सोमवार, 7 अक्तूबर 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Oct 2019

★ दु:ख और क्लेशों की आग में जलने से बचने की जिन्हें इच्छा है उन्हें पहला काम यह करना चाहिए कि अपनी आकांक्षाओं को सीमित रखें। अपनी वर्तमान परिस्थिति में प्रसन्न और सन्तुष्ट रहने की आदत डालें। गीता के अनासक्त कर्मयोग का तात्पर्य यही है कि महत्वकांक्षायें वस्तुओं की न करके केवल कर्त्तव्य पालन की करें।
 
□  देवत्व वह आलोक है, जिसके हटते ही तमिस्ना और निस्तब्धता छाने लगती है। नरक क्या है ? देवत्व के आभाव में फैली हुई अव्यवस्था और उसकी सड़न-दुर्गंध। दैत्य क्या है? देवत्व के दुर्बल बनने पर परिपुष्ट हुआ औद्धत्य-अनौचित्य। देवमाता ही इस संसार में सत्यम् शिवम् सुन्दरम की अनुभूति एवं आभा बनकर प्रकट होती है। उसकी अवहेलना से ही पतन और पराभव का वातावरण बनता और विनाश का सरंजाम खडा होता है।
 
◆ सद्ज्ञान की मानव जाति को भारी आवश्यकता है, उसका भविष्य सद्विचारों पर ही निर्भर है। संसार को सुखी बनाने के लिए गायत्री परिवार ज्ञान की मशाल जलाये रखने का संकल्प किया है। परिवार के हर सदस्य को इस दिशा में कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए और भारत भूमि को प्रकाशित कर देने के संकल्प की पूर्ति में अपना हिस्सा आगे बढ़कर बढाना चाहिए।

◇ वर्तमान काल में मनुष्य जाति पर जो विपत्तियाँ आई है, उनके तत्कालिक कारण अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं, परन्तु इन सबके मूल में एक ही कारण काम कर रहा है वह यह है "धर्म के प्रति उपेक्षा" आत्मा का स्वाभाविक धर्म यह है कि सेवा बुद्धि से लोक कल्याणार्थ कर्तव्य करें। सब भूतों में ईश्वर की भावना रखकर उनकी क्रियात्मक पूजा करना, प्रेम, सहायता, सहयोग, करना सच्चा धर्म है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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