जीभ का चटोरापन अनावश्यक मात्रा में अभक्ष्य पेट पर लादता है और क्रमशः अपच, रक्त दूषण बढ़ाते-बढ़ाते समूची स्वास्थ्य सम्पदा को ही बर्बाद करके रख देता है। इसी प्रकार कामुक चिन्तन में निरत रहने वाले पाते तो कुछ नहीं, अपनी एकाग्रता और चिन्तन की शालीनता गिराते-गिराते, घटाते-घटाते खोखला बनाने वाली दुश्चरित्रता के मानसिक मरीज बन जाते हैं। ऐसे लोग बौद्धिक दृष्टि से तो दुर्बल होते ही जाते हैं। शरीरबल, मनोबल और चरित्र बल की दृष्टि से भी गई गुजरी स्थिति में जा पहुँचते हैं।
व्यक्तित्व को खोखला करने वाली दुष्प्रवृत्तियों को अपने चिन्तन, स्वभाव और व्यवहार में ढूँढ़ते रहा जाय, साथ ही उन्हें संक्रामक बीमारी मानकर समय रहते उन्मूलन का उपाय उपचार किया जाता रहे तो यह अपने आप से स्वयं लड़ते रहने की शूरता किसी सफल सेनापति को विजयश्री मिलने जैसी मानी जायेगी। जो अपने को जीतता है वह विश्व विजयी बनता है। इस उक्ति को सर्वथा सारगर्भित समझा जाना चाहिए। गीता में ऐसे ही धर्मक्षेत्र, कर्मक्षेत्र में अर्जुन को लड़ने का उपदेश भगवान ने दिया था। वह हर विचारशील के लिए सदा सर्वदा अनुकरणीय है।
वह व्यक्तिगत सुधार परिधि की गुण, कर्म, स्वभाव क्षेत्र की चर्चा हुई। अब एक कदम और आगे बढ़ना चाहिए। परिवार एवं समाज में प्रयुक्त होने वाले प्रचलनों को भी इसी दृष्टि से देखना चाहिए और खोजना चाहिए कि सर्वत्र न सही अपने निज के व्यवहार तथा सम्बद्ध परिवार में ऐसी क्या अवांछनीयताएँ हैं जो व्यक्तिगत क्षेत्र में पनपने पर भी समूचे समाज के लिए घातक सिद्ध होती हैं। हैजा प्लेग के विषाणु आरम्भ में किसी छोटे क्षेत्र में होते हैं पर छूत की बीमारी बनकर दूर-दूर तक फैलते और असंख्यों का प्राण हरण करते चले जाते हैं। मूढ़ मान्यताएँ, कुरीतियाँ और अनैतिकताएँ एक प्रकार से चरित्र एवं समाज क्षेत्र की बीमारियाँ हैं। यह जहाँ पनपती हैं उतने ही क्षेत्र में तबाही नहीं करती वरन् अपनी चपेट में सुविस्तृत क्षेत्र को जकड़ती और पतन पराभव का वातावरण बनाती चली जाती हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
व्यक्तित्व को खोखला करने वाली दुष्प्रवृत्तियों को अपने चिन्तन, स्वभाव और व्यवहार में ढूँढ़ते रहा जाय, साथ ही उन्हें संक्रामक बीमारी मानकर समय रहते उन्मूलन का उपाय उपचार किया जाता रहे तो यह अपने आप से स्वयं लड़ते रहने की शूरता किसी सफल सेनापति को विजयश्री मिलने जैसी मानी जायेगी। जो अपने को जीतता है वह विश्व विजयी बनता है। इस उक्ति को सर्वथा सारगर्भित समझा जाना चाहिए। गीता में ऐसे ही धर्मक्षेत्र, कर्मक्षेत्र में अर्जुन को लड़ने का उपदेश भगवान ने दिया था। वह हर विचारशील के लिए सदा सर्वदा अनुकरणीय है।
वह व्यक्तिगत सुधार परिधि की गुण, कर्म, स्वभाव क्षेत्र की चर्चा हुई। अब एक कदम और आगे बढ़ना चाहिए। परिवार एवं समाज में प्रयुक्त होने वाले प्रचलनों को भी इसी दृष्टि से देखना चाहिए और खोजना चाहिए कि सर्वत्र न सही अपने निज के व्यवहार तथा सम्बद्ध परिवार में ऐसी क्या अवांछनीयताएँ हैं जो व्यक्तिगत क्षेत्र में पनपने पर भी समूचे समाज के लिए घातक सिद्ध होती हैं। हैजा प्लेग के विषाणु आरम्भ में किसी छोटे क्षेत्र में होते हैं पर छूत की बीमारी बनकर दूर-दूर तक फैलते और असंख्यों का प्राण हरण करते चले जाते हैं। मूढ़ मान्यताएँ, कुरीतियाँ और अनैतिकताएँ एक प्रकार से चरित्र एवं समाज क्षेत्र की बीमारियाँ हैं। यह जहाँ पनपती हैं उतने ही क्षेत्र में तबाही नहीं करती वरन् अपनी चपेट में सुविस्तृत क्षेत्र को जकड़ती और पतन पराभव का वातावरण बनाती चली जाती हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य






































