सोमवार, 18 अप्रैल 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १२१)

शान्ति और परमानन्द का रूप है भक्ति

गन्धर्वराज चित्रकेतु की जिज्ञासा और महात्मा सत्यधृति के उत्तर ने सभी के अन्तस को स्पन्दित किया। प्रायः सभी के मानससरोवर में विचारों की अनेकों उर्मियाँ उठीं और विकीर्ण हो गयीं। इन विचारउर्मियों की अठखेलियों से घिरे गन्धर्व श्रुतसेन सोच रहे थे कि भक्ति भावों को परिष्कृत करती है, व्यवहार में व्यक्ति को अपेक्षाकृत अधिक उदार व सहिष्णु बनाती है, यहाँ तक तो ठीक है लेकिन जीवन की परिस्थितियाँ यहीं तक सीमित नहीं हैं। इनकी जटिलता और समस्याओं के संकट जब-तब जिन्दगी को क्षत-विक्षत करते हैं। अनगिनत प्रश्नों के कंटक रह-रहकर चुभते रहते हैं। इनकी चुभन की टीस से कैसे छुटकारा मिले। वैसे भी दुनिया की रीति बड़ी अजब है। यहाँ शक्तिसम्पन्न को सर्वगुणसम्पन्न माना जाता है जबकि भावनाशील गुणसम्पन्न जनों को ठोकर खाते अपमानित होता देखा जाता है।

गन्धर्व श्रुतसेन अपनी इन्हीं विचारवीथियों में विचरण कर कर थे। उनका ध्यान किसी अन्य ओर न था, जबकि कुछ अन्य जन उनके मुख पर आने वाले भावों के उतार-चढ़ावों को ध्यान से देख रहे थे। इन ध्यान देने वालों में गन्धर्वराज चित्रसेन भी थे। उन्होंने इन्हें हल्के से टोका भी, ‘‘क्या सोचने लगे श्रुतसेन? कोई समस्या है तो कहो? यह महर्षियों, सन्तों, भक्तों व समर्थ सिद्धजनों की सभा है। यहाँ सभी समस्याओं का समाधान सम्भव है।’’ गन्धर्वराज चित्रसेन के इस कथन पर श्रुतसेन ने बड़ी विनम्रता से कहा- ‘‘आपका कथन सर्वथा सत्य है महाराज। मैं आपसे पूर्णतया सहमत हूँ, साथ ही मैं यह भी जानता हूँ कि यह महासभा न केवल समर्थ जनों की है, बल्कि अन्तर्यामी जनों की भी है। यहाँ विराजित महर्षि जन, सन्त और भगवद्भक्त सभी अन्तर्मन की वेदना एवं अरोह-अवरोह को जानने में समर्थ हैं। उनकी इस क्षमता पर भरोसा करके ही मैंने कुछ नहीं कहा।’’
श्रुतसेन के इस कथन पर देवर्षि नारद हल्के से मुस्करा दिये और बोले- ‘‘यदि आप सब की आज्ञा हो तो मैं अपना अगला सूत्र प्रस्तुत करूँ।’’ ‘‘अवश्य!’’ सभी ने प्रायः एक साथ कहा। इसी के साथ देवर्षि नारद की मधुर वाणी से यह सूत्र उच्चारित हुआ-

‘शान्तिरूपात्परमानन्द रूपाच्च’॥ ६०॥
भक्ति शान्तिरूपा और परमानन्दरूपा है।

इस सूत्र के उच्चारण के साथ देवर्षि नारद ने गन्धर्व श्रुतसेन को देखा और फिर मुस्करा दिए। इसके बाद वह दो क्षण रूके और बोले- ‘‘जीवन की जटिलताएँ व समस्याओं के संकट शान्ति छीनते हैं और यह सच तो जग जाहिर है कि जिसकी शान्ति छिन गयी वह कभी भी सुखी नहीं हो सकता। जबकि भक्त की स्थिति थोड़ा सा अलग है। जिन्दगी की कोई जटिलता या समस्या उसकी शान्ति नहीं छिन सकती।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २३९

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