सोमवार, 7 दिसंबर 2020

👉 अविश्वास और सन्देह

हर किसी पर अविश्वास करने वाले, सब को संदेह और तुच्छता की दृष्टि से देखने वाले व्यक्ति अपने मन में ऐसा सोचते हैं कि हम बहुत बुद्धिमान हैं किसी की बातों में नहीं आते और चौकस रहकर अपनी जरा भी हानि नहीं होने देते पर वस्तुतः यह उनकी भारी भूल है। अविश्वासी को किसी का सच्चा प्रेम नहीं मिल सकता। भावना छिपती नहीं, जब दूसरे को सह मालूम पड़ता है कि यह हमारे प्रति अविश्वास करता है तो वह भी सच्चा प्रेम नहीं कर सकता और न सहानुभूति रखता है। ऐसी प्रकृति के व्यक्ति आमतौर से मित्रविहीन देखे गये हैं। माना कि विश्वास में खतरा है। 

यदि खरे खोटे की परख न करके हर किसी पर विश्वास करने लग जाय तो उसमें ठगे जाने का खतरा भी है। पर साथ ही यह भी निश्चित है कि किसी ने कभी दूसरों को अपना बनाया है तो उसे उस पर पूरा विश्वास अवश्य करना पड़ा है। एक व्यक्ति दूसरे का गुलाम तभी बनता है जब उसमें अपने लिए सच्ची सहानुभूति एवं आस्था अनुभव करता है। दाम्पत्ति जीवन में, भाई-भाइयों में जहाँ भी सच्ची आत्मीयता पाई जायगी वहाँ उसके मूल में विश्वास वफादारी और गहरा आत्म−भाव अवश्य होगा। अविश्वास के वातावरण में एक ऐसी घुटन रहती है कि मनुष्य वहाँ से अलग हटकर ही सन्तोष की साँस ले पाता है। परायों को अपना बनाने और अपनों को पराया बनाने में यह विश्वास एवं अविश्वास ही प्रमुख कारण रहा होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

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