शनिवार, 5 दिसंबर 2020

👉 समीक्षा और निराकरण

अपने गुण, कर्म, स्वभाव में जो त्रुटियाँ हों उन पर अपने आलोचक या विरोधी की दृष्टि से निरीक्षण करते रहना चाहिए। जब तक अपने प्रति पक्षपात की दृष्टि रहती है तब तक दोष एक भी सूझ नहीं पड़ता, पर जब निष्पक्ष आलोचक की दृष्टि से देखते हैं तो खुर्दबीन के शीशे की तरह अगणित त्रुटियाँ अपने में दिखाई देने लगती हैं। त्रुटियों को सुधारते और अच्छाइयों बढ़ाते चलना प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का आवश्यक कर्त्तव्य है। अपने में कोई अच्छे गुण भी हो सकते हैं और यह भी हो सकता है कि उनका विकास अभी पूरी तरह न हो पाया हो। इस विकास के लिए भी हमें सतत प्रयत्न करना चाहिए। आदत में सम्मिलित हुई कई बुराइयाँ यदि आरम्भ में ही पूर्णतया छोड़ सकना संभव न हो तो उनकी मात्रा दिन−दिन घटाते चलना शुरू कर देना चाहिए। जैसे बीड़ी पीने की आदत पड़ी हुई है और एक दिन में 10 बीड़ी पीते हैं तो हर महीने एक बीड़ी घटाते चलिये तो दस महीने में पूर्णतया छोड़ने की प्रक्रिया भी बन सकती है। अच्छा तो यही है कि एक बार पूरा मनोबल एकत्रित करके उन्हें झटके के साथ उखाड़ कर फेंक दिया जाय पर जिनसे इतना न बन पड़े, वे धीरे−धीरे भी सुधार के मार्ग पर चल सकते हैं।

अच्छाइयाँ भी हर मनुष्य में होती हैं। उनको समझना चाहिए और उन पर प्रसन्न होना चाहिए। जिस प्रकार बुराइयों को ढूँढ़कर उन पर क्षुब्ध होना, घृणा करना, हानियों की संभावना पर विचार करते रहना और उन्हें त्यागने के लिए नित्य एक कदम बढ़ाते चलना आवश्यक है उसी प्रकार अपनी अच्छाइयों को ढूँढ़ना, उन पर संतोष अनुभव करना और उन्हें बढ़ाते चलने के लिए आगे और भी अधिक बड़े कदम उठाने का प्रयत्न करते रहना आवश्यक है। हर आदमी में बुराइयाँ और अच्छाइयाँ अपने−अपने ढंग की होती है और अलग−अलग प्रकार की। इसलिए हर व्यक्ति को अपनी शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलताओं को स्वयं ही ढूँढ़ना चाहिए और उनके घटाने का कार्यक्रम स्वयं ही बनाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

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