रविवार, 18 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 Feb 2024

🔹किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।
 
🔸 हे सखे, तुम क्यों रो रहे हो? सब शक्ति तो तुम्हीं में हैं। हे भगवन्, अपना ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। ये तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड की कोई शक्ति नहीं प्रबल शक्ति आत्मा की हैं। हे विद्वन! डरो मत्; तुम्हारा नाश नहीं हैं, संसार-सागर से पार उतरने का उपाय हैं। जिस पथ के अवलम्बन से यती लोग संसार-सागर के पार उतरे हैं, वही श्रेष्ठ पथ मै तुम्हे दिखाता हूँ!
 
🔹लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मे, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।

🔸 अपना काम करते जाओ किसी की बात का जवाब देने से क्या काम? सत्यमेव जयते नानृतं, सत्येनैव पन्था विततो देवयानः (सत्य की ही विजय होती है, मिथ्या की नहीं; सत्य के ही बल से देवयानमार्ग की गति मिलती है।) ...धीरे - धीरे सब होगा। वीरता से आगे बढो। एक दिन या एक साल में सिध्दि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ रहो। स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे। याद रखो व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द

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शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Feb 2024

🔸 दु:ख और क्लेशों की आग में जलने से बचने की जिन्हें इच्छा है उन्हें पहला काम यह करना चाहिए कि अपनी आकांक्षाओं को सीमित रखें। अपनी वर्तमान परिस्थिति में प्रसन्न और सन्तुष्ट रहने की आदत डालें। गीता के अनासक्त कर्मयोग का तात्पर्य यही है कि महत्वकांक्षायें वस्तुओं की न करके केवल कर्त्तव्य पालन की करें।
 
🔹 देवत्व वह आलोक है, जिसके हटते ही तमिस्ना और निस्तब्धता छाने लगती है। नरक क्या है ? देवत्व के आभाव में फैली हुई अव्यवस्था और उसकी सड़न-दुर्गंध। दैत्य क्या है? देवत्व के दुर्बल बनने पर परिपुष्ट हुआ औद्धत्य-अनौचित्य। देवमाता ही इस संसार में सत्यम् शिवम् सुन्दरम की अनुभूति एवं आभा बनकर प्रकट होती है। उसकी अवहेलना से ही पतन और पराभव का वातावरण बनता और विनाश का सरंजाम खडा होता है।
 
🔸 सद्ज्ञान की मानव जाति को भारी आवश्यकता है, उसका भविष्य सद्विचारों पर ही निर्भर है। संसार को सुखी बनाने के लिए गायत्री परिवार ज्ञान की मशाल जलाये रखने का संकल्प किया है। परिवार के हर सदस्य को इस दिशा में कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए और भारत भूमि को प्रकाशित कर देने के संकल्प की पूर्ति में अपना हिस्सा आगे बढ़कर बढाना चाहिए।

🔹 वर्तमान काल में मनुष्य जाति पर जो विपत्तियाँ आई है, उनके तत्कालिक कारण अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं, परन्तु इन सबके मूल में एक ही कारण काम कर रहा है वह यह है "धर्म के प्रति उपेक्षा" आत्मा का स्वाभाविक धर्म यह है कि सेवा बुद्धि से लोक कल्याणार्थ कर्तव्य करें। सब भूतों में ईश्वर की भावना रखकर उनकी क्रियात्मक पूजा करना, प्रेम, सहायता, सहयोग, करना सच्चा धर्म है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 Feb 2024

🔹 सुख- दुःख हर तरह की परिस्थिति में सन्तुष्ट रहने को सन्तोष कहते हैं। कुसंस्कारों के परिशोधन एवं सुसंस्कारों के अभिवर्द्धन के लिए स्वेच्छापूर्वक जो कष्ट उठाया जाता है- वह तप कहलाता है। स्वयं के अध्ययन- विश्लेषण के लिए किया जाने वाला अध्यवसाय स्वाध्याय है। अपने चित्त को श्रद्धापूर्वक परमात्मा के दिव्य स्वरूप में नियोजित करना ईश्वर प्राविधान कहलाता है।

🔸 संकीर्ण स्वार्थपरता एवं आसुरी जीवन दर्शन को निरस्त करने के लिए आवश्यक है कि चिन्तन की उत्कृष्टता ,स्वभावगत शालीनता और व्यवहार की आदर्शवादिता के दूरगामी सत्परिणामों को तर्क, प्रमाण और उदाहरणों सहित समझाया जाय।   

🔹 भगवान् पत्र, पुष्पों के बदले नही, भावनाओं के बदले प्राप्त किये जाते हैं और वे भावनाएँ आवेश, उन्माद या कल्पना जैसी नहीं, वरन् सच्चाई की कसौटी पर खरी उतरने वाली होनी चाहिए। उनकी सच्चाई की परीक्षा मनुष्य के त्याग, बलिदान, संयम, सदाचार एवं व्यवहार से होती है। 
 
🔸 आदर्शवादी और उत्कृष्टता वादी चिंतन के साथ जब गायत्री उपासना की जाती है, तो उसे सोने में सुगन्ध मिलने की तरह सराहा जाता है। इस सम्बन्ध में अपना दृष्टिकोण साफ रखना चाहिए कि उपासना का जितना महत्त्व है, उतना ही, बल्कि उससे भी कहीं अधिक महत्त्व साधना का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Feb 2024

🔹 दम के समान कोई धर्म नहीं सुना गया है। दम क्या है? क्षमा, संयम, कर्म करने में उद्यत रहना, कोमल स्वभाव, लज्जा, बलवान, चरित्र,  प्रसन्न चित्त रहना, सन्तोष, मीठे वचन बोलना, किसी को दुख न देना, ईर्ष्या न करना, यह सब दम में सम्मिलित है।

🔸 त्याग के बिना कुछ प्राप्त नहीं होता। त्याग के बिना परम आदर्श की सिद्धि नहीं होती। त्याग के बिना मनुष्य भय से मुक्त नहीं हो सकता। त्याग की सहायता से मनुष्य को हर प्रकार का सुख प्राप्त हो जाता है।

🔹 लोग अनेक प्रकार के मोह में जकडे़ हुए हैं। उनकी दशा ऐसी है, जैसी रेत के पुल की जो नदी के वेग के साथ नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार तिल कोल्हू में पेरे जाते हैं, उसी प्रकार वे मनुष्य पेरे जाते हैं जो संसार के मोह में फँस जाता है और निकल नहीं सकता। वैसे ही दशा उस मनुष्य की है जो मोह में फँसा हुआ है।
 
🔸 श्रेष्ठ व्यक्ति अपने जीवन को केवल जीने के लिए ही नहीं, अपितु महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उपयोग करते है और समय आने पर प्राण देकर भी अपने उद्दिष्ट कार्य को पूर्ण करते है। मनुष्य का विद्याध्ययन की अपेक्षा सरल व्यवहार से ही अधिक ज्ञान प्राप्त हो सकता है पर वह सत्संगति द्वारा ही प्राप्त होता है।

🔹 यदि केवल बालू की ही दिवार बनाई जाय तो-प्रथम तो दीवार बनेगी ही नहीं और आदि बन गई तो शीघ्र गिर जायेगी, यदि उस बालू में सीमेंट छठा अंश भी मिला दिया जाये तो वही दीवार पत्थर की बन जाती है, इसी प्रकार माया के सब कार्य भी बालू की भाँति है । यदि इनसें परमार्थ रूपी कुछ सीमेन्ट मिल जायेगा तो वही बालू की दीवार सुदृढ़ बन जाएगी।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 Feb 2024

🔸सच्चा साथी प्यार करता है, सलाह देता है तथा सुख- दुःख में सहयोग भी देता है। इसके अलावा वह शक्ति और सुरक्षा भी दे और प्रत्युपकार की जरा भी अपेक्षा न रखे, तो वह सोने में सुहागा हो जायेगा- ईश्वर ऐसा ही साथी है।

🔹  मनुष्य इसीलिए श्रेष्ठ है कि वह धर्म, सदाचार, नीति विशेष और परमार्थ को प्रधानता देता है। यदि वह इन पाँचों को छोड़ दे, तब तो उसे सबसे निकृष्ट कहा जाएगा, क्योंकि बुद्धि का उपयोग करके वह संसार में दुःख और क्लेशों को ही बढाता है।

🔸   आरोग्य रक्षा एवं स्वस्थ जीवन का महत्त्व पूर्ण सूत्र-
मित भुक् -- अर्थात भूख से कम खाना।
हित भुक् -- अर्थात्- सात्विक खाना।
ऋत भुक्- अर्थात् न्यायोपार्जित खाना।


🔹  महत्त्व की बात यह नहीं है कि हमने कितने लोगों की सेवा की। निरहंकारितापूर्वक सेवा हुई या नहीं, सेवा का मूल्य इसी से आँका जाता है। संख्या अल्प होते हुए भी  अगर इसका छेद शून्य हो ,तो उसका मूल्य अनन्त हो जाता है। उसी प्रकार अल्प सेवा को भी निरहंकारिता का छेद प्राप्त होने से उसका मूल्य अनन्त हो जाता है। यथार्थ सेवा से सन्तोष की मात्रा बढ़ती है। उस सन्तोष से सेवा वास्तविक है या आभासात्मक, यह जाना जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 12 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 12 Feb 2024

🔹 स्वस्थ जीवन का आधार है- अध्यात्म सिद्धान्तों का जीवन के हर क्षण, हर गतिविधि में व्यापक समावेश। दवाओं से स्वास्थ्य नहीं खरीदा जा सकता। मनो,विकार  व्यक्तिगत व समष्टिगत रोगों का मूल कारण है। राष्ट्र के समग्र स्वास्थ्य हेतु, इसके निवारण के लिए अध्यात्म सिद्धान्तों को उत्कृष्ठता की पक्षधर मान्यताओं का जन- स्तरीय व्यापक प्रचार- प्रसार अति आवश्यक है।

🔸    जिस तरह अग्नि, यज्ञ कुण्ड में प्रज्वलित होती है, वैसे ही ज्ञानाग्नि अन्तःकरण में, तपाग्नि इन्द्रियों में तथा कर्माग्नि देह में प्रज्वलित रहनी चाहिए। यही यज्ञ की। आध्यात्मि स्वरूप है। अपनी संकीर्णता, अहंता, स्वार्थपरता को जो इस दिव्य अग्नि में होम देता है, वह बदले में इतना प्राप्त करता है, जिससे नर को नारायण की पदवी मिल सके।  

🔹   मनुष्य में देवत्व का उदय गुण- कर्म- स्वभाव में चिन्तन और चरित्र में शालीनता अपनाने से ही सम्भव है। नव युग की महती आवश्यकता दुष्प्रवृत्ति उन्मूल और संवर्धन का पक्षधर लोक मानस बनाना पड़ेगा। नये सिरे से यथार्थवादी दिशाधारा अपनाने के लिए अभीष्ट उत्साह एवं साहस जाग्रत् कर सके। 
 
🔸  प्रसन्न रहना सब रोगों की दवा है और प्रसन्न रहने के लिए आवश्यक है अपना जीवन निष्कलुष बनाया जाय। निष्कलुष, निष्पाप, निर्दोष और पवित्र जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति ही सभी परिस्थितियों में प्रसन्न रह सकता है और यह तो सिद्व हो ही चुका है कि मनोविकारों से बचे रहकर प्रसन्नचित्त मनःस्थिति ही सुदृढ़स्वास्थ्य का सुदृढ़ आहार है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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रविवार, 11 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 12 Feb 2024

🔸 कुशलता पूर्वक कार्य करने का नाम ही योग है, कुशल व्यक्ति संसार में सच्ची प्रगति कर सकता है जीवन का सर्वाेच्च लक्ष्य यही है कि मनुष्य प्रत्येक कार्य को विवेक  पूर्वक करे। इससे मन निर्मल रहता है, आत्मा सजग हो जाता है और मस्तिष्क परिष्कृत रहता है। ऐसे विचारशील व्यक्ति को संशय और मोहग्रस्त होकर भटकना नही पड़ता।

🔹  अनासक्ति कर्मयोग का यह अर्थ कदापि नहीं है कि व्यस्थ रहकर कुछ भी अच्छा -बुरा किये जाओ ,कोई भी गुण दोष हमारे लिये नहीं आयेगा। अनासक्ति कर्मयोग का केवल यह अर्थ है कि अपने कर्मों के कर्मफल से प्रभावित होकर कर्म गति में व्यवधान अथवा विराम न आने दें जिससे दिन प्रति दिन अपने कर्मों में सुधार करते हुए परमपद की ओर बढ़ते जायें।

🔸  गृहस्थाश्रम समाज के संगठन मानवीय मूल्यों की स्थापना, समाज निष्ठ, भौतिक विकास के साथ- साथ मनुष्य के आध्यात्मिक- मानसिक विकास का क्षेत्र है। गृहस्थाश्रम ही समाज के व्यवस्थित स्वरूप का मूलाधार है।
 

🔹 
संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसकी प्राप्ति मनुष्य के लिए असम्भव हो। प्रयत्न और पुरुषार्थ से सभी कुछ पाया जा सकता है, लेकिन एक ऐसी भी चीज है, जिसे एक बार खोने के बाद कभी नहीें पाया जा सकता और वह है समय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 Feb 2024

🔹 कोई व्यक्ति विद्वानों के साथ रहे पर उसके मन में वेश्याओं की छवि भाव भंगी, कुचेष्टाएँ नाचती रहें, और विकार पूर्ण अंगों तथा चेष्टाओं का चिंतन करता रहे तो निश्चय ही विद्वानों की संगति का उतना प्रभाव न होगा जितना उन मानसिक काम विकारों का होगा।

🔸 स्वाद को जीतने के लिए एक नियम तो यह है कि मसालों को सर्वथा अथवा जितना हो सके त्याग देना चाहिए, और दूसरा अधिक जोरदार उपाय यह है कि इस भावना की वृद्धि हमेशा की जाय कि हम स्वाद के लिए नहीं, केवल शरीर रक्षा के लिए ही भोजन करते हैं।

🔹 जीवन एक झूले है जिस में आगे भी और पीछे भी झोटे आती है। झूलने वाला पीछे जाते हुए भी प्रसन्न होता है। और आगे आते हुए भी, यह अज्ञानग्रस्त, माया मोहित, जीवन विद्या से अपरिचित लोग बात बात में अपना मानसिक संतुलन खो बैठते है। कभी हर्ष में मदहोश होते है तो कभी शोक में पागल बन जाते है।  
 
🔸 जो अलज्जा के काम में लज्जा करते हैं और लज्जा के काम में लज्जा नहीं करते, जो भय रहित काम में भय देखते हैं और भय के काम में निर्भय रहते हैं, और जो अदोष में दोष बुद्धि रखते हैं और दोष में अदोष रखते हैं वे झूठी धारणा वाले जीव दुर्गति को प्राप्त होते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 Feb 2024

🔸 प्रेम गंगा की भाँति वह पवित्र जल है, जिसे जहाँ छिडका जाय, वहीं पवित्रता पैदा करेगा। उसमें आदर्शेंकी अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है। आदर्श रहित प्यार को ही मोह कहते हैं। दूरदर्शिता, विवेकशीलता, शालीनता, पवित्रता, सदाशयता जैसे गुणों का भरपूर समावेश प्रेम में होता है। उसमें इन्हीं गुणों की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहता है। मोह इन विशेषताओं से रहित होता है।

🔹 दृष्टिकोण में संयम, सहकार, सन्तुलन स्नेह, सद्भाव, श्रम, साहस जैसे सद्गुणों का महत्व समझने और अपने स्वभाव, व्यवहार को सज्जनोचित बनाने की उपयोगिता समाविष्ट हो सके, तो समझना चाहिए कि आज गई- गुजरी स्थिति होने पर भी कल इन्हीं विशेषताओं के कारण उज्ज्वल भविष्य का सरंजाम जुटाना सुनिश्चित है।   

🔸 धर्म व्यक्तित्व के गहन क्षेत्र में प्रवेश करके भावश्रद्धा, प्रखर प्रज्ञा और आदर्श कर्म- निष्ठा को उभारकार मनुष्य में देवत्व का उदय करता है। भ्रष्टता और दुष्टता पर शासकीय नियन्त्रण नगण्य जितना ही हो पाता है। धर्म चरित्र और चिन्तन में उत्कृष्टता भर देने और समाज को सत्परम्परा अपनाने के लिए बाधित करने वाला एक प्रचण्ड अनुशासन है। ऐसा अनुशासन जिसके सामने न अनीति ठहरती है, न उद्दण्ड आततायी उच्छृंखलता। 
 
🔹 ऊँचे उद्देश्यों का होना सराहनीय है, पर उनकी सफलता के लिए ऐसे कर्मठ समर्थकों की मण्डली चाहिए जो लक्ष्य के प्रति, इस प्रकार समर्पित हो, मानो वही ईमान है और वही भगवान है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 Feb 2024

🔹आशा आध्यात्मिक जीवन का शुभ आरम्भ है। आशावादी व्यक्ति सर्वत्र परमात्मा की सत्ता विराजमान देखता है। उसे सर्वत्र मंगलमय परमात्मा की मंगलदायककृपा बरसती दिखाई देती है। सच्ची शान्ति, सुख और सन्तोष मनुष्य की निराशावादी प्रवृत्ति के करण नहीं, अपने ऊपर अपनी शक्ति पर विश्वास करने से होता है।

🔸  गृहस्थाश्रम की सफलता तीन बातों पर निर्भर करती है। पहला गृहस्थ- जीवन के पूर्व की तैयारी, दूसरे पति- पत्नी के दाम्पत्य जीवन में आने का ध्येय, तीसरा गृहस्थ जीवन में एक दूसरे का व्यवहार और उनका कर्तव्य पालन।    

🔹  तेजस्विता तपश्चर्या की उपलब्धि है, जो निजी जीवन में संयम, साधना और सामाजिक जीवन में परमार्थ परायणता के फलस्वरूप उद्भूत होती है। संयम- अर्थात् अनुशासन का, नीति मर्यादाओं का कठोरतापूर्वक परिपालन। 
 
🔸  आहार न केवल स्थूल दृष्टि से पौष्टिक, स्वल्प और सात्विक होना चाहिए, वरन् उसके पीछे यायानुकूल उपार्जन और सद्भावनाओं का समावेश भी होना चाहिए ।। तभी वह अन्य मनुष्य के तीनों आवरणों को पोषित कर सकेगा और स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीर को विकसित कर सकेगा। तभी वह शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वांगीण विकास कर सकेगा। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Feb 2024

🔹 आशा की जानी चाहिए कि नव- सृजन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मनीषो, समय दानी धनी आदि प्रतिभावान अपनी- अपनी श्रद्धांजलि लेकर नवयुग के अभिनव सृजन में आगे बढ़ेगें और कहने लायक योगदान देंगे। इक्कीसवीं सदीं का उज्ज्वल भविष्य विनिर्मित करने के लिए इस प्रकार का सहयोग आवश्यक है और अनिवार्य भी।

🔸  ‘‘उद्घरेदात्मनात्मानं’’ अपना उद्धार आप करो। अपनी प्रगति का पथ स्वयं प्रशस्त करो। जो माँगना है, अपने जीवन देवता से माँगो। बाहर दीखने वाली हर वस्तु का उद्गम केन्द्र अपना ही अन्तरंग है। आत्म देव की साधना ही जीवन देवता की उपासना है।

🔹  राम के कर्त्तव्य पालन में ,भरत के त्याग- तप में मीरा के प्रेम में, हरिश्चन्द्र के सत्य व्रत में, दधीचि के दान में, कृष्ण के अनासक्ति योग में चरित्र की पूर्णता के दर्शन होते है। चरित्र जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है। चरित्र ही जीवन रथ का सारथी है। उत्तम चरित्र जीवन को सही दिशा में प्रेरित करता है। चरित्र ही हमारे मूल्यांकन की कसौटी हो। चरित्रवान् व्यक्तियों को प्रोत्साहित और महत्त्व दें।
 
🔸  प्रत्येक छोटे से लेकर बड़े कार्यक्रम शान्त और सन्तुलित मस्तिष्क द्वारा ही पूरे किए जा सकते हैं। संसार में मनुष्य ने अब तक जो कुछ भी उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, उनके मूल में धीर- गम्भीर, शान्त- मस्तिष्क ही रहे हैं। कोई भी साहित्यकार, वैज्ञानिक, कलाकार- शिल्पी, यहाँ तक की बढ़ई, लुहार, सफाई करने वाला श्रमिक तक अपने कार्य, तब- तक भली- भांति नहीं कर सकते, जब तक उनकी मनः स्थिति शान्त न हो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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मंगलवार, 6 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Feb 2024

■ हे मनुष्य! इस संसार में दुःख का कारण असन्तोष है और सन्तोष ही सुख है। जिन्हें सुख की क ामना हो, वे सन्तुष्ट रहा करें। सन्तोष एक महान् अध्यात्मिक भाव है, जो मनुष्य के हृदय की विशालता को व्यक्त करता है। धैर्य, सहन शक्ति, त्याग और उदारता ये सब सन्तोष का अनुगमन करते हैं। सन्तोषी पुरुषों में शेष सभी सद्गुण और शुभ संस्कार स्वतः आ जाते हैं।

□ क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी। विद्या कामदुधा धेनुः सन्तोषो नंदनं वनम्। अर्थात् मनुष्य का विनाश क्रोध के कारण होता है और तृष्णा वैतरणी नदी के समान है, जिसका कभी अन्त नहीं होता। विद्या कामधेनु के समान है तथा सन्तोष नन्दन वन के समान है।

◆ विज्ञान और अध्यात्म अन्योन्याश्रित है। एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे की गति नहीं। विचार आौर कार्य, विश्वास और श्रद्धा, शंका और निराशा, ज्ञान और कर्तव्य, व्यक्ति और समाज, पदार्थ और आत्मा जाति और सभ्यता, कथा और इतिहास, प्रेम और घृणा, त्याग और भक्ति जैसे असंख्य प्रश्न के सन्दर्भ में अध्यात्म द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखकर शोध करना चाहिए और जो निष्कर्ष सामने आये, उनसे मानव जाति को लाभान्वित करना चाहिए।

◇ व्यक्ति श्रेष्ठ ही सोचे, उसी दिशा में आगे बढ़े यही प्रेरणा सभी महामानवों की रही है। न केवल समय का ध्यान हमें रखना है वरन इस तथ्य का भी कि राह में कण्टक भी बिछे हो, अगणित कष्ट सहने पड़ सकते हैं। कष्ट तो आयेंगे, प्रतिकूलताओं का भी सामना करना होना पर हमें लक्ष्य नही भूलना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Feb 2024

🔹गंगा गोमुख से निकलती है और जमुना जमुनोत्री से, नर्मदा का अवतरण अमरकंटक के एक छोटे से कुण्ड से होता है। मान सरोवर से ब्रह्मपुत्र निकलती है, शांतिकुंज ऐसे अनेकों प्रवाहों को प्रवाहित कर रहा है, जिसका प्रभाव न केवल भारत को वरन् समूचे विश्व को एक नई दिशा में घसीटता हुआ ले चले।

🔸 निःसन्देह प्रार्थना में अमोघ शक्ति है। परोपकार आत्म कल्याण और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही उसका सदुपयोग होना चाहिए। आत्म कल्याण और संसार की  भलाई से प्रेरित प्रार्थनायें ही सार्थक हो सकती हैं। जब असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृंत गमय के श्रद्धापूरित भाव उद्गार अंतःकरण से उठेंगे, तो निश्चय ही जीवन में एक नया प्रकाश प्रस्फुटित होगा।

🔹यह सुनिश्चित है कि लोगों की आस्थाओं को ,युग के अनुरूप विचार धारा को स्वीकारने हेतु उचित मोड़़ दिया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि सुखद भविष्य का, उज्ज्वल परिस्थितियों का प्रादुर्भाव संभव न हो सके? यह प्रवाह बदल कर उलटे को उलटकर सीधा बनाने की तरह का भागीरथी कार्य है, किन्तु असम्भव नहीं, पूर्णतः सम्भव है।

🔸 सेवा, त्याग, प्रेम, सहृदयता, कष्ट सहिष्णुता आदि परोपकार का अङ्ग है। जिस तरह नदियाँ अपने लिये नहीं बहती, वृक्ष अपने फलों का उपभोग स्वतः नहीं करते, बादल अपने लिये नहीं बरसते, उसी तरह सज्जन और विशाल हृदय मनुष्य सदैव परोपकार में लगे रहते हैं। परोपकार वह है,जो निःस्वार्थ भाव से किया जाय। उसमें कर्तव्य भावना की विशालता अन्तर्हित हो। स्वार्थ की भावना और भविष्य में अपने लिये अनुकूल साधन प्राप्त की दृष्टि से जो सेवा की जाती है, वह परोपकार नहीं प्रवंचना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

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👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Feb 2024

■ मन का, मस्तिष्क का नाश करने में अप्रसन्नता से बढ़कर और कोई घातक शत्रु नहीं। जिसका चित्त किसी न किसी कारण दुखी बना ही रहता है। जो आशंका, भय, असफलता से चिन्तित रहता है, जिसे द्वेष, कुढ़न, शोक, आवेश, उद्वेग घेरे रहते हैं, जो अहंकार से गर्दन फुलाये रहता है सीधे मुँह किसी से बात करना जिसे सुहाता नहीं ऐसे बद मिज़ाज आदमी अपनी मानसिक शक्तियों का सत्यानाश करते रहते हैं।

□  जिसे अपनी महानता का, अपने आत्म गौरव का ध्यान है, वह नीच विचारों और पतित कर्मों को नहीं अपना सकता अतएव उसकी उच्च विचारधारा और उत्तम कार्यप्रणाली अपने आप ही स्वचालित डायनुमा की तरह प्राणशक्ति की बिजली उत्पन्न करती है और साधक का प्राणमय कोष सुविकसित होता चलता है।

◆ कठिनाइयों से, प्रतिकूलताओं से घिरे होने पर भी जीवन का वास्तविक प्रयोजन समझने वाले व्यक्ति कभी निराश नहीं होते, वे हर प्रकार की परिस्थितियों में अपने लक्ष्य से ही प्रेरणा प्राप्त करते तथा श्रेष्ठता के पथ पर क्रमशः आगे बढते जाते हैं।

◇ सामाजिक और पारिवारिक जीवन की सुव्यवस्था विकसित नारी के ही द्वारा सम्भव है। इतना ही नहीं मनुष्य का मनः क्षेत्र जो समस्त प्रकार की प्रगति, समृद्धि एवं शक्ति का केन्द्र है, नारी के सहयोग पर ही प्रफुल्लित और प्रस्फुटित हो सकेगा। अपने भाग्य निर्माण की- भविष्य निर्माण की इन मंगलमयी घड़ियों से हमें इधर भी ध्यान  देना होगा। इस अनिवार्य आवश्यकता की उपेक्षा से जितनी जल्दी विमुख हो सकना सम्भव हो, उतना ही उत्तम है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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