बुधवार, 6 नवंबर 2019

👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग २)

यह मान्यता अनगढ़ों की है कि वैभव के आधार पर ही समुन्नत बना जा सकता है, इसलिए उसे हर काम छोड़कर हर कीमत पर अर्जित करने में अहर्निश संलग्न रहना चाहिए। सम्पन्नता से मात्र सुविधाएँ खरीदी जा सकती है और वे मात्र मनुष्य के विलास, अहंकार का ही राई रत्ती समाधान कर पाती है। राई रत्ती का तात्पर्य है, क्षणिक तुष्टि। उतना जितना कि आग पर ईंधन डालते समय प्रतीत होता है कि वह बुझ चली। किन्तु वह स्थिति कुछ ही समय में बदल जाती है और पहले से भी अधिक ऊँची ज्वालाएँ लहराने लगती हैं। दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने में वैभव काम आ सकता है। दर्प दिखाने, विक्षोभ उभारने के अतिरिक्त उससे और कोई बड़ा प्रयोजन सधता नहीं है। अनावश्यक संचय के ईर्ष्या द्वेष से लेकर दुर्व्यसनों तक के अनेकानेक ऐसे विग्रह खड़े होते है, जिन्हें देखते हुए कई बार तो निर्धनों की तुलना में सम्पन्नों को अपनी हीनता अनुभव करते देखा गया है।

उत्कृष्टता के आलोक की आभा यदि अन्तराल तक पहुँचे तो व्यक्ति को नए सिरे से सोचना पड़ता है और अपनी दिशाधारा का निर्धारण स्वतन्त्र चिन्तन एवं एकाकी विवेक के आधार पर करना पड़ता है। प्रस्तुत जन समुदाय द्वारा अपनायी गयी मान्यताओं और गतिविधियों से इस प्रयोजन के लिए तनिक भी सहायता नहीं मिलती। वासना, तृष्णा के लिए मरने खपने वाले नर पामरों की तुलना में अपना स्तर ऊँचा होने की अनुभूति होते ही परमार्थ के लिए मात्र दो ही मनीषियों का आश्रय लेना पड़ता है, इनमें से एक को आत्मा दूसरे को परमात्मा कहते हैं। इन्हीं को ईमान और भावना भी कहा जा सकता है। उच्चस्तरीय निर्धारणों में इन्हीं का परामर्श प्राप्त होता है। व्यामोह ग्रस्त तो ‘कोढ़ी और संघाती चाहे’ वाली बात ही कर सकते हैं। नरक में रहने वालों को भी साथी चाहिए। अस्तु वे संकीर्ण स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में उन्हीं की तरह बुलबुलाते रहने में ही सरलता, स्वाभाविकता देखते हैं। तदनुसार परामर्श भी वैसा ही देते हैं, आग्रह भी वैसा ही करते हैं।

इस रस्साकशी में विवेक का कर्तव्य है कि औचित्य का समर्थन करें। अनुचित के लिए मचलने वालों की बालबुद्धि को हँसकर टाल दें। गुड़ दे सकना सम्भव न हो तो, गुड़ जैसी बात कहकर भी सामयिक संकट को टाला जा सकता है। लेकिन बहुधा ऐसा होता नहीं। निकृष्टता का अभाव सहज ही मानव को अपनी ओर खींचता है। इसका निर्धारण स्वयं औचित्य, विवेक के आधार पर करना होता है। निषेधात्मक परामर्शों को इस कान सुनकर दूसरे कान से निकाल देना अथवा ऐसा परामर्श देने वाले व्यक्ति के चिन्तन का परिष्कार करना भी एक ऐसा प्रबल पुरुषार्थ है, जो बिरलों से ही बन पड़ता है। लेकिन यह संभव है क्योंकि मानवी गरिमा उसे सदा ऊँचा उठने, ऊँचा ही सोचने का संकेत करती है। कौन, कितना इस पुकार को सुन पाता है, यह उस पर, उसकी मन की संरचना, अन्तश्चेतना पर निर्भर है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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