मंगलवार, 14 जुलाई 2020
👉 जीवन कहानी
एक बड़ा सुन्दर शहर था, उसका राजा बड़ा उदार और धर्मात्मा था। प्रजा को प्राणों के समान प्यार करता और उनकी भलाई के लिए बड़ी बड़ी सुन्दर राज व्यवस्थाएं करता। उसने एक कानून प्रचलित किया कि अमुक अपराध करने पर देश निकाले की सजा मिलेगी। कानून तोड़ने वाले अनेक दुष्टात्मा राज्य से निकाल बाहर किये गये, राज्य में सर्वत्र सुख शान्ति का साम्राज्य था।
एक बार किसी प्रकार वही जुर्म राजा से बन पड़ा। बुराई करते तो कर गया पर पीछे उसे बहुत दुःख हुआ। राजा था सच्चा, अपने पाप को वह छिपा भी सकता था पर उसने ऐसा किया नहीं।
दूसरे दिन बहुत दुखी होता हुआ वह राज दरबार में उपस्थित हुआ और सबके सामने अपना अपराध कह सुनाया। साथ ही यह भी कहा मैं अपराधी हूँ इसलिए मुझे दण्ड मिलना चाहिए। दरबार के सभासद ऐसे धर्मात्मा राजा को अलग होने देना नहीं चाहते थे फिर भी राजा अपनी बात पर दृढ़ रहा उसने कड़े शब्दों में कहा राज्य के कानून को मैं ही नहीं मानूँगा तो प्रजा उसे किस प्रकार पालन करेगी? मुझे देश निकाला होना ही चाहिये।
निदान यह तय करना पड़ा कि राजा को निर्वासित किया जाय। अब प्रश्न उपस्थित हुआ कि नया राजा कौन हो? उस देश में प्रजा में से ही किसी व्यक्ति को राजा बनाने की प्रथा थी। जब तक नया राजा न चुन लिया जाय तब तक उसी पुराने राजा को कार्य भार सँभाले रहने के लिए विवश किया गया। उसे यह बात माननी पड़ी।
उस जमाने में आज की तरह वोट पड़कर चुनाव नहीं होते थे। तब वे लोग इस बात को जानते ही न हों सो बात न थी। वे अच्छी तरह जानते थे कि यह प्रथा उपहासास्पद है। लालच, धौंस, और झूठे प्रचार के बल पर कोई नालायक भी चुना जा सकता है। इसलिए उपयुक्त व्यक्ति की कसौटी उनके सद्गुण थे। जो अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करता था वही अधिकारी समझा जाता था।
उस देश का राजा जैसा धर्मात्मा था वैसा ही प्रधान मन्त्री बुद्धिमान था। उसने नया राजा चुनने की तिथि नियुक्त की। और घोषणा की कि अमुक तिथि को दिन के दस बजे जो सबसे पहले राजमहल में जाकर महाराज से भेंट करेगा वही राजा बना दिया जायेगा। राजमहल एक पथरीली पहाड़ी पर शहर से जरा एकाध मील हठ कर जरूर था पर उसके सब दरवाजे खोल दिये गये थे भीतर जाने की कोई रोक टोक न थी। राजा के बैठने की जगह भी खुले आम थी और वह मुनादी करके सबको बता दी गई थी।
राजा के चुनाव से एक दो दिन पहले प्रधान मन्त्री ने शहर खाली करवाया और उसे बड़ी अच्छी तरह सजाया। सभी सुखोपभोग की सामग्री जगह जगह उपस्थिति कर दी। उन्हें लेने की सबको छुट्टी थी किसी से कोई कीमत नहीं ली जाती। कहीं मेवे मिठाइयों के भण्डार खुले हुए थे तो कहीं खेल, तमाशे हो रहे थे कहीं आराम के लिए मुलायम पलंग बिछे हुए थे तो कहीं सुन्दर वस्त्र, आभूषण मुफ्त मिल रहे थे। कोमलाँगी तरुणियाँ सेवा सुश्रूषा के लिए मौजूद थीं जगह -जगह नौकर दूध और शर्बत के गिलास लिये हुए खड़े थे। इत्रों के छिड़काव और चन्दन के पंखे बहार दे रहे थे। शहर का हर एक गली कूचा ऐसा सज रहा था मानो कोई राजमहल हो।
चुनाव के दिन सबेरे से ही राजमहल खोल दिया गया और उस सजे हुए शहर में प्रवेश करने की आज्ञा दे दी गई। नगर से बाहर खड़े हुए प्रजाजन भीतर घुसे तो वे हक्के-बक्के रह गये। मुफ्त का चन्दन सब कोई घिसने लगा। किसी ने मिठाई के भण्डार पर आसन बिछाया तो कोई सिनेमा की कुर्सियों पर जम बैठा, कोई बढ़िया बढ़िया कपड़े पहनने लगा तो किसी ने गहने पसन्द करने शुरू किये। कई तो सुन्दरियों के गले में हाथ डालकर नाचने लगे सब लोग अपनी अपनी रुचि के अनुसार सुख सामग्री का उपयोग करने लगे।
एक दिन पहले ही सब प्रजाजनों को बता दिया गया था कि राजा से मिलने का ठीक समय 10 बजे है। इसके बाद पहुँचने वाला राज का अधिकारी न हो सकेगा। शहर सजावट चन्द रोजा है, वह कल समय बाद हटा दी जायेगी एक भी आदमी ऐसा नहीं बचा था जिसे यह बातें दुहरा दुहरा कर सुना न दी गई हों, सबने कान खोलकर सुन लिया था।
शहर की सस्ती सुख सामग्री ने सब का मन ललचा लिया उसे छोड़ने को किसी का जी नहीं चाहता था। राज मिलने की बात को लोग उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे। कोई सोचता था दूसरों को चलने दो मैं उनसे आगे दौड़ जाऊँगा, कोई ऊंघ रहे थे अभी तो काफी वक्त पड़ा है, किसी का ख्याल था सामने की चीजों को ले लो, राज न मिला तो यह भी हाथ से जाएंगी, कोई तो राज मिलने की बात का मजाक उड़ाने लगे कि यह गप्प तो इसलिये उड़ाई गई है कि हम लोग सामने वाले सुखों को न भोग सकें। एक दो ने हिम्मत बाँधी और राजमहल की ओर चले भी पर थोड़ा ही आगे बढ़ने पर महल का पथरीला रास्ता और शहर के मनोहर दृश्य उनके स्वयं बाधक बन गये बेचारे उल्टे पाँव जहाँ के तहाँ लौट आये। सारा नगर उस मौज बहार में व्यस्त हो रहा था।
दस बज गये पर हजारों लाखों प्रजाजनों में से कोई वहाँ न पहुँचा। बेचारा राजा दरबार लगाये एक अकेला बैठा हुआ था। प्रधान मन्त्री मन ही मन खुश हो रहा था कि उसकी चाल कैसी सफल हुई। जब कोई न आया तो लाचार उसी राजा को पुनः राज भार सँभालना पड़ा।
यह कहानी काल्पनिक है परन्तु मनुष्य जीवन में यह बिल्कुल सच उतरती है। ईश्वर को प्राप्त करने पर हम राज्य मुक्ति अक्षय आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। उसके पाने की अवधि भी नियत हैं मनुष्य जन्म समाप्त होने पर यह अवसर हाथ से चला जाता है। संसार के मौज तमाशे थोड़े समय के हैं यह कुछ काल बाद छिन जाते हैं। सब किसी ने यह घोषणा सुन रखी है कि संसार के भोग नश्वर हैं, ईश्वर की प्राप्ति में सच्चा सुख है, प्रभु की प्राप्ति का अवसर मनुष्य जन्म में रहने तक ही है। परन्तु हममें से कितने हैं जो इस घोषणा को याद रख कर नश्वर माया के लालच में नहीं डूबे रहते?
अवसर चला जा रहा है। हम माया के भुलावे में फँस कर तुच्छ वस्तुओं को समेट रहे हैं और अक्षय सुख की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते। हमारे इस व्यवहार को देखकर प्रधान मन्त्री शैतान मन ही मन खुश हो रहा है कि मेरी चाल कैसी सफल हो रही है। यह कहानी हमारे जीवन का एक कथा चित्र है।
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1940
एक बार किसी प्रकार वही जुर्म राजा से बन पड़ा। बुराई करते तो कर गया पर पीछे उसे बहुत दुःख हुआ। राजा था सच्चा, अपने पाप को वह छिपा भी सकता था पर उसने ऐसा किया नहीं।
दूसरे दिन बहुत दुखी होता हुआ वह राज दरबार में उपस्थित हुआ और सबके सामने अपना अपराध कह सुनाया। साथ ही यह भी कहा मैं अपराधी हूँ इसलिए मुझे दण्ड मिलना चाहिए। दरबार के सभासद ऐसे धर्मात्मा राजा को अलग होने देना नहीं चाहते थे फिर भी राजा अपनी बात पर दृढ़ रहा उसने कड़े शब्दों में कहा राज्य के कानून को मैं ही नहीं मानूँगा तो प्रजा उसे किस प्रकार पालन करेगी? मुझे देश निकाला होना ही चाहिये।
निदान यह तय करना पड़ा कि राजा को निर्वासित किया जाय। अब प्रश्न उपस्थित हुआ कि नया राजा कौन हो? उस देश में प्रजा में से ही किसी व्यक्ति को राजा बनाने की प्रथा थी। जब तक नया राजा न चुन लिया जाय तब तक उसी पुराने राजा को कार्य भार सँभाले रहने के लिए विवश किया गया। उसे यह बात माननी पड़ी।
उस जमाने में आज की तरह वोट पड़कर चुनाव नहीं होते थे। तब वे लोग इस बात को जानते ही न हों सो बात न थी। वे अच्छी तरह जानते थे कि यह प्रथा उपहासास्पद है। लालच, धौंस, और झूठे प्रचार के बल पर कोई नालायक भी चुना जा सकता है। इसलिए उपयुक्त व्यक्ति की कसौटी उनके सद्गुण थे। जो अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करता था वही अधिकारी समझा जाता था।
उस देश का राजा जैसा धर्मात्मा था वैसा ही प्रधान मन्त्री बुद्धिमान था। उसने नया राजा चुनने की तिथि नियुक्त की। और घोषणा की कि अमुक तिथि को दिन के दस बजे जो सबसे पहले राजमहल में जाकर महाराज से भेंट करेगा वही राजा बना दिया जायेगा। राजमहल एक पथरीली पहाड़ी पर शहर से जरा एकाध मील हठ कर जरूर था पर उसके सब दरवाजे खोल दिये गये थे भीतर जाने की कोई रोक टोक न थी। राजा के बैठने की जगह भी खुले आम थी और वह मुनादी करके सबको बता दी गई थी।
राजा के चुनाव से एक दो दिन पहले प्रधान मन्त्री ने शहर खाली करवाया और उसे बड़ी अच्छी तरह सजाया। सभी सुखोपभोग की सामग्री जगह जगह उपस्थिति कर दी। उन्हें लेने की सबको छुट्टी थी किसी से कोई कीमत नहीं ली जाती। कहीं मेवे मिठाइयों के भण्डार खुले हुए थे तो कहीं खेल, तमाशे हो रहे थे कहीं आराम के लिए मुलायम पलंग बिछे हुए थे तो कहीं सुन्दर वस्त्र, आभूषण मुफ्त मिल रहे थे। कोमलाँगी तरुणियाँ सेवा सुश्रूषा के लिए मौजूद थीं जगह -जगह नौकर दूध और शर्बत के गिलास लिये हुए खड़े थे। इत्रों के छिड़काव और चन्दन के पंखे बहार दे रहे थे। शहर का हर एक गली कूचा ऐसा सज रहा था मानो कोई राजमहल हो।
चुनाव के दिन सबेरे से ही राजमहल खोल दिया गया और उस सजे हुए शहर में प्रवेश करने की आज्ञा दे दी गई। नगर से बाहर खड़े हुए प्रजाजन भीतर घुसे तो वे हक्के-बक्के रह गये। मुफ्त का चन्दन सब कोई घिसने लगा। किसी ने मिठाई के भण्डार पर आसन बिछाया तो कोई सिनेमा की कुर्सियों पर जम बैठा, कोई बढ़िया बढ़िया कपड़े पहनने लगा तो किसी ने गहने पसन्द करने शुरू किये। कई तो सुन्दरियों के गले में हाथ डालकर नाचने लगे सब लोग अपनी अपनी रुचि के अनुसार सुख सामग्री का उपयोग करने लगे।
एक दिन पहले ही सब प्रजाजनों को बता दिया गया था कि राजा से मिलने का ठीक समय 10 बजे है। इसके बाद पहुँचने वाला राज का अधिकारी न हो सकेगा। शहर सजावट चन्द रोजा है, वह कल समय बाद हटा दी जायेगी एक भी आदमी ऐसा नहीं बचा था जिसे यह बातें दुहरा दुहरा कर सुना न दी गई हों, सबने कान खोलकर सुन लिया था।
शहर की सस्ती सुख सामग्री ने सब का मन ललचा लिया उसे छोड़ने को किसी का जी नहीं चाहता था। राज मिलने की बात को लोग उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे। कोई सोचता था दूसरों को चलने दो मैं उनसे आगे दौड़ जाऊँगा, कोई ऊंघ रहे थे अभी तो काफी वक्त पड़ा है, किसी का ख्याल था सामने की चीजों को ले लो, राज न मिला तो यह भी हाथ से जाएंगी, कोई तो राज मिलने की बात का मजाक उड़ाने लगे कि यह गप्प तो इसलिये उड़ाई गई है कि हम लोग सामने वाले सुखों को न भोग सकें। एक दो ने हिम्मत बाँधी और राजमहल की ओर चले भी पर थोड़ा ही आगे बढ़ने पर महल का पथरीला रास्ता और शहर के मनोहर दृश्य उनके स्वयं बाधक बन गये बेचारे उल्टे पाँव जहाँ के तहाँ लौट आये। सारा नगर उस मौज बहार में व्यस्त हो रहा था।
दस बज गये पर हजारों लाखों प्रजाजनों में से कोई वहाँ न पहुँचा। बेचारा राजा दरबार लगाये एक अकेला बैठा हुआ था। प्रधान मन्त्री मन ही मन खुश हो रहा था कि उसकी चाल कैसी सफल हुई। जब कोई न आया तो लाचार उसी राजा को पुनः राज भार सँभालना पड़ा।
यह कहानी काल्पनिक है परन्तु मनुष्य जीवन में यह बिल्कुल सच उतरती है। ईश्वर को प्राप्त करने पर हम राज्य मुक्ति अक्षय आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। उसके पाने की अवधि भी नियत हैं मनुष्य जन्म समाप्त होने पर यह अवसर हाथ से चला जाता है। संसार के मौज तमाशे थोड़े समय के हैं यह कुछ काल बाद छिन जाते हैं। सब किसी ने यह घोषणा सुन रखी है कि संसार के भोग नश्वर हैं, ईश्वर की प्राप्ति में सच्चा सुख है, प्रभु की प्राप्ति का अवसर मनुष्य जन्म में रहने तक ही है। परन्तु हममें से कितने हैं जो इस घोषणा को याद रख कर नश्वर माया के लालच में नहीं डूबे रहते?
अवसर चला जा रहा है। हम माया के भुलावे में फँस कर तुच्छ वस्तुओं को समेट रहे हैं और अक्षय सुख की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते। हमारे इस व्यवहार को देखकर प्रधान मन्त्री शैतान मन ही मन खुश हो रहा है कि मेरी चाल कैसी सफल हो रही है। यह कहानी हमारे जीवन का एक कथा चित्र है।
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1940
👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (भाग १)
जिस स्थान पर मनुष्य रहता तथा जिस शरीर से काम लेता है, उसकी नित्य सफाई करनी होती है। आहार-विहार से स्वास्थ्य संवर्धन का लाभ तभी मिल पाता है। गन्दगी बढ़ने से रोगों के कीटाणु उत्पन्न होते तथा अनेकों रोगों को जन्म देते हैं। अतएव स्वच्छता, स्वास्थ्य सन्तुलन के लिए अनिवार्य है। मन की स्वच्छता, पवित्रता शरीर से भी अधिक आवश्यक है। शरीर की भाँति मन पर भी नित्य विकारों की पर्त चढ़ती है। उनका शोधन भी जरूरी है। काम-क्रोध-लोभ-अहंकार जैसे अनेकों विकारों के कारण ही मन चिन्तित, विक्षुब्ध बना रहता है।
स्वच्छ मन में ही श्रेष्ठ विचारों का निवास होता है। वैयक्तिक अथवा सामूहिक उन्नति अथवा अवनति विचारों की उत्कृष्टता पर निर्भर करती है। स्वच्छ मन मानव जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा है। ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, स्वार्थ, पाप, व्यभिचार, अपहरण, क्रोध, अहंकार, आदि दुष्प्रवृत्तियाँ मन में बढें़ तो मनुष्य पिशाच बन जाता है। उसकी सारी क्रियाएँ और चेष्टाएँ ऐसी हो जाती हैं जिनसे उसे मनुष्य शरीर में रहते हुए भी प्रत्यक्ष असुर के रूप में देखा जा सकता है। आलस, प्रमाद, निराशा, अनुत्साह, अनियमितता, दीर्घसूत्रता, विलासिता जैसे दुर्गुण मन में जम जायें तो वह एक प्रकार से पशु ही बन जाता है। सींग, पूँछ भले ही उसके न हों पर जीवन के अपव्यय की दृष्टि से वह सब प्रकार पशु से भी अधिक घाटे में रहता है।
मन की मलीनता प्रगति के द्वार बन्द कर देती है। उससे न जम कर श्रम होता है और न पुरूषार्थ, साहस की पूँजी ही उसके पास शेष रहती है। दूषित दृष्टिकोण के कारण भीतर ही भीतर निरन्तर जलता -भुनता रहता है और अशान्ति, उद्विग्रता में घिरा रहता है। झुंझलाहट, अशिष्टता, कटुता ही उसके चेहरे और व्यवहार से टपकती है। दूसरे हर किसी को खराब बताना, सब में दोष ढूँढ़ना और उन्हें अपना शत्रु मानना ऐसा मानसिक दुर्गुण है जिसके कारण अपने भी विराने हो जाते हैं, जो लोग प्यार करते थे और सहयोग देते थे वे भी उदासीन, असन्तुष्ट और प्रतिपक्षी बन जाते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने आपको मरघट के ठूँठ करील की तरह सर्वथा एकाकी और सताया हुआ ही अनुभव करते रहते है। बेचारों की स्थिति दयनीय रहती हैं।
आलसी और अव्यवस्थित, छिन्द्रान्वेषी और उद्विग्र मनुष्य के लिये यह संसार नरक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। पापी और दुराचारी, चोर और व्यभिचारी की न लोक में प्रतिष्ठा है और न परलोक में स्थान। ऐसे लोग क्षणिक सुख की मृग-तृष्णा में भटकते और ओस चाटते फिरते है, फिर भी उन्हें सन्ताप के अतिरिक्त मिलता कुछ नही। दो घड़ी डरते काँपते कुछ ऐश कर भी लिया तो उसकी प्रति-क्रिया में चिर-अशान्ति उसके पल्ले बँध जाती है । मन की मलीनता से बढ़कर इस संसार में और कोई शत्रु नहीं है। यह पिशाचिनी भीतर ही भीतर कलेजे को चाटती रहती है और जो कुछ मानव जीवन में श्रेष्ठता है उस सबको चुपके-चुपके खा जाती है। बेचारा मनुष्य अपनी बर्बादी की इस तपेदिक को समझ भी नहीं पाता। वह बाहर ही कारणों को ढूँढ़ता रहता है, कभी इस पर कभी उस पर दोष मढ़ता रहता है और भीतर ही भीतर चलने वाली यह सत्यानाशी आरी सब कुछ चीर डालती है। उन्नति, प्रगति, शान्ति, स्नेह, आत्मीयता, प्रसन्नता जैसे लाभ जो उसे मन के स्वच्छ होने पर सहज ही मिल सकते थे, उसके लिए एक असंभव जैसी चीज बने रहते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
स्वच्छ मन में ही श्रेष्ठ विचारों का निवास होता है। वैयक्तिक अथवा सामूहिक उन्नति अथवा अवनति विचारों की उत्कृष्टता पर निर्भर करती है। स्वच्छ मन मानव जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा है। ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, स्वार्थ, पाप, व्यभिचार, अपहरण, क्रोध, अहंकार, आदि दुष्प्रवृत्तियाँ मन में बढें़ तो मनुष्य पिशाच बन जाता है। उसकी सारी क्रियाएँ और चेष्टाएँ ऐसी हो जाती हैं जिनसे उसे मनुष्य शरीर में रहते हुए भी प्रत्यक्ष असुर के रूप में देखा जा सकता है। आलस, प्रमाद, निराशा, अनुत्साह, अनियमितता, दीर्घसूत्रता, विलासिता जैसे दुर्गुण मन में जम जायें तो वह एक प्रकार से पशु ही बन जाता है। सींग, पूँछ भले ही उसके न हों पर जीवन के अपव्यय की दृष्टि से वह सब प्रकार पशु से भी अधिक घाटे में रहता है।
मन की मलीनता प्रगति के द्वार बन्द कर देती है। उससे न जम कर श्रम होता है और न पुरूषार्थ, साहस की पूँजी ही उसके पास शेष रहती है। दूषित दृष्टिकोण के कारण भीतर ही भीतर निरन्तर जलता -भुनता रहता है और अशान्ति, उद्विग्रता में घिरा रहता है। झुंझलाहट, अशिष्टता, कटुता ही उसके चेहरे और व्यवहार से टपकती है। दूसरे हर किसी को खराब बताना, सब में दोष ढूँढ़ना और उन्हें अपना शत्रु मानना ऐसा मानसिक दुर्गुण है जिसके कारण अपने भी विराने हो जाते हैं, जो लोग प्यार करते थे और सहयोग देते थे वे भी उदासीन, असन्तुष्ट और प्रतिपक्षी बन जाते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने आपको मरघट के ठूँठ करील की तरह सर्वथा एकाकी और सताया हुआ ही अनुभव करते रहते है। बेचारों की स्थिति दयनीय रहती हैं।
आलसी और अव्यवस्थित, छिन्द्रान्वेषी और उद्विग्र मनुष्य के लिये यह संसार नरक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। पापी और दुराचारी, चोर और व्यभिचारी की न लोक में प्रतिष्ठा है और न परलोक में स्थान। ऐसे लोग क्षणिक सुख की मृग-तृष्णा में भटकते और ओस चाटते फिरते है, फिर भी उन्हें सन्ताप के अतिरिक्त मिलता कुछ नही। दो घड़ी डरते काँपते कुछ ऐश कर भी लिया तो उसकी प्रति-क्रिया में चिर-अशान्ति उसके पल्ले बँध जाती है । मन की मलीनता से बढ़कर इस संसार में और कोई शत्रु नहीं है। यह पिशाचिनी भीतर ही भीतर कलेजे को चाटती रहती है और जो कुछ मानव जीवन में श्रेष्ठता है उस सबको चुपके-चुपके खा जाती है। बेचारा मनुष्य अपनी बर्बादी की इस तपेदिक को समझ भी नहीं पाता। वह बाहर ही कारणों को ढूँढ़ता रहता है, कभी इस पर कभी उस पर दोष मढ़ता रहता है और भीतर ही भीतर चलने वाली यह सत्यानाशी आरी सब कुछ चीर डालती है। उन्नति, प्रगति, शान्ति, स्नेह, आत्मीयता, प्रसन्नता जैसे लाभ जो उसे मन के स्वच्छ होने पर सहज ही मिल सकते थे, उसके लिए एक असंभव जैसी चीज बने रहते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 Accumulate Strength
Life is a sort of a continuum of struggles of varied intensities and types. One has to fight with diverse, unfavorable situations and troubles every moment. The success of life is in proceeding ahead against all odds. This seems to be the case with the life cycle of every living being; despite enormous gifts of Nature, there also appear enemies and hardships all around in one form or the other. “Survival of the fittest” is a bitter truth in this world. The weaker is a prey to the stronger; big fishes eat the tiny ones; Sparrows eat insects; Hawks eat sparrows and so on… Huge trees grab the food of the small plants around; the rich men exploit the poor; the mightier rule over the meek.
What do these live-examples teach us? If we do not want to let ourselves ruined by adversities and want to live with dignity, we must be alert and eliminate our weaknesses. We should at least have that much (inner) strength that no one would ruin us just like that; we should at least have the courage, vigor and mental power to fight for our genuine rights and work for moral rise.
Before entering the worldly life, we must know this secret that only the awakened, aware, strong (independent), confident and wise enjoy esteemed success here.
📖 Akhand Jyoti, Aug. 1945
What do these live-examples teach us? If we do not want to let ourselves ruined by adversities and want to live with dignity, we must be alert and eliminate our weaknesses. We should at least have that much (inner) strength that no one would ruin us just like that; we should at least have the courage, vigor and mental power to fight for our genuine rights and work for moral rise.
Before entering the worldly life, we must know this secret that only the awakened, aware, strong (independent), confident and wise enjoy esteemed success here.
📖 Akhand Jyoti, Aug. 1945
👉 विवेकहीन अन्धानुकरण
अंग्रेजों की आमदनी बहुत थी वे मनचाहा खर्च कर सकते थे। वे अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा के लिए इस गरम देश में रहकर भी अपने ठण्डे मुल्क की पोशाक पहनते थे, हिन्दुस्तानी भाषा जानते हुए भी अपनी मातृ भाषा में बोलने में ही गौरव अनुभव करते थे। उन्होंने अपने को श्रेष्ठ समझा और अपनी दृढ़ता से दूसरे की कमजोरी को प्रभावित किया। एक हम हैं जो उनकी दृढ़ता देश भक्ति ,स्वाभिमान एवं विशेषताओं को तो छू भी न सके उलटे बन्दर की तरह नकल बनाने लगे अपनी भाषा, संस्कृति, पोशाक, आहार, परम्परा आदि को तिलाञ्जलि देकर हमने पाया कुछ नहीं समझदार लोगों की आँखों में उपहासास्पद बने और खर्च भी बढ़ा लिये।
अब अंग्रेज भारत में नहीं हैं राजनैतिक गुलामी से भी छुटकारा मिल गया पर काले अंग्रेज अभी भी उनकी सांस्कृतिक गुलामी को गले में लपेटे बैठे हैं और इसी दुर्बुद्धि है कि भारतीय परम्पराओं के अनुरूप जीवन क्रम रखने की अपेक्षा अंग्रेजी परम्पराओं के अनुरूप वेश विन्यास एवं ढंग ढाँचा बनाना कहीं अधिक खर्चीला है और इतना खर्चीला ढोंग जो कोई भी बनावेगा दरिद्रता का अभिशाप उसे घेरे ही रहेगा। नक्कालों की हर जगह हँसी उड़ाई जाती है। साँस्कृतिक नकलची जहाँ आर्थिक तंगी में घिरे रहते हैं वहाँ हर समझदार की दृष्टि में परले सिरे के मूर्ख भी माने जाते हैं। हमें इस खर्चीले मूर्खता से बचकर भारतीय रहन−सहन अपनाये रहना चाहिए। हर शिक्षित को इस ओर अधिक ध्यान देना चाहिए क्योंकि शिक्षा के कारण उनकी बढ़ी हुई आमदनी को भी यही नकलची प्रवृत्ति बरबाद करती रहती है।
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अब अंग्रेज भारत में नहीं हैं राजनैतिक गुलामी से भी छुटकारा मिल गया पर काले अंग्रेज अभी भी उनकी सांस्कृतिक गुलामी को गले में लपेटे बैठे हैं और इसी दुर्बुद्धि है कि भारतीय परम्पराओं के अनुरूप जीवन क्रम रखने की अपेक्षा अंग्रेजी परम्पराओं के अनुरूप वेश विन्यास एवं ढंग ढाँचा बनाना कहीं अधिक खर्चीला है और इतना खर्चीला ढोंग जो कोई भी बनावेगा दरिद्रता का अभिशाप उसे घेरे ही रहेगा। नक्कालों की हर जगह हँसी उड़ाई जाती है। साँस्कृतिक नकलची जहाँ आर्थिक तंगी में घिरे रहते हैं वहाँ हर समझदार की दृष्टि में परले सिरे के मूर्ख भी माने जाते हैं। हमें इस खर्चीले मूर्खता से बचकर भारतीय रहन−सहन अपनाये रहना चाहिए। हर शिक्षित को इस ओर अधिक ध्यान देना चाहिए क्योंकि शिक्षा के कारण उनकी बढ़ी हुई आमदनी को भी यही नकलची प्रवृत्ति बरबाद करती रहती है।
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 पचास फीसदी दुख अभी खत्म हो जाएं
'शांति चाहिए। इसके लिए मैं क्या करूं? 'कुछ मत करो, बल्कि जो कर रहे हो उसे बंद कर दो, शांति आ जाएगी।' बतौर उदाहरण आप झूले पर झूल रहे हो और पैर से टेका लगाना बंद कर दो, झूला अपने आप थम जाएगा। शांतिमय जीवन के लिए जरूरी है कि व्यक्ति हर हाल में मस्त रहने की कला सीख ले। जो नहीं मिला, उसके लिए प्रभु से शिकायत मत करो कि तूने मुझे औरों से कम दिया है, बल्कि इस बात के लिए उसे धन्यवाद दो कि उसने तुझे तेरी काबलियत से भी अधिक दिया है। अगर व्यक्ति इस तथ्य को स्वीकार कर ले कि 'जो भी दे-दे मालिक, तू कर ले कबूल, कभी-कभी कांटो में भी खिलते हैं फूल' तो उसके पचास फीसदी दुख आज और अभी खत्म हो जाएं।
जीवन की सफलता यह नहीं कि आप कितने खुश हैं? बल्कि जीवन की सफलता यह है कि लोग आपसे कितने खुश हैं। लोगों को क्षमा करते और अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगते चलिए, जीवन की सफलता आपको नजर आने लगेगी।
जीवन की सफलता यह नहीं कि आप कितने खुश हैं? बल्कि जीवन की सफलता यह है कि लोग आपसे कितने खुश हैं। लोगों को क्षमा करते और अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगते चलिए, जीवन की सफलता आपको नजर आने लगेगी।
शुक्रवार, 10 जुलाई 2020
👉 कर्तव्य पालन की साधना।
कौशिक नामक एक ब्राह्मण बड़ा तपस्वी था। तप के प्रभाव से उसमें बहुत आत्म बल आ गया था। एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था कि ऊपर बैठी हुई चिड़िया ने उस पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आ गया। लाल नेत्र करके ऊपर को देखा तो तेज के प्रभाव से चिड़िया जल कर नीचे गिर पड़ी। ब्राह्मण को अपने बल पर गर्व हो गया।
दूसरे दिन वह एक सद् गृहस्थ के यहाँ भिक्षा माँगने गया। गृहिणी पति को भोजन परोसने में लगी थी। उसने कहा-भगवान थोड़ी देर ठहरें अभी आपको भिक्षा दूँगी। इस पर ब्राह्मण को क्रोध आया कि मुझ जैसे तपस्वी की उपेक्षा करके यह पति सेवा को अधिक महत्व दे रही है। गृह स्वामिनी ने दिव्य दृष्टि से सब बात जान ली। उसने ब्राह्मण से कहा-क्रोध न कीजिए मैं चिड़िया नहीं हूँ। अपना नियत कर्तव्य पूरा करने पर आपकी सेवा करूँगी।
ब्राह्मण क्रोध करना तो भूल गया, उसे यह आश्चर्य हुआ कि चिड़िया वाली बात इसे कैसे मालूम हुई? ब्राह्मणी ने इसे पति सेवा का फल बताया और कहा कि इस संबंध में अधिक जानना हो तो मिथिला पुरी में तुलाधार वैश्य के पास जाइए। वे आपको अधिक बता सकेंगे।
भिक्षा लेकर कौशिक चल दिया और मिथिलापुरी में तुलाधार के घर जा पहुँचा। वह तौल नाप के व्यापार में लगा हुआ था। उसने ब्राह्मण को देखते ही प्रणाम अभिवादन किया ओर कहा-तपोधन कौशिक देव! आपको उस सद्गृहस्थ गृह स्वामिनी ने भेजा है सो ठीक है। अपना नियत कर्म कर लू तब आपकी सेवा करूँगा कृपया थोड़ी देर बैठिये। ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बिना बताये ही इसने मेरा नाम तथा आने का उद्देश्य कैसे जाना? थोड़ी देर में जब वैश्य अपने कार्य से निवृत्त हुआ तो उसने बताया कि मैं ईमानदारी के साथ उचित मुनाफ़ा लेकर अच्छी चीजें लोकहित की दृष्टि से बेचता हूँ। इस नियत कर्म को करने से ही मुझे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है। अधिक जानना हो तो मगध के निजात चाण्डाल के पास जाइए।
कौशिक मगध चल दिया और चाण्डाल के यहाँ पहुँचा। वह नगर की गंदगी झाड़ने में लगा हुआ था। ब्राह्मण को देखकर उसने साष्टांग प्रणाम किया और कहा-भगवान आप चिड़िया मारने जितना तप करके उस सद्गृहस्थ देवी और तुलाधार वैश्य के यहाँ होते हुए यहाँ पधारे यह मेरा सौभाग्य है। मैं नियत कर्म कर लू, तब आपसे बात करूँगा तब तक आप विश्राम कीजिए।
चाण्डाल जब सेवा वृत्ति से निवृत्त हुआ तो उन्हें संग ले गया और अपने वृद्ध माता पिता को दिखाकर कहा अब मुझे इनकी सेवा करनी है। मैं नियत कर्तव्य कर्मों में निरंतर लगा रहता हूँ इसी से मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है।
तब कौशिक की समझ में आया कि केवल तप साधना से ही नहीं, नियत कर्तव्य कर्म निष्ठा पूर्व करते रहने से भी आध्यात्मिक लक्ष’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती हैं।
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1961
बुधवार, 8 जुलाई 2020
👉 कलह से दरिद्रता
एक बहुत धनवान् व्यक्ति के यहाँ चार बेटों की चार बहुएँ आई। वे बड़े उग्र और असहिष्णु स्वभाव की थीं, आपस में रोज ही लड़ती। दिन-रात गृह-कलह ही मचा रहता। इससे खिन्न होकर लक्ष्मी जी ने वहाँ से चले जाने की ठानी। रात को लक्ष्मी ने उस सेठ को स्वप्न दिया कि अब मैं जा रही हूँ। यह कलह मुझसे नहीं देखा जाता। जहाँ ऐसे लड़ने झगड़ने वाले लोग रहते हैं वहाँ मैं नहीं रह सकती।
सेठ बहुत गिड़गिड़ाकर रोने लगा, लक्ष्मी के पैरों से लिपट गया और कहा मैं आपका अनन्य भक्त रहा हूँ। मुझे छोड़कर आप जावे नहीं। लक्ष्मी को उस पर दया आई और कहा-कलह के स्थान पर मेरा ठहर सकना तो संभव नहीं। ऐसी स्थिति में अब मैं तेरे घर तो किसी भी प्रकार न रहूँगी पर और कुछ तुझे माँगना हो तो एक वरदान मुझ से माँग ले।
सेठ बहुत गिड़गिड़ाकर रोने लगा, लक्ष्मी के पैरों से लिपट गया और कहा मैं आपका अनन्य भक्त रहा हूँ। मुझे छोड़कर आप जावे नहीं। लक्ष्मी को उस पर दया आई और कहा-कलह के स्थान पर मेरा ठहर सकना तो संभव नहीं। ऐसी स्थिति में अब मैं तेरे घर तो किसी भी प्रकार न रहूँगी पर और कुछ तुझे माँगना हो तो एक वरदान मुझ से माँग ले।
धनिक ने कहा-अच्छा माँ यही सही। आप यह वरदान दें कि मेरे घर के सब लोगों में प्रेम और एकता बनी रहे। लक्ष्मी ने ‘एवमस्तु’ कह कर वही वरदान दे दिया और वहाँ से चली गई। दूसरे दिन से ही सब लोग प्रेम पूर्वक रहने लगे और मिल-जुल कर सब काम करने लगे।
एक दिन धनिक ने स्वप्न में देखा कि लक्ष्मी जी घर में फिर वापिस आ गई हैं। उसने उन्हें प्रणाम किया और पुनः पधारने के लिए धन्यवाद दिया। लक्ष्मी ने कहा-इसमें धन्यवाद की कोई बात नहीं है। मेरा उसमें कुछ अनुग्रह भी नहीं है। जहाँ एकता होती है और प्रेम रहता हूँ वहाँ तो मैं बिना बुलाये ही जा पहुँचती हूँ।
जो लोग दरिद्रता से बचना चाहते हैं और घर से लक्ष्मी को नहीं जाने देना चाहते उन्हें अपने घर में कलह की परिस्थितियाँ उत्पन्न नहीं होने देनी चाहिए।
👉 ममता हटाने पर ही चित्त शुद्ध होगा (अंतिम भाग)
वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आकर्षण ही वासनाओं को जन्म देता है। इस आकर्षण का कारण है वस्तुओं को बहुत महत्व देना। जब मानव जीवन की सुख शाँति का हेतु वस्तुओं की प्राप्ति मान लिया जाता है तब उनका महत्व अनावश्यक रूप से बढ़ जाता है। मनुष्य अपनी भ्राँत मान्यता के वशीभूत होकर वस्तुओं के संग्रह में निरत हो जाता है। वह उन्हें पाने में कर्तव्य का भी बोध खो देता है। एक वस्तु पाने के बाद दूसरी पाने की लालसा में प्रयत्न करता हुआ स्वाभाविक जीवन से भटक कर अस्वाभाविक जीवन की ओर चला जाता है, जिससे संघर्ष अशांति तथा अतृप्ति की वृद्धि हो जाती है। ऐसी दशा में चित्त का शुद्ध रहना सम्भव नहीं हो सकता।
जिनको पाने और इकट्ठा करने में मनुष्य अपना सारा जीवन ही यापन कर डालता है, यदि उन वस्तुओं में सुख एवं सन्तुष्टि होती तो कोई एक वस्तु की कामना न रहती । सुख में खण्ड नहीं होते वह अखण्ड एवं पूर्ण होता है। वह जिसमें रहता है पूर्ण एवं अखण्ड रूप में रहता है अन्यथा बिल्कुल नहीं रहता। एक वस्तु से तृप्त न होकर दूसरी के लिए लालायित रहना इस बात का प्रमाण है कि सच्चा सुख, सन्तुष्टि वस्तुओं में नहीं है। इस लिए उसके लिए उनका संग करना असंगत एवं अस्वाभाविक है जो कि चित्त की अशुद्धि का विशेष कारण बनती है।
चित्त की शुद्धि के लिये वस्तुओं से असंग रहना आवश्यक है। वह हर चीज इन अर्थों में वस्तु ही कही जायेगी जो नश्वर एवं परिवर्तनशील है। आवश्यकतानुसार निर्मोह के साथ संसार की वस्तुओं का उपयोग करते हुए अवनिश्वर आत्मा के प्रति आकर्षित रहना ही वस्तुओं का असंग कहा गया है। वस्तुओं के साथ असंग रहने की स्थिति में मनुष्य में माया, मोह, ममता, लोभ तथा अहंकार की वे विकृतियाँ उत्पन्न नहीं होने पाती जो कि चित्त की अशुद्धता अथवा मल कही गई है। इन विकृतियों के अभाव में चित्त शुद्ध, शान्त एवं स्थिर रहता है जिससे एक शाश्वत, सात्विक तथा अनिवर्चनीय प्रसन्नता प्राप्त होती है और यही प्रसन्नता मानव जीवन का लक्ष्य एवं उद्देश्य है।
निःसन्देह इस नश्वर संसार में रहते हुए और नश्वर वस्तुओं की आवश्यकता होने पर उनसे संग होना असम्भव नहीं, किन्तु आवश्यकता जन्य संग व्यवहारिक है, स्थायी अथवा सार्वजनिक नहीं है। मनुष्य का सार्वजनिक सम्बन्ध तो उसकी अपनी उस आत्मा से है जिसका कभी न तो नाश होता है और न जिसमें कभी कोई विकार ही उत्पन्न होता है। संग करते हुये भी वस्तुओं से असंग रहने की कला का अभ्यास कर लेने वाले अपने चित्त को शुद्ध करके शाश्वत सुख शान्ति एवं सन्तोष के अधिकारी बनते हैं।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.12
जिनको पाने और इकट्ठा करने में मनुष्य अपना सारा जीवन ही यापन कर डालता है, यदि उन वस्तुओं में सुख एवं सन्तुष्टि होती तो कोई एक वस्तु की कामना न रहती । सुख में खण्ड नहीं होते वह अखण्ड एवं पूर्ण होता है। वह जिसमें रहता है पूर्ण एवं अखण्ड रूप में रहता है अन्यथा बिल्कुल नहीं रहता। एक वस्तु से तृप्त न होकर दूसरी के लिए लालायित रहना इस बात का प्रमाण है कि सच्चा सुख, सन्तुष्टि वस्तुओं में नहीं है। इस लिए उसके लिए उनका संग करना असंगत एवं अस्वाभाविक है जो कि चित्त की अशुद्धि का विशेष कारण बनती है।
चित्त की शुद्धि के लिये वस्तुओं से असंग रहना आवश्यक है। वह हर चीज इन अर्थों में वस्तु ही कही जायेगी जो नश्वर एवं परिवर्तनशील है। आवश्यकतानुसार निर्मोह के साथ संसार की वस्तुओं का उपयोग करते हुए अवनिश्वर आत्मा के प्रति आकर्षित रहना ही वस्तुओं का असंग कहा गया है। वस्तुओं के साथ असंग रहने की स्थिति में मनुष्य में माया, मोह, ममता, लोभ तथा अहंकार की वे विकृतियाँ उत्पन्न नहीं होने पाती जो कि चित्त की अशुद्धता अथवा मल कही गई है। इन विकृतियों के अभाव में चित्त शुद्ध, शान्त एवं स्थिर रहता है जिससे एक शाश्वत, सात्विक तथा अनिवर्चनीय प्रसन्नता प्राप्त होती है और यही प्रसन्नता मानव जीवन का लक्ष्य एवं उद्देश्य है।
निःसन्देह इस नश्वर संसार में रहते हुए और नश्वर वस्तुओं की आवश्यकता होने पर उनसे संग होना असम्भव नहीं, किन्तु आवश्यकता जन्य संग व्यवहारिक है, स्थायी अथवा सार्वजनिक नहीं है। मनुष्य का सार्वजनिक सम्बन्ध तो उसकी अपनी उस आत्मा से है जिसका कभी न तो नाश होता है और न जिसमें कभी कोई विकार ही उत्पन्न होता है। संग करते हुये भी वस्तुओं से असंग रहने की कला का अभ्यास कर लेने वाले अपने चित्त को शुद्ध करके शाश्वत सुख शान्ति एवं सन्तोष के अधिकारी बनते हैं।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.12
👉 Reality of Love
The roots of real love lie deep within the soul. Linking it with the Supreme Soul (God) makes is an eternal source of unlimited, unalloyed bliss. What we often regard as love is, in one form or the other, an affection or attachment with the people or things which we feel as our own. But this binding, howsoever strong that may be, with the perishable entities, of this ever-changing world can’t be long lasting or consistently blissful. The instances of change like – demise of near and dear ones, separation from the beloved, loss of hard-earned prosperity, or tainting of self-prestige, etc break one’s heart; the same world which used to be so loving, appears an ocean of dole and depression in these tragic moments. This demonstrates that the bounds and strength of ‘worldly love’ are no more stable or stronger than a castle of sand. Love with the mortal beings, with the momentary things of this world is therefore not true love. True love is a perennial source of limitless joy… How can it ever be a cause of sorrow?
True love is a spiritual feeling, which surrenders the individual self in the Divine Supreme Self. The individual self, the soul is immortal, sublime, consciousness force, so its love could only be with the sachchidanand (eternal, omnipresent, everenlightening,
ever-blissful) – Supreme Soul.
📖 Akhand Jyoti, July 1945
True love is a spiritual feeling, which surrenders the individual self in the Divine Supreme Self. The individual self, the soul is immortal, sublime, consciousness force, so its love could only be with the sachchidanand (eternal, omnipresent, everenlightening,
ever-blissful) – Supreme Soul.
📖 Akhand Jyoti, July 1945
👉 सबका प्रिय बनना है तो...
क्रोध तो दूध का एक उबाल है। जब तक आग रहेगी जब तक दूध उबलेगा लेकिन जब आग ठंडी पड़ जाएगी तो दूध भी बैठ जाएगा। अपेक्षा की उपेक्षा क्रोध है। आप किसी से अपेक्षा रखते हैं और जब उसकी उपेक्षा होती है तो क्रोध आता है। अपेक्षा ही मत रखिए तो फिर आपको कोई भी आपको क्रोध नहीं दिला सकता।
क्रोध जहर है तो क्षमा अमृत है। क्षमा आदत में हो और क्षमा की आदत हो तो जीवन में खुशियां ही खुशियां है । अगर आदमी दिमाग की गर्मी हटाए और जुबान में नरमी लाए तो परिवार में बल्ले-बल्ले हो जाए। मनुष्य समाज में जीता है। सबके साथ सबके बीच में रहता है। अगर उसे सभी का प्रिय बनना है तो वह नम्र बने, बड़ों के सामने झुकना सीखे, अहंकार के हिमालय से उतर कर विनम्रता की कार में सवारी करना सीखे। हर टक्कर अंतत लौटकर उस पर ही हमला करती है। अत: गलती होने पर परस्पर में क्षमा याचना करते चलें।
क्रोध जहर है तो क्षमा अमृत है। क्षमा आदत में हो और क्षमा की आदत हो तो जीवन में खुशियां ही खुशियां है । अगर आदमी दिमाग की गर्मी हटाए और जुबान में नरमी लाए तो परिवार में बल्ले-बल्ले हो जाए। मनुष्य समाज में जीता है। सबके साथ सबके बीच में रहता है। अगर उसे सभी का प्रिय बनना है तो वह नम्र बने, बड़ों के सामने झुकना सीखे, अहंकार के हिमालय से उतर कर विनम्रता की कार में सवारी करना सीखे। हर टक्कर अंतत लौटकर उस पर ही हमला करती है। अत: गलती होने पर परस्पर में क्षमा याचना करते चलें।
सोमवार, 6 जुलाई 2020
👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (अंतिम भाग)
एक घंटा समय किस कार्य में लगाया जाय? इसका उत्तर यही है- ‘जन जागृति में’-विचार क्रान्ति का अलख जगाने में। बौद्धिक कुण्ठा ही राष्ट्रीय अवसाद का एकमात्र कारण है। भावनाएं जग पड़े तो सब ओर जागृति ही जागृति होगी। सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश दृष्टिगोचर होगा। अन्तःकरण न जगे तो बाहरी हलचलें कुछ ही दिन चमक कर बुझ जाती हैं। जो भीतर से प्रकाशवान है वह आँधी तूफान में भी ज्योतिर्मय बना रहता है, इसलिये हमें दीपक से दीपक जलाने की धर्म परम्परा प्रचलित करने के लिये अपने समय दान का सदुपयोग करना चाहिये। अपने मित्रों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों, परिचित-अपरिचितों के नामों में से छाँटकर एक लिस्ट ऐसे लोगों की बनानी चाहिये जिनमें विचारशीलता एवं सद्भावना के बीजाँकुर पहले से ही किसी अंश में मौजूद हैं। उन लोगों से संपर्क बनाकर उन तक नव निर्माण की प्रौढ़ विचारधारा पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिये। इस अभिनव ज्ञान दान द्वारा हम उन स्वजनों की सच्ची सेवा करते हैं। भाव जागृति द्वारा किसी व्यक्ति में उत्कृष्टता उत्पन्न कर देना ऐसा परोपकार है जिससे बढ़कर और कुछ अनुदान दिया ही नहीं जा सकता। राष्ट्र की तीन आवश्यकताएं नैतिक, क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति का सूत्रपात यहीं से होता है। भाव जागृति के बिना मानव जाति की कुण्ठाओं और विकृतियों को और किसी प्रकार दूर नहीं किया जा सकता।
लिस्ट में अंकित व्यक्ति प्रथम बार में भी कम से कम दस तो होने ही चाहिये। उनके पास जाने एवं संपर्क बनाने की पहल अपने को ही करनी चाहिये। मीटिंग में जिन्हें बुलाया जाता है, उन आने वालों का अपने ऊपर अहसान होता है और जिनके घर हम स्वयं जाते हैं वे हमारी सद्भावना से प्रभावित होते हैं। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को हमें समझ ही लेना चाहिये। इसलिये जिन्हें प्रेरणा देनी हो, उनके पास स्वयं जाने का क्रम बनाना ही होगा। मीटिंग में इकट्ठे करने से यह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता। धर्म फेरी का पुण्य हमें ही लेना चाहिये। जन-जागरण के लिए लोगों से संपर्क बनाने एवं उनके घरों पर जाने का क्रम हमें ही बनाना चाहिये।
जिनके घर जाया जाय उनसे कुशल क्षेम पूछने के साधारण शिष्टाचार के उपरान्त अभीष्ट उद्देश्य के लिये आवश्यक प्रेरणा देनी आरंभ कर देनी चाहिये। जो पढ़े-लिखे हैं उन्हें अपनी अखण्ड-ज्योति व युग निर्माण योजना के पिछले अंक पढ़ने को देना चाहिये। जो पढ़े नहीं हैं उन्हें प्रेरणाप्रद लेख, समाचार एवं प्रसंग सुनाने चाहिये। अवसर हो तो उन विषयों पर चर्चा भी आरंभ करनी चाहिये। पुरानी अखण्ड-ज्योति की प्रतियाँ युग निर्माण योजना के अंक सभी के पास होंगे, उनके ऊपर अच्छे मोटे कवर चढ़ा चिपका लेने चाहिये ताकि अनेक लोगों में पढ़े जाने पर वे खराब न हों। आदर्शवादी विचार आमतौर से रूखे और नीरस माने जाते हैं। उन्हें पढ़ना, सुनना बहुत कम लोग पसंद करते हैं। यह काम अपना है कि विषय की महानता एवं गरिमा को आकर्षक तथा प्रभावशाली ढंग से समझा कर लोगों में यह अभिरुचि उत्पन्न करें। व्यापक दृष्टिकोण को समझने और विचारने की आकांक्षा जब जागृत हो जाय तब समझना चाहिये कि यह व्यक्ति राष्ट्र के लिये कुछ उपयोगी सिद्ध हो सकने की स्थिति में पहुँचा। इतनी सफलता मिल जाने पर आगे की प्रगति बहुत सरल हो जाती है। जिसके मनोभाव सोये पड़े हैं उसमें विचारशीलता की अभिरुचि जागृत कर देना हमारे लिये भारी गौरव, गर्व एवं संतोष की बात होगी।
गुरु पूर्णिमा पर्व पर (जो रविवार 5 जुलाई सन् 2020 को पड़ेगा) गुरु दक्षिणा में देने के लिए इस वर्ष हमें एक घंटा समय और एक रुपया प्रतिदिन दान करने का व्रत लेना चाहिए। एक रुपया प्रतिदिन देने से एक महीने में 30 होता है। वर्ष भर में 365 रुपये होते है। 220 की अखण्ड-ज्योति 110 की युग-निर्माण योजना आती है। यह खर्च भी हमें नव-निर्माण के लिए करना ही चाहिए। यह पैसे बाहर किसी को देने नहीं हैं। वरन् इन्हें अत्यन्त सस्ते लागत से भी कम मूल्य में मिलने वाले सत्साहित्य के रूप में परिणित कर लेना है। यह अमानत अपने ही पास जमा रहती है। भण्डार बढ़ता रहेगा और उसका लाभ अब से लेकर आगामी पचास सौ वर्ष तक अनेक लोग उठाते रहेंगे। विवेक सम्पन्न दान का यह सर्वश्रेष्ठ तरीका है। छोटे बच्चे भी आमतौर से स्कूल जाते समय एक आना जेब खर्च ले जाते हैं। समझना चाहिए कि युग-निर्माण अभियान भी हमारा एक बच्चा है। चाहे तो ऐसा भी मान सकते हैं कि आचार्य जी हमारे एक बच्चे हैं और उन्हें एक आना प्रतिदिन जेब खर्च के लिए दिया जाता है। मन को समझाने के हजार प्रकार हो सकते हैं। भावना यदि विद्यमान हो तो इतना खर्च कर सकना गरीब से गरीब के लिए भी भारी नहीं पड़ता। एक आने का अनाज तो हर घर में चूहे, कीड़े भी खा जाते हैं। इतना तो सभी को सहन करना पड़ता है। भावना जाग पड़े तो इतना छोटा खर्च भी क्या किसी को भारी पड़ेगा।
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रबुद्ध सदस्यों को इस गुरु पूर्णिमा से यह व्रत लेना चाहिये। एक घण्टा समय, एक आना नकद, यह त्याग कुछ इतना बड़ा नहीं है, जिसे लक्ष्य की महानता को देखते हुए, कर सकना हमारे लिए कठिन होना चाहिये। नियमितता में बड़ी शक्ति होती है। महीने में 30 घण्टे यदि जन संपर्क के लिए सुरक्षित रख लिये जायें और प्रतिदिन या साप्ताहिक अवकाश के दिन उन्हें ठीक तरह प्रचार कार्य में लगाया जाय तो इसका चमत्कारी परिणाम कितना महान होता है इसे कोई भी प्रत्यक्ष देख सकता है। दान अनेक प्रकार करने पड़ते हैं पर यह प्रेरक साहित्य संग्रह करने के लिए किया गया साहस विश्व मानव का भाग्य बदलने के लिए कितना उपयोगी सिद्ध होता है इसे कुछ ही दिनों में मूर्तिमान देखा जा सकेगा।
आगे हमें बहुत कुछ करना है। अनैतिकता, मूढ़ता, अन्ध परम्परा, अस्वस्थता, अशिक्षा, दरिद्रता, अकर्मण्यता आदि अगणित विकृतियों से डटकर लोहा लेना है। हमारा देश किसी समय सर्वश्रेष्ठ मानवों का निवास स्थान, समस्त संसार का मार्ग दर्शक, देवलोक के लिये भी स्पर्धा का विषय माना जाता था। पर इन्हीं कुरीतियों, हानिकारक अन्ध परम्पराओं के कारण आज वह निकृष्ट, दीन−हीन स्थिति को प्राप्त हो गया है। यदि हमको इस दुरावस्था से बाहर निकल फिर दुनिया के प्रगतिशील देशों की श्रेणी में अपनी गणना करानी है तो हमको अवश्य ही इन हीन प्रवृत्तियों से छुटकारा पाना चाहिये। उसके लिए अगले दिनों व्यापक योजनाएं बनाई जानी हैं और उन्हें कार्य रूप में परिणित किया जाना है। पर इसके लिए आवश्यक जन-शक्ति तो अपने पास होनी चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति हमारी यह प्रथम प्रक्रिया ही पूर्ण करेगी। एक घण्टा समय, एक आना नकद की माँग को पूरा करने के लिए यदि हम साहस कर सकें तो इस अवसर पर बढ़ा हुआ शौर्य आगे की कठिन मंजिलों को भी पार कर सकने में समर्थ होगा। पर यदि इतना भी न बन पड़ा तो हमारी वाक्शूरता ऊसर में डाले गये बीज की तरह ही नपुंसक सिद्ध होगी।
अब समय कम ही रह गया है। इसलिए आज से ही विचारना आरम्भ कीजिए कि इस पुण्य पर्व के उपलक्ष में उपरोक्त प्रथम आवश्यकता की पूर्ति के लिये ‘एक घण्टा एक आना’ की माँग पूरी करेंगे क्या? यदि कर सके तो उसकी सूचना गुरुपूर्णिमा को श्रद्धाञ्जलि के रूप में समय से पूर्व ही भेज दें ताकि उस दिन उन्हें छाती से लगाकर अपार आनन्द प्राप्त किया जा सके।
आगामी गुरु पूर्णिमा हमारी परीक्षा लेने आ रही है। क्या करना है, क्या करेंगे, इसका निर्णय करने के लिये अभी से सोच विचार आरम्भ कर देना चाहिये।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 50, 51
लिस्ट में अंकित व्यक्ति प्रथम बार में भी कम से कम दस तो होने ही चाहिये। उनके पास जाने एवं संपर्क बनाने की पहल अपने को ही करनी चाहिये। मीटिंग में जिन्हें बुलाया जाता है, उन आने वालों का अपने ऊपर अहसान होता है और जिनके घर हम स्वयं जाते हैं वे हमारी सद्भावना से प्रभावित होते हैं। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को हमें समझ ही लेना चाहिये। इसलिये जिन्हें प्रेरणा देनी हो, उनके पास स्वयं जाने का क्रम बनाना ही होगा। मीटिंग में इकट्ठे करने से यह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता। धर्म फेरी का पुण्य हमें ही लेना चाहिये। जन-जागरण के लिए लोगों से संपर्क बनाने एवं उनके घरों पर जाने का क्रम हमें ही बनाना चाहिये।
जिनके घर जाया जाय उनसे कुशल क्षेम पूछने के साधारण शिष्टाचार के उपरान्त अभीष्ट उद्देश्य के लिये आवश्यक प्रेरणा देनी आरंभ कर देनी चाहिये। जो पढ़े-लिखे हैं उन्हें अपनी अखण्ड-ज्योति व युग निर्माण योजना के पिछले अंक पढ़ने को देना चाहिये। जो पढ़े नहीं हैं उन्हें प्रेरणाप्रद लेख, समाचार एवं प्रसंग सुनाने चाहिये। अवसर हो तो उन विषयों पर चर्चा भी आरंभ करनी चाहिये। पुरानी अखण्ड-ज्योति की प्रतियाँ युग निर्माण योजना के अंक सभी के पास होंगे, उनके ऊपर अच्छे मोटे कवर चढ़ा चिपका लेने चाहिये ताकि अनेक लोगों में पढ़े जाने पर वे खराब न हों। आदर्शवादी विचार आमतौर से रूखे और नीरस माने जाते हैं। उन्हें पढ़ना, सुनना बहुत कम लोग पसंद करते हैं। यह काम अपना है कि विषय की महानता एवं गरिमा को आकर्षक तथा प्रभावशाली ढंग से समझा कर लोगों में यह अभिरुचि उत्पन्न करें। व्यापक दृष्टिकोण को समझने और विचारने की आकांक्षा जब जागृत हो जाय तब समझना चाहिये कि यह व्यक्ति राष्ट्र के लिये कुछ उपयोगी सिद्ध हो सकने की स्थिति में पहुँचा। इतनी सफलता मिल जाने पर आगे की प्रगति बहुत सरल हो जाती है। जिसके मनोभाव सोये पड़े हैं उसमें विचारशीलता की अभिरुचि जागृत कर देना हमारे लिये भारी गौरव, गर्व एवं संतोष की बात होगी।
गुरु पूर्णिमा पर्व पर (जो रविवार 5 जुलाई सन् 2020 को पड़ेगा) गुरु दक्षिणा में देने के लिए इस वर्ष हमें एक घंटा समय और एक रुपया प्रतिदिन दान करने का व्रत लेना चाहिए। एक रुपया प्रतिदिन देने से एक महीने में 30 होता है। वर्ष भर में 365 रुपये होते है। 220 की अखण्ड-ज्योति 110 की युग-निर्माण योजना आती है। यह खर्च भी हमें नव-निर्माण के लिए करना ही चाहिए। यह पैसे बाहर किसी को देने नहीं हैं। वरन् इन्हें अत्यन्त सस्ते लागत से भी कम मूल्य में मिलने वाले सत्साहित्य के रूप में परिणित कर लेना है। यह अमानत अपने ही पास जमा रहती है। भण्डार बढ़ता रहेगा और उसका लाभ अब से लेकर आगामी पचास सौ वर्ष तक अनेक लोग उठाते रहेंगे। विवेक सम्पन्न दान का यह सर्वश्रेष्ठ तरीका है। छोटे बच्चे भी आमतौर से स्कूल जाते समय एक आना जेब खर्च ले जाते हैं। समझना चाहिए कि युग-निर्माण अभियान भी हमारा एक बच्चा है। चाहे तो ऐसा भी मान सकते हैं कि आचार्य जी हमारे एक बच्चे हैं और उन्हें एक आना प्रतिदिन जेब खर्च के लिए दिया जाता है। मन को समझाने के हजार प्रकार हो सकते हैं। भावना यदि विद्यमान हो तो इतना खर्च कर सकना गरीब से गरीब के लिए भी भारी नहीं पड़ता। एक आने का अनाज तो हर घर में चूहे, कीड़े भी खा जाते हैं। इतना तो सभी को सहन करना पड़ता है। भावना जाग पड़े तो इतना छोटा खर्च भी क्या किसी को भारी पड़ेगा।
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रबुद्ध सदस्यों को इस गुरु पूर्णिमा से यह व्रत लेना चाहिये। एक घण्टा समय, एक आना नकद, यह त्याग कुछ इतना बड़ा नहीं है, जिसे लक्ष्य की महानता को देखते हुए, कर सकना हमारे लिए कठिन होना चाहिये। नियमितता में बड़ी शक्ति होती है। महीने में 30 घण्टे यदि जन संपर्क के लिए सुरक्षित रख लिये जायें और प्रतिदिन या साप्ताहिक अवकाश के दिन उन्हें ठीक तरह प्रचार कार्य में लगाया जाय तो इसका चमत्कारी परिणाम कितना महान होता है इसे कोई भी प्रत्यक्ष देख सकता है। दान अनेक प्रकार करने पड़ते हैं पर यह प्रेरक साहित्य संग्रह करने के लिए किया गया साहस विश्व मानव का भाग्य बदलने के लिए कितना उपयोगी सिद्ध होता है इसे कुछ ही दिनों में मूर्तिमान देखा जा सकेगा।
आगे हमें बहुत कुछ करना है। अनैतिकता, मूढ़ता, अन्ध परम्परा, अस्वस्थता, अशिक्षा, दरिद्रता, अकर्मण्यता आदि अगणित विकृतियों से डटकर लोहा लेना है। हमारा देश किसी समय सर्वश्रेष्ठ मानवों का निवास स्थान, समस्त संसार का मार्ग दर्शक, देवलोक के लिये भी स्पर्धा का विषय माना जाता था। पर इन्हीं कुरीतियों, हानिकारक अन्ध परम्पराओं के कारण आज वह निकृष्ट, दीन−हीन स्थिति को प्राप्त हो गया है। यदि हमको इस दुरावस्था से बाहर निकल फिर दुनिया के प्रगतिशील देशों की श्रेणी में अपनी गणना करानी है तो हमको अवश्य ही इन हीन प्रवृत्तियों से छुटकारा पाना चाहिये। उसके लिए अगले दिनों व्यापक योजनाएं बनाई जानी हैं और उन्हें कार्य रूप में परिणित किया जाना है। पर इसके लिए आवश्यक जन-शक्ति तो अपने पास होनी चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति हमारी यह प्रथम प्रक्रिया ही पूर्ण करेगी। एक घण्टा समय, एक आना नकद की माँग को पूरा करने के लिए यदि हम साहस कर सकें तो इस अवसर पर बढ़ा हुआ शौर्य आगे की कठिन मंजिलों को भी पार कर सकने में समर्थ होगा। पर यदि इतना भी न बन पड़ा तो हमारी वाक्शूरता ऊसर में डाले गये बीज की तरह ही नपुंसक सिद्ध होगी।
अब समय कम ही रह गया है। इसलिए आज से ही विचारना आरम्भ कीजिए कि इस पुण्य पर्व के उपलक्ष में उपरोक्त प्रथम आवश्यकता की पूर्ति के लिये ‘एक घण्टा एक आना’ की माँग पूरी करेंगे क्या? यदि कर सके तो उसकी सूचना गुरुपूर्णिमा को श्रद्धाञ्जलि के रूप में समय से पूर्व ही भेज दें ताकि उस दिन उन्हें छाती से लगाकर अपार आनन्द प्राप्त किया जा सके।
आगामी गुरु पूर्णिमा हमारी परीक्षा लेने आ रही है। क्या करना है, क्या करेंगे, इसका निर्णय करने के लिये अभी से सोच विचार आरम्भ कर देना चाहिये।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 50, 51
शनिवार, 4 जुलाई 2020
👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (भाग ३)
राजनैतिक स्वाधीनता के लिए आत्माहुति देने वाले पिछली पीढ़ी के शहीद अपनी जलाई हुई मशाल हमारे हाथों में थमा कर गये हैं। जिनने अपने प्राण, परिवार, शरीर, धन आदि का मोह छोड़कर भारत माता को पराधीनता पाश से मुक्त करने के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया, उनकी आत्माएं भारतीय राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आशा लेकर इस संसार से विदा हुई हैं। उन्हें विश्वास था कि अगली पीढ़ी हमारे छोड़े हुए काम को पूरा करेगी। नैतिक क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति की अभी तीन मंजिलें पार करनी हैं। राजनैतिक क्रान्ति की अभी एक ही मंजिल तो पार हुई है। तीन चौथाई काम करना बाकी पड़ा है। यदि वैयक्तिक स्वार्थपरता तक सीमित रह कर हम उन सार्वजनिक उत्तरदायित्वों को उठाने से इनकार करेंगे, बहाने बनायेंगे तो निश्चय ही यह उन स्वर्गीय शहीदों के प्रति विश्वासघात होगा। इतिहास हमारे इस ओछेपन को सहन न करेंगे। भावी पीढ़ियाँ इस अकर्मण्यता को घृणा भरी दृष्टि से देखती रहेंगी।
मानव जीवन का गौरव समझने वाला कोई भावनाशील व्यक्ति अपने को इस घृणित परिस्थिति में रखना पसंद न करेगा—अखण्ड-ज्योति परिवार का कोई सदस्य तो निश्चित रूप में नहीं । हम लोग जिस भी परिस्थिति में है देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान अभियान में भाग लेते हुए बहुत कुछ करते रहे हैं, आगे बढ़ती हुई जिम्मेदारियों के अनुरूप और भी अधिक करेंगे। त्रिविध क्रान्तियों को सम्पन्न करने की तीन अग्नि परीक्षाओं में होकर जब गुजरना ही ठहरा तो झंझट किस बात का, जो करना हो उसे करेंगे ही।
आगामी गुरुपूर्णिमा हमसे कुछ अधिक खरी और अधिक स्पष्ट बात करने आ रही है। अब तक लड़खड़ाते हुए चलने की बात निभती रही, पर अब तो सीना तान कर ही चलना पड़ेगा। अब ‘यदा कदा’ के स्थान पर निश्चितता और नियमित की नीति बदलनी पड़ेगी। जिस प्रकार शरीर को नित्य ही नहाते, खिलाते, सुलाते हैं, जिस प्रकार परिवार की दैनिक जिम्मेदारियों को नियमित रूप से वहन करते हैं उसी प्रकार हमें नव निर्माण के उत्तरदायित्व भी एक प्रकार से दैनिक नित्य कर्मों में सम्मिलित करने पड़ेंगे और जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता बनाना पड़ेगा। अपने दृष्टिकोण में जब तक यह परिवर्तन न हो तब तक युग-परिवर्तन अभिमान के एक उत्तरदायी सदस्य के ऊपर आने वाली जिम्मेदारियों को हम समुचित रूप से पूरा कर ही न सकेंगे।
गुरुपूर्णिमा पर्व अखण्ड-ज्योति का हर सदस्य सदा से मनाता आया है। सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, गुरु पूजन, सत्संकल्प पाठ, दीप दान आदि औपचारिक कर्म काण्ड प्रायः सभी शाखाओं में आयोजित किये जाते हैं। जहाँ शाखाएं नहीं हैं वहाँ वह कार्यक्रम वैयक्तिक रूप से किया जाता है। इस पर्व पर श्रद्धाञ्जलि के रूप में गुरुदक्षिणा देने की भी प्रथा है। मातृऋण, पितृ ऋण की तरह गुरु ऋण भी रहता है और उसे अपने धर्म एवं अपनी संस्कृति के प्रति आस्था रखने वाले किसी न किसी रूप में चुकाकर अपने को आँशिक रूप से उऋण बनाने का प्रयत्न किया करते हैं। स्वर्गीय पितरों के वार्षिक श्राद्ध की तरह गुरुदक्षिणा भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देनी ही पड़ती है। नहीं तो एक धार्मिक ऋण हमारे ऊपर चढ़ा ही रह जाता है।
गत वर्षों में अपनी-अपनी श्रद्धा और स्थिति के अनुरूप अखण्ड-ज्योति के सदस्य जिस प्रकार भी इस पुनीत पर्व पर जो भी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते रहे हों, वह बात अलग है। पर इस वर्ष तो हम सभी को एक ही प्रकार अपनाना है। वह है नव-निर्माण के लिए ‘यदा कदा’ कुछ कर देने की ढील-पोल छोड़कर निश्चित और नियमित रूप से कुछ न कुछ करते रहने का व्रत लेना। शरीर में कई अंग होते हैं उन सबको रक्त देना पड़ता है, परिवार में कई सदस्य होते हैं उन सब का भरण पोषण करना होता है, दैनिक क्रम में अनेकों समस्याएं रहती हैं, उन सब को सुलझाना पड़ता है। इन्हीं दैनिक आवश्यकताओं में एक नव निर्माण के राष्ट्रीय कर्तव्यों की आवश्यकता को भी जोड़ लेना चाहिये। उसे दैनिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता का स्थान देना चाहिये। यदि इतना किया जा सका तो यह ठोस गुरु पूर्णिमा होगी। यह व्रत लिया जा सका तो गुरु ऋण, राष्ट्रीय ऋण, समाज ऋण, धर्म ऋण सभी से उऋण होने का अवसर मिलेगा।
हमारी माँग यह है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य “एक घंटा समय तथा एक आना नित्य” (आज के समय में १ रुपया) नव निर्माण योजना के धर्म कर्तव्यों को पूरा करने के लिए दान किया करें। दान, भारतीय धर्म का अंग है। दान से विमुख कृपण की सद्गति नहीं होती। कुपात्रों को विडम्बनाओं को दान तो हम बहुत दिन से देते आ रहे हैं पर अब आदर्श एवं कर्त्तव्य के लिये अपनी परमार्थ बुद्धि को प्रयुक्त करना पड़ेगा। देखा-देखी के निरर्थक आडम्बरों में हम न जाने कितना धन और समय लगाते रहते हैं, पर तात्विक सत् प्रयोजनों के लिए कुछ कर सकना विवेकवानों के लिये ही संभव होता है। नामवरी और स्वर्ग-सिद्धि के लिये तो लोभी दुनिया न जाने क्या-क्या लुटाती रहती है पर जिससे मानवता का मुख उज्ज्वल हो सके ऐसे तात्विक परमार्थ को अपना सकना केवल विवेकशील, जागृत आस्थाओं का ही काम है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को इस श्रेणी में गिना जा सकता है इसलिये इन से इस प्रकार की याचना एवं आशा करना भी हमारे लिये उचित ही है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 48, 49
मानव जीवन का गौरव समझने वाला कोई भावनाशील व्यक्ति अपने को इस घृणित परिस्थिति में रखना पसंद न करेगा—अखण्ड-ज्योति परिवार का कोई सदस्य तो निश्चित रूप में नहीं । हम लोग जिस भी परिस्थिति में है देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान अभियान में भाग लेते हुए बहुत कुछ करते रहे हैं, आगे बढ़ती हुई जिम्मेदारियों के अनुरूप और भी अधिक करेंगे। त्रिविध क्रान्तियों को सम्पन्न करने की तीन अग्नि परीक्षाओं में होकर जब गुजरना ही ठहरा तो झंझट किस बात का, जो करना हो उसे करेंगे ही।
आगामी गुरुपूर्णिमा हमसे कुछ अधिक खरी और अधिक स्पष्ट बात करने आ रही है। अब तक लड़खड़ाते हुए चलने की बात निभती रही, पर अब तो सीना तान कर ही चलना पड़ेगा। अब ‘यदा कदा’ के स्थान पर निश्चितता और नियमित की नीति बदलनी पड़ेगी। जिस प्रकार शरीर को नित्य ही नहाते, खिलाते, सुलाते हैं, जिस प्रकार परिवार की दैनिक जिम्मेदारियों को नियमित रूप से वहन करते हैं उसी प्रकार हमें नव निर्माण के उत्तरदायित्व भी एक प्रकार से दैनिक नित्य कर्मों में सम्मिलित करने पड़ेंगे और जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता बनाना पड़ेगा। अपने दृष्टिकोण में जब तक यह परिवर्तन न हो तब तक युग-परिवर्तन अभिमान के एक उत्तरदायी सदस्य के ऊपर आने वाली जिम्मेदारियों को हम समुचित रूप से पूरा कर ही न सकेंगे।
गुरुपूर्णिमा पर्व अखण्ड-ज्योति का हर सदस्य सदा से मनाता आया है। सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, गुरु पूजन, सत्संकल्प पाठ, दीप दान आदि औपचारिक कर्म काण्ड प्रायः सभी शाखाओं में आयोजित किये जाते हैं। जहाँ शाखाएं नहीं हैं वहाँ वह कार्यक्रम वैयक्तिक रूप से किया जाता है। इस पर्व पर श्रद्धाञ्जलि के रूप में गुरुदक्षिणा देने की भी प्रथा है। मातृऋण, पितृ ऋण की तरह गुरु ऋण भी रहता है और उसे अपने धर्म एवं अपनी संस्कृति के प्रति आस्था रखने वाले किसी न किसी रूप में चुकाकर अपने को आँशिक रूप से उऋण बनाने का प्रयत्न किया करते हैं। स्वर्गीय पितरों के वार्षिक श्राद्ध की तरह गुरुदक्षिणा भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देनी ही पड़ती है। नहीं तो एक धार्मिक ऋण हमारे ऊपर चढ़ा ही रह जाता है।
गत वर्षों में अपनी-अपनी श्रद्धा और स्थिति के अनुरूप अखण्ड-ज्योति के सदस्य जिस प्रकार भी इस पुनीत पर्व पर जो भी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते रहे हों, वह बात अलग है। पर इस वर्ष तो हम सभी को एक ही प्रकार अपनाना है। वह है नव-निर्माण के लिए ‘यदा कदा’ कुछ कर देने की ढील-पोल छोड़कर निश्चित और नियमित रूप से कुछ न कुछ करते रहने का व्रत लेना। शरीर में कई अंग होते हैं उन सबको रक्त देना पड़ता है, परिवार में कई सदस्य होते हैं उन सब का भरण पोषण करना होता है, दैनिक क्रम में अनेकों समस्याएं रहती हैं, उन सब को सुलझाना पड़ता है। इन्हीं दैनिक आवश्यकताओं में एक नव निर्माण के राष्ट्रीय कर्तव्यों की आवश्यकता को भी जोड़ लेना चाहिये। उसे दैनिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता का स्थान देना चाहिये। यदि इतना किया जा सका तो यह ठोस गुरु पूर्णिमा होगी। यह व्रत लिया जा सका तो गुरु ऋण, राष्ट्रीय ऋण, समाज ऋण, धर्म ऋण सभी से उऋण होने का अवसर मिलेगा।
हमारी माँग यह है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य “एक घंटा समय तथा एक आना नित्य” (आज के समय में १ रुपया) नव निर्माण योजना के धर्म कर्तव्यों को पूरा करने के लिए दान किया करें। दान, भारतीय धर्म का अंग है। दान से विमुख कृपण की सद्गति नहीं होती। कुपात्रों को विडम्बनाओं को दान तो हम बहुत दिन से देते आ रहे हैं पर अब आदर्श एवं कर्त्तव्य के लिये अपनी परमार्थ बुद्धि को प्रयुक्त करना पड़ेगा। देखा-देखी के निरर्थक आडम्बरों में हम न जाने कितना धन और समय लगाते रहते हैं, पर तात्विक सत् प्रयोजनों के लिए कुछ कर सकना विवेकवानों के लिये ही संभव होता है। नामवरी और स्वर्ग-सिद्धि के लिये तो लोभी दुनिया न जाने क्या-क्या लुटाती रहती है पर जिससे मानवता का मुख उज्ज्वल हो सके ऐसे तात्विक परमार्थ को अपना सकना केवल विवेकशील, जागृत आस्थाओं का ही काम है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को इस श्रेणी में गिना जा सकता है इसलिये इन से इस प्रकार की याचना एवं आशा करना भी हमारे लिये उचित ही है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 48, 49
शुक्रवार, 3 जुलाई 2020
👉 हमारी वास्तविकता को परखने फिर आ पहुँचा (भाग २)
जो जितना प्रबुद्ध है उसकी उतनी ही अधिक जिम्मेदारी है। ईश्वर, आत्मा और समाज के सामने उनके उत्तरदायित्व बहुत कुछ बढ़े-चढ़े होते हैं। मूढ़ता और पशुता की स्थिति में पड़े हुए मनुष्यों की न कोई भर्त्सना है और न महिमा। वे जीते भर हैं। खाने और कमाने भर तक उनकी गतिविधियाँ सीमित रहती हैं। ऐसे लोग कुछ बड़ी बात सोच नहीं पाते, इसलिए कुछ बड़ा काम कर सकना भी उनके लिए संभव नहीं होता। संसार उनकी इस विवशता को जानता है इसलिए उन्हें कुछ श्रेय, दोष भी नहीं देता। पर जिन्हें भगवान ने विचारणा दी है, उनकी स्थिति भिन्न है। प्रबुद्ध लोग यदि अपने समय की समस्याओं की उपेक्षा करने लगें तो उनका अपराध अक्षम्य माना जायगा। फौजी अधिकारियों की छोटी-सी भूल राष्ट्रीय स्वाधीनता को खतरे में डाल सकती है। इसलिए उनसे अधिक सतर्कता एवं जिम्मेदारी की आशा की जाती है। यदि वह थोड़ा भी प्रमाद करता है तो उसे सहन नहीं किया जा सकता। सरकारी अन्य विभागों के कर्मचारी ढील-पोल बरतने पर चेतावनी या नगण्य-सा अर्थ दंड पाकर छुटकारा पा जाते हैं पर फौजी अफसर का तो ‘कोर्ट मार्शल’ ही होता है। उसे अपनी छोटी-सी लापरवाही के लिए मृत्यु दंड भुगतना पड़ता है।
सौभाग्य या दुर्भाग्य से ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों को ऐसी ही उत्तरदायित्वपूर्ण परिस्थिति प्राप्त हुई हैं। भगवान ने उन्हें प्रबुद्धता की चेतना दी है। साथ ही कुछ जिम्मेदारी भी सौंपी है। उनके लिए लापरवाही बरतने का अवसर नहीं। बेशक सामाजिक नागरिकों की तरह हम लोगों को भी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ उठानी पड़ती हैं। यह अर्थ उपार्जन आदि का प्रबन्ध करना पड़ता है। पर इसका यह अर्थ किसी प्रकार भी नहीं होता कि नव-निर्माण के कार्यों में भाग लेने के लिए उसे तनिक भी अवकाश नहीं मिलता। इस बहानेबाजी को कोई स्वीकार नहीं कर सकता। संसार के प्रायः सभी महापुरुष गृहस्थ थे और उन्हें पारिवारिक व्यवस्था जुटाने का भी ध्यान रखना पड़ता था। पर उनमें से किसी ने यह बहाना नहीं बनाया कि राष्ट्रीय कर्तव्यों की पूर्ति के लिए हमारे पास तनिक भी अवकाश नहीं। इस प्रकार की झूठी धोखेबाजी से केवल अपनी अन्तरात्मा को झुठलाया जा सकता है और किसी को नहीं। जिसकी आत्मा में थोड़ी भी समाज निष्ठा एवं कर्तव्य-निष्ठा होगी वह बुरी से बुरी परिस्थितियों में रहते हुए भी विश्व मानव की किसी न किसी प्रकार सेवा कर ही सकेगा। जहाँ इच्छा हो वहाँ रास्ता निकलता ही है। जिस ओर सच्ची आन्तरिक श्रद्धा होगी उस ओर चलने का भी कुछ न कुछ प्रबन्ध बन जाना निश्चित है।
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य उस कसौटी पर खोटे नहीं खरे उतरते रहे हैं। हम सभी गृहस्थ हैं और व्यस्तता के बीच भी अवकाश निकालकर इतना कुछ करते रहे हैं कि सारा राष्ट्र आश्चर्यचकित है। यदि फुरसत वाले साधु सन्त हम लोग होते तो शायद इतना भी न कर पाते जितना अब करते हैं। तब संभवतः संसार को माया मिथ्या बताकर आलस्य और अवसाद में पड़े रहने को ही मन करता। प्रश्न परिस्थितियों का नहीं भावना का है। युग के उत्तरदायित्वों के समझने की-अनुभव करने की— चेतना जिनके अन्तःकरण में जागृत हो चुकी है, उन्हें न समय का अभाव रहता है, न कठिनाइयों का रोना, रोना पड़ता है। आकाँक्षा अपना रास्ता बनाती है। यह तथ्य कितना सत्य है, इसका अनुभव हम सब इन दिनों भली प्रकार करते रहते हैं। वर्तमान काल की आर्थिक तंगी तथा पारिवारिक जीवन की उलझनों से जूझते हुए भी नव-निर्माण के लिए कितना अधिक कर लेते हैं। इस प्रयोग ने उन लोगों का मुँह बन्द ही कर दिया है जो सामयिक उत्तरदायित्वों के प्रति निष्ठावान न होने के कारण उत्पन्न हुई अकर्मण्यता को फुरसत न मिलने, अमुक कठिनाई रहने जैसे बहानों की चादर उठाने की उपहासास्पद चेष्टा करते रहते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/June/v1.47
सौभाग्य या दुर्भाग्य से ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों को ऐसी ही उत्तरदायित्वपूर्ण परिस्थिति प्राप्त हुई हैं। भगवान ने उन्हें प्रबुद्धता की चेतना दी है। साथ ही कुछ जिम्मेदारी भी सौंपी है। उनके लिए लापरवाही बरतने का अवसर नहीं। बेशक सामाजिक नागरिकों की तरह हम लोगों को भी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ उठानी पड़ती हैं। यह अर्थ उपार्जन आदि का प्रबन्ध करना पड़ता है। पर इसका यह अर्थ किसी प्रकार भी नहीं होता कि नव-निर्माण के कार्यों में भाग लेने के लिए उसे तनिक भी अवकाश नहीं मिलता। इस बहानेबाजी को कोई स्वीकार नहीं कर सकता। संसार के प्रायः सभी महापुरुष गृहस्थ थे और उन्हें पारिवारिक व्यवस्था जुटाने का भी ध्यान रखना पड़ता था। पर उनमें से किसी ने यह बहाना नहीं बनाया कि राष्ट्रीय कर्तव्यों की पूर्ति के लिए हमारे पास तनिक भी अवकाश नहीं। इस प्रकार की झूठी धोखेबाजी से केवल अपनी अन्तरात्मा को झुठलाया जा सकता है और किसी को नहीं। जिसकी आत्मा में थोड़ी भी समाज निष्ठा एवं कर्तव्य-निष्ठा होगी वह बुरी से बुरी परिस्थितियों में रहते हुए भी विश्व मानव की किसी न किसी प्रकार सेवा कर ही सकेगा। जहाँ इच्छा हो वहाँ रास्ता निकलता ही है। जिस ओर सच्ची आन्तरिक श्रद्धा होगी उस ओर चलने का भी कुछ न कुछ प्रबन्ध बन जाना निश्चित है।
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य उस कसौटी पर खोटे नहीं खरे उतरते रहे हैं। हम सभी गृहस्थ हैं और व्यस्तता के बीच भी अवकाश निकालकर इतना कुछ करते रहे हैं कि सारा राष्ट्र आश्चर्यचकित है। यदि फुरसत वाले साधु सन्त हम लोग होते तो शायद इतना भी न कर पाते जितना अब करते हैं। तब संभवतः संसार को माया मिथ्या बताकर आलस्य और अवसाद में पड़े रहने को ही मन करता। प्रश्न परिस्थितियों का नहीं भावना का है। युग के उत्तरदायित्वों के समझने की-अनुभव करने की— चेतना जिनके अन्तःकरण में जागृत हो चुकी है, उन्हें न समय का अभाव रहता है, न कठिनाइयों का रोना, रोना पड़ता है। आकाँक्षा अपना रास्ता बनाती है। यह तथ्य कितना सत्य है, इसका अनुभव हम सब इन दिनों भली प्रकार करते रहते हैं। वर्तमान काल की आर्थिक तंगी तथा पारिवारिक जीवन की उलझनों से जूझते हुए भी नव-निर्माण के लिए कितना अधिक कर लेते हैं। इस प्रयोग ने उन लोगों का मुँह बन्द ही कर दिया है जो सामयिक उत्तरदायित्वों के प्रति निष्ठावान न होने के कारण उत्पन्न हुई अकर्मण्यता को फुरसत न मिलने, अमुक कठिनाई रहने जैसे बहानों की चादर उठाने की उपहासास्पद चेष्टा करते रहते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/June/v1.47
गुरुवार, 2 जुलाई 2020
👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (भाग १)
हमारी वास्तविकता को परखने फिर आ पहुँचा
‘युग-निर्माण योजना’ की जन्म तिथि गुरु पूर्णिमा है। इसी दिन इस युग के इस महान अभियान का शुभारम्भ उस परम प्रेरक दिव्य शक्ति के द्वारा किया गया था। बसन्त पंचमी के दिन अखण्ड-ज्योति प्रारम्भ हुई और गुरु पूर्णिमा के दिन ‘युग-निर्माण योजना’। अपने परिवार के लिए ये दो कौटुम्बिक पर्व हैं। यों इनका व्यापक महत्व है। भारतीय संस्कृति की सुविस्तृत प्रक्रिया इन दो के ऊपर निर्भर है। ज्ञान और कर्म के यह दो पुनीत पर्व हैं। माता सरस्वती का जन्म दिन हमारा ज्ञान पर्व है और उस ज्ञान को कर्म रूप में परिणित करने की प्रेरणा देने वाले परम गुरु भगवान व्यास का जन्म दिन-गुरु पूर्णिमा-कर्म पर्व है। ज्ञान और कर्म का मानव जीवन में असाधारण महत्व है। प्रतीक रूप से वही महत्व इन दो पर्वों का भी है। यों हमारे सभी पर्व एक से एक बढ़कर हैं पर जहाँ तक अपने परिवार की गतिविधियों का संबंध है इन दो को हम विशेष महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि अपनी गतिविधियों की प्रेरणा इन दो से ही हम विशेष रूप से प्राप्त किया करते हैं।
सरकारी विकास-योजनाओं का अपना महत्व है। ‘युग-निर्माण योजना’ का संचालन भले ही छोटे समझे जाने वाले और अर्थ साधनों से विहीन लोगों द्वारा किया जा रहा हो, पर उसका भी अपना महत्व है। भौतिक समृद्धि की अपेक्षा मानवीय उत्कृष्टता कहीं अधिक मूल्यवान है। उसकी अभिवृद्धि अगणित समृद्धियों को जन्म देती है। इसलिए जब कभी कार्य पद्धतियों का विश्लेषण एवं मूल्याँकन किया जायगा, युग-निर्माण योजना को अपने समय की एक अनुपम घटना ठहराया जायगा। इतनी विशालकाय संभावनाओं से परिपूर्ण प्रक्रिया को आरम्भ कर सकने के साहस का श्रेय अखण्ड-ज्योति परिवार को मिलता है। उसका हर सदस्य गर्वोन्नत मस्तक से यह कह सकेगा कि अपने युग की चुनौती और जिम्मेदारी को उसने समझा और स्वीकार किया। राष्ट्र की पुकार का समुचित प्रत्युत्तर देने का आत्म संतोष उसे मिलता ही है। देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए जो अनुपम प्रयत्न किया गया है, उस महान यज्ञ का होता— अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य—अपनी जीवन साधना को सार्थक समझे तो यह उचित ही होगा। भले ही छोटे दिखाई पड़ें पर हमारे प्रयत्न निस्संदेह महान हैं।
पिछले हजार वर्ष तक राष्ट्र को अज्ञानांधकार में भटकना पड़ा है। उन दिनों हमने बहुत कुछ खोया है। अनेकों दोष दुर्गुण उन्हीं दिनों हमारे पीछे लग गये हैं। अब समय आ गया है कि उनका प्रतिकार और परिष्कार करें। दुर्बलताओं को भगावें और समर्थ प्रबुद्ध व्यक्तियों जैसी गतिविधियाँ अपनावें। भारतीय राष्ट्र को यही गतिविधियाँ अपनानी पड़ेंगी। इसके बिना उसे न तो वर्तमान विपन्नताओं से त्राण मिलेगा और न उज्ज्वल भविष्य की ज्योतिर्मय आभा ही दृष्टिगोचर होगी। जीवन-मरण की समस्या सामने हैं। यदि हम पुनरुत्थान के लिए, नव-निर्माण के लिए प्रयत्न नहीं करते तो प्रगति के पथ पर बढ़ रहे संसार की घुड़दौड़ में इतने पिछड़ जायेंगे कि दूसरों के समकक्ष पहुँच सकना कभी भी संभव न रहेगा।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/June/v1.47
‘युग-निर्माण योजना’ की जन्म तिथि गुरु पूर्णिमा है। इसी दिन इस युग के इस महान अभियान का शुभारम्भ उस परम प्रेरक दिव्य शक्ति के द्वारा किया गया था। बसन्त पंचमी के दिन अखण्ड-ज्योति प्रारम्भ हुई और गुरु पूर्णिमा के दिन ‘युग-निर्माण योजना’। अपने परिवार के लिए ये दो कौटुम्बिक पर्व हैं। यों इनका व्यापक महत्व है। भारतीय संस्कृति की सुविस्तृत प्रक्रिया इन दो के ऊपर निर्भर है। ज्ञान और कर्म के यह दो पुनीत पर्व हैं। माता सरस्वती का जन्म दिन हमारा ज्ञान पर्व है और उस ज्ञान को कर्म रूप में परिणित करने की प्रेरणा देने वाले परम गुरु भगवान व्यास का जन्म दिन-गुरु पूर्णिमा-कर्म पर्व है। ज्ञान और कर्म का मानव जीवन में असाधारण महत्व है। प्रतीक रूप से वही महत्व इन दो पर्वों का भी है। यों हमारे सभी पर्व एक से एक बढ़कर हैं पर जहाँ तक अपने परिवार की गतिविधियों का संबंध है इन दो को हम विशेष महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि अपनी गतिविधियों की प्रेरणा इन दो से ही हम विशेष रूप से प्राप्त किया करते हैं।
सरकारी विकास-योजनाओं का अपना महत्व है। ‘युग-निर्माण योजना’ का संचालन भले ही छोटे समझे जाने वाले और अर्थ साधनों से विहीन लोगों द्वारा किया जा रहा हो, पर उसका भी अपना महत्व है। भौतिक समृद्धि की अपेक्षा मानवीय उत्कृष्टता कहीं अधिक मूल्यवान है। उसकी अभिवृद्धि अगणित समृद्धियों को जन्म देती है। इसलिए जब कभी कार्य पद्धतियों का विश्लेषण एवं मूल्याँकन किया जायगा, युग-निर्माण योजना को अपने समय की एक अनुपम घटना ठहराया जायगा। इतनी विशालकाय संभावनाओं से परिपूर्ण प्रक्रिया को आरम्भ कर सकने के साहस का श्रेय अखण्ड-ज्योति परिवार को मिलता है। उसका हर सदस्य गर्वोन्नत मस्तक से यह कह सकेगा कि अपने युग की चुनौती और जिम्मेदारी को उसने समझा और स्वीकार किया। राष्ट्र की पुकार का समुचित प्रत्युत्तर देने का आत्म संतोष उसे मिलता ही है। देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए जो अनुपम प्रयत्न किया गया है, उस महान यज्ञ का होता— अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य—अपनी जीवन साधना को सार्थक समझे तो यह उचित ही होगा। भले ही छोटे दिखाई पड़ें पर हमारे प्रयत्न निस्संदेह महान हैं।
पिछले हजार वर्ष तक राष्ट्र को अज्ञानांधकार में भटकना पड़ा है। उन दिनों हमने बहुत कुछ खोया है। अनेकों दोष दुर्गुण उन्हीं दिनों हमारे पीछे लग गये हैं। अब समय आ गया है कि उनका प्रतिकार और परिष्कार करें। दुर्बलताओं को भगावें और समर्थ प्रबुद्ध व्यक्तियों जैसी गतिविधियाँ अपनावें। भारतीय राष्ट्र को यही गतिविधियाँ अपनानी पड़ेंगी। इसके बिना उसे न तो वर्तमान विपन्नताओं से त्राण मिलेगा और न उज्ज्वल भविष्य की ज्योतिर्मय आभा ही दृष्टिगोचर होगी। जीवन-मरण की समस्या सामने हैं। यदि हम पुनरुत्थान के लिए, नव-निर्माण के लिए प्रयत्न नहीं करते तो प्रगति के पथ पर बढ़ रहे संसार की घुड़दौड़ में इतने पिछड़ जायेंगे कि दूसरों के समकक्ष पहुँच सकना कभी भी संभव न रहेगा।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/June/v1.47
👉 ममता हटाने पर ही चित्त शुद्ध होगा (भाग ३)
चित्त में अस्वाभाविकता आ जाना ही उसकी अशुद्धि है जिसके कारण हम उसे अपने वश में नहीं रख पाते। वासनाओं की उत्पत्ति और उनकी पूर्ति को ही जीवन मान लेना वह अस्वाभाविकता है जो चित्त की अशुद्धि का कारण बनता है। जब कि स्वाभाविक जीवन वासनाओं से परे है। वासनाओं से परे जो एक सत्य, शिव और सुन्दर जीवन है वही वास्तविक जीवन है। उस जीवन की अनुभूति कर लेने पर मनुष्य का चित्त शान्त, सन्तुष्ट एवं स्थिर हो जाता है।
वासनायें जीवन की अविराम विकृतियाँ है। एक बार जब इनका क्रम प्रारम्भ हो जाता तो फिर खत्म होने का नाम नहीं लेता। एक वासना की पूर्ति से दूसरी वासना का जन्म होता है। वासनाओं का जाल इतना सधन तथा सुदृढ़ हो जाता है कि एक बार फँस जाने पर उसमें से निकल जाना कठिन हो जाता है। मनुष्य मछली की तरह छटपटाता हुआ तड़प-तड़प कर जीवन खो देता है। वासनाओं की उत्पत्ति एवं पूर्ति स्वयं में कोई प्रक्रिया नहीं है। इनको जन्म और पूर्ति का सुख देने वाली एक चेतन सत्ता है उसी चेतना सत्ता के प्राप्त करने का प्रयास ही वह स्वाभाविक जीवन है जो चित्त की शुद्धि में सहायक होता है। आत्म प्रकाशक मूल सत्ता को जीवन न मान कर वासनाओं की उत्पत्ति एवं पूर्ति को जीवन मान लेना ही अस्वाभाविकता है, जिसको अपनों लेने से चित्त अशुद्ध एवं विकृत हो जाता है।
वासना प्रधान चित्त सदैव ही किसी न किसी प्रकार का अभाव अनुभव करता है। वासनाओं एवं तृप्ति में स्वाभाविक विरोध है। जिस समय तक वासनाओं की उपस्थिति रहेगी, अभाव बना रहेगा। वासनाओं से निवृत्त चित्त में एक शाश्वत तृप्ति का समावेश हो जाता है और यही तृप्ति उसकी वह निर्विकारता है जिसकी मनुष्य को अपेक्षा है, आवश्यकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.12
वासनायें जीवन की अविराम विकृतियाँ है। एक बार जब इनका क्रम प्रारम्भ हो जाता तो फिर खत्म होने का नाम नहीं लेता। एक वासना की पूर्ति से दूसरी वासना का जन्म होता है। वासनाओं का जाल इतना सधन तथा सुदृढ़ हो जाता है कि एक बार फँस जाने पर उसमें से निकल जाना कठिन हो जाता है। मनुष्य मछली की तरह छटपटाता हुआ तड़प-तड़प कर जीवन खो देता है। वासनाओं की उत्पत्ति एवं पूर्ति स्वयं में कोई प्रक्रिया नहीं है। इनको जन्म और पूर्ति का सुख देने वाली एक चेतन सत्ता है उसी चेतना सत्ता के प्राप्त करने का प्रयास ही वह स्वाभाविक जीवन है जो चित्त की शुद्धि में सहायक होता है। आत्म प्रकाशक मूल सत्ता को जीवन न मान कर वासनाओं की उत्पत्ति एवं पूर्ति को जीवन मान लेना ही अस्वाभाविकता है, जिसको अपनों लेने से चित्त अशुद्ध एवं विकृत हो जाता है।
वासना प्रधान चित्त सदैव ही किसी न किसी प्रकार का अभाव अनुभव करता है। वासनाओं एवं तृप्ति में स्वाभाविक विरोध है। जिस समय तक वासनाओं की उपस्थिति रहेगी, अभाव बना रहेगा। वासनाओं से निवृत्त चित्त में एक शाश्वत तृप्ति का समावेश हो जाता है और यही तृप्ति उसकी वह निर्विकारता है जिसकी मनुष्य को अपेक्षा है, आवश्यकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.12
मंगलवार, 30 जून 2020
👉 Triumph over Vices
The external world, as we find it, is mostly a reflection of our inner world. Moreover, the intrinsic desires and sentiments of the human self are so strong that they attract and accumulate thoughts of similar nature, trigger one’s actions accordingly and thus create corresponding circumstances.
So if you want to clean up the ambience around you, you will have to begin purifying your own sentiments and thoughts first. If you want peace and benevolence around you, you should first conquer your own vices, untoward instincts and wrong thinking. Utter selfishness and egotism are the root causes of all conflicts and clashes, be that at familial, social or communal levels. The narrow tendency of grabbing supremacy at any cost, neglecting even the genuine rights of others and ignoring the ethics of humanity, are behind the religious or political battles and wars the consequences of which are horrifying and devastating.
You may care for self-respect and happy progress of your life, but it is not necessary that you should block someone else’s ascent for this or snatch it from someone. People might acquire wealth and might by such means, but it hardly gives them any joy and eventually proves to be agonizing. The only and the best way to happiness is that of equality, cooperation, mutual respect and goodwill.
This way, we all can contribute to spread happiness collectively and be happier… The evils of self-centeredness are toxic to the ambience of peace. The delight that emanates from and extends the nectar of collective, widespread happiness is the real joy…
📖 Akhand Jyoti, June 1945
So if you want to clean up the ambience around you, you will have to begin purifying your own sentiments and thoughts first. If you want peace and benevolence around you, you should first conquer your own vices, untoward instincts and wrong thinking. Utter selfishness and egotism are the root causes of all conflicts and clashes, be that at familial, social or communal levels. The narrow tendency of grabbing supremacy at any cost, neglecting even the genuine rights of others and ignoring the ethics of humanity, are behind the religious or political battles and wars the consequences of which are horrifying and devastating.
You may care for self-respect and happy progress of your life, but it is not necessary that you should block someone else’s ascent for this or snatch it from someone. People might acquire wealth and might by such means, but it hardly gives them any joy and eventually proves to be agonizing. The only and the best way to happiness is that of equality, cooperation, mutual respect and goodwill.
This way, we all can contribute to spread happiness collectively and be happier… The evils of self-centeredness are toxic to the ambience of peace. The delight that emanates from and extends the nectar of collective, widespread happiness is the real joy…
📖 Akhand Jyoti, June 1945
👉 ममता हटाने पर ही चित्त शुद्ध होगा (भाग २)
स्वाधीन-चित्त केवल शाँति दाता ही नहीं, शक्ति-दाता भी होता है। शक्ति सुख की जननी है। उससे आत्मविश्वास और आत्मविश्वास से निर्भयता का आविर्भाव होता है। अनुशासित चित्त का शक्ति भण्डार मनुष्य को इतना कार्य सक्षम बना देता है कि वह बड़े-बड़े विस्मयकारक कार्य कर सकता है। जीवन की सार्थकता एवं सफलता इस एक बात पर ही निर्भर रहती है कि वह कुछ ऐसे सत्कर्म कर सके जिससे उसका तथा संसार का उपकार हो और उसकी आत्मा को एक शाश्वत सन्तोष मिले। उसे जीवन अथवा मृत्यु दोनों स्थितियों में हर्ष की उपलब्धि हो। मनुष्य का चित्त सच्ची शक्तियों का आगार है। इस शक्ति -कोष का उद्घाटन तब ही होता है जब चित्त अनुशासित तथा स्ववश होता है। चित्त की स्वाधीनता उसकी निर्दोषिता पर ही निर्भर है।
मनुष्य के लिये अब यह बात अनजान नहीं रह गई है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना चाहिए क्या करने में उसका कल्याण है और क्या करने में अकल्याण है। अशुद्ध चित्त के कारण बहुधा यह होता रहता है कि मनुष्य कल्याणकारी कार्य करना चाहता है किन्तु नहीं कर पाता प्रत्युत उससे परवश ही ऐसे कार्य हो जाते हैं जो अमाँगलिक तथा अकल्याणकारी होते हैं। ऐसी दशा में पश्चाताप होना स्वाभाविक है। मनुष्य मन ही-मन रोता-खीजता और अपने को कोसता है। वह जानता है कि इस प्रकार के अवाँछनीय कार्य उसको प्रगति पथ पर, सुख-शाँति के महान् मार्ग पर न बढ़ने देंगे। जिससे उसका बहुमूल्य मानव-जीवन यों ही नष्ट होकर व्यर्थ चला जायेगा और तब उसे आत्मोन्नति, आत्मकल्याण करने का अवसर न जाने कभी मिलेगा या नहीं। मनुष्य की स्वाभाविक इच्छा होती है कि वह अति दुर्लभ मानव-जीवन का सदुपयोग करके आत्मकल्याण का अधिकारी बन जाये। किन्तु खेद है कि चित्त की अशुद्धता के कारण वह अपने इस महत् उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता।
बहुधा लोग चित्त को चंचलता का ही वह दोष मान लेते हैं जिसके कारण हम उसे स्ववश नहीं कर पाये चित्त की चंचलता वस्तुतः उसका दोष नहीं है बल्कि यह असकी विकलता है, छटपटाहट है जो शुद्धि प्राप्त करने की लालसा एवं प्रयास से उत्पन्न होती है। नैसर्गिक नियम के अधीन चित्त स्वभावतः शुद्धि की ओर स्वयं गतिशील रहा करता है और जब तक उसे अभीष्ट शुद्धता नहीं मिल जाती है एक ओर से दूसरी और को भागता रहता है। ज्यों ही उसे अभीष्ट शुद्धता जो कि प्रसन्नता के रूप में होती है, मिल जाती है वह स्थिर, शाँत एवं सन्तुष्ट हो जाता है। फिर न वह व्यग्र होता है और न चंचल। अभीष्ट केन्द्र बिन्दु पर पहुँच कर वह एकरस शुभ संकल्पों तथा सत्कर्मों में लग कर मानव जीवन को सफल एवं सार्थक बना देता है। चित्त की चंचलता इस बात का प्रमाण है कि वह अपने अभीष्ट लक्ष्य को नहीं पा रहा है, जिसके लिए वह लालायित होकर भागा-भागा फिर रहा है। मनुष्य को चाहिए कि वह उसकी सहायता करे। एक बार ऐसे अपने केन्द्र बिन्दु पर पहुँच जाने में मदद करे, जिससे कि वह शुद्ध एवं प्रबुद्ध होकर मनुष्य को उसी प्रकार सहायक तथा सुखदाता बन सके जिस प्रकार पिता द्वारा पाला-पोषा पुत्र उसका अवलम्ब बन जाता है। चित्त द्वारा शुद्धि का प्रयत्न और कुछ नहीं मनुष्य को कल्याण पथ पर पहुँचाने की सामर्थ्य प्राप्त करने का प्रयास ही है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.11
मनुष्य के लिये अब यह बात अनजान नहीं रह गई है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना चाहिए क्या करने में उसका कल्याण है और क्या करने में अकल्याण है। अशुद्ध चित्त के कारण बहुधा यह होता रहता है कि मनुष्य कल्याणकारी कार्य करना चाहता है किन्तु नहीं कर पाता प्रत्युत उससे परवश ही ऐसे कार्य हो जाते हैं जो अमाँगलिक तथा अकल्याणकारी होते हैं। ऐसी दशा में पश्चाताप होना स्वाभाविक है। मनुष्य मन ही-मन रोता-खीजता और अपने को कोसता है। वह जानता है कि इस प्रकार के अवाँछनीय कार्य उसको प्रगति पथ पर, सुख-शाँति के महान् मार्ग पर न बढ़ने देंगे। जिससे उसका बहुमूल्य मानव-जीवन यों ही नष्ट होकर व्यर्थ चला जायेगा और तब उसे आत्मोन्नति, आत्मकल्याण करने का अवसर न जाने कभी मिलेगा या नहीं। मनुष्य की स्वाभाविक इच्छा होती है कि वह अति दुर्लभ मानव-जीवन का सदुपयोग करके आत्मकल्याण का अधिकारी बन जाये। किन्तु खेद है कि चित्त की अशुद्धता के कारण वह अपने इस महत् उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता।
बहुधा लोग चित्त को चंचलता का ही वह दोष मान लेते हैं जिसके कारण हम उसे स्ववश नहीं कर पाये चित्त की चंचलता वस्तुतः उसका दोष नहीं है बल्कि यह असकी विकलता है, छटपटाहट है जो शुद्धि प्राप्त करने की लालसा एवं प्रयास से उत्पन्न होती है। नैसर्गिक नियम के अधीन चित्त स्वभावतः शुद्धि की ओर स्वयं गतिशील रहा करता है और जब तक उसे अभीष्ट शुद्धता नहीं मिल जाती है एक ओर से दूसरी और को भागता रहता है। ज्यों ही उसे अभीष्ट शुद्धता जो कि प्रसन्नता के रूप में होती है, मिल जाती है वह स्थिर, शाँत एवं सन्तुष्ट हो जाता है। फिर न वह व्यग्र होता है और न चंचल। अभीष्ट केन्द्र बिन्दु पर पहुँच कर वह एकरस शुभ संकल्पों तथा सत्कर्मों में लग कर मानव जीवन को सफल एवं सार्थक बना देता है। चित्त की चंचलता इस बात का प्रमाण है कि वह अपने अभीष्ट लक्ष्य को नहीं पा रहा है, जिसके लिए वह लालायित होकर भागा-भागा फिर रहा है। मनुष्य को चाहिए कि वह उसकी सहायता करे। एक बार ऐसे अपने केन्द्र बिन्दु पर पहुँच जाने में मदद करे, जिससे कि वह शुद्ध एवं प्रबुद्ध होकर मनुष्य को उसी प्रकार सहायक तथा सुखदाता बन सके जिस प्रकार पिता द्वारा पाला-पोषा पुत्र उसका अवलम्ब बन जाता है। चित्त द्वारा शुद्धि का प्रयत्न और कुछ नहीं मनुष्य को कल्याण पथ पर पहुँचाने की सामर्थ्य प्राप्त करने का प्रयास ही है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.11
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य (अंतिम भाग)
जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है— हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्। (तत्वा. (...



















