
फेफड़ों में भरी हुई सारी हवा बाहर निकाल दीजिये, अब धीरे-धीरे नासिका द्वारा साँस लेना आरम्भ कीजिये, जितनी अधिक मात्रा में फेफड़े में हवा भर सकें भर लीजिये। अब कुछ देर उसे भीतर रोके रखिये। इसके पश्चात् साँस को धीरे-धीरे नासिका द्वारा बाहर निकालना आरम्भ कीजिये। हवा को जितना अधिक खाली कर सकें-कीजिये। अब कुछ देर साँस को बाहर ही रोक दीजिये अर्थात् बिना साँस के रहिये। इसके बाद पूर्ववत् वायु को खींचना आरम्भ कीजिये। यह एक प्राणाकर्षण प्राणायाम हुआ। परम पूज्य गुरुदेव कहते हैं कि साँस खींचने को रेचक, निकालने को पूरक और रोके रहने को कुम्भक कहते हैं। कुम्भक के दो भेद हैं-साँस को भीतर रोके रहना-अंतःकुम्भक और खाली करके बिना साँस के रहना-बाह्य कुम्भक कहलाता है। रेचक व पूरक में समय बराबर लगना चाहिए, जबकि कुम्भक में उसका आधा समय ही पर्याप्त है।
    
प्राणायाम की यह प्रक्रिया विचार शुद्धि, भाव शुद्धि व संस्कार शुद्धि के उद्देश्य को पूरा करे, इसके लिए इस प्रयोग के साथ भावों का जुड़ना जरूरी है। पूरक करते समय यह भावना करनी चाहिए कि मैं जन शून्य लोक में अकेला बैठा हूँ और मेरे चारों ओर विद्युत जैसी चैतन्य जीवनी शक्ति का समुद्र लहरें ले रहा है। साँस द्वारा वायु के साथ-साथ प्राण शक्ति को मैं अपने अन्दर खींच रहा हूँ। अन्तःकुम्भक करते समय यह भावना करनी चाहिए कि उस चैतन्य शक्ति को मैं अपने भीतर भर रहा हूँ। समस्त नस-नाड़ियों में अंग-प्रत्यंगों में वह शक्ति स्थिर हो रही है। उसे सोंखकर देह का रोम-रोम चैतन्य, प्रफुल्लित, सतेज व परिपुष्ट हो रहा है। रेचक करते समय भावना करनी चाहिए कि शरीर में संचित मल, रक्त में मिले हुए विष, मन में धँसे हुए विकार साँस छोड़ने के साथ वायु के साथ-साथ बाहर निकाले जा रहे हैं। बाह्य कुम्भक करते समय भावना करनी चाहिए कि अन्दर के दोष बाहर निकालकर भीतर का दरवाजा बन्द कर लिया है, ताकि ये विकार वापस न लौटने पायें। इन भावनाओं के साथ प्राणाकर्षण प्राणायाम करना चाहिए। आरम्भ में पाँच प्राणायाम करें, फिर क्रमशः सुविधानुसार बढ़ाते जायें।
    
ठीक तरह से प्राणाकर्षण करने पर सूर्यचक्र जाग्रत होने लगता है। ऐसा लगता है कि पसलियों के जोड़ व आमाशय के स्थान पर जो गड्ढा है वहाँ सूर्य के समान एक छोटा सा प्रकाश बिन्दु मानव नेत्रों से दीख रहा है। वह गोला आरम्भ में छोटा, थोड़े प्रकाश का और धुँधला मालूम पड़ता है, किन्तु जैसे-जैसे अभ्यास बढ़ने लगता है, वैसे-वैसे यह स्वच्छ बड़ा और प्रकाशवान् होता है। जिनका अभ्यास बढ़ा-चढ़ा है। उन्हें आँख बन्द करते ही अपना सूर्य चक्र साक्षात् सूर्य की तरह तेजपूर्ण दिखाई देने लगता है।
    
प्राणाकर्षण की इस प्रक्रिया से प्राण प्रवाह में निर्मलता आती है। और प्राणों की इस निर्मलता से विचारों की उत्तेजना, उद्वेलन स्वतः ही शान्त हो जाते हैं और अन्ततः संस्कारों के शुद्ध होने की प्रक्रिया चल पड़ती है। इस प्रक्रिया से चित्त स्वस्थ-प्रसन्न होता चला जाता है। यदि विवेक व वैराग्य का सम्बल बना रहे और इससे मिलने वाली अतीन्द्रिय सामर्थ्य व सिद्धियों को दरकिनार किया जा सके, तो अन्ततः समाधि की अनुभूति मिलने में भी देर नहीं लगती।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १३५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Revolution

It is an established truth that whoever listened to and heeded the call of the “Budham, Dhamman, Sangham saranam gachchhami” to protest against the then prevalent malpractices. Thousands and thousands forsook everything and followed him. He ushered in a reform through intellectual revolution. A similar miracle was wrought by Gandhiji. One and a half thousand years of slavery and suppression had left the populace emaciated, and it lacked the courage and wherewithal to take on the mighty British Empire.

A small number of satyagrahis were simply no match. But the widespread and deep resentment coalesced into the great freedom struggle. Circumstances started turning favourable, and India became independent. The present age is witnessing a spiritual-intellectual revolution. The divisive  human consciousness bound to be transformed into the unitive cosmic consciousness. Indian culture is on the threshold of becoming world culture. The emergence of a New Era is imminent.

📖 From Akhand Jyoti

शनिवार, 5 दिसंबर 2020

👉 असंम्भव कुछ नही:-

एक समय की बात है किसी राज्य में एक राजा का शासन था। उस राजा के दो बेटे थे – अवधेश और विक्रम। 

एक बार दोनों राजकुमार जंगल में शिकार करने गए। रास्ते में एक विशाल नदी थी। दोनों राजकुमारों का मन हुआ कि क्यों ना नदी में नहाया जाये। 

यही सोचकर दोनों राजकुमार नदी में नहाने चल दिए। लेकिन नदी उनकी अपेक्षा से कहीं ज्यादा गहरी थी। 

विक्रम तैरते तैरते थोड़ा दूर निकल गया, अभी थोड़ा तैरना शुरू ही किया था कि एक तेज लहर आई और विक्रम को दूर तक अपने साथ ले गयी।

विक्रम डर से अपनी सुध बुध खो बैठा गहरे पानी में उससे तैरा नहीं जा रहा था अब वो डूबने लगा था। 

अपने भाई को बुरी तरह फँसा देख के अवधेश जल्दी से नदी से बाहर निकला और एक लकड़ी का बड़ा लट्ठा लिया और अपने भाई विक्रम की ओर उछाला।

लेकिन दुर्भागयवश विक्रम इतना दूर था कि लकड़ी का लट्ठा उसके हाथ में नहीं आ पा रहा था।

इतने में सैनिक वहां पहुँचे और राजकुमार को देखकर सब यही बोलने लगे – अब ये नहीं बच पाएंगे, यहाँ से निकलना नामुमकिन है। 

यहाँ तक कि अवधेश को भी ये अहसास हो चुका था कि अब विक्रम नहीं बच सकता, तेज बहाव में बचना नामुनकिन है, यही सोचकर सबने हथियार डाल दिए और कोई बचाव को आगे नहीं आ रहा था। काफी समय बीत चुका था, विक्रम अब दिखाई भी नही दे रहा था.

अभी सभी लोग किनारे पर बैठ कर विक्रम का शोक मना रहे थे कि दूर से एक सन्यासी आते हुए नजर आये उनके साथ एक नौजवान भी था। थोड़ा पास आये तो पता चला वो नौजवान विक्रम ही था। 

अब तो सारे लोग खुश हो गए लेकिन हैरानी से वो सब लोग विक्रम से पूछने लगे कि तुम तेज बहाव से बचे कैसे?

सन्यासी ने कहा कि आपके इस सवाल का जवाब मैं देता हूँ – ये बालक तेज बहाव से इसलिए बाहर निकल आया क्यूंकि इसे वहां कोई ये कहने वाला नहीं था कि “यहाँ से निकलना नामुनकिन है”

इसे कोई हताश करने वाला नहीं था, इसे कोई हतोत्साहित करने वाला नहीं था। इसके सामने केवल लकड़ी का लट्ठा था और मन में बचने की एक उम्मीद बस इसीलिए ये बच निकला।

दोस्तों हमारी जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही होता है, जब दूसरे लोग किसी काम को असम्भव कहने लगते हैं तो हम भी अपने हथियार डाल देते हैं क्यूंकि हम भी मान लेते हैं कि ये असम्भव है। हम अपनी क्षमता का आंकलन दूसरों के कहने से करते हैं।

आपके अंदर अपार क्षमताएं हैं, किसी के कहने से खुद को कमजोर मत बनाइये। सोचिये विक्रम से अगर बार बार कोई बोलता रहता कि यहाँ से निकलना नामुमकिन है, तुम नहीं निकल सकते, ये असम्भव है तो क्या वो कभी बाहर निकल पाता? कभी नहीं……. 

उसने खुद पे विश्वास रखा, खुद पे उम्मीद थी बस इसी उम्मीद ने उसे बचाया।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ७८)

बड़ा गहरा है—प्राण व मन का नाता

जो योग साधना के मर्म को जानते हैं, उन्हें मालूम है कि प्राण प्रवाह को शुद्ध किये बिना साधना में सफलता सम्भव नहीं है। तपस्वी के तप, भक्त की भक्ति और योगी के योग से सबसे पहले प्राण निर्मल होते हैं। ऐसा होने पर ही इनकी साधना आगे बढ़ती है। प्राणों का मल वासना है। वर्तमान स्थिति में प्राण वासना से गंदले और धुँधले हैं। वासना के आवेग इन्हें प्रेरित, प्रवर्तित, परिवर्तित और उद्वेलित करते हैं। वासना इन्हें जिधर मोड़ती है, प्राण उधर ही मुड़ जाती है। साधना जीवन का यह ऐसा विकट सत्य है, जिसे प्रत्येक साधक अपनी साधना में कभी न कभी अनुभव करता है। जो साधक सावधान और जागरूक होते हैं, वे अपनी साधना के प्रारम्भ में ही इस समस्या का हल ढूँढ लेते हैं। जो इस सावधानी से चूक जाते हैं, उन्हें आगे चलकर भटकाव व पतन के महाव्यूह में फँसना पड़ता है।

महर्षि पतंजलि योग साधना के सभी रहस्यों के गहरे ज्ञानी हैं। इसीलिए वे अपने योग सूत्रों में साधकों व साधना की सभी उलझनों को एक-एक करके सुलझाते हैं। व्यवहार के परिमार्जन से संस्कारों के परिमार्जन की प्रक्रिया सुझाने के साथ महर्षि बताते हैं कि मंजिल तक पहुँचने के लिए राहें और भी हैं। महर्षि पतंजलि अध्यात्म विज्ञान के महान् वैज्ञानिक हैं और वे अपनी वैज्ञानिक अभिवृत्ति के अनुरूप नयी प्रक्रियाएँ व नयी तकनीकें विकसित करते हैं। इस नये सूत्र में उनकी एक नयी तकनीक का प्रस्तुतीकरण है-
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य॥ १/३४॥
शब्दार्थ- वा= अथवा, प्राणस्य = प्राणवायु को, प्रच्छर्दनविधारणाभ्याम् = बारम्बार बाहर निकालने व रोकने के अभ्यास से भी चित्त निर्मल होता है।
अर्थात्  बारी-बारी से श्वास बाहर छोड़ने और रोकने से भी मन शान्त होता है।
    
महर्षि अपने इस सूत्र में बड़ी अद्भुत बात कहते हैं-वे बताते हैं कि प्राण व मन का जोड़ गहरा है। कहीं गहरे में प्राणों में मन घुला हुआ है, ठीक इसी तरह से प्राण भी मन में घुले हुए हैं। श्वास और विचार गहरे में एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। जब हमारे विचारों की गुणवत्ता में परिवर्तन आता है, तो श्वास भी परिवर्तित हो जाती है। विचारों में क्रोध का उद्वेलन हो या कामुकता का ज्वार उठे, तो श्वास की लय बदले बिना नहीं रहती। इसी तरह यदि विचारों में गहरी शान्ति, समरसता व सामंजस्य हो तो श्वास की लय भी सुरीली हो जाती है। इस सत्य व सिद्धान्त के आधार पर ही हठयोग में प्राणायाम का सम्पूर्ण विधान रचा गया है।  हठयोग कहता है कि प्राण को यदि साध लिया जाय, तो मन अपने आप ही सध जायेगा। महर्षि अपने सूत्रों व प्रयोगों में हठयोग की जटिलता तो नहीं बताते, परन्तु प्राणशोधन की आवश्यकता अवश्य बताते हैं। वे कहते हैं कि यदि श्वास के आवागमन को लयबद्ध किया जाय, तो चित्त भी लयबद्ध हो जायेगा।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १३४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 समीक्षा और निराकरण

अपने गुण, कर्म, स्वभाव में जो त्रुटियाँ हों उन पर अपने आलोचक या विरोधी की दृष्टि से निरीक्षण करते रहना चाहिए। जब तक अपने प्रति पक्षपात की दृष्टि रहती है तब तक दोष एक भी सूझ नहीं पड़ता, पर जब निष्पक्ष आलोचक की दृष्टि से देखते हैं तो खुर्दबीन के शीशे की तरह अगणित त्रुटियाँ अपने में दिखाई देने लगती हैं। त्रुटियों को सुधारते और अच्छाइयों बढ़ाते चलना प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का आवश्यक कर्त्तव्य है। अपने में कोई अच्छे गुण भी हो सकते हैं और यह भी हो सकता है कि उनका विकास अभी पूरी तरह न हो पाया हो। इस विकास के लिए भी हमें सतत प्रयत्न करना चाहिए। आदत में सम्मिलित हुई कई बुराइयाँ यदि आरम्भ में ही पूर्णतया छोड़ सकना संभव न हो तो उनकी मात्रा दिन−दिन घटाते चलना शुरू कर देना चाहिए। जैसे बीड़ी पीने की आदत पड़ी हुई है और एक दिन में 10 बीड़ी पीते हैं तो हर महीने एक बीड़ी घटाते चलिये तो दस महीने में पूर्णतया छोड़ने की प्रक्रिया भी बन सकती है। अच्छा तो यही है कि एक बार पूरा मनोबल एकत्रित करके उन्हें झटके के साथ उखाड़ कर फेंक दिया जाय पर जिनसे इतना न बन पड़े, वे धीरे−धीरे भी सुधार के मार्ग पर चल सकते हैं।

अच्छाइयाँ भी हर मनुष्य में होती हैं। उनको समझना चाहिए और उन पर प्रसन्न होना चाहिए। जिस प्रकार बुराइयों को ढूँढ़कर उन पर क्षुब्ध होना, घृणा करना, हानियों की संभावना पर विचार करते रहना और उन्हें त्यागने के लिए नित्य एक कदम बढ़ाते चलना आवश्यक है उसी प्रकार अपनी अच्छाइयों को ढूँढ़ना, उन पर संतोष अनुभव करना और उन्हें बढ़ाते चलने के लिए आगे और भी अधिक बड़े कदम उठाने का प्रयत्न करते रहना आवश्यक है। हर आदमी में बुराइयाँ और अच्छाइयाँ अपने−अपने ढंग की होती है और अलग−अलग प्रकार की। इसलिए हर व्यक्ति को अपनी शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलताओं को स्वयं ही ढूँढ़ना चाहिए और उनके घटाने का कार्यक्रम स्वयं ही बनाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

बुधवार, 2 दिसंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ७७)

करुणा कर सकती है—चंचल मन पर काबू
    
महर्षि के सूत्र का दूसरा आयाम है करुणा। करुणा दुःखी व्यक्ति के प्रति। फिर यह दुःखी कोई भी क्यों न हो। युगऋषि गुरुदेव का कहना था कि दुःखियों को प्रायः  व्यंग्य, अपमान व तिरस्कार का शिकार होना पड़ता है। न तो कोई उनकी सहायता के लिए तत्पर होता है और न कोई उनका हाथ थामता है। गुरुदेव कहते थे- जो प्रत्येक दुःखी में नारायण का दर्शन करता है, उसकी सेवा के लिए स्वयं को न्यौछावर करता है, वही सच्चा योग साधक है। ध्यान रहे सम्वेदना का एक ही अर्थ है। सम+वेदना यानि कि किसी की पीड़ा से हमें भी उतनी ही व्याकुलता होनी चाहिए जितनी कि उसकी है। पीड़ित के प्रति करुणा यही योगधर्म है। फिर वह पीड़ित कोई बुरा हो या भला। गुरुदेव कहा करते थे कि दुःखी सिर्फ दुःखी होता है, वह न भला होता है और न बुरा। वह न पापी होता है न पुण्यात्मा। वह तो सिर्फ नारायण होता है। उसके प्रति तो केवल सम्वेदनशील होकर सेवाधर्म निभाया जाना चाहिए।
    
महर्षि के सूत्र का तीसरा आयाम है- मुदिता। मुदिता सफल व्यक्ति के प्रति, पुण्यवान् के प्रति। हालांकि लोकचलन में सफल व्यक्ति केवल ईर्ष्या के पात्र बनते हैं। प्रत्यक्ष में भले ही कोई उन्हें बधाई देता रहे, प्रशंसा करता रहे, पर परोक्ष में उसे नीचा दिखाने वाले उपाय ही सोचे जाते हैं। गुरुदेव कहते थे किसी की सफलता पर हमें न केवल प्रसन्न होना चाहिए, बल्कि उससे प्रेरणा लेना चाहिए। जो जीवन की तह को जानते हैं, जीवन के मर्म से परिचित हैं, उन्हें मालूम है कि प्रत्येक सफलता केवल पुण्य का परिणाम होती है। पुण्य कर्मों के परिणाम ही व्यक्ति को सफल बनाते हैं। हालाँकि इन्हें हासिल करने के लिए व्यक्ति कभी-कभी दुष्कर्मों का भी सहारा लेता है। लेकिन सफलता कभी भी दुष्कर्मों का परिणाम  नहीं होती। इन दुष्कर्मों के कारण या तो सफलता अधूरी रह जाती है- या फिर कलंकित हो जाती है। इसलिए किसी की भी सफलता के पीछे छुपे उसके पुण्य कर्मों की ओर नजर डालकर हमें प्रसन्न होना चाहिए।
    
महर्षि के सूत्र का चौथा आयाम है- उपेक्षा। हमें उपेक्षा उनकी करनी चाहिए, जो यथार्थ में पापी हैं और कदम-कदम पर हमें नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते हैं। ऐसों के प्रति हमारे मन में न तो द्वेष रहे और न घृणा। इनसे हर पग पर हमको टकराने की भी कोई जरूरत नहीं। इनसे तो बस बचा जाना चाहिए। और इसका एक ही उपाय है-इनकी उपेक्षा। ये बेचारे हैं- इनके प्रति द्वेष भाव रखकर अपने मन को मलिन नहीं करना चाहिए। हाँ, जब परिस्थितियाँ विषमता से भरी हो और जीवन में ऐसे दुष्ट जनों की भरमार हो, तो ऐसे में इनकी उपेक्षा करके सारा ध्यान अपने तपबल बढ़ाने में लगाना चाहिए। यह तप ही हमें इन पापियों से बचाता है और इसी से जीवन की नयी राहें खुलती हैं।
    
और अन्त में इस सूत्र के उपसंहार क्रम में महर्षि कहते हैं कि व्यवहार के इन सभी चार तत्वों का अनुपालन करने से चित्त स्वच्छ हो जाता है, क्योंकि इस प्रक्रिया से अतीत में पड़ी मन की सभी गाँठें खुल जाती हैं और नयी ग्रन्थियों के होने की संभावना समाप्त हो जाती है। बस, अन्तस् का सविधि सम्पूर्ण परिष्कार ही इस व्यवहार साधना का मर्म है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १३१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 आत्म सुधार का मार्ग

आत्म संयम का कार्यक्रम संसार की सबसे बड़ी सेवा है। अपना आदर्श प्रस्तुत किये बिना हम दूसरों को अच्छाई की ओर एक कदम भी आगे बढ़ने की प्रेरणा नहीं दे सकते और न जिस गिरी हुई स्थिति में पड़े हुए हैं उससे ऊँचे उठ सकते हैं। इसलिए आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार और आत्मविकास के लिए विचार करने योजना बनाने और उस निर्धारित कार्यक्रम पर चलने का हमें नियमित प्रोग्राम बनाना चाहिए। अपने विचार और कार्यों का लेखा−जोखा रखने के लिए, डायरी में चार विभाग बना लेने चाहिए। 
(1) आज हमने साधना के लिए कितना समय लगाया और उपासना के लिए कितना समय लगाया और उपासना के कर्मकाण्ड के साथ−साथ जो भावनाऐं रखनी चाहिए वे कितनी श्रद्धा के साथ कितनी गहराई तक रखीं? 
(2) आज हमने स्वाध्याय की दृष्टि से कौन सी पुस्तकें के कितने पृष्ठ पढ़े और उन में प्राप्त हुई महत्वपूर्ण बातों पर कितनी देर मनन-चिन्तन किया? 
(3) आज हमने अपने दिन भर के विचारों और कार्यों की बड़ी समीक्षा करके उनमें क्या−क्या गुण-दोष पाये और कल उन दोषों को सुधारने एवं गुणों को बढ़ाने के लिए क्या निश्चय किया? 
(4) आज हमने दूसरों को क्या सेवा लाभ दिया? इन चारों बातों पर यदि नित्य बारीक नजर रखी जाय, इनके महत्व को सोचते-समझते रहा जाय और दैनिक जीवन में इनके लिए स्थान दिया जाता रहे तो एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो सकती है। ऐसी डायरी रखना और उसे नित्य लिखना प्रत्येक आत्म कल्याण के इच्छुक के लिए आवश्यक है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

👉 साधन और साध्य

एक बार अकबर ने तानसेन से कहा था कि तेरा वीणावादन देखकर कभी—कभी यह मेरे मन में खयाल उठता है कि कभी संसार में किसी आदमी ने तुझसे भी बेहतर बजाया होगा या कभी कोई बजाएगा? मैं तो कल्पना भी  नहीं कर पाता कि इससे श्रेष्ठतर कुछ हो सकता ‘है। 

तानसेन ने कहा,क्षमा करें, शायद आपको पता नहीं कि मेरे: गुरु अभी जिन्दा हैं। और एक बार अगर आप उनकी वीणा सुन लें तो कहां वे और कहां मैं!

बड़ी जिज्ञासा जगी अकबर को। अकबर ने कहा तो फिर उन्हें बुलाओ! तानसेन ने कहा, इसीलिए कभी मैंने उनकी बात नही छेड़ी। आप मेरी सदा प्रशंसा करते थे, मैं चुपचाप पी लेता था, जैसे जहर का घूंट कोई पीता है, क्योंकि मेरे गुरु अभी जिन्दा हैं, उनके सामने मेरी क्या प्रशंसा! यह यूं ही है जैसे कोई सूरज को दीपक दिखाये। मगर मैं चुपचाप रह जाता था, कुछ कहता न था, आज न रोक सका अपने को, बात निकल गयी। लेकिन नहीं कहता था इसीलिए कि आप तत्‍क्षण कहेंगे, ‘उन्हें बुलाओ’। और तब मैं मुश्किल में पड़ुगा, क्योंकि वे यूं आते नहीं। उनकी मौज हो तो जंगल में बजाते हैं, जहां कोई सुननेवाला नहीं। जहां कभी—कभी जंगली जानवर जरूर इकट्ठे हो जाते हैं सुनने को। वृक्ष सुन लेते हैं, पहाड़ सुन लेते हैं। लेकिन फरमाइश से तो वे कभी बजाते नहीं। वे यहां दरबार मे न आएंगे। आ भी जाएं किसी तरह और हम कहें उनसे कि बजाओ तो वे बजाएंगे नहीं। 

तो अकबर ने कहा, फिर क्या करना पड़ेगा, कैसे सुनना पड़ेगा? तो तानसेन ने कहा, एक ही उपाय है कि यह मैं जानता हूं कि रात तीन बजे वे उठते हैं, यमुना के तट पर आगरा में रहते हैं—हरिदास उनका नाम है—हम रात में चलकर छुप जाएं—दो बजे रात चलना होगा; क्योंकि कभी तीन बजे बजाए, चार बजे —बजाए, पांच बजे बजाए; मगर एक बार (जरूर सुबह—सुबह स्नान के बाद वे वीणा बजाते हैं— तो हमें चोरी से ही सुनना होगा, बाहर झोपड़े के छिपे रहकर सुनना होगा।.. शायद ही दुनिया के इतिहास में किसी सम्राट ने, अकबर जैसे बड़े सम्राट ने चोरी से किसी की वीणा सुनी हो!.. लेकिन अकबर गया।

दोनों छिपे रहे एक झाड़ की ओट में, पास ही झोपड़े के पीछे। कोई तीन बजे स्नान करके हरिदास यमुना सै आये और उन्होंने अपनी वीणा उठायी और बजायी। कोई घंटा कब बीत गया—यूं जैसे पल बीत जाए! वीणा तो बंद हो गयी, लेकिन जो राग भीतर अकबर के जम गया था वह जमा ही रहा।

आधा घंटे बाद तानसेन ने उन्हें हिलाया और कहा कि अब सुबह होने के करीब है, हम चलें! अब कब तक बैठे रहेंगे। अब तो वीणा बंद भी हो. चुकी। अकबर ने कहा, बाहर की तो वीणा बंद हो गयी मगर भीतर की वीणा बजी ही चली जाती है। तुम्हें मैंने बहुत बार सुना, तुम जब बंद करते हो तभी बंद ‘हो जाती है। यह पहला मौका है कि जैसे मेरे भीतर के तार छिड़ गये हैं।। और आज सच में ही मैं तुमसे कहता हूं कि तुम ठीक ही कहते थे कि कहा तुम और कहां तुम्हारे गुरु!

अकबर की आंखों से आंसू झरे जा रहे हैं। उसने कहा, मैंने बहुत संगीत सुना, इतना भेद क्यों है? और तेरे संगीत में और तेरे गुरु के संगीत में इतना भेद क्यों है? जमीन—आसमान का फर्क है।

तानसेन ने कहा - कुछ बात कठिन नहीं है। मैं बजाता हूं कुछ पाने के लिए; और वे बजाते हैं क्योंकि उन्होंने कुछ पा लिया है। उनका बजाना किसी उपलब्‍धि की,किसी अनुभूति की अभिव्यक्ति है। मेरा बजाना तकनीकी है। मैं बजाना जानता हूं मैं बजाने का पूरा गणित जानता हूं मगर गणित! बजाने का अध्यात्म मेरे पास नहीं! और मैं जब बजाता होता हूं तब भी इस आशा में कि आज क्या आप देंगे? हीरे का हार भेंट करेंगे, कि मोतियों की माला, कि मेरी झोली सोने से भर देंगे, कि अशार्फेयों से? जब बजाता हूं तब पूरी नजर भविष्य पर अटकी रहती है, फल पर लगी रहती है। वे बजा रहे हैं, न कोई फल है, न कोई भविष्य,वर्तमान का क्षण ही सब कुछ है। उनके जीवन में साधन और साध्य में बहुत फर्क है, साधन ही साध्य है; ओर मेरे जीवन में अभी साधन और साध्य में कोई फर्क नहीं है। बजाना साधन है। पेशेवर हूं मैं। उनका बजाना आनंद है, साधन नहीं। वे मस्ती में हैं।

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ७६)

करुणा कर सकती है—चंचल मन पर काबू

अन्तर्यात्रा विज्ञान हर निर्मल योग साधक की आन्तरिक गुत्थियों को सुलझाता है। उलझे मन के अनेकों धागे इसके जादुई असर से अपने आप सुलझ जाते हैं। अन्तस् की गांठें इसकी छुअन से अपने ही आप खुल जाते हैं।  
साधकों की यह आम समस्या है कि व्यवहार की गड़बड़ियाँ से भी मन इतना चंचल व अस्थिर हो जाता है कि योग साधना की  स्थिति ही नहीं बनती। इस समस्या का निराकरण महर्षि अपने अगले सूत्र में कहते हैं। वे कहते हैं-
मैत्रीकरुणामुदितोयेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्॥ १/३३॥

शब्दार्थ-सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणाम्= सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्मा, ये चारों जिनके क्रम से विषय है, ऐसी; मैत्रीकुरूणामुदितोयेक्षाणाम्= मित्रता, दया, प्रसन्नता और उपेक्षा की; भावनातः= भावना से; चित्तप्रसादनम्= चित्त स्वस्थ हो जाता है।
अर्थात् आनन्दित व्यक्ति के प्रति मैत्री, दुःखी व्यक्ति के प्रति करुणा, पुण्यवान् के प्रति मुदिता तथा पापी के प्रति उपेक्षा, इन भावनाओं का सम्वर्धन करने से मन शान्त हो जाता है।
    
महर्षि पतंजलि के इस सूत्र में व्यावहारिक जीवन की सभी समस्याओं के समाधान समाहित है। इसे यदि व्यवहार चिकित्सा का आधारभूत तत्व कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। व्यवहार चिकित्सा के द्वारा चिकित्सक न केवल मनोरोगी के आन्तरिक घावों को ठीक करता है, बल्कि उसके व्यवहार को सुधारता व सँवारता है। फिर यह व्यवहार बच्चे का हो या फिर युवक अथवा प्रौढ़ का। महर्षि पतंजलि इस सूत्र में व्यवहार के परिष्कार से चित्त के परिष्कार की विधि सुझाते हैं। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि ‘व्यवहार सुधरे तो चित्त सँवरे।’
    
महर्षि के सूत्र में चार आयाम हैं। इनमें से पहला आयाम है मैत्री का। महर्षि कहते हैं कि मैत्री आनन्दित व्यक्ति से। परम पूज्य गुरुदेव इस तत्व की व्याख्या में कहते थे- मैत्री शब्द से तो सभी परिचित हैं, पर अर्थ को प्रायः कोई नहीं जानता। प्रायः लोग मैत्री उससे करते हैं, जिससे कुछ लाभ मिलने वाला हो, जिसमें अपना लोभ टिका हो। इस लाभ और लोभ के बावजूद भी सच्ची मैत्री के दर्शन नहीं हो पाते। बस मित्रता का ऊपरी दिखावा होता है। यथार्थ में तो सुखी और आनन्दित व्यक्ति के प्रति सामान्य मन ईर्ष्या से भर जाता है। दाह और जलन मन को झुलसाने लगते हैं। गुरुदेव कहते थे कि सुखी व आनन्दित से मैत्री का भाव इसलिए होना चाहिए, क्योंकि सुखी रहने की, जीवन जीने की कला सीखी जा सकती है। उससे आनन्दित होने की तकनीकें जानी जा सकती हैं। उसके सहचर्य में जीवन की सही डगर खोजी जा सकती है। बस इस सम्बन्ध में बात इतनी जरूर देख ली जाय कि उसका आनन्द किसी साधन-सुविधा पर न टिका रह कर आत्मा की गहराइयों से उपजा हो।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १३०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 उपासना की अनिवार्य आवश्यकता

नियमित उपासना मनुष्य जीवन में एक अत्यन्त आवश्यक धर्म-कृत्य है। इसकी उपेक्षा किसी को भी नहीं करनी चाहिए। उपासना की जो भी अपनी विधि हो करते हुए दो भावनाऐं मन में बराबर बनायें रहनी चाहिए कि परमात्मा घट−घट वासी और सर्वान्तर्यामी है। वह हमारी हर प्रवृत्ति को भली भाँति जानता है और हमारी भावनाओं के अनुरूप ही वह प्रसन्न-अप्रसन्न होता है अथवा दुख−सुख का दण्ड पुरस्कार प्रदान करता है। वह दयालु होते हुए भी न्यायकारी तथा व्यवस्थाप्रिय है। ईश्वर को हम इसलिए स्मरण रखें कि कुकर्म और कुविचारों से हमें सदा भय बना रहे और ईश्वर की प्रसन्नता के लिए उसके बताये धर्म मार्ग पर चलते हुए या उसकी दुनियाँ में सद्भावना बढ़ाते हुए उसका अनुग्रह प्राप्त कर सकें। “जो सन्मार्ग पर चल रहा है उसके साथ ईश्वर है इसलिए उसे किसी बड़े आततायी से भी डरने की आवश्यकता नहीं है।”

आस्तिकता का प्रतिफल है ‘निर्भयता’ जो हर घड़ी ईश्वर को अपने सहायक के रूप में साथ रहता हुआ अनुभव करेगा वह किसी से क्यों डरेगा। इतना बड़ा बलवान उसके साथ है उसे किसी समस्या या किसी वस्तु से डरने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। ईश्वर महान है। उसकी दया, करुणा, वात्सल्य, दान, न्याय, क्षमा, उदारता, आत्मीयता आदि महानता का स्मरण रखने और वैसे ही स्वयं बनने की चेष्टा करने से ईश्वरीय समीपता एवं महानता प्राप्त होती है, उसी का नाम ‘मुक्ति’ है। इन भावनाओं के साथ की हुई ईश्वर उपासना उपासक की आत्मा में तुरन्त एवं निश्चित रूप से आत्मबल प्रदान करती है।

उपासक उच्चस्तरीय होनी चाहिए आत्मकल्याण के लिए। गायत्री मंत्र में सद्बुद्धि की उपासना है। सद्बुद्धि ही मानव जीवन की सर्वोपरि महत्ता एवं विभूति है। ईश्वर की सद्बुद्धि के, सत्प्रवृत्ति के रूप में उपासना करना ही सच्ची उपासना हो सकती है, यही गायत्री उपासना है। हमारा प्रातःकाल थोड़ा बहुत समय इस कार्य के लिए अवश्य लगता है। यदि अत्यन्त ही व्यस्तता है तो भी उतना तो हो ही सकता है कि प्रातःकाल आँख खुलते ही हम चारपाई पर बैठ कर कुछ देर गायत्री माता का सद्बुद्धि के रूप में ध्यान करते हुए, सत्य−वृत्तियों को जीवन में अधिकाधिक मात्रा में धारण करने की कुछ देर भावना करें। पन्द्रह मिनट इस प्रकार लगाने के लिए समय का अभाव जैसी बात नहीं कही जा सकती। अनिच्छा हो तो बहाना कुछ भी बनाया जा सकता है। जिनके पास अवकाश है वे स्नान करके नित्य-नियमित पूजा अपनी श्रद्धा और मान्यता के अनुरूप किया करें। चूँकि गायत्री मन्त्र भारतीय धर्म और संस्कृति का आदि बीज है, इसलिए उसके लिए अपनी रुचि के साधन क्रम में भी कोई महत्वपूर्ण स्थान अवश्य रखना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

रविवार, 29 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ७५)

एक से ही हों एकाकार
    
भक्त के जीवन में यह एक तत्त्व उसके भगवान् होते हैं। उसका हृदय सदा अपने आराध्य की स्मृति से स्पन्दित होता है। अपने आराध्य के प्रति उसकी भावनाएँ इतनी सघन होती हैं कि उसे यह अभ्यास करना नहीं पड़ता, बल्कि अपने आप बरबस होता चलता है। ध्रुव हो या प्रह्लाद, मीरा हो या रैदास इनके मन-प्राण, विचार- भावनाएँ सदा अपने भगवान् में रमे रहते हैं। श्री रामकृष्ण परमहंस को माँ कहते ही भाव समाधि घेर लेती थी। सच तो यह है कि भक्तों के लिए बड़ा सहज होता है—अपने भगवान् में रमना। वह अपने भगवान् में इतनी प्रगाढ़ता से रमता है कि सभी अवरोध अपने आप ही विलीन होते जाते हैं। 
    
बात मीरा की करें, तो उनके कृष्ण प्रेम की डगर सहज नहीं थी। इस डगर पर चलने वाली मीरा को राणा जी कभी साँप का पिटारा भेजते थे, तो कभी विष का प्याला, लेकिन इन विघ्नों से मीरा को कभी घबराहट नहीं होती। वह तो सदा यही कहती रहती- ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’। सच तो यह है कि भक्त के जीवन का दर्शन ही ‘दूसरो न कोई’ है। किसी और का चिन्तन उसे सुहाता नहीं है। तभी तो गोपियाँ ज्ञान सिखाने आए उद्धव को समझाने लगती हैं- ‘ऊधौ मन नाहीं दस-बीस, एक हुतो सो गयो स्याम संग को आराधै ईस’।
    
भक्त के लिए बड़ा सजह होता है एक तत्त्व का अभ्यास। क्योंकि वही जानता है ‘एक’ में छिपा सत्य। बात है तो खरी, पर कहे बिना रहा भी नहीं जाता। प्रेम की रीति तो भक्त ही जानता है। जिसे दुनिया प्रेम, प्यार का नाम देती है, वह तो वासनाओं की गंदेला कीचड़ में लिपटने, लिपटाने के सिवा और क्या है? देखा यही जाता है कि सारी उम्र प्यार-प्रेम का राग अलापने वाले अपने हठ, जिद एवं अहं को थामे रहते हैं। अब हठ, जिद एवं अहं के विषधरों को पालने वाले भला क्या जानेंगे कि प्रेम तो ‘सीस उतारै भुइँ धरै’ का सौदा है। कबीर ने जाना था इस सच को, तभी तो उन्होंने कहा कि ‘प्रेम गली अति साँकरी, जामे दुइ न समाहिं’। यानि कि प्रेम की  गली अति सँकरी है, इसमें दो आ ही नहीं सकते।
    
बड़ा गहरा अर्थ है इस बात में। जो प्रेम में जीता है, वही इस रहस्य को जानता है। जब प्रेम शुरू होता है, तब दो होते हैं, एक भक्त, दूसरा भगवान्। लेकिन भक्त की दीवानगी अपने भगवान् के लिए इतनी गहरी होती है कि अपने आप को मिटाने के लिए ठान लेता है। उसकी कोशिश होती है कि मेरा अस्तित्व भगवान् में विलीन हो जाए। भक्त रहे ही नहीं भगवान् ही बचे। और होता भी यही है कि भगवान् ही बचता है। 
    
भगवान् से प्रेम संसार में बड़ी विरल घटना के रूप में सामने आता है। बड़ी बड़भागी होती है वे आत्माएँ, जो मीरा बनकर प्रकट होती हैं। पर एक प्रेम- एक भक्ति की शुरूआत थोड़ी आसान है। और वह है गुरुभक्ति, अपने गुरु से प्रेम। पतंजलि प्रणीत एक तत्त्व के अभ्यास का यह बड़ा सरल एवं अनुभूत उपाय है। परम पूज्य गुरुदेव ने स्वयं अपने जीवन में यही सच साधा था। आज उनके शिष्यों के सामने भी यही सुपथ है। अपने गुरु का ध्यान, उन्हीं का चिन्तन, उनकी ही कथा, वार्ता और उन्हीं का ही काम। जो ऐसा करते हैं, उनके जीवन में एक तत्त्व का अभ्यास स्वयं ही होने लगता है। और इसके परिणाम स्वरूप योग साधना के विघ्नों का निराकरण भी होता जाता है। यह कथन न तो कोरी कल्पना है, और न ही किसी तार्किकता का निष्कर्ष। यह तो अनुभूति में सनी, पगी बात है, पढ़ने वाले चाहे तो वे भी कर लें। जिस गति से वे इस गुरुभक्ति की डगर पर चलेंगे, उसी तीव्रता से उनकी साधना में आने वाले विघ्नों का शमन होगा। पर यह सच निर्मल चित्त वालों को ही समझ में आएगा।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १२८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 अपना सुधार−संसार का सुधार

अपने सुधार के बिना परिस्थितियाँ नहीं सुधर सकतीं। अपना दृष्टिकोण बदले बिना जीवन की गतिविधियाँ नहीं बदली जा सकती हैं। इस तथ्य को मनुष्य जितनी जल्दी समझ ले उतना ही अच्छा है। हम दूसरों को सुधारना चाहते हैं पर इसके लिए समर्थ वहीं हो सकता है जो पहले इस सुधार के प्रयोग को अपने ऊपर आजमा कर योग्यता की परीक्षा दे दे। दूसरे लोग अपना कहना न मानें यह हो सकता है पर हम अपनी बात स्वयं ही न मानें इसका क्या कारण है? अपनी मान्यताओं को यदि हम स्वयं ही कार्य रूप में परिणित न करेंगे तो फिर सभी स्त्री बच्चों से, मित्र पड़ौसियों से या सारे संसार से यह आशा कैसे करेंगे कि वे अपनी बुरी आदतों को छोड़कर उस उत्तम मार्ग पर चलने लगें जिसकी कि आप शिक्षा देते हैं।

अपना मन अपना है, उसे समझाना और सुधारना तो अपने वश क बात हो ही सकती है। बाहरी अस्वच्छता साफ करने में कुछ अड़चने आवें यह बात समझ में आती है पर अपना घर, अपना मन भी साफ सुथरा न बनाया जा सकने में कौन बहानेबाजी ठीक जँचेगी? यह कार्य कोई देवता या गुरु कर देगा यह सोचना व्यर्थ है। हर आदमी अपने को स्वयं ही सुधार या बिगाड़ सकता है, दूसरे लोग इस कार्य में सहायता कर सकते हैं पर रोटी खाने, दही जमने, विद्या पढ़ने की तरह मन को सुधारने का काम भी स्वयं करना पड़ेगा। हमारे बदले की कोई दूसरा रोटी खा लिया करे, कोई दूसरा टट्टी हो आया करे यह नहीं हो सकता इसी प्रकार यह भी नहीं हो सकता कि किसी दूसरे के आशीर्वाद या वरदान से हमारी मानसिक अस्वच्छता दूर हो जाय। यह कार्य स्वयं ही करना होगा हमें भी स्वयं ही करना पड़ेगा। संसार के सुधार का आन्दोलन करना चाहिए पर संसार में, समाज में सबसे पहला वह व्यक्ति कौन हो सकता है जिससे सुधार कार्य आरंभ किया जाय? वह हम स्वयं ही हो सकते हैं। अपने प्रयत्न से अपने को सुधार कर ही हम संसार और समाज की सेवा कर सकने के अधिकारी सिद्ध हो सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

शनिवार, 28 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ७४)

एक से ही हों एकाकार

योग पथ पर आगे बढ़ते जाना आसान नहीं है। इसमें आने वाले अँधेरे, अड़चनें, मुश्किलें भी जटिल है।  हर नया कदम योग साधक के सामने नयी चुनौती खड़ी करता है। इसका सामना करने के लिए नए सूत्र, नयी तकनीकें और नए ढंग की प्रकाश ज्योति चाहिए। अन्तर्यात्रा विज्ञान की हर नयी कड़ी योग साधक की इसी समस्या का सार्थक समाधान है। योग पथ की गहनता के अनुरूप इसके समाधान की क्षमता भी बढ़ती जाती है। योग साधक इसकी अनुभूति अपनी अन्तर्यात्रा में करते हैं। उन्हें पग-पग पर महर्षि पतंजलि की प्रेरणा एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव के आशीषों की अनुभूति होती है।

जीवन ऊर्जा के चक्र के अव्यवस्थित हो जाने से जन्मे विघ्नों को समाप्त करने का समाधान महर्षि अपने अगले सूत्र में बताते हैं। और यह सूत्र है-
तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः॥ १/३२॥
शब्दार्थ-तत्प्रतिषेधार्थम्= उनको दूर करने के लिए; एकतत्त्वाभ्यासः= एक तत्त्व का अभ्यास (करना चाहिए)।
अर्थात् उनको (साधना में आने वाले सभी विघ्नों को) दूर करने के लिए एक तत्त्व का अभ्यास करना चाहिए।
    
महर्षि पतंजलि का यह सूत्र अपने अर्थों में अतिव्यापक है। वह इस सूत्र में एक तत्त्व के अभ्यास को सभी विघ्नों के निराकरण के रूप में तो प्रस्तुत करते हैं, परन्तु वह एक तत्त्व क्या हो? इसका चुनाव योग साधक पर ही छोड़ देते हैं। अब यह योग साधक की साधना के स्वरूप, स्तर पर निर्भर करता है कि वह एक तत्त्व के रूप में किसे चुनता है। परन्तु इतना जरूर है कि वह जिसे भी चुने उसी में उसके मन-प्राण घुलने चाहिए। वहीं पर उनके विचार व भाव केन्द्रित होना चाहिए। यानि कि इस एक तत्त्व को उसके साधना जीवन में चरम आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित होना चाहिए। इसकी स्मृति में उसकी जीवन धारा बहनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १२७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 दूरदर्शिता का तकाजा

जो आज का, अभी का, तुरन्त का लाभ सोचता है और इसके लिए कल की हानि की भी परवा नहीं करता वह उतावला मन विपत्तियों को आमंत्रण देता रहता है। प्रत्येक महान कार्य समयसाध्य और श्रमसाध्य होता है। उसकी पूर्ति के लिए आरंभ में बहुत कष्ट सहना पड़ता है, प्रतीक्षा करनी होती है और धैर्य रखना होता है। जिसमें इतना धैर्य नहीं वह तत्काल के छोटे लाभ पर ही फिसल पड़ता है और कई बार तो यह भी नहीं सोचता कि कल इसका क्या परिणाम होगा? चोर, ठग, बेईमान, उचक्के लोग तुरन्त कुछ फायदा उठा लेते हैं पर जिन व्यक्तियों को एक बार दुख दिया उनसे सदा के लिए संबन्ध समाप्त हो जाते हैं। फिर नया शिकार ढूँढ़ना पड़ता है। ऐसे लोग अपने ही परिचितों की नजर को बचाते हुए अतृप्ति और आत्मग्लानि से ग्रसित प्रेत−पिशाच की तरह जहाँ−तहाँ मारे−मारे फिरते रहते हैं और अन्त में उनका कोई सच्चा सहायक नहीं रह जाता। 

वासना के वशीभूत होकर लोग ब्रह्मचर्य की मर्यादा का उल्लंघन करते रहते हैं। तत्काल तो उन्हें कुछ प्रसन्नता होती है पर पीछे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ही चौपट हो जाता है पर पीछे विरोध एवं शत्रुता का सामना करना पड़ता है तो उस क्षणिक आवेश पर पछताने की बात ही हाथ में शेष रह जाती है। स्कूल पढ़ने जाना छोड़कर फीस के पैसे सिनेमा में खर्च कर देने वाले विद्यार्थी को उस समय अपनी करतूत पर दुख नहीं वरन् गर्व ही होता है पर पीछे जब वह अशिक्षित रह जाता है और जीवन को कष्टमय प्रक्रियाओं के साथ व्यतीत करता है तब उसे अपनी भूल का पता चलता है। दूरदर्शिता और अदूरदर्शिता का अन्तर स्पष्ट है। उसके परिणाम भी साफ हैं। मन की अदूरदर्शिता एक विपत्ति है। जिसमें तुरन्त का कुछ लाभ भले ही दिखाई पड़े पर अंत बड़ा दुखदायी होता है। मन में इतनी विवेकशीलता होनी ही चाहिए कि वह आज की, अभी की ही बात न सोचकर कल की, भविष्य की और अन्तिम परिणाम की बात सोचें। जिसने अपने विचारों में दूरदर्शिता के लिए स्थान रखा है उसे ही बुद्धिमान कहा जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

गुरुवार, 26 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ७३)

बहुत बड़ी है आततायी विघ्नों की फौज
    
महर्षि कहते हैं कि दुःख, निराशा, कंपकंपी एवं अनियमित श्वसन बीमार मन के लक्षण है। यानि कि यदि मन बीमार है, तो ये पाँचों अनुभूतियाँ किसी न किसी तरह से होती रहेंगी। इन लक्षणों में प्रत्येक लक्षण मन की बीमार दशा का बयान करता है। उदाहरण के लिए दुःख- इसका मतलब है कि मन तनाव से भरा है, बँटा-बिखरा है। और यह बँटा-बिखरा मन निराश ही होगा और जो सतत उदास-निराश होता है उसकी जैविक ऊर्जा का परिपथ हमेशा गड़बड़ होता है। ऐसे व्यक्तियों के शरीर में बहने वाली जैव विद्युत् कभी भी ठीक-ठीक नहीं बहती और देह में एक सूक्ष्म कंपकंपी शुरू हो जाती है। और जब प्राण ही कंपायमान है, तो भला श्वास नियमित कैसे होगा? अब यदि इन सभी लक्षणों को दूर करना है तो उपाय एक ही है कि मन स्वस्थ हो जाय। मन की बीमारी समाप्त हो जाय।
    
इसके लिए उपाय एक ही है- मंत्र जप। मन यदि मंत्र के स्पर्श में आए अथवा मन में यदि मंत्र स्पन्दित होने लगे तो समझो कि मन की बीमारी ज्यादा देर तक टिकने वाली नहीं है। परम पूज्य गुरुदेव अपनी आध्यात्मिक गोष्ठियों में इस सम्बन्ध में बड़ी अद्भुत बात कहते थे। उनका कहना था कि- बेटा, मंत्र मन का इन्जेक्शन है। देह की चिकित्सा करने वाले चिकित्सक देह में इन्जेक्शन लगाते हैं। इस इन्जेक्शन की भी दो विधियाँ हैं- १. मांस पेशियों में लगाया जाने वाला इन्जेक्शन, २. रक्तवाहिनी नलिकाओं में लगाया जाने वाला इन्जेक्शन। चिकित्सक कहते हैं कि पहले की तुलना में दूसरी तरह से लगाया जाने वाला इन्जेक्शन जल्दी असर करता है।
    
परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि मंत्र ऐसा इन्जेक्शन है, जो मन में लगाया जाता है। इस इन्जेक्शन का प्रयोग मंत्रविद्या के मर्मज्ञ या आध्यात्मिक चिकित्सक करते हैं। इसके प्रयोग के तीन तरीके हैं। १. स्थूल वाणी के द्वारा, २. सूक्ष्म वाणी के द्वारा एवं ३. मानसिक स्पन्दनों के द्वारा। इसमें से पहला तरीका सबसे कम असर कारक है। यदि कोई बोल-बोल कर जप करे, तो असर देर से होता है। इसकी तुलना में दूसरा तरीका ज्यादा असरकारक है। यानि कि जप यदि अस्फुट स्वर में उपांशु ढंग से मानसिक एकाग्रता के साथ किया जाय, तो असर ज्यादा गहरा होता है। इन दोनों तरीकों से कहीं ज्यादा प्रभावशाली है मंत्र जप का तीसरा तरीका कि वाणी पर सम्पूर्णता शान्त रहे और मंत्र मानसिक स्पन्दनों में स्पन्दित होता रहे। इसका असर व प्रभाव बहुत गहरा होता है।
    
इस अन्तिम तरीके की खास बात यह है कि मंत्र का इन्जेक्शन सीधा मन में ही लग रहा है। मन के विचारों के साथ मंत्र के विचार-स्पन्दन घुल रहे हैं। यदि मंत्र गायत्री है, तो फिर यह असर हजारों-लाखों गुना ज्यादा हो जाता है। इसके प्रभाव के पहले चरण में मन की टूटी-बिखरी लय फिर से सुसम्बद्ध होने लगती है। मन में मंत्र के अनुरूप एक समस्वरता पनपती है। मानसिक चेतना में मंत्र नए प्राणों का संचार करता है। इसकी शिथिलता-निस्तेजता समाप्त होती है। एक नयी ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है। यह प्रक्रिया अपने अगले चरण से प्राणों की खोयी हुई लय वापस लाती है। जैव विद्युत् का परिपथ फिर से सुचारु होता है। और प्राणों की अनियमितता समाप्त हो जाती है।
    
इस सूत्र की व्याख्या में गुरुदेव कहते थे कि दुःख और निराशा मन के तल पर पनपते हैं। कंपकंपी एवं अनियमित श्वसन प्राणों के तल पर उपजता है। मंत्र जप करने वाले साधक की सबसे पहले मानसिक संरचना में परिवर्तन आते हैं। उसका मन नए सिरे से रूपान्तरित, परिवर्तित होता है। इस रूपान्तरण में दुःख प्रसन्नता में बदलता है और निराशा उत्साह में परिवर्तित होती है। प्रक्रिया के अगले चरण में प्राण बल बढ़ने से कंपकंपी दृढ़ता एवं बल में बदल जाती है। और श्वास की गति धीमी व सम होने लगती है। ये ऐसे दिखाई देने वाले अनुभव हैं- जिन्हें गायत्री मंत्र का कोई भी साधक छहः महीनों के अन्दर कर सकता है। शर्त बस यही है कि गायत्री मंत्र का जप गायत्री महाविज्ञान में दी गई बारह तपस्याओं का अनुशासन मानकर किया जाय। यह हो सका, तो अन्तर्यात्रा मार्ग पर प्रगति का चक्र और तीव्र हो जाएगा।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १२४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 परिपूर्ण कोई नहीं

किसी व्यक्ति में या किसी वस्तु में थोड़ा सा भी अवगुण देखकर कई व्यक्ति आग−बबूला हो उठते हैं और उसकी उस छोटी सी बुराई को ही बढ़ा-चढ़ाकर कल्पित करते हुए ऐसा मान बैठते हैं मानों यही सबसे खराब हो। अपनी एक बात किसी ने नहीं मानी तो उसे अपना पूरा शत्रु ही समझ बैठते हैं। जीवन में अनेकों सुविधाऐं रहते हुए भी यदि कोई एक असुविधा है तो उन सुविधाओं की प्रसन्नता अनुभव न करते हुए सदा उस अभाव का ही चिंतन करके खिन्न बने रहते हैं। ऐसे लोगों को सदा संताप और क्रोध की आग में ही झुलसते रहना पड़ेगा। इस संसार में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं जिसमें कोई दोष-दुर्गुण नहीं और न ही कोई वस्तु ऐसी है जो सब प्रकार हमारे अनुकूल ही हो। सब व्यक्ति सदा वही आचरण करें जो हमें पसंद है ऐसा हो नहीं सकता। 

सदा मनचाही परिस्थितियाँ किसे मिली हैं? किसी को समझौता करके जो मिला है उस पर सन्तोष करते हुए यथासंभव सुधार करते चलने की नीति अपनानी पड़ी है तभी वह सुखी रह सकता है। जिसने कुछ नहीं, या सब कुछ की माँग की है उसे क्षोभ के अतिरिक्त और कुछ उपलब्ध नहीं हुआ है। अपनी धर्मपत्नी में कई अवगुण भी हो सकते हैं यदि उन अवगुणों पर ही ध्यान रखा जाय तो वह बहुत दुखदायक प्रतीत होगी। किन्तु यदि उसके त्याग, आत्म-समर्पण, वफादारी, सेवा-बुद्धि, उपयोगिता, उदारता एवं निस्वार्थता की कितनी ही विशेषताओं का देर तक चिन्तन करें तो लगेगा कि वह साक्षात् देवी के रूप में हमारे घर अवतरित हुई है। उसी प्रकार पिता−माता के एक कटुवाक्य पर क्षुब्ध हो उठने उपकार, वात्सल्य एवं सहायता की लम्बी शृंखला पर विचार करें तो उत्तेजनावश कह दिया गया एक कटु शब्द बहुत ही तुच्छ प्रतीत होगा। मन को बुराई के बीच अच्छाई ढूँढ़ निकालने की आदत डालकर ही हम अपनी प्रसन्नता को कायम रख सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 राजा बड़ा या संत

एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य ...