सोमवार, 25 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २१

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

बाहरी रहन-सहन के कारण उन्हें गरीब ही समझा जाता है ' मरने के बाद जब घड़ों भरी हुई धन-दौलत जमीन में से निकलती है तब आश्चर्य करना पड़ता है कि लोगों को जिंदगी भर इसके इतने धनी होने का भेद प्रकट न हो पाया। बहुत लोग ऐसे रहस्यमय भेद अपने अंदर छिपाए पड़े रहते हैं जिनका पता उनके सगे- संबंधियों तक को नहीं लग पाता। गुप्त पुलिस के आदमी इस विद्या में बडे होते हैं वे अपनी असलियत का पता नहीं लगने देते और दूसरों सगे-संबंधी बनकर ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि बड़े- बड़े भेदों को निकाल लाते हैं।

इससे प्रकट होता है कि दूसरों को उतनी बात का पता चल पाता है जितनी आसानी से उनके सामने आ जाती है। सामने रखी गेंद का अगला भाग देखा जा सकता है पर उसका पृष्ठ भाग है यह तब तक नहीं मालूम हो सकता जब तक कि उसे उलट-पलट कर न देखा जाए। सच तो यह है कि किसी वस्तु के बारे में हम बहुत ही थोडे अंशों में जानकारी रखते हैं। अपने शरीर के भीतरी अंग किस गतिविधि से कार्य कर रहे हैं, अपने रक्त में किन रोगों के कीटाणु प्रवेश कर रहे हैं? निजी बातों का इतना पता नहीं तो दूसरे लोगों के मनोभाव, आचरण, कैसे हैं इसको ठीक-ठीक मालूम करना और भी कठिन है  मोटी-मोटी प्रकट बातों को देखकर किसी के गुण- अवगुणों के बारे में लोग अपनी सम्मति निर्धारित करते हैं और एक से एक सुनकर दूसरा भी अपनी सहमति वैसी ही बना लेता है। दो-चार पूर्ण- अपूर्ण बातों के आधार पर ही अक्सर सारा समाज अपनी भली- बुरी धारणा बना लेता है। व्यक्ति चाहे बदल गया हो पर वह धारणा मुद्दतों तक चलती जाती है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए आप अपने सुद्गुणों को प्रकाश में लाने का प्रयत्न कीजिए। जो अच्छाइया, भलाइयाँ योग्यताएँ उत्तमताएँ विशेषताएँ हैं उन्हें छिपाया मत कीजिए वरन इस प्रकार रखा करिए जिससे वे अनायास ही लोगों की दृष्टि में आ जावें। अपने बारे में बढ-चढ कर बातें करना ठीक नहीं, शेखीखोरी ठीक नहीं, अहंकार से प्रेरित होकर अपनी बड़ाई के पुल बाँधना यह भी ठीक नहीं, अच्छी बात को बुरी तरह रखने में उसका सौंदर्य नष्ट हो जाता है।
 
दूसरे प्रसंगों के सिलसिले में कलापूर्ण ढंग से, मधुर वाणी से इस कार्य को बड़ी सुंदरता पूर्वक किया जा सकता है । अप्रिय सत्य को प्रिय सत्य बना कर कहने मैं बुद्धि-कौशल की परीक्षा है, बुराई की इसमें कुछ बात नहीं। जो गाय पाँच सेर दूध देती है क्या हर्ज है यदि इस बात से दुसरे लोग भी परिचित हो जाएँ?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३२

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

👉 भक्तिगाथा (भाग १२३)

भक्त को लोकहानि की कैसी चिन्ता

भक्त प्रह्लाद की भक्तिकथा को सुनकर सबके मन आह्लादित हो उठे। उन क्षणों में वहाँ सभी के मनों में एक ही सत्य स्पन्दित होने लगा कि सच्चा भक्त कभी चिन्तित नहीं होता। फिर भला ऐसा हो भी क्यों न? जिसकी सारी चिन्ताओं का भार स्वयं भगवान वहन करें, वह क्यों चिन्तित हो। वैसे भी भक्त का दायित्व अपने भगवान का सतत चिन्तन करना है, व्यर्थ की चिन्ता करना नहीं। इन्हीं विचार वीथियों में सभी की मानसिक चेतना देर तक भ्रमण करती रही। इन भक्ति तरंगों के संग-संग ऋषिमण्डल व देवमण्डल सहित अन्य जनों ने भी अपना सन्ध्या वन्दन सम्पन्न किया। ऐसा करते हुए भगवान् सूर्यदेव धरती के दूसरी छोर पर प्रकाश, प्रखरता एवं पवित्रता का वितरण करने के लिए प्रस्थान कर गए। उनके प्रस्थान करते ही नील गगन में निशा देवी के धीमे पगों की आहट सुनायी देने लगी। इसी के साथ उनका तारों जड़ा श्याम परिधान समूचे नभमण्डल पर छा गया।

क्षण बीते-पल बीते। इसी के साथ नभ में चन्द्रोदय हो गया और तब भगवती निशा का श्याम परिधान धवल चन्द्रिका में नहा उठा। यह सर्वथा अनूठा व अनोखा दृश्य था। हिमालय के रजत शृंगों पर निशानाथ राशि की राशि चाँदनी उड़ेलने लगे। आस-पास के पर्वत शिखरों से प्रवाहित होने निर्झर, चन्द्रदेव की चन्द्रिका को अपनी जलराशि में समेटने-घोलने एवं प्रवाहित करने लगे। ऋषियों-देवों, सिद्धों व गन्धर्वों का समुदाय इस मनमोहक दृश्य को निहार रहा था। यह मनोहर दृश्य उनके भावों में और भी अधिक पुलकन उत्पन्न कर रहा था। देवर्षि नारद को अभी भी अपने प्रिय प्रह्लाद की स्मृतियाँ घेरे थीं। इन्हीं स्मृतियों में एक मीठी सी याद ब्राह्मण कुमार श्रुतसेन की भी उभरी। उन्हें याद आने लगा कि श्रुतसेन सदा प्रह्लाद के साथ अपना समय व्यतीत करते थे। नारायण नाम संकीर्तन में सबसे आगे थे। भार्गव शुक्राचार्य का शिष्य होने के बावजूद उसमें तमस व रजस का लेश भी न था। उसमें थी तो केवल शुद्ध सात्त्विकता।

भगवान श्रीनारायण के नाम का सत्प्रभाव कहें या फिर पिछले जन्मों के शुभ संस्कारों से मिली प्रतिभा अथवा भार्गव शुक्राचार्य जैसे महामनस्वी आचार्य के सान्निध्य का सुफल, वह देवशास्त्र, दर्शन, उपनिषद् आदि के साथ अन्य सभी विद्याओं व कलाओं में पारंगत हो गया। शुक्राचार्य चाहते थे कि श्रुतसेन अपने जीवन की सभी उपलब्धियों को उनकी कृपा माने। जाने-अनजाने बार-बार वह यह प्रयास भी करते पर श्रुतसेन बार-बार विनम्रतापूर्वक दुहरा देता, गुरुदेव सभी कुछ आपके आशीष एवं भगवान् नारायण की मंगलमय कृपा से सम्भव हो सका है। श्रुतसेन के इस कथन से शुक्राचार्य का अहं आहत हो जाता। यहाँ तक कि वह अपने चोटिल अहं के साथ श्रुतसेन का अनिष्ट करने पर विचार करने लगते।
देवर्षि को अभी भी वे सारी बातें याद थीं। बल्कि यूं कहें कि वे सारी बातें उनके मन के क्षितिज पर अपने आप ही उभर रही थीं। देवर्षि इन्हीं में स्वयं को पता नहीं कब तक भूले रहते, यदि महर्षि पुलह ने उन्हें टोका न होता। महर्षि उन्हें काफी देर से देखे जा रहे थे। कुछ देर तक यूं ही देखते रहने के बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा- ‘‘किस चिन्तन में खोये हैं देवर्षि!’’ ऋषिश्रेष्ठ पुलह के इस तरह टोकने पर देवर्षि कुछ बोल तो नहीं पाये बस मुस्करा दिए। तभी महात्मा सत्यधृति ने विनम्र स्वर में कहा- ‘‘हम सबको आपके अगले सूत्र की प्रतीक्षा है।’’ ‘‘यह सत्य है।’’ ऐसा कहते हुए अनेकों ने सत्यधृति का समर्थन किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४३

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

शनिवार, 23 अप्रैल 2022

👉 कर्मफल हाथों-हाथ

अहंकार और अत्याचार संसार में आज तक किसी को बुरे कर्मफल से बचा न पाये। रावण का असुरत्व यों मिटा कि उसके सवा दो लाख सदस्यों के परिवार में दीपक जलाने वाला भी कोई न बचा। कंस, दुर्योधन, हिरण्यकशिपु की कहानियाँ पुरानी पड़ गयीं। हिटलर, सालाजार, चंगेज और सिकन्दर, नैपोलियन जैसे नर-संहारकों को किस प्रकार दुर्दिन देखने पड़े, उनके अन्त कितने भयंकर हुए, यह भी अब अतीत की गाथाओं में जा मिले हैं। नागासाकी पर बम गिराने वाले अमेरिकन वैमानिक फ्रेड ओलीपी और हिरोशिमा के विलेन (खलनायक) मेजर ईथरली का अन्त कितना बुरा हुआ, यह देखकर सुनकर सैंकड़ों लोगों ने अनुभव कर लिया कि संसार संरक्षक के बिना नहीं है। शुभ-अशुभ कर्मों का फल देने वाला न रहता होता, तो संसार में आज जो भी कुछ चहल-पहल, हंसी खुशी दिखाई दे रही है, वह कभी की नष्ट हो चुकी होती।

इन पंक्तियों में लिखी जा रही कहानी एक ऐसे खलनायक की है जिसने अपने दुष्कर्मों का बुरा अन्त अभी-अभी कुछ दिन पहले ही भोगा है। जलियावाला हत्याकाँड की जब तक याद रहेगी तब तक जनरल डायर का डरावना चेहरा भारतीय प्रजा के मस्तिष्क से न उतरेगा। पर बहुत कम लोग जानते होंगे कि डायर को भी अपनी करनी का फल वैसे ही मिला जैसे सहस्रबाहु, खर-दूषण, वृत्रासुर आदि को।

पंजाब में जन्मे, वहीं के अन्न और जल से पोषण पा कर अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में सिख धर्म में दीक्षित होकर भी जनरल डायर ने हजारों आत्माओं को निर्दोष पिसवा दिया था, उसे कौन नहीं जानता। इंग्लैंड उसकी कितनी ही प्रशंसा करता पर वह भगवान के दण्ड-विधान से उसी प्रकार नहीं बच सकता था, जैसे संसार का कोई भी व्यक्ति अपने किये हुए का फल भोगने से वंचित नहीं रहता। भगवान की हजार आँखें, हजार हाथ और कराल दाढ़ से छिपकर बचकर कोई जा नहीं सकता। जो जैसा करेगा, उसे वैसा भरना ही पड़ेगा। यह सनातन ईश्वरीय नीति कभी परिवर्तित न होगी।

हंटर कमेटी ने उसके कार्यों की सार्वजनिक निन्दा की, उससे उसका मन अशान्त हो उठा। तत्कालीन भारतीय सेनापति ने उसके किये हुए काम को बुरा ठहराकर त्यागपत्र देने का आदेश दिया। फलतः अच्छी खासी नौकरी हाथ से गई, पर इतने भर को नियति की विधि-व्यवस्था नहीं कहा जा सकता। आगे जो हुआ, प्रमाण तो वह है, जो यह बताता है कि करने के फल विलक्षण और रहस्यपूर्ण ढंग से मिलते हैं।

सन 1921 में जनरल डायर को पक्षाघात हो गया, उससे उसका आधा शरीर बेकार हो गया। प्रकृति इतने से ही सन्तुष्ट न हुई फिर उसे गठिया हो गया। उसके मित्र उसका साथ छोड़ गये। उसके संरक्षक माइकेल ओडायर की हत्या कर दी गई। उसे तो चलना-फिरना तक दूभर हो गया। ऐसी ही स्थिति में एक दिन उसके दिमाग की नस फट गई और लाख कोशिशों के बावजूद वह ठीक नहीं हुई। डायर सिसक-सिसक कर, तड़प-तड़प कर मर गया। अन्तिम शब्द उसके यह थे-

मनुष्य को परमात्मा ने यह जो जीवन दिया है, उसे बहुत सोच-समझ कर बिताने वाले ही व्यक्ति बुद्धिमान होते हैं, पर जो अपने को मुझ जैसा चतुर और अहंकारी मानते हैं, जो कुछ भी करते न डरते हैं न लजाते हैं, उनका क्या अन्त हो सकता है? यह किसी को जानना हो तो इन प्रस्तुत क्षणों में मुझसे जान ले।’

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर १९७० पृष्ठ २३

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २०

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

इस ईश्वरीय प्रयोजन पर विश्वास करिए आत्मा की प्रगतिशीलता पर भरोसा करिए आप सतोगुणी हैं उन्नतिशील हैं सफलता के अधिकारी हैं, विजय यात्रा के लिए निर्वाध गति से आगे बढ़ रहे हैं।

आइए अब एक पेचीदा प्रश्न पर कुछ विचार-विमर्श करें। कई व्यक्तियों में साधारण योग्यताएँ होते भी उनकी कीर्ति बहुत विस्तृत होती है और कईयों में अधिक  योग्यता होते हुए भी उन्हें कोई नहीं पूछता,कोई दुर्गुणी होते हुए भी श्रेष्ठ समझे जाते हैं, कोई सद्गुणी होते हुए भी बदनाम हो जाते हैं, आपने विचार किया कि इस अटपटे परिणाम का क्या कारण है? शायद आप यह कहें कि-' ' दुनियाँ मूर्ख है, उसे भले-बुरे की परख नहीं '' तो आपका कहना न्याय संगत न होगा क्योंकि अधिकांश मामलों में उसके निर्णय ठीक होते हैं। आमतौर से भलों के प्रति भलाई और बुरों के प्रति बुराई ही फैलती है, ऐसे अटपटे निर्णय तो कभी-कभी ही होते हैं।

कारण यह कि वही वस्तुएँ चमकती हैं जो प्रकाश में आती हैं। सामने वाला भाग ही दृष्टिगोचर होता है। जो चीजें रोशनी में खुली रखी हैं वे साफ-साफ दिखाई देती हैं, हर कोई उनके अस्तित्व पर विश्वास कर सकता है परंतु जो वस्तुएँ अंधेरे में, पर्दे के पीछे, कोठरी में बंद रखी हैं उनके बारे में हर किसी को आसानी से पता नहीं लग सकता। बहुत खोजने वाले, खासतौर से ध्यान देने वाले, तीक्षा परीक्षक बुद्धि वाले लोग ही उन अप्रकट वस्तुओं के संबंध में थोडा- थोडा जान सकते हैं, सर्वसाधारण के लिए वह जानकारी सुलभ नहीं है। दुनियाँ में हर एक मनुष्य के सामने उसकी निजी परिस्थितियाँ और समस्याएँ भी पर्याप्त मात्रा में सुलझाने को पडी रहती हैं, सारा समय लगाकर वे ही कठिनाई से हल हो पाती हैं, इतनी फुरसत किसे है जो दूसरों को गहराई से देखकर तब उस पर कुछ मत निश्चित करे। आमतौर से यही होता है कि जो बात जिस रूप में सामने आ गई, उसे वैसे ही रूप में मान लिया गया। डॉक्टर लोग अपनी दुकानों को सजाने के लिए खाली बोतलों में रंगीन पानी भर कर रख लेते हैं, ग्राहक उन्हें दवाएँ ही समझते हैं, किसे इतनी फुरसत है कि उन बोतलों की जाँच करता फिरे कि इनमें पानी है या दवा? कोई कोई कंजूस लोग बहुत धन-दौलत जमा किए होते हैं,
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३०

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

👉 भक्तिगाथा (भाग १२२)

शान्ति और परमानन्द का रूप है भक्ति

इतना कहने के बाद देवर्षि ने वहाँ उपस्थित जनों की ओर देखा और बोले- ‘‘यदि आप सब श्रेष्ठजन अनुमति दें तो भक्तश्रेष्ठ प्रह्लाद का कथाप्रसंग कहूँ।’’ प्रह्लाद का नाम सुनकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ तथा विश्वामित्र तो रोमांचित हो उठे। वे दोनों लगभग एक साथ ही बोले- ‘‘भक्त प्रह्लाद धन्य हैं, उनके स्मरण से ही मन पावन हो जाता है। उनके बारे में कहना-सुनना जन्म व जीवन को धन्य करता है।’’ वशिष्ठ एवं विश्वामित्र के कथन ने देवर्षि नारद को उत्साहित किया। वे कहने लगे- ‘‘भक्त प्रह्लाद का जन्म मेरे ही आश्रम में हुआ था। मैं जानता हूँ कि जीवन की जटिलताएँ व समस्याएँ उनके जन्म से पहले ही उनके जीवन में थीं। अलौकिक चमत्कारी सिद्धियों एवं प्रचण्ड तान्त्रिक शक्तियों के स्वामी भार्गव शुक्राचार्य एवं त्रिलोकविजयी परम समर्थ सम्राट हिरण्यकश्यप ने उनसे अकारण वैर पाल रखा था।

निर्दोष प्रह्लाद उनकी दृष्टि में दोषी थे। यदि उनका कोई दोष था तो वह थी केवल उनकी भक्ति की भावना। नारायण नाम के स्मरण में लीन रहने वाले प्रह्लाद को विनष्ट करने के लिए ये दोनों कृतसंकल्पित थे। इनकी अनेकों समर्थ शक्तियों के सामने प्रह्लाद के पास केवल प्रभुनाम व प्रभुभक्ति का सहारा था। उनका विश्वास उनकी निष्ठा, उनकी श्रद्धा, उनकी आस्था- बस यही भक्त प्रह्लाद की दिव्य शक्तियाँ थीं। प्रह्लाद इन्हीं को अपना अमोघ कवच मानते थे। जबकि भार्गव शुक्राचार्य एवं उनके शिष्य सम्राट हिरण्यकश्यप दोनों इनका उपहास उड़ाते थे। मृतसंजीवनी विद्या के आचार्य शुक्र को अपनी अलौकिक शक्तियों एवं तंत्र विज्ञान पर भरोसा था। उनकी सोच थी कि उनकी प्रचण्ड शक्तियों के सामने यह भोला-मासूम बालक भला क्या कर लेगा?

इसी सोच के बलबूते अपनी शक्ति के दम्भ में उन्मत्त भार्गव शुक्राचार्य प्रह्लाद पर एक के बाद एक कड़े प्रहार करने लगे। कभी तो वह पुत्तलिका प्रयोग करते, तो कभी वह कृत्या का विनाशक प्रयोग करते। इधर सम्राट हिरण्यकश्यप भी पीछे न था। उसने राक्षसों को प्रह्लाद को यातनाएँ देने के लिए नियुक्त कर रखा था। ये राक्षस कभी तो प्रह्लाद को पर्वत की ऊँचाई से गिरा देते। कभी वे उन्हें समुद्र में फिकवा देते। कभी वे इन्हें हाथियों के झुण्ड के पाँवों के नीचे डाल देते। इन महासमर्थ एवं अति पराक्रमी तथा अजेय समझे जाने वाले इन गुरु-शिष्य के कृत्यों को जो देखता वही सहम जाता। पर नारायण नाम को अपना आश्रय मानने वाले प्रह्लाद सर्वथा निर्भय एवं निश्चिन्त थे। उन्हें न तो कोई चिन्ता थी और न डर।

उनकी माता कयाधू सदा अपने लाडले के लिए चिन्तित एवं भयभीत रहती। प्रह्लाद जब-तब उसे समझाया करते, माता चिन्ता की कोई बात नहीं। भगवान नारायण हैं न। मेरे प्रभु सदा भक्तवत्सल हैं। रही बात विपदाओं-विपत्तियों की तो ये केवल भक्त की ही परीक्षा नहीं लेती, इन क्षणों में परीक्षा भगवान की भी होती है। भक्त की परीक्षा इस बात की होती है कि भक्त की निष्ठा, श्रद्धा, आस्था कितनी सच्ची व अडिग है। भगवान की परीक्षा इस बात की होती है कि वे कितने भक्तवत्सल एवं कितने समर्थ हैं। ये बातें अपनी माता को समझाते हुए प्रह्लाद हँस देते और कहते- माता कोई भी विपदा भगवान से बड़ी नहीं होती। मेरे ऊपर आचार्यश्री एवं पिताश्री ने अब तक जो भी विनाशक प्रहार किए हैं, उससे यही प्रमाणित हुआ है। इसीलिए मैं सर्वथा शान्त एवं परमानन्द में मग्न रहता हूँ। मुझे चिन्ता तो बस पिताश्री के लिए होती है कि कहीं सर्वसमर्थ प्रभु उनके इस आचरण के लिए उन पर कुपित न हो जाएँ।

प्रह्लाद की इन बातों को सुनकर उनकी माता कयाधू को थोड़ी आश्वस्ति मिलती, लेकिन थोड़ी देर बाद वे पुनः चिन्ता में पड़ जातीं। कई बार ऐसा भी हुआ कि उन्होंने मुझे बुलवाया अथवा वह स्वयं मुझसे मिलने आयीं। जब भी वे मुझसे मिलतीं, उनकी चिन्ता पराकाष्ठा पर होती। उनकी इस चिन्ता को देखकर मैं सर्वदा उनसे कहता- चिन्ता न करो महारानी! भगवान कभी भी अपने प्रिय भक्त को अकेला नहीं छोड़ते। भक्त सदा-सर्वदा अपने इष्ट-आराध्य की गोद में रहता है। यह किसी को दिखे अथवा न दिखे परन्तु सत्य यही है। सम्राट हिरण्यकश्यप एवं भार्गव शुक्राचार्य इसे भले न देख सकें लेकिन प्रह्लाद हमेशा ही अपने नारायण की गोद में हैं। इतना ही नहीं मैंने उन्हें यह भी बताया कि एक सत्य यह भी जान लें महारानी कि केवल प्रह्लाद के हृदय में ही नारायण नहीं बसते, भगवान नारायण के हृदय में भी अपने प्रिय प्रह्लाद का वास है।

भगवान का अपने भक्त से सतत जुड़ाव ही भक्त को सर्वथा शान्त एवं परमानन्द में मग्न रहता है। महारानी कयाधू मेरी बातें सुनतीं एवं मौन रहतीं। हाँ! उनकी चिन्ता भय एवं निराशा जरूर कम हो जाते पर प्रह्लाद तो सर्वथा निश्चिन्त थे। समय बीतता गया सम्राट एवं आचार्य के अत्याचार बढ़ते गए और एक दिन भक्त प्रह्लाद की आस्था ने स्तम्भ को फाड़कर नृसिंह रूप में स्वयं को प्रकट कर दिया। भगवान नृसिंह के विकराल रूप एवं भयावह गर्जन के सामने हिरण्यकश्यप तो मूर्छित सा हो गया। रही बात भार्गव शुक्राचार्य की तो वे भय के मारे कहीं जा छुपे। परन्तु प्रह्लाद तो अपने भगवान को सम्मुख पा हर्षित थे। भगवान ने पल भर में अपने भक्त की सभी समस्याएँ मिटा दीं। इसलिए जो भक्तिपथ पर चलता है उसे किसी भी समस्या के बारे में चिन्तित नहीं होना पड़ता।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २४१

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

मंगलवार, 19 अप्रैल 2022

👉 आसक्ति

प्रभु को यदि पाना है तो सब आसक्तियों को छोड़कर निर्वैर हो जाओ।

भक्ति रसामृत सिंधु में आता है कि कामना ही राक्षसी है, ये जानता हुआ भक्त भगवान् या  भगवान् की भक्ति के अलावा और कोई भी कामना नहीं करता।  प्रभु को यदि पाना है तो सब आसक्तियों व कामनाओं को छोड़कर निर्वैर हो जाओ, प्रभु शीघ्र मिल जायेंगे। 

जिसे एक गिलास पानी की भी आवश्यकता न हो, और न ही किसी से बात करने या बोलने की अपेक्षा हो, वो भक्त शान्त और निर्भय हो जाता है।  जैसे वर्षा पड़ने पर घास स्वतः उत्पन्न हो जाती है, उसी तरह आसक्तियों व कामनाओं को छोड़ने पर चारों ओर फिर प्रभु ही दिखाई देंगे। बिना आसक्ति छोड़े भगवद् भजन नहीं होता। 

आसक्ति की रस्सी दिखाई नहीं देती है, परन्तु वह इतनी लम्बी होती है कि उसकी कोई सीमा नहीं है। आप अमेरिका में बैठे हैं, और आसक्ति की रस्सी वहीं से बाँधकर आपको ले आयेगी।  साधक को अपनी वृत्तियों को बचाकर रखना चाहिए।  यदि वृत्तियाँ  बँट गयीं तो साधक लुट जायेगा।  वृत्तियों के बँटने के बाद कुछ भी जप, तप व पाठ आदि करते रहो, कुछ नहीं मिलने वाला।  अपनी वृत्तियों को सब जगह से हटाकर एक श्री कृष्ण में लगा दो। जब तक कहीं भी आसक्ति है, चाहे थोड़ी ही क्यों न हो, तब तक वहाँ श्री कृष्ण प्रेम नहीं होता है।  

प्रेम की उत्पत्ति तब ही होती है, जब जीव सब आसक्तियों को छोड़ देता है। इसलिए गोपियों ने श्री कृष्ण से कहा था कि हम सब कुछ छोड़कर तुम्हारे पास आयीं हैं। अपनी सब आसक्तियों को छोड़कर आयीं हैं। क्यों छोड़कर आयीं हैं ? तुम्हारी उपासना की आशा से। 

मैवं विभो अहर्ति.....   भजते मुमुक्षून्||  श्रीमद्भागवत 10-29-31
देवहूति जी ने कहा-

संगो  य:  संसृते..... .... कल्पते||   श्रीमद्भागवत 03-23-55

आसक्ति बहुत ख़राब है, परन्तु आसक्ति से अच्छी वस्तु भी कोई नहीं। यदि आसक्ति महापुरुषों में हो जाय तो निश्चित कल्याण हो जाता है। यदि ये आसक्ति संसार से नहीं छूटती है तो इसको महापुरुषों से बाँध दो। तुम्हारा अवश्य कल्याण हो जायेगा। 

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

👉 आपत्तिकाल का अध्यात्म

नए युग का जन्म होने जा रहा है। दो बातें होनी हैं— एक युग-निर्माण की, दूसरा निर्माण से पहले ध्वंस होना है। ध्वंस भी होना है। इमारत जब बनाई जाती है, तब जमीन की खुदाई करनी पड़ती है। पीछे मिटटी डालकर कुटाई-पिटाई भी करते हैं और गड्ढे को ठीक करके तब दीवार की चिनाई की जाती है।

भगवान के जब अवतार होते हैं, तब एक ही कार्य नहीं करते, मात्र धर्म की स्थापना करते हुए नहीं आते, वरन अनीति, बुराई का ध्वंस करते हुए भी आते हैं। वे शांति लेकर आयेंगे तो सही, पर यह भी ध्यान में रखिये की वे लाखों-करोड़ों के लिए रोना-पीटना और हाहाकार भी लेकर आयेंगे। वे दया बरसाएंगे. तो क्रोध भी बरसाएंगे।

परिवर्तन की इस संधिबेला में आपको न तो कोई विशेष समय की मांग दिखाई दिखाई पड़ती है, न कर्तव्यों की पुकार सुनाई पड़ती है। चारों ओर क्या हो रहा है, आपको दिखाई पड़ना चाहिए। अगर आप विमूढ़ ही बने रहे, रोटी खाने और पैसा कमाने से लेकर बच्चे पैदा करने तक के चक्र में पड़े रहे तो फिर मैं क्या कह सकता हूँ!

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

सोमवार, 18 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १९

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

हमारा तात्पर्य यह नहीं कि आप भूलों, त्रुटियों और गलतियों की ओर से ओंखें बंद कर लें और बार-बार उनको दुहराते चलें, आपको चाहिए कि ' भूलों को दूर करने की और पुनरावृत्ति रोकने का भरसक प्रयत्न करें। फिर भी यदि कभी ठोकर खाकर गिर पड़े, प्राचीन बुरे संस्कारों के खिंचाव से परास्त होकर कोई गलती कर बैठें तो उसकी विशेष चिंता न करें। सच्चा पश्चाताप यही है कि दुबारा वैसी गलती न करने का प्रण किया जाए उपवास आदि से आत्मशुद्धि की जाए जिसे हानि पहुँचती है उसकी या उसके समक्ष की क्षति पूर्ति कर दी जाए मन पर जो बुरी छाप पड़ी है अच्छे कार्य की छाप द्वारा हटाया जाए। साबुन से मैला कपडा स्वच्छ किया जाता है, भूलों का परिमार्जन, श्रेष्ठ कार्यों द्वारा करने के लिए खुला द्वार आपके सामने मौजूद है, फिर की अप्रिय स्मृतियों को जगा-जगा कर नित्य दु रू भ्र्राल स्थ्य? व क्या प्रयोजन? यदि सदैव अपने ऊपर दोषारोपण ही करते रहेंगे, अपने को कोसते ही रहेंगे, भर्त्सना, ग्लानि और तिरष्कार में जलते रहेंगे तो अपनी बहुमूल्य योग्यताओं को खो बैठेंगे, अपनी कार्यकारिणी शक्तियों नष्ट कर डालेंगे। अपने को अयोग्य मत मानिए। ऐसा विश्वास मत कीजिए कि आपमें मूर्खता, दुर्भावना, कमजोरी के तत्त्व अधिक हैं।
 
इस प्रकार की मान्यता को मन में स्थान देना झूँठा,भ्रमपूर्ण गिराने वाला और आत्मघाती है। यह किसी भी प्रकार नहीं माना जा सकता कि मानव शरीर के इतने ऊँचे स्थान पर चढ़ता आ आ पहुँचने वाला जीव अपने में बुराइयाँ अधिक भरे हुए हैं। यदि सचमुच ही वह नीची श्रेणी की योग्यताओं वाला होता तो किसी कीट-पतंग या पक्षी की योनि में समय बिताता होता। उन योनियों को उत्तीर्ण करके मनुष्य योनि में, विचार पूर्ण भूमिका में प्रवेश करने का अर्थ ही यह है कि मानवोचित सद्गुणों का पर्याप्त मात्रा में विकास हो गया है। भले ही आप अन्य सद्गुणी लोगों से कुछ पीछे हों पर इसी कारण अपने को पतित क्यों समझें? एक से एक आगे है, एक से एक पीछे है। इसलिए इस प्रकार तो बडे भारी बुद्धिमान को भी कहा जा सकता है क्योंकि उससें भी अधिक बुद्धिमान भी कोई न कोई निकल ही आवेगा। आप अपने को बुद्धिमान और सद्गुणी मानें इसके लिए एक आधार है कि बहुत से लोग आप से भी कम योग्यता वाले हैं। जब इस दुनियाँ में आप से भी कम अच्छाइयों के मनुष्य हैं तो यह मान्यता सत्य है कि आप अधिक बुद्धिमान हैं,अधिक अच्छे हैं,अधिक धर्मनिष्ठ हैं। इस सत्य को खुले ह्रदय से स्वीकार करके गहरे अंतःस्थल में उतार लीजिये कि आपकी सुयोग्यता बढ़ी हुई है,आप श्रेष्ठ हैं,सक्षम है,उन्नतिशील हैं।
 
चौरासी लाख बडे-ब,डे मोर्चे फतह कर चुके हैं, अंतिम मोर्चे पर विजयी होने की तैयारी कर रहे हैं, फिर छोटे- छोटे जीवन प्रसंगों का तो कहना ही क्या? छुट-पुट समस्याएँ जो प्रतिदिन स्वभावत: सामने आया ही करती हैं उनको हल कर लेना, उन पर विजय प्राप्त करना भला यह भी कोई बडी बात है? दस-पाँच असफलताओं के कारण खिन्न मत हूजिएं अपने बारे में गिरे हुए विचार मत रखिए असंख्य सफलताएं प्रतिदिन प्राप्त करते हैं, इससे भी अधिक आगे प्राप्त करेंगे। आप विजय की मूर्तिमान प्रतिमा हैं सफलताएँ आपके लिए बनाई गई है। बढ़ना, उन्नति करना और विजय प्राप्त करना-इन तीन क्रियाओं से आपका भूतकाल का इतिहास भरा पड़ा है, यह क्रम आज भी जारी है और आगे भी जारी रहेगा।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २८

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

👉 भक्तिगाथा (भाग १२१)

शान्ति और परमानन्द का रूप है भक्ति

गन्धर्वराज चित्रकेतु की जिज्ञासा और महात्मा सत्यधृति के उत्तर ने सभी के अन्तस को स्पन्दित किया। प्रायः सभी के मानससरोवर में विचारों की अनेकों उर्मियाँ उठीं और विकीर्ण हो गयीं। इन विचारउर्मियों की अठखेलियों से घिरे गन्धर्व श्रुतसेन सोच रहे थे कि भक्ति भावों को परिष्कृत करती है, व्यवहार में व्यक्ति को अपेक्षाकृत अधिक उदार व सहिष्णु बनाती है, यहाँ तक तो ठीक है लेकिन जीवन की परिस्थितियाँ यहीं तक सीमित नहीं हैं। इनकी जटिलता और समस्याओं के संकट जब-तब जिन्दगी को क्षत-विक्षत करते हैं। अनगिनत प्रश्नों के कंटक रह-रहकर चुभते रहते हैं। इनकी चुभन की टीस से कैसे छुटकारा मिले। वैसे भी दुनिया की रीति बड़ी अजब है। यहाँ शक्तिसम्पन्न को सर्वगुणसम्पन्न माना जाता है जबकि भावनाशील गुणसम्पन्न जनों को ठोकर खाते अपमानित होता देखा जाता है।

गन्धर्व श्रुतसेन अपनी इन्हीं विचारवीथियों में विचरण कर कर थे। उनका ध्यान किसी अन्य ओर न था, जबकि कुछ अन्य जन उनके मुख पर आने वाले भावों के उतार-चढ़ावों को ध्यान से देख रहे थे। इन ध्यान देने वालों में गन्धर्वराज चित्रसेन भी थे। उन्होंने इन्हें हल्के से टोका भी, ‘‘क्या सोचने लगे श्रुतसेन? कोई समस्या है तो कहो? यह महर्षियों, सन्तों, भक्तों व समर्थ सिद्धजनों की सभा है। यहाँ सभी समस्याओं का समाधान सम्भव है।’’ गन्धर्वराज चित्रसेन के इस कथन पर श्रुतसेन ने बड़ी विनम्रता से कहा- ‘‘आपका कथन सर्वथा सत्य है महाराज। मैं आपसे पूर्णतया सहमत हूँ, साथ ही मैं यह भी जानता हूँ कि यह महासभा न केवल समर्थ जनों की है, बल्कि अन्तर्यामी जनों की भी है। यहाँ विराजित महर्षि जन, सन्त और भगवद्भक्त सभी अन्तर्मन की वेदना एवं अरोह-अवरोह को जानने में समर्थ हैं। उनकी इस क्षमता पर भरोसा करके ही मैंने कुछ नहीं कहा।’’
श्रुतसेन के इस कथन पर देवर्षि नारद हल्के से मुस्करा दिये और बोले- ‘‘यदि आप सब की आज्ञा हो तो मैं अपना अगला सूत्र प्रस्तुत करूँ।’’ ‘‘अवश्य!’’ सभी ने प्रायः एक साथ कहा। इसी के साथ देवर्षि नारद की मधुर वाणी से यह सूत्र उच्चारित हुआ-

‘शान्तिरूपात्परमानन्द रूपाच्च’॥ ६०॥
भक्ति शान्तिरूपा और परमानन्दरूपा है।

इस सूत्र के उच्चारण के साथ देवर्षि नारद ने गन्धर्व श्रुतसेन को देखा और फिर मुस्करा दिए। इसके बाद वह दो क्षण रूके और बोले- ‘‘जीवन की जटिलताएँ व समस्याओं के संकट शान्ति छीनते हैं और यह सच तो जग जाहिर है कि जिसकी शान्ति छिन गयी वह कभी भी सुखी नहीं हो सकता। जबकि भक्त की स्थिति थोड़ा सा अलग है। जिन्दगी की कोई जटिलता या समस्या उसकी शान्ति नहीं छिन सकती।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३९

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

शनिवार, 16 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १८

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए
 
नैपोलियन के बचपन में कोई यह नहीं कहता था कि बड़ा होकर यह किसी काम का निकलेगा। डॉक्टर कैलमर्स और डॉक्टर कुक को उनके अध्यापकों ने स्कूल में से यह कहकर निकाल दिया था कि इन पत्थरों से सिर मारना बेकार है। ' यह उदाहरण बताते हैं कि दूसरे लोग किसी के संबंध में जो कहते हैं वह पूर्णत: सत्य नहीं होता। आमतौर से चंद घटनाओं या बातों से प्रभावित होकर किसी के भले या के हनि का अनुमान लगाया जाता है। इस जल्दबाजी के निर्णय में गलती की बहुत बड़ी संभावना विद्यमान रहती है।

यदि आपको उपरोक्त भावों की तरह लोगों की ओर से निराशा, भर्त्सना, उपेक्षा मिलती है, आपको बुरा या असफल कहा जाता है तो इससे तनिक भी विचलित न हूजिए, मन को जरा भी गिरने न दीजिए। सर्दी, गर्मी के घातक प्रभावों से वस्रों द्वारा अपनी रक्षा करते हैं, मलेरिया या हैजा के कीटाणुओं को दवा के द्वारा शरीर में से मार भगाते हैं, इसी प्रकार आत्मविश्वास द्वारा उन प्रभावों को अपने मस्तिष्क में से निकाल बाहर करिए जो आपको नीच, असफल और मूर्ख ठहराते हैं। यह प्रभाव चाहे आपने स्वयं किया हो या किन्हीं अन्य महानुभावों ने अपनी तुच्छ बुद्धि के कारण संचरित कराया हो, जितनी जल्दी इन निराशाप्रद संक्रामक कीटाणुओं को मस्तिष्क में से मार कर भगा सके भगा दीजिए क्योंकि यह आस्तीन के साँप यदि प्रत्यक्षत: दिखाई नहीं पड़ते तो भी वे आपकी सारी उन्नति के मार्ग को रोक कर भारी विघ्न-बाधा के रूप में खड़े रहते हैं।

कहने वाला कोई कितना ही बडा, कितना ही धनवान, कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो आप यह मानने को कदापि तत्पर मत हुजिए कि आपके ऊपर ' बुराइयों ने कब्जा जमा लिया है, दुर्भावना से ग्रसित हो गए हैं, 'योग्यता खो बैठे हैं, पाप में डूबे हुए हैं। यह हो सकता है कि अन्य लोगों की भांति आप में भी कुछ दोष हों। यह त्रुटियाँ ऐसी नहीं है जो दूर न हो सकें। भूतकाल में' कुछ ऐसे काम जरूर बन पड़े होंगे जो प्रतिष्ठा को घटाने वाले समझे जाते हों और आगे भी ऐसे अवसर बन पड़ने की संभावना है क्योंकि पूर्णता की मंजिल  क्रमश: पार होती है।
 
फसल अपनी अवधि पर पकती है, आपको ' हटाकर पूर्णता प्राप्त करने के लिए कुछ समय चाहिए पारे को शुद्ध करके रसायन बना देने में वैद्य को कुछ समय लगता है, आपको भी निर्दोष मनोस्थिति तैयार करने के लिए कुछ अवकाश चाहिए यह समय एक जन्म से अधिक भी हो सकता है। पथरीले मार्ग को पार करने में ठोकरें लगने की आशंका रहेगी ही, जिस दुर्गम पर्वत पर आप चढ रहे हैं, उसमें कंकड़- पत्थर पड़े हुए हैं, बहुत बार ठोकरें लगने का क्रम चलता रहेगा।  यदि हर ठोकर पर वेदना प्रकट करने की नीति ग्रहण करेंगे तो यह मार्ग रुदन और पीड़ाओं से भरा हुआ, आनंद रहित हो जाएगा। इसलिए समभूमि, चट्टान, पथरीले मार्ग का हर्ष-विषाद न करते हुए प्रधान लक्ष्य की ओरे आगे बढते चलिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २७

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

👉 भक्तिगाथा (भाग १२०)

भक्ति को किसी प्रमाण की आवश्यकता नही

इतना कहते हुए वे थोड़ी देर के लिए आत्मलीन हुए फिर बोले- ‘‘भक्ति-भगवान भुवनभास्कर की भाँति है। सूर्य उदय हुआ, यह किसी को कहना-बताना, जताना नहीं पड़ता। सूर्य के प्रवेश मात्र से अंधियारा हटने-मिटने लगता है। दिशाएँ प्रकाशित हो जाती हैं। वृक्ष-वनस्पतियों, लताओं, बेलों में नयी चेतना गीत गाने लगती है। पशु-पक्षी से लेकर मनुष्य तक सभी स्वयं में नया जागरण अनुभव करने लगते हैं। सूर्योदय होने भर से धरती-जगती में नए प्राण आ जाते हैं।

कुछ ऐसी ही स्थिति भक्ति की है। भक्ति का अंकुरण, जीवन के समग्र रूपान्तरण का प्रारम्भ है। भक्ति जैसे-जैसे विकसित होती है, जीवन वैसे-वैसे रूपान्तरित होता है। व्यक्ति के चरित्र-चिन्तन-व्यवहार में एक नवीन प्रकाश व प्रभा छा जाती है।’’ ऐसा कहते हुए महात्मा सत्यधृति थोड़ी देर के लिए रुके फिर बोले- ‘‘इस महासत्य को देवर्षि से बढ़कर और कौन जानेगा? किसने और कब सोचा था कि रत्नाकर रूपान्तरित होकर ऋषियों के लिए भी पूजनीय महर्षि वाल्मीकि बन जाएँगे?’’

‘‘भक्ति से समग्र रूपान्तरण का रहस्य क्या है? महात्मन्!’’ गन्धर्व चित्रकेतु ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की। एक क्षण के लिए सभी की दृष्टि चित्रकेतु की ओर उठी परन्तु उसमें प्रशंसा के भाव थे। सम्भवतः इसलिए क्योंकि इसमें अनेकों जिज्ञासाओं का सहज समावेश था। इसके उत्तर में महात्मा सत्यधृति ने कहा- ‘‘हे गन्धर्वश्रेष्ठ! भक्ति के दो चरण हैं-१. स्मरण, २. समर्पण। भगवत्स्मरण से स्वाभाविक ही चित्त परिशुद्ध होता है। ईश्वरस्मरण सतत होता चले तो चित्त से संस्कार, संचित कर्म, प्रारब्ध स्वाभाविक ही हटते-मिटते जाते हैं और ईश्वर के प्रति नित्य समर्पण हो तो अहंता स्वयं ही विगलित होकर मिट जाती है। और ज्यूँ ही, जहाँ भी, जिस किसी के जीवन में ऐसा हुआ, वहाँ ईश्वरीय चेतना, प्रकाश का अवतरण सहज हो जाता है फिर इस सहजता में रूपान्तरण भी सहज, समग्र एवं सम्पूर्ण हो जाता है। इसीलिए तो कहते हैं कि भक्ति को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसकी उपस्थिति स्वयं ही अपना प्रमाण बनती है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३७

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १७

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

लोग यदि आपके बारे में अच्छे विचार नहीं रखते, आपको बुद्धिमान नहीं मानते, निरुत्साहित करने वाले वचन कहते हैं, तो ' कहने दीजिए। अपने स्वतंत्र विचार रखने का हर एक को अधिकार है, परंह यह आवश्यक नहीं कि आप हर किसी  ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे ', के अविवेक वचनों को वेद वाक्य की तरह स्वीकार करके अपने भविष्य को अंधकारपूर्ण बना लें। कहने वाले कितने ही बुद्धिमान या बडे आदमी सही, पर यह आवश्यक नहीं कि वे जो कुछ कहते हैं बिलकुल सत्य ही कहते हैं। जब आप स्वयं अपने बारे में निर्णय करते हुए गलती करते हैं, सद्गुण प्रधान होते भी अपने को दुर्गुण प्रधान मान बैठते हैं, जब आप अपने निज के बारे में  इतनी. गलती कर सकते हैं तो यह बिलकुल आसान है कि दूसरे लोग जिन्हें आपको ठीक तरह से समझने का मौका नही मिला, गलती करते हों। जैसे आपने एक अच्छे प्रीतिभोज को दो उजड्डों की हरकतों और हलुआ में मिर्च पड जाने के कारण खराब ठहरा दिया था,वैसे ही यह भी संभव है कि दो-चार छोटी-मोटी बाहरी, आकस्मिक घटनाओं को देखकर उन लोगों ने कोई भ्रम धारणा बना ली हो और उसी झूठें विश्वास के कारण समय- समय पर आपकी योग्यता में अविश्वास प्रकट करते हों।
 
पूरी सावधानी के साथ, ठीक प्रकार छान-बीन करके किसी निर्णय पर पहुँचने की फुरसत लोगों को नहीं है, वे जल्दी में जो कुछ थोडा बहुत देख पाते हैं, उसी से अपनी धारण बनाते हैं। कहते हैं कि एक बार अंधों के सामने हाथी खड़ा किया गया। उन्होंने हाथी के एक दो अंगों को छुआ और अपनी अपूर्ण जानकारी के आधार पर बताया कि हाथी कैसा है? हाथी के एक अंग को ही वे लोग पूरा समझकर उसका वैसा रूप बताते थे। भले ही वे अंधे अपने विश्वास के अनुसार सच्चे हों, पर यह आवश्यक नहीं कि उनका कथन यथार्थ ही हो। एक पैर को पकड़ कर जिसने. यह कहा कि हाथी खंभे जैसा है, वह अंधा अपनी समझ से ठीक कहता है पर आप उसकी बात मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। प्रत्यक्ष आँखों से यदि हाथी को असली रूप में देख रहे हैं तो आपका कर्त्तव्य है कि अंधों की बात को मानने से इंकार कर दें। कोई आदमी एक विशाल भवन के पिछवाड़े होकर आया-जाया करता है, पर वह उस भवन के पृष्ठ भाग की ही व्याख्या करेगा, उसने आगे का भीतर का भाग नहीं देखा है कभी उधर गया ही नहीं है तो कैसे बता सकता है कि यह भीतर, कैसा सुंदर बना हुआ है। पिछवाडे की टूटी दीवार तक ही उस दर्शक का ज्ञान सीमित है, वह तो उन्हीं बातों को कह सकता है।

प्रसिद्ध चित्रकार पाट्रोडी कोरडोना इतना मंदबुद्धि था कि उसे  गधे का सिर ' कह कर चिढाया जाता था। प्रसिद्ध गणितज्ञ सर आइजक न्यूटन अपने दर्जे में सबसे फिसड्डी लडका था। ऐकम क्लार्क के घर वाले उसे '' महामूढ़ '' कह कर पुकारते_ थे। नादयकार शैरीडन की माता से उसके अध्यापक ने कहा- ऐसे जड़ बुद्धि लड़के से मैं बाज आया, इसे घर ले जाइए। '' सर वाल्टर स्काट के अध्यापक ने अपना मत घोषित किया था कि ' यह लड़का जन्म भर बुद्ध रहेगा। ' लार्ड क्लाइव जिसने भारत में अँग्रेजी राज्य स्थापित किया, ऐसा मूढ़ बुद्धि था कि घर वाले उससे तंग आ गए थे और पीछा. छुडाने के लिए सात समुन्दर पार हिन्दुस्तान को भिजवा दिया था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २६

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

👉 भक्तिगाथा (भाग ११९)

भक्ति को किसी प्रमाण की आवश्यकता नही

हांलाकि देवर्षि अभी तक चुप थे, परन्तु उनकी इस चुप्पी को ऋषि विश्वामित्र ने तोड़ने का प्रयास करते हुए कहा- ‘‘देवर्षि! हम सभी को आपके नए भक्तिमन्त्र की प्रतीक्षा है।’’ ‘‘यह हमारा अहोभाग्य है ब्रह्मर्षि!’’ देवर्षि ने प्रसन्नतापूर्वक कहा और इसी के साथ वीणा की मधुर झंकृति के साथ उन्होंने अपने नए भक्तिसूत्र का सत्योच्चार किया-
‘प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात् स्वयंप्रमाणत्वात्’॥ ५९॥

क्योंकि भक्ति स्वयं प्रमाण स्वरूप है, इसके लिए अन्य किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।

देवर्षि का यह सूत्र सभी को बहुत भाया। परन्तु कोई कुछ बोला नहीं, सभी मौन बने रहे। इस बार महात्मा सत्यधृति भी शान्त रहे, सम्भवतः वह इस नए भक्तिमन्त्र का मनन करने लगे। उनको यूं मौन बैठे देख ब्रह्मर्षि विश्वामित्र से रहा न गया। उन्होंने अनुरोध व आग्रहपूर्ण स्वर में कहा- ‘‘हे महात्मन्! आप देवर्षि के इस सूत्र पर कुछ कहें।’’ विश्वामित्र के इस आग्रह पर महात्मा सत्यधृति ने विनम्रतापूर्ण स्वर में कहा- ‘‘हम पिछले कुछ सूत्रों पर अपनी सम्मति व अनुभव व्यक्त करते रहे हैं। इस बार कुछ कहने से कुछ सुनने की चाहत अधिक है।’’ इस बार वार्ता के सूत्र को ऋषि श्रेष्ठ वशिष्ठ ने पकड़ा और कहा- ‘‘हम सभी आपकी इस चाहत का सम्मान करते हैं। परन्तु आपसे कुछ और सुनने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहे। सम्भवतः मेरे इस कथन से अन्य सब भी, और भ्राता नारद भी सहमत हैं।’’ ‘‘निश्चय ही।’’ ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के इस कथन का सभी ने एक स्वर से अनुमोदन किया। देवर्षि नारद ने लगभग हँसते हुए कहा- ‘‘मेरी तो विशेष रूप से यह इच्छा है।’’

अब तो इतने प्रबल आग्रह व अनुरोध को स्वीकार करने के अलावा अन्य कोई उपाय न था। महात्मा सत्यधृति ने सम्पूर्ण विनयशीलता के साथ इसे स्वीकार तो किया, परन्तु साथ ही यह निवेदन भी किया कि इस सूत्र के  बाद मुझे भक्ति-श्रवण का सुअवसर प्रदान किया जाय। महात्मा सत्यधृति के इस कथन पर सब हँस पड़े और हास्य के स्वर में बोले- ‘‘महात्मन्! आपका आदेश सिर माथे पर किन्तु आज तो आप हमें श्रवण का सुअवसर प्रदान करें।’’ यह सुनकर सत्यधृति बोले- ‘‘आप सब तत्त्ववेत्ता, ज्ञानी, तपस्वी, योगी हैं। भक्ति की भावना आप सबके व्यक्तित्व में रची-बसी है। आप सभी का सान्निध्य मुझे एक साथ सुलभ हो सका, यही मेरा अहोभाग्य। सम्भवतः यह भी भक्ति के संस्पर्श का प्रभाव है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३५

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

बुधवार, 13 अप्रैल 2022

👉 किसी का जी न दुखाया करो (भाग 2)

क्या तुम समझते हो कि दूसरे के मन पर घात करने से तुम्हारी बात ऊंची रह जायेगी? क्या तुम सोचते हो कि तुम्हारे प्रहारों से दूसरे तुम्हारी बातें मान लेंगे? क्या तुम्हारा विचार है कि तुम केवल उसके जी को दुःखाते हुए उसे परास्त करके अपनी विजय स्थापित कर लोगे? क्या तुम्हारी धारण है कि उसका मन चुपचाप तुम्हारे प्रहारों को सहता रहेगा? ऐसा न समझो कि तुम उसको केवल परास्त करके मनवा सकोगे। उसका मन तुम्हारा सदा विरोध करेगा।

तुम्हारी बातों को वह मानेगा तो कदापि नहीं, हाँ भीतर ही भीतर वह तुम्हारा विरोधी अवश्य बन जायगा। उसका हृदय भी तुम्हारी ही भाँति कुछ आत्मगौरववान् होता है। उसकी भी इच्छा होती है कि वह तुम्हारे कथनों का प्रतिवाद करे। उसमें भी बदले की छिपी भावना रहती है। तुम उसे दुःखी करके विरोध को बढ़ाते ही हो, अपने मत को स्थापित नहीं करते।

विजय प्रेम से होती है। जो काम प्रेम से निकलता है वह क्रोध, दबाव या आघात से नहीं। किसी को समझाना प्रेम से अधिक अच्छी ढंग से हो सकता है, झिझकने, फटकारने या चुभती बात कहने से नहीं। मानव मन पर किसी का एकाधिकार तो है नहीं। यदि तुमसे ही कोई आज कहे कि तुम बड़ा बुरा करते हो कि बहस किया करते हो, तो तुम यही कहोगे न, कि जाओ, करते हैं- तुम्हें इससे क्या? यही दशा सबकी है।

दीवार से टकराकर पत्थर लौट जाता है। पहाड़ से टकराकर शब्द प्रति ध्वनित होता है। क्रिया की प्रतिक्रिया सदा होती ही है। फिर तुम्हारे जी दुखाने की प्रतिक्रिया क्यों न होगी? यदि वह प्रकट रूप से तुम्हें कुछ न कहेगा, तो उसकी अन्तरात्मा तो तुम्हें सदा कोसती रहेगी। तुम्हें वह चाहे एक शब्द भी न कहे, पर उसका मन हमेशा कुढ़ता रहेगा।

क्रमशः जारी
~ अखण्ड ज्योति फरवरी 1948 पृष्ठ 24 

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १६

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए
दो-चार छोटी-मोटी बुराइयाँ यदि आप में हैं तो वे विजातीय होने के कारण बार-बार आपका ध्यान खींचेंगी और पूर्ण विवेक एवं निष्पक्ष परीक्षण शक्ति की कमी रही तो संभव है आप कभी बुरे नतीजे पर पहुँच जाएँ। वे बुराइयाँ आपके ध्यान को अपने में उलझाए रहेंगी अच्छाइयों तक दृष्टि न पहुँचने' देंगी। ऐसी दशा में कोई व्यक्ति यह विश्वास कर बैठ सकता है कि मुझ में बुराइयाँ पाप-वासनाएँ दुर्भावनाएँ  अयोग्यताएँ अधिक हैं इससे नीची ही स्थिति में पड़ा रहूँगा आगे और भी नीचा हो जाऊँगा, ऊँचा चढ़ना कठिन है।
ऐसे निराशापूर्ण विचार और विश्वास, भ्रम पूर्ण, एकांगी और आवेश में आकर निश्चय किए हुए होते हैं। 
 
इनमें कोई तथ्य नहीं, इनसे कोई लाभ नहीं, यह निरर्थक विचार प्रेरक शक्ति से बिल्कुल शून्य होने के कारण सर्वथा अग्राह्य हैं। हानि, पतन और झुँझलाहट की आत्मघाती, विषैली भावनाएँ इससे उपजती हैं जिससे हर प्रकार का अपकार ही अधिक होता है।
असल में मानव तत्त्व में ' दुर्गुणों की मात्रा इतनी नहीं है जो सद्गुणों  से अधिक हो, कम से कम इतना तो निश्चित है कि जिनके हाथों में यह पुस्तक है जिनकी आँखें इन पंक्तियों को पढने में रुचि ले रही हैं वे दुर्गुण प्रधान नहीं हैं। आप अपने गुण- अवगुणों पर एक बार पुन: दृष्टिपात कीजिए निष्पक्षता पूर्वक निरीक्षण कीजिए तो हम विश्वास दिलाते हैं कि आपको इस परिणाम पर पहुँचने के लिए विवश होना पडेगा कि आप में 'दुर्गुणों की अपेक्षा सद्गुण अधिक हैं। सचाई इसके लिए मजबूर कि अपने अंदर उच्च ' गुणों की अधिकता को स्वीकार करें। मनुष्य शरीर, इसमें भी शिक्षित, फिर आध्यात्मिक विषयों में दिलचस्पी, यह तीनों एक से बढ़कर एक प्रमाण हैं जो साबित करते हैं कि आप अच्छे हैं, बुद्धिमान हैं, विवेकशील हैं और ऊपर की ओर चल रहे हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २४

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

👉 भक्तिगाथा (भाग ११८)

भक्ति को किसी प्रमाण की आवश्यकता नही

महात्मा सत्यधृति के मुख से भक्त विमलतीर्थ के अनुभव सुनकर सभी भावलीन हो गए। भावनाएँ-भावनाओं को छूती हैं, इनके स्पर्श से अस्तित्त्व व व्यक्तित्त्व के केन्द्र में एक रहस्यमय हिलोर उठती है, जो समूचे व्यक्तित्व को स्पन्दित करती चली जाती है। भक्तिमन्त्र के द्रष्टा ऋषि नारद भक्तितत्त्व के परम अनुभवी व मर्मज्ञ थे। वे जानते थे कि भक्ति-भावनाओं का परिमार्जन-परिष्कार व रूपान्तरण करने में समर्थ है। बस आवश्यकता इसके सम्यक प्रयोग की है। जिसने भी जब यह प्रयोग जहाँ कहीं भी किया उसे सफलता अवश्य मिली। इसमें कहीं किसी तरह की विकलता, असफलता की कोई गुंजाइश ही नहीं।

देवर्षि नारद अपनी लय में सोचे जा रहे थे। अन्य सभी भी अपनी विचारविथियों में भ्रमण कर रहे थे। बाहर सब ओर मौन छाया था। पर्वत शिखर, उत्तुंग वृक्ष, औषधीय वनस्पत्तियाँ, यहाँ तक वन्य पशु सभी शान्त व स्थिर थे। कहीं से कोई स्वर नहीं था। ऐसा लग रहा था कि सारे रव, नीरव में समाहित हो गए हैं। काफी देर तक ऐसा ही बना रहा। पल-क्षण बीतते गए, परन्तु भक्ति की भावसमाधि यथावत बनी रही। लेकिन तभी अब तक स्तम्भित रही वायु मन्दगति से बह चली और धीरे-धीरे उसमें हिमपक्षियों के स्वर घुलने लगे। थोड़ी देर बाद हिमालयी वन्य पशुओं ने भी उसमें अपना रव घोला। वातावरण में ऐसी चैतन्यता अचानक उभरी, जैसे कि समूची प्रकृति अपनी समाधिलीनता त्यागकर अपने बाह्य जगत के कर्त्तव्यों के प्रति सजह, सचेष्ट हो गयी हो।

इस नयी स्थिति को अपने अनुभव में समेटते हुए महर्षि पुलह मुस्करा उठे। उनकी यह मुस्कराहट ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के मन को बेध गयी। उन्होंने बड़े मन्द स्वर में  ऋषि पुलह से पूछा- ‘‘महर्षि अचानक आपकी इस मुस्कराहट का कोई प्रयोजन तो नहीं?’’ उत्तर में ऋषि पुलह ने पुनः अपनी उसी मुस्कान में स्वरों को घोलते हुए कहा- ‘‘लगता है हम सभी को मौन देखकर स्वयं प्रकृति मुखर हो उठी है।’’ महर्षि पुलह के इस अटपटे उत्तर को सुनकर ऋषि विश्वामित्र भी मुस्करा दिये। इन दोनों ऋषियों की मुस्कान ने वातावरण को और भी चैतन्य बना दिया। देवर्षि नारद के साथ अन्य सब अपनी विचार वीथियों से बाहर निकलकर जीवन की सामान्य सतह पर आ गए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३४

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

👉 मातृत्व का सम्यक् बोध ही नवरात्रि का मूल (भाग 4)

माँ की इच्छा है कि हमारा प्राण और हमारी प्रतिज्ञा समान हो। माँ की चाहत है कि वह जिस सृष्टि और जिस ब्रह्मांड की मंगलमयी अधिष्ठात्री देवी है, उसका किसी भी तरह अमंगल न हो। जिस दैवी सम्पदा, संस्कृति और परम्परा की रक्षा के लिए वह अपने सम्पूर्ण तप, संकल्प, सिद्धि, शक्ति, ममता, करुणा और मातृत्व का पुँज बनकर समय-समय पर प्रकट होती आयी है, हम उसकी प्राण-पण से रक्षा करें। नवरात्रि अनुष्ठान के साथ यदि हम इस महासत्य के लिए संकल्पित नहीं है, तो हमारा अनुष्ठान अधूरा है। और विडम्बना यही है कि बहुसंख्यक जनों की स्थिति ऐसी ही है। निजी स्वार्थ में वे सर्वभूत हितेरतः का बीज मंत्र या मातृ मंत्र भूल गए हैं।

सवाल यह है कि ऐसी स्थिति आयी ही क्यों? तो जवाब यह है कि हमारी यह प्रतीति ही खो गयी है कि हम किससे हैं? हम जिसके कारण हैं, वह कौन है? वह हमारी क्या है और सबसे बढ़कर हम उसके क्या हैं? हमने जननी को, माँ को केवल स्त्री मान लिया है। धरती माता, भारत माता हमारे लिए केवल एक मिट्टी का टुकड़ा बनकर रह गयी है। हमें यह तो याद है कि हमारे लिए माँ को राष्ट्रमाता को क्या-क्या करना चाहिए। लेकिन उसके प्रति किए जाने वाले हमारे कर्म-धर्म हमको अब याद नहीं रहे। स्थिति इतनी विकृत एवं बिगड़ी हुई है कि हम केवल प्रकृति एवं प्रवृत्ति को ही प्रदूषित नहीं कर रहे, नारी और उसके मातृत्व को भी अपवित्र बनाते जा रहे हैं। यही कारण है कि आज सन्तानों का जन्म किसी सद्संकल्प के कारण नहीं वासना के वशीभूत होकर होता है।

आज हर घर-आँगन में तुलसी के बिरवे की जगह यह प्रश्न रोपित-आरोपित है कि हमारे बच्चे बिगड़ैल एवं हमारा परिवार आतंकित क्यों है? इसका जवाब एकदम सीधा-सपाट है कि हमें मातृत्व का सम्यक् बोध नहीं रहा। हमारे देश की नारी ने आधुनिकता की दौड़ में जो पश्चिमी बालक बना रही है, उसके परिणाम में वह जननी तो बन जाती हैं, पर माँ नहीं बन पाती। यही स्थिति जन्म देने वाले की है। ध्यान रहे कि कभी भी वासना जीवन का वन्दनवार नहीं बन सकती। पश्चिमी आधुनिकतावादी कोख से जन्मी हमारी सन्तानें यदि विलासी, लम्पट एवं उच्छृंखल बन रही हैं, तो इसमें भला अचरज ही क्या है? उन्हें जन्म तो मिला पर संस्कार प्रदान करने वाली माँ नहीं मिली।

अखण्ड ज्योति- अप्रैल 2002 पृष्ठ 12


शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

सोमवार, 11 अप्रैल 2022

👉 किसी का जी न दुखाया करो (भाग 1)

भाई! मनुष्यता के नाते तो किसी का मन न दुःखित किया करो। सम्भव है उसमें कुछ कमियाँ हों, कुछ बुराइयाँ भी हों। यह भी हो सकता है कि उसके विचार तुम से न मिलते हों, या तुम्हारी राय में उसके सिद्धान्त ठीक न हों। पर क्या इसीलिए तुम उसके मन पर अपने वाक्-प्रहारों द्वारा आघात पहुँचाओगे? तुम यह न भूल जाओ कि वह मनुष्य है, उसके भी मन होता है, तुम्हारे कठोर वचन सुनकर उसके भी हृदय में ठेस पहुँचती है और उसको भी अपने आत्माभिमान का अपनी सत्यता का अपनी मनुष्यता के अधिकार का कुछ मान है।

सम्भव है तुम्हारा वाक् चातुर्य इतना अच्छा हो कि तुम उसे अपनी युक्तियों द्वारा हरा दो। सम्भव है वह व्यर्थ विवाद करना ठीक न समझे और तुम अपनी टेक द्वारा उसे झुका दो। यह भी सम्भव है कि उसका ज्ञान अपूर्ण हो और वह बार बार तुमसे हार खाता रहे। पर इन अपने विवादों में ऐसे साधनों का प्रयोग तो न करो जो उसके हृदय पर मार्मिक चोट करते हों। संसार में सुन्दर युक्तियाँ क्या कम हैं? क्या ऐसी बातों का पूर्णतः अभाव ही हो गया है जो उसे परास्त भी कर दे, पर उस पर चोट न करें? क्या ऐसे तर्क संसार से चल बसे हैं जिनसे तुम अपना पक्ष भी स्थापित कर लो और उसका भी जी न दुःखे?

तुम भूल न जाओ कि संसार का सत्य तुम्हारे ही पल्ले नहीं पड़ गया है। यह भी याद रखो कि जो कुछ तुम सोचते हो वही पूर्णतः सत्य नहीं भी हो सकता है। तुम्हारे सभी विचार अच्छे हैं और दूसरे के सभी खराब, ऐसा भी तो नहीं कहा जा सकता। तुम आक्षेप कर सकते हो कि उसके खराब विचारों का हम विरोध करते हैं। विरोध करो। तुम्हें कौन रोक सकता है? पर इसमें दूसरे के जी को व्यथित करने की क्या आवश्यकता है? तुम्हारा मार्ग सही है, ठीक है। तुम दूसरों को सन्मार्ग पर लाना चाहते हो, उत्तम है। युक्तियों द्वारा दूसरे को परास्त करके स्वपक्ष स्थापित करना चाहते हो- श्रेष्ठ है। पर क्या ये कार्य बिना दूसरे के चित्त को पीड़ा पहुँचाये नहीं हो सकते?

क्रमशः जारी
-अखण्ड ज्योति फरवरी 1948 पृष्ठ 24

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/February/v1.24

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

👉 आप पढ़े-लिखे लोगों तक हमारी आवाज पहुंचा दीजिए

हमारे विचारों को आप पढ़िए और हमारी आग की चिनगारी को लोगों में फैला दीजिए। आप जीवन की वास्तविकता के सिद्धान्तों को समझिए। ख्याली दुनियां में से निकलिए। आपके नजदीक जितने भी आदमी हैं उनमें आप हमारे विचारों को फैला दीजिए। यह काम आप अपने काम के साथ-साथ भी कर सकते हैं। आप युग साहित्य लेकर अपने पड़ोसियों को पढ़ाना शुरू कर दीजिए। उनको हमारे विचार दीजिए। हमको आगे बढ़ने दीजिए, सम्पर्क बनाने दीजिए ताकि हम उन विचारशीलों के पास, शिक्षितों के पास जाने में सफल हो सकें। इससे कम में हमारा काम बनने वाला नहीं।

जो हमारा विचार पढ़ेगा-समझेगा, वही हमारा शिष्य है। हमारे विचार बड़े पैने हैं। दुनियां को हम पलट देने का दावा जो करते हैं वह सिद्धान्तों से नहीं, बल्कि अपने सशक्त विचारों से करते हैं। आप इन विचारों को फैलाने में हमारी सहायता कीजिए।
अब हमको नई पीढ़ी चाहिए। इसके लिए आप पढ़े-लिखे विचारशीलों में जाइए। उनकी खुशामद कीजिए, दरवाजा खटखटाइए और किसी भी तरह हमारी विचारधारा उन तक पहुंचाइए। हमने सारे विश्व को अपना कार्यक्षेत्र बनाया है। विचार क्रान्ति अभियान आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस युग की सभी समस्याएं इसलिए पैदा हुई हैं कि आदमी की अक्ल खराब हो गई है।

न पैसा कम है, न कोई चीज कम है, बस अक्ल खराब है। बस इस अक्ल को ठीक करने के लिए ही हमें विचार क्रान्ति में हिस्सा लेना चाहिए। व्यक्ति, समाज, देश, धर्म और संस्कृति के विकास एवं विस्तार करने तथा मानवीय भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए ज्ञान यज्ञ का विस्तार करना चाहिए। आप घर-घर में जाइए, जन-जन के पास जाइए। अलख जगाइए। नवयुग का सन्देश सुनाइए। हमारा साहित्य पढ़वाइए। अगर आपने यह किया तो हमारा दावा है कि युग अवश्य बदलेगा।

~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

शनिवार, 9 अप्रैल 2022

👉 व्यक्ति की पहचान

व्यक्ति को पहचानने की एक ही कसौटी है कि उसकी वाणी घटिया है या बढ़िया। व्याख्यान कला अलग है। मंच पर तो सभी शानदार मालूम पड़ते हैं। प्रत्यक्ष सम्पर्क में आते ही व्यक्ति नंगा हो जाता है। जो प्राण वाणी में है, वही परस्पर चर्चा- व्यवहार में परिलक्षित होता है। वाणी ही व्यक्ति का स्तर बताती है। व्यक्तित्व बनाने के लिए वाणी की विनम्रता जरूरी है। प्याज खाने वाले के मुँह से, शराब पीने वाले मसूड़े के मुँह से जो बदबू आती है, वाणी की कठोरता ठीक इसी प्रकार मुँह से निकलती है। अशिष्टता छिप नहीं सकती। यह वाणी से पता चल ही जाती है। अनगढ़ता मिटाओ, दूसरों का सम्मान करना सीखो। तुम्हें प्रशंसा करना आता ही नहीं, मात्र निन्दा करना आता है। व्यक्ति के अच्छे गुण देखो, उनका सम्मान करना सीखो। तुरन्त तुम्हें परिणाम मिलना चालू हो जाएँगे।

वाणी की विनम्रता का अर्थ चाटुकारिता नहीं है। फिर समझो इस बात को, कतई मतलब नहीं है चापलूसी- वाणी की मिठास से। दोनों नितान्त भिन्न चीजें हैं। दूसरों की अच्छाइयों की तारीफ करना, मीठी बोलना एक ऐसा सद्गुण है, जो व्यक्ति को चुम्बक की तरह खींचता व अपना बनाता है। दूसरे सभी तुम्हारे अपने बन जाएँगे, यदि तुम यह गुण अपने अन्दर पैदा कर लो। इसके लिए अन्तः के अहंकार को गलाओ। अपनी इच्छा, बड़प्पन, कामना, स्वाभिमान को गलाने का नाम समर्पण है, जिसे तुमसे करने को मैंने कहा है व इसकी अनन्त फलश्रुतियाँ सुनाई हैं। अपनी इमेज विनम्र से विनम्र बनाओ। मैनेजर की, इंचार्ज की, बॉस की नहीं, बल्कि स्वयंसेवक की। जो स्वयंसेवक जितना बड़ा हैं, वह उतना ही विनम्र है, उतना ही महान बनने के बीजांकुर उसमें हैं। तुम सबमें वे मौजूद हैं। अहं की टकराहट बन्द होते ही उन्हें अन्दर टटोलो कि तुमने समर्पण किया है कि नहीं।

हमारी एक ही महत्त्वाकाँक्षा है कि हम सहस्रभुजा वाले सहस्रशीर्षा पुरुष बनना चाहते हैं। तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ, यह हमारी मन की बात है। गुरु- शिष्य एक- दूसरे से अपने मन की बात कहकर हल्के हो जाते हैं। हमने अपने मन की बात तुमसे कह दी। अब तुम पर निर्भर है कि तुम कितना हमारे बनते हो? पति- पत्नी की तरह, गुरु व शिष्य की आत्मा में भी परस्पर ब्याह होता है, दोनों एक- दूसरे से घुल- मिलकर एक हो जाते हैं। समर्पण का अर्थ है- दो का अस्तित्व मिटाकर एक हो जाना। तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महत्त्वाकाँक्षाओं को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महत्त्वाकाँक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहं जिन्दा है, वह वेश्या है। जिसका अहं मिट गया, वह पवित्रता है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो? इसके लिए निरहंकारी बनो। स्वाभिमानी तो होना चाहिए, पर निरहंकारी बनकर। निरहंकारी का प्रथम चिह्न है वाणी की मिठास।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 2)

सम्पत्ति के लिए रोने और चिन्तित होने वाला व्यक्ति यदि यह सोच ले कि अधिक सम्पत्ति उपार्जन के लिए मनुष्य को उचित एवं अनुचित साधनों का प्रयोग क...