मंगलवार, 18 अक्तूबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 19 Oct 2016

🔵 पुरुषार्थ एक नियम है और भाग्य उसका अपवाद। अपवादों का अस्तित्व तो मानना पड़ता है, पर उनके आधार पर कोई नीति नहीं अपनाई जा सकती। जैसे कभी-कभी ग्रीष्म ऋुत में ओले बरस जाते हैं, यह अपवाद है। इन्हें कौतुक या कौतूहल की दृष्टि से देखा जा सकता है, पर इनको नियम नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार भाग्य की गणना अपवादों में तो हो सकती है, पर यह नहीं माना जा सकता कि मानव जीवन की सारी गतिविधियाँ ही पूर्ण निश्चित भाग्य विधान के अनुसार चलती हैं। यदि ऐसा होता तो पुरुषार्थ और प्रयत्न की कोई आवश्यकता ही न रह जाती।

🔴 मनुष्य और भय परस्पर विरोधी शब्द हैं। मनुष्य में जिस शक्ति की कल्पना की जाती है उसके रहते उसे भय कदापि न होना चाहिए, पर आत्मबल की कमी और अपनी शक्तियों पर विश्वास न रखने से ही वह स्थिति बनती है। भय मनुष्य को केवल पाप से होना चाहिए। चोरी, छल, कपट, बेईमानी, मिलावट, जुआ, नशा, मांसाहार-इनसे सामाजिक जीवन में कलुष उत्पन्न होता है, इनसे भयभीत होना व्यक्ति और समाज के हित में है, किन्तु मृत्यु और विपरीत परिस्थितियों से घबड़ाता मनुष्योचित धर्म नहीं है।

🔵 भगवान् घट-घट वासी हैं। वे भावनाओं को परखते हैं और हमारी प्रवृत्तियों को भली प्रकार जानते हैं। उन्हें किसी बाह्य उपचार से बहकाया नहीं जा सकता। वे किसी पर तभी कृपा करते हैं जब भावना की उत्कृष्टता को परख लेते हैं। उन्हें भजन से अधिक भाव प्यारा है। भावनाशील व्यक्ति बिना भजन के भी ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, पर भावनाहीन व्यक्ति के लिए केवल भजन के बल पर लक्ष्य प्राप्ति संभव नहीं हो सकती।

🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 आपसी मतभेद से विनाश :-

🔵 एक बहेलिए ने एक ही तरह के पक्षियों के एक छोटे से झुंड़ को खूब मौज-मस्ती करते देखा तो उन्हें फंसाने की सोची. उसने पास के घने पेड़ के नीच...