शुक्रवार, 13 मार्च 2020

👉 जीवन का सत्य


जीवन की नश्वरता को जो जान लेते हैं, वे सत्य को समझ लेते हैं। जिन्हें भी सत्य की अनुभूति हुई है, उन सबने यही कहा है कि जीवन झाग का बुलबुला है। जो इस घड़ी है, अगली घड़ी मिट जाएगा। जो इस नश्वर को शाश्वत मान लेते हैं, वे इसी में डूबते और नष्ट हो जाते हैं। लेकिन जो इसके सत्य के प्रति सजग होते हैं, वे एक ऐसे जीवन को पा लेने की शुरुआत करते हैं, जिसका कोई अन्त नहीं है।
  
जीवन के इस सत्य का अनुभव करने वाले एक फकीर को किसी बादशाह ने कैद कर लिया। कैद की वजह यह थी कि उसने बादशाद के सामने सत्य बातें कह दी थीं। बादशाह को फकीर का कहा हुआ सच अप्रिय लगा, सो उसने उसे कैद कर लिया। उस फकीर के एक मित्र ने उससे कहा- आखिर यह बैठे-बिठाये मुसीबत क्यों मोल ले ली। न कहते वे सब बातें, तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता। अपने मित्र की बातें सुनकर फकीर हँस पड़ा और बोला- मैं करूँ भी तो क्या? जब से खुदा का दीदार हुआ है, तब से झूठ बेमानी हो गया है। कोशिश करने पर भी झूठ बोला ही नहीं जाता।
  
परमात्मा की सत्ता ही कुछ ऐसी है कि उसे अनुभव करने के बाद असत्य का ख्याल ही नहीं आता। सत्य के अतिरिक्त अब जीवन में कोई विकल्प नहीं है। फिर-इस कैद का क्या? यह कैद तो बस घड़ी भर की है। फकीर की कही हुई यह बात  जेल के किसी सिपाही ने सुन ली और बादशाह को बता भी दी। इसे सुनकर उस बादशाह ने कहा- उस पागल फकीर से कहना कि यह कैद घड़ी भर की नहीं, बल्कि जीवन भर की है। फकीर ने जब बादशाह के इस कथन को सुना तो जोर से हँस पड़ा और बोला- अरे भाई! उस बादशाह से कहना कि उस पागल फकीर ने कहा है कि क्या जिन्दगी घड़ी भर से ज्यादा की है? सचमुच ही जो जीवन का सत्य पाना चाहते हैं उन्हें जीवन की यह सच्चाई जाननी ही पड़ती है। इसे समझकर वे अनुभव कर पाते हैं कि एक स्वप्न से अधिक न तो जीवन की कोई सत्ता है और न ही जीवन का सत्य।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०३

👉 दांपत्य जीवन में कलह से बचिए (भाग १)

नेक परिवारों में स्त्री-पुरुषों के मध्य जैसे मधुर संबंध नहीं देखे जाते जैसे कि होने चाहिए । अनेक घरों में आएदिन संघर्ष, मनोमालिन्य और अविश्वास के चिन्ह परिलक्षित होते रहते हैं । कारण यह है कि पति-पत्नी में से एक या दोनों ही केवल अपनी-अपनी इच्छा, आवश्यकता और रुचि को प्रधानता देते हैं । दूसरे पक्ष की भावना और परिस्थितियों को न समझना ही प्रायः कलह का कारण होता है ।

जब एक पक्ष दूसरे पक्ष की इच्छानुसार आचरण नहीं करता है तो उसे यह बात अपना अपमान, उपेक्षा या तिरस्कार प्रतीत होती है, जिससे चिढ़कर वह दूसरे पक्ष पर कटु वाक्यों का प्रहार या दुर्भावनाओं का आरोपण करता है । उत्तर-प्रत्युत्तर आक्रमण-प्रत्याक्रमण, आक्षेप-प्रत्याक्षेप का सिलसिला चल पड़ता है तो उससे कलह बढ़ता ही जाता है । दोनों में से कोई अपनी गलती नहीं मानता, वरन दूसरे को अधिक दोषी सिद्ध करने के लिए अपनी जिद को आगे बढ़ाते रहते हैं । इस रीति से कभी भी झगड़े का अंत नहीं हो सकता । अग्नि में ईंधन डालते जाने से तो और भी अधिक प्रज्वलित होती है ।

जो पति-पत्नी अपने संबंधों को मधुर रखना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि दूसरे पक्ष की योग्यता, मनोभूमि, भावना, इच्छा, संस्कार, परिस्थिति एवं आवश्यकता को समझने का प्रयत्न करें और उस स्थिति के मनुष्य के लिए जो उपयुक्त हो सके ऐसा उदार व्यवहार करने की चेष्टा करें, तो झगड़े के अनेक अवसर उत्पन्न होने से पहले ही दूर हो जाएँगे । हमें भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि सब मनुष्य एक समान नहीं हैं, सबकी रुचि एक समान नहीं है, सबकी बुद्धि, भावना और इच्छा एक जैसी नहीं होती । भिन्न वातावरण भिन्न परिस्थिति और भिन्न कारणों से लोगों की मनोभूमि में भिन्नता हो जाती है । यह भिन्नता पूर्णतया मिटकर दूसरे पक्ष के बिलकुल समान हो जावे यह हो नहीं सकता । कोई स्त्री-पुरुष आपस में कितने ही सच्चे क्यों न हों, उनके विचार और कार्यों में कुछ न कुछ भिन्नता रह ही जाएगी ।

अनुदार स्वभाव के स्त्री-पुरुष कट्टर एवं संकीर्ण मनोवृत्ति के होने के कारण यह चाहते हैं कि हमारा साथी हमारी किसी भी बात में तनिक भी मतभेद न रखे । पति अपनी पत्नी को पतिव्रत का पाठ पढ़ाता है और उपदेश करता है कि तुम्हें पूर्ण पतिव्रता, इतनी उग्र पतिव्रता होना चाहिए कि पति की किसी भी भली-बुरी विचारधारा, आदत कार्य प्रणाली में हस्तक्षेप न हो । इसके विपरीत स्त्री अपने पति से आशा करती है कि पति के लिए भी उचित है कि स्त्री को अपना जीवनसंगी, आधा अंग समझकर उसके सहयोग एवं अधिकार की उपेक्षा न करे । ये भावनाएँ जब संकीर्णता और अनुदारता से सम्मिश्रित होती हैं तो एक पक्ष सोचता है कि मेरे अधिकार को दूसरा पक्ष पूर्ण नहीं करता । बस यहीं से झगड़े की जड़ आरंभ हो जाती है ।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 गृहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 13 March 2020



👉 अपने बाल-बच्चे मत बेचिए! (भाग २)

जिस परिवार में तिलक-दहेज की विशेष चाहत हैं, वहाँ कन्याओं का समुचित सत्कार नहीं हो सकता, बल्कि वे आरम्भ से ही उपेक्षा की दृष्टि से देखी जाती हैं। उन्हें सुयोग्य बनाने का भी प्रयत्न प्रायः नहीं किया जाता। ऊँची शिक्षा देने-दिलाने की बात तो दूर रही, सूत कातने, कपड़ा बुनने, भात-रोटी आदि भोजन की सामग्री प्रस्तुत करने, तथा सीना-पिरोना आदि उपयोगी कार्यों के ज्ञान से भी वे वंचित रहती हैं, जिससे उन्हें पति-गृह में और भी अधिक कष्ट भोगने पड़ते हैं। कन्याओं के प्रति सभी का यह भाव रहता है कि कन्या ऐसी महाजन है जो हम लोगों से अपना ऋण अदा कराने आयी है, अतएव उसका आदर ही क्या? लोग उनकी उपेक्षा करते हैं। बेचारी कन्याओं के बीमार पड़ने पर प्रायः लोग उनकी चिकित्सा आदि की व्यवस्था भी उस समय नहीं करते, जैसे लड़के के लिये करते हैं। जनसाधारण में ऐसी कहावत प्रसिद्ध है कि ‘बिन ब्याहे बेटी मरे, खड़ी उख बिकाय। बिन मारे बैरी मरे, दोनों कुल तर जाय।”

एक ही घर में लड़कों को सुन्दर चीजें खिलायी-पिलायी जाती हैं और कन्याओं को उन चीजों से यत्नपूर्वक वंचित रखा जाता है। तिलक-देहज के कारण जब कन्याओं के लिए वर-घर उपयुक्त नहीं मिलते, तो लोग उन्हें अभागिनी और बुरे लक्षणों वाली कह कर अपमानित किया करते हैं विशेष तिलक-देहज के भय से कुछ लोग अपनी कन्या का विवाह बूढ़े, रोगी एवं भारी अयोग्य पुरुष के साथ करने में भी संकोच नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने में उन्हें कम खर्च करना पड़ता है। कहीं-कहीं तिलक-देहज की परेशानी के कारण कन्या के उपयुक्त घर और वर नहीं मिलते, तो उनके अभिभावक व्यर्थ के मोह में पड़ कर मरते हुए भी देखे जाते हैं। कन्या खरीद कर जो विवाह करने वाले हैं, उनमें अधिकाँश से लोग ऐसे होते हैं, जिनका विवाह करना निर्धनता आदि कई कारणों से उनके परिवार वाले पसंद नहीं करते। जिस दिन से नव-वधू पति गृह में जाती है, उस दिन से वहाँ अनेकों लड़ाई-झगड़े खड़े हो जाते हैं। वह परिवार नरक से भी भयानक हो जाता है। उस विवाहिता रमणी को तरह-तरह के दुखों का सामना करना पड़ता है और उसकी संतानें भी दुखों से बची नहीं रहतीं।

तिलक-दहेज देकर जो कन्याओं का विवाह करते हैं, उनके यहाँ यदि कोई दूसरी लड़की है, तो उसी अनुपात से उन्हें उसके विवाह में रुपये आदि भी खर्च करने पड़ते हैं, यदि उनके भाई या परिवार के और किसी आदमी के कोई लड़की है और उसके तिलक-दहेज में बुरा कुछ भी कम हुआ, तो उसका फल बहुत बुरा होता है। उनके घर में शीघ्र ही वैमनस्य फैल जाता है। तरह-तरह के लड़ाई-झगड़े खड़े होकर उस परिवार का नाश करके ही छोड़ते हैं। कितने ही लोगों को तो कन्या-विक्रय और वर-विक्रय की कुप्रथा के कारण इतना अधिक खर्च करना पड़ता है कि वे बहुत जल्द राह के भिखारी बन जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 20

👉 The Roots of Fulfillment

Most thinkers, philosophers of the world opine that self-evolution is a natural desire, and tendency of every living being. In fact this is what lies behind one’s quest for progress and joy… All efforts, all competitions and struggles for worldly possessions, sensual pleasures, ego-satisfaction emanate from this rootcause in the deepest depth, though we don’t realize it because of our extrovert
attitude and illusions of letting the worldly substances and circumstances as the keys to a treasure of joy.

One earns money with hard work and keeps saving it to get more and more. Why? Because, he ‘feels’ it like a source of joy. But the same fellow might spend his savings in gorgeous arrangements of his child’s marriage? Why? Because that might give him a ‘feeling’ of greater pleasure of making his child happy or gaining prestige in the society or what not…! A dacoit risks his life in bringing huge wealth in loot, but what does he do of it? He might just throw it in drinking liquor; because for him that might appear to be a greater source of pleasure than saving the money or using it some other ways.

If the savings are consumed in religious alms or treatment of a disease, one does not feel as bad as one would, if the same amount was lost due to burglary. So what we see common in all these examples and perhaps in every action of our life is that one opts for what he or she feels or thinks as more satisfying, although this satisfaction or joy might be just circumstantial, illusory and short-lived. Deeper thinking would indicate that the root of this quest for joy or fulfillment lies beneath the sublime core of eternal quest of the self for ascent, for betterment, for unbounded evolution… Then we would then attempt for the absolute unalloyed bliss, ultimate fulfillment.

📖 Akhand Jyoti, June 1940

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 March 2020

■ जो हीन बुद्धि हैं, वे ही सिद्धाई चाहते हैं। बीमारी को अच्छा करना, मुकदमा जिता देना, जल के ऊपर से चलना-ये सब (सिद्धाई हैं)। जो भगवान् के भक्त हैं, वे ईश्वर के पादपद्मों को छोड़ कर और कुछ भी नहीं चाहते हैं। जिनकी थोड़ी बहुत सिद्धाई हो, उनकी प्रतिष्ठा-लोकमान्य होती है। व्याकुल होकर भगवान् की प्रार्थना करो। विवेक के लिए प्रार्थना करो। ईश्वर ही लक्ष्य है, और सब अनित्य है, इसी का नाम विवेक है। जल-छादन (जल छानने के महीन कपड़े) से जल छान लेना होता है। मेला-कूड़ा कर्कट एक तरफ रहता है, और अच्छा जल दूसरे तरफ पड़ता है। तुम उनको (ईश्वर को) जान कर संसार को छोड़ो इसी का नाम विद्या का संसार है।

□  नाना मत हैं। ‘मत का पन्थ’ अर्थात् जितने मत हैं उतने ही पन्थ हैं। किन्तु सभी मानते हैं कि-‘मेरा मत ही ठीक है - मेरी ही घड़ी ठीक चल रही है।’ सत्य कथा - सत्य बोलना कलि की तपस्या है। कलियुग में अन्य तपस्या कठिन है। सत्य मार्ग पर रहने से भगवान् पाया जाता है। अवतार या अवतार के अंश को ईश्वर कोटि कहते हैं, और साधारण लोगों का जीवन या जीव-कोटि। जो जीव कोटी के हैं, वे साधनाएं कर ईश्वर का लाभ कर सकते हैं। वे (निर्विकल्प) समाधि से फिर लौटते नहीं हैं।

◆ जो ईश्वर कोटी हैं, वे मानो राजा के बेटे हैं, और मानों सात मंजिल वाले मकान की चाबी उनके हाथ में है। वे सातों मंजिलों तक चढ़ जाते हैं, फिर इच्छानुसार उतर भी आ सकते हैं। जीव कोटी मानो छोटे कर्मचारी (नौकर) हैं वे सात मंजिल के कुछ दूर तक पहुँच सकते हैं।जनक ज्ञानी थे। साधनाएं कर उन्होंने ज्ञान लाभ किया था। शुकदेव थे ज्ञान की मूर्ति। शुकदेव का साधनाएं कर ज्ञान लाभ करना नहीं हुआ था। नारद में भी शुकदेव के जैसा ब्रह्मज्ञान था। किन्तु वह भक्ति लेकर था। लोकशिक्षा के लिए प्रहलाद कभी ‘सोऽहं’ भाव में रहते, फिर कभी दास भाव में और कभी सन्तान भाव में रहते थे। हनुमान की भी वैसी अवस्था थी।
✍🏻 रामकृष्ण परमहंस के उपदेश

सोमवार, 9 मार्च 2020

👉 हमारी होली

ऐसी होली जले ज्ञान की ज्योति जगत मे भरदे।
कलुषित कल्मष जले, नाश पापों तापों का कर दे ।।


आप अपने जीवन में कितनी होलियाँ मना चुके, कितने दिवालियाँ बिता चुके, सावन, सनुने, दौज, दशहरे अबतक कितने बिता दिये, जरा उँगलियों पर गिन कर बताइये तो कितनी बार आपने धूम- धाम से तैयारियाँ  की और कितनी बार आनन्द सामग्री को विसर्जित किया। आपने उनमें खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परन्तु ओस की बूँदें ठहरीं कब? वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ीं और धूलि में समा गईं। इस बार की होली भी ऐसी ही होनी है। चैत बदी प्रतिपदा, दौज, तीज के बाद त्योहार की एक धुँधली सी स्मृति रह जायगी। और चौथ, पाँचें को ही कोई कष्ट आ गया तो भूल जायेंगे कि इसी सप्ताह हमने किसी त्योहार का आनंद भी उठाया था। ऐसे अस्थिर आनंद पर मेरी बधाई कुछ ज्यादा उपयुक्त न होती पर यह छाया दर्शन भी कोई दुख की बात नहीं है।

मैं चाहता हूँ कि आप इस होली पर खूब आनंद मनायें और साथ ही यह भी चिन्तन करें कि जिसकी यह छाया है उस अखण्ड आनन्द को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरी युग- युग की प्यास कैसे बुझ सकती है? इस अँधेरे में कहाँ से प्रकाश पा सकता हूँ जिससे अपना स्वरूप और लक्ष्य की ओर बढ़ने का मार्ग भली प्रकार देख सकूँ ?? सच्चे अमृत को मैं कैसे और कहाँ से प्राप्त कर सकता हूँ ??

आइये, उस अखण्ड आनन्द को प्राप्त करने के लिए हृदयों में होली जलावें। सच्चे ज्ञान की ऐसी उज्ज्वल ज्वाला हमारे अन्तरों में जल उठे जिसकी लपटें आकाश तक पहुँच। अन्तर के कपट खुल जावें और उस दीप्त प्रकाश में अपना स्वरूप परख सकें। दूसरे पड़ोसी भी उस प्रकाश का लाभ प्राप्त करें। चिरकाल के जमा हुए झाड़ झंखाड़ इस होलिका की ज्वाला में जल जावें। विकारों के राक्षस जो अँधेरी कोठरी में छिपे बैठे हैं और हमें भीतर ही भीतर खोंट खोंप कर खा रहे हैं इसी होलिका में भस्म हो जावें। अपने सब पाप तापों को जला कर हम लोग शुद्ध स्वर्ण की तरह चमकने लगें। उसी निर्मल शरीर से वास्तविक आनन्द प्राप्त किया जा सकेगा।
अखण्ड- ज्योति परिवार के हृदयों में ईश्वर ऐसी ही होली जला दें।
यही आज मेरी प्रार्थना है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 8 मार्च 2020

👉 सच्चा भक्त

एक राजा था जो एक आश्रम को संरक्षण दे रहा था। यह आश्रम एक जंगल में था। इसके आकार और इसमें रहने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती जा रही थी और इसलिए राजा उस आश्रम के लोगों के लिए भोजन और वहां यज्ञ की इमारत आदि के लिए आर्थिक सहायता दे रहा था। यह आश्रम बड़ी तेजी से विकास कर रहा था। जो योगी इस आश्रम का सर्वेसर्वा था वह मशहूर होता गया और राजा के साथ भी उसकी अच्छी नजदीकी हो गई। ज्यादातर मौकों पर राजा उसकी सलाह लेने लगा। ऐसे में राजा के मंत्रियों को ईर्ष्या होने लगी और वे असुरक्षित महसूस करने लगे। एक दिन उन्होंने राजा से बात की – ‘हे राजन, राजकोष से आप इस आश्रम के लिए इतना पैसा दे रहे हैं। आप जरा वहां जाकर देखिए तो सही। वे सब लोग अच्छे खासे, खाते-पीते नजर आते हैं। वे आध्यात्मिक लगते ही नहीं।’ राजा को भी लगा कि वह अपना पैसा बर्बाद तो नहीं कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर योगी के प्रति उसके मन में बहुत सम्मान भी था। उसने योगी को बुलवाया और उससे कहा- ‘मुझे आपके आश्रम के बारे में कई उल्टी-सीधी बातें सुनने को मिली हैं। ऐसा लगता है कि वहां अध्यात्म से संबंधित कोई काम नहीं हो रहा है। वहां के सभी लोग अच्छे-खासे मस्तमौला नजर आते हैं। ऐसे में मुझे आपके आश्रम को पैसा क्यों देना चाहिए?’

योगी बोला- ‘हे राजन, आज शाम को अंधेरा हो जाने के बाद आप मेरे साथ चलें। मैं आपको कुछ दिखाना चाहता हूं।’

रात होते ही योगी राजा को आश्रम की तरफ लेकर चला। राजा ने भेष बदला हुआ था। सबसे पहले वे राज्य के मुख्यमंत्री के घर पहुंचे। दोनों चोरी-छिपे उसके शयनकक्ष के पास पहुंचे। उन्होंने एक बाल्टी पानी उठाया और उस पर फेंक दिया। मंत्री चौंककर उठा और गालियां बकने लगा। वे दोनों वहां से भाग निकले। फिर वे दोनों एक और ऐसे शख्स के यहां गए जो आश्रम को पैसा न देने की वकालत कर रहा था। वह राज्य का सेनापति था। दोनों ने उसके भी शयनकक्ष में झांका और एक बाल्टी पानी उस पर भी उड़ेल दिया। वह व्यक्ति और भी गंदी भाषा का प्रयोग करने लगा। इसके बाद योगी राजा को आश्रम ले कर गया। बहुत से संन्यासी सो रहे थे।उन्होंने एक संन्यासी पर पानी फेंका। वह चौंककर उठा और उसके मुंह से निकला – शिव-शिव। फिर उन्होंने एक दूसरे संन्यासी पर इसी तरह से पानी फेंका। उसके मुंह से भी निकला – हे शंभो। योगी ने राजा को समझाया – ‘महाराज, अंतर देखिए। ये लोग चाहे जागे हों या सोए हों, इनके मन में हमेशा भक्ति रहती है। आप खुद फर्क देख सकते हैं।’ तो भक्त ऐसे होते हैं।भक्त होने का मतलब यह कतई नहीं है कि दिन और रात आप पूजा ही करते रहें। भक्त वह है जो बस हमेशा लगा हुआ है, अपने मार्ग से एक पल के लिए भी विचलित नहीं होता। वह ऐसा शख्स नहीं होता जो हर स्टेशन पर उतरता-चढ़ता रहे। वह हमेशा अपने मार्ग पर होता है, वहां से डिगता नहीं है। अगर ऐसा नहीं है तो यात्रा बेवजह लंबी हो जाती है।

भक्ति की शक्ति कुछ ऐसी है कि वह सृष्टा का सृजन कर सकती है। जिसे मैं भक्ति कहता हूं उसकी गहराई ऐसी है कि यदि ईश्वर नहीं भी हो, तो भी वह उसका सृजन कर सकती है, उसको उतार सकती है। जब भक्ति आती है तभी जीवन में गहराई आती है। भक्ति का अर्थ मंदिर जा कर राम-राम कहना नहीं है। वो इन्सान जो अपने एकमात्र लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित है, वह जो भी काम कर रहा है उसमें वह पूरी तरह से समर्पित है, वही सच्चा भक्त है। उसे भक्ति के लिए किसी देवता की आवश्यकता नहीं होती और वहां ईश्वर मौजूद रहेंगे। भक्ति इसलिए नहीं आई, क्योंकि भगवान हैं। चूंकि भक्ति है इसीलिए भगवान हैं।

👉 प्रवाह

प्रवाह इसीलिए है, ताकि पूर्णता पायी जा सके। इस जगत् में जड़ हो या फिर चेतन सभी जाने-अनजाने प्रवाहित हो रहे हैं। काल के किनारों के सहारे सब के सब बहे जा रहे हैं। सृजन, स्थिति, विलय के पड़ावों को पार करता हुआ जड़ जगत् प्रवाहित है। जन्म, बचपन, यौवन, व जरावस्था के पड़ावों को पार करते हुए चेतन जगत् की चैतन्यता भी प्रवाहमान है। गहराई से देखा जाय तो ठहराव व स्थिरता कहीं दिखाई ही नहीं देती। बाबा फरीद शेख यही सोचते हुए सुबह घूम कर लौट रहे थे।
  
लौटते समय उन्होंने नदी तट पर छोटे से झरने का मिलना देखा। राह के सूखे पत्तों को हटाकर वह छोटा सा झरना भागकर नदी से मिल रहा था। उसकी दौड़ फिर नदी में उसका आनन्दपूर्ण मिलन। फिर उन्होंने देखा अरे यह नदी भी तो भाग रही है, सागर से मिलने के लिए, असीम में खोने के लिए। पूर्ण को पाने के लिए यह समस्त जीवन और जगत् राह के सूखे और मृत पत्तों को हटाता हुआ, भागा जा रहा है।
  
क्योंकि सीमा में संताप है, अपूर्णता में अतृप्ति है। बूँद में दुःख है, सुख तो सागर की सम्पूर्णता में है। मनुष्य के सभी दुःखों का कारण उसका अहं की बूंद पर अटक जाना है। इस अटकन के कारण ही वह जीवन के अनन्त प्रवाह से खण्डित हो गया है। इस भाँति वह अपने ही हाथों सूरज को खोकर दीये की धुँधली लौ में तृप्ति खोजने के चक्कर में परेशान है। यहाँ न तो उसे तृप्ति मिल सकती है, और न ही परेशानी मिट सकती है। क्योंकि बूंद- बूंद बनी रहकर कैसे तृप्त हो सकती है। तृप्ति के लिए तो उसे सागर की सम्पूर्णता की ओर बहना होगा।
  
प्रवाहित हुए बिना न तो प्रसन्नता है और न पूर्णता। प्रसन्नता और पूर्णता की अनुभूति पाने के लिए बूंद को मिटना होगा- बहना होगा। उसे सागर की ओर प्रवाहित होकर सागर में मिलना होगा। अहं में अटके-भटके मनुष्य को भी जीवन की धारा में प्रवाहित होकर अनन्त ब्रह्म बनना होगा। अहं प्रवाह में विलीन हो ब्रह्म बने, तभी संतृप्ति व सम्पूर्णता सम्भव है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०२

👉 Maa Ki Mahima मां की महिमा (प्रेरणादायक प्रसंग)

मां की महिमा जानने के लिए एक आदमी स्वामी विवेकानंद के पास आया। इसके लिए स्वामी जी ने आदमी से कहा, ''5 किलो का एक पत्थर कपड़े में लपेटकर पेट पर बांध लो और 24 घंटे बाद मेरे पास आना, तुम्हारे हर सवाल का उत्तर दूंगा।'' दिनभर पत्थर बांधकर वह आदमी घूमता रहा, थक-हारकर स्वामी जी के पास पंहुचा और बोला- मैं इस पत्थर का बोझ ज्यादा देर तक सहन नहीं कर सकता हूं।

स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, ''पेट पर बंधे इस पत्थर का बोझ तुमसे सहन नहीं होता। एक मां अपने पेट में पलने वाले बच्चे को पूरे नौ महीने तक ढ़ोती है और घर का सारा काम भी करती है। दूसरी घटना में स्वामी जी शिकागो धर्म संसद से लौटे तो जहाज से उतरते ही रेत से लिपटकर रोने गले थे। वह भारत की धरती को अपनी मां समझते थे और लिपटकर खूब रोए थे।

सीख- संसार में मां के सिवा कोई इतना धैर्यवान और सहनशील नहीं है। इसलिए मां से बढ़ कर इस दुनिया में कोई और नहीं है।

👉 अपने बाल-बच्चे मत बेचिए! (भाग १)

ऐसी दुर्घटनाएं सदा ही समाचार-पत्रों में इन को मिलती हैं, कि अमुक स्थान में अमुक कन्या ने, जो अत्यन्त होनहार और विवाह के समस्त गुणों से पूर्ण थी, अपने विवाह के पहले आत्महत्या करके अपने प्राण दे दिये। भावुक पाठक का हृदय इसको पढ़कर अवश्य ही व्यग्र और विह्वल हो जाता है, तथा वे इस दुर्घटना के मूल कारणों पर तरह-तरह के अनुमान करने लगते हैं। मेरी समझ में इसके वस्तुतः दो ही कारण होते हैं। एक तो उस कन्या के माँ-बाप या उसके कोई निकट सम्बन्धी उसे किसी अयोग्य पुरुष के साथ रुपये आदि लेकर विवाह करना चाहते हैं, और नहीं तो किसी लड़के का दुष्ट अभिभावक इतना अधिक द्रव्य उस लड़की के पिता भाई या उसके परिवार के और लोगों से चाहता है, जिससे कि उस कन्या के वे सम्बन्धी अत्यन्त विह्वल और व्यग्र हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में उस बेचारी कन्या को जीवन अवश्य ही बोझ मालूम पड़ता है।

क्यों न हो-“सबसे अधिक जाति अपमाना।” नारी-जाति का यह असह्य अपमान जब उसे बर्दाश्त नहीं होता तो वह अपने प्राणों को त्याग देती है। सती ने जिस तरह अपने अपमान और क्रोध की दहन-ज्वाला से अपने पिता के यहाँ प्राण दे दिये थे, ठीक उसी तरह दो एक नहीं, अनेकों देवियाँ हमारे समाज के भयंकर अग्निकुण्ड में वर-विक्रय और कन्या-विक्रय की कुप्रथा के कारण अपने को होम कर देती हैं। कितनी ही कन्याएं आजीवन कुमारी ही रह जाती हैं। उनके अभिभावकों के पास तिलक-दहेज के लिये इतने रुपये नहीं कि जिनसे उनका विवाह कर सकें।

मेरा यह दृढ़विश्वास है कि बहुत सी कन्याएं, जिन्हें अपने भविष्य की कुछ भी चिन्ता है, इस वर-विक्रय और कन्या विक्रय की घातक कुप्रथा के कारण चिंतासागर में डूबी रहती हैं, जंगल के मृग-शावकों की तरह सदैव भयातुर बनी रहती हैं ठीक ही है, जहाँ तिलक-दहेज और कन्या-विक्रय के इतने जबर्दस्त जाल बिछे हुए हैं, वहाँ अभागी कन्या-मृग शावकों को अयोग्य वर-बधिक के जाल में फंस जाना न पड़े यही आश्चर्य है!

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 19

👉 Who Do You Worship – The Divine or the Devil?

Man misidentifies himself as the physical body. Although he has herd something like ‘he has a soul that is different from the body’ but does not quite believe it or is not even able to imagine it. If most of us were not living under this illusion about unity of the self with the living body, this land (India) of great rishis would not have become home to vast spread corruption and confusion. It was this sacred land where Lord Krishna had preached Bhagvad Gita to Arjuna and reminded him that he is not the body. As we have totally forgotten this fact and never bother to know about our own “self”, how could we know the Omnipresent Self, the God?

We are living in a state of utter ignorance and darkness. Whatever suits our deluded convictions or convinces our selfish intellect, that has become the definition of God for us. It is like considering a rope to be a snake because of lack of light. Indeed the rope resembles the shape of a snake and both would look alike if kept at a dark place. But, as we all know they are not the same. It is only our illusion because of which we might confuse one with the other. It is a pity that this is what we the ‘intelligent beings’ have done today by regarding the devil as the divine.

Its time we awaken and ponder over our reality. We should attempt to realize that – the soul is sublime; it is not perceivable by the body or the materialistic means.

📖 Akhand Jyoti, May 1940

शनिवार, 7 मार्च 2020

👉 तू ही है

मैं की भ्रान्ति से समस्त भ्रान्तियाँ पनपती हैं। जिन्हें अपने मैं पर भारी अभिमान है, उन्हें भी ठीक से नहीं पता कि आखिर यह मैं है क्या? रोगी, बीमार, अशक्त होने वाला यह शरीर मैं है? जो बचपन, यौवन और बुढ़ापे के जाने कितने रंग बदलता है। अथवा फिर वह मन है, जो विचारों और भावनाओं के ऊहापोह में पल-पल डूबता-उतराता है। अनुभवी कहते हैं कि मैं तो वह गाँठ है जो आत्मा ने प्रकृति से भ्रमवश बाँध ली है। भ्रम की इस गाँठ के कारण ही जीवन के सारे अनुभवों में भ्रम और भटकन घुल गयी है। यह गाँठ दुखती है, कसकती है, पर खुलती नहीं है। यह खुले तो तब, जब चेत हो।
    
जीवन के अनन्त-असीम प्रवाह पर इस मैं की गाँठ का बन्धन सम्पूर्ण जीवन प्रवाह में अनेकों विसंगतियाँ पैदा कर देता है। इससे व्यक्ति सत्य और स्वयं से टूट जाता है। मैं का बुद्बुदा सत्ता-प्रवाह से अपने को अलग समझ बैठता है। जबकि बुद्बुदे की कोई सत्ता नहीं है, उसका कोई केन्द्र नहीं है। वह सागर ही है, सागर ही उसका जीवन है। सागर से पृथक् सत्ता का बोध ही अज्ञान है। बुद्बुदे के मूल में भी तो सागर की अनन्त जलराशि ही है।
    
सूफी सन्तों में एक कथा कही जाती है- प्रेयसी के द्वार पर किसी ने दस्तक दी। भीतर से आवाज आयी, कौन है? जो द्वार के बाहर खड़ा था, उसने कहा, मैं हूँ। उत्तर में उसे सुनायी दिया, यह घर ‘मैं’ और ‘तू’ दो को नहीं सँभाल सकता है। और बंद द्वार बंद ही रहा। प्रेमी वन में चला गया। उसने तप किया, उपासनाएँ की, भक्ति में स्वयं को समर्पित किया। बहुत सालों बाद वह लौटा और पुनः उसने द्वार खटखटाए। दुबारा फिर वही सवाल पूछा गया- बाहर कौन है? लेकिन इस बार द्वार खुल गए, क्योंकि उसका उत्तर दूसरा था- ‘तू ही है’। यह उत्तर तू ही है, समस्त आध्यात्मिक जीवन का सार है। क्योंकि इसमें अपने क्षुद्र मैं की सर्वव्यापी परमात्मा की सत्ता में विलय की दिव्य अनुभूति है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०१

👉 आप के निमार्ण-कार्य (अन्तिम भाग)

देश के प्रति भी आपका कुछ कर्तव्य है। राष्ट्र को आपकी सेवाओं की आवश्यकता है। आज हमारे देश में उत्साह है, जनता में हलचल है, प्रत्येक हृदय में प्रेरणा है कि राष्ट्र निर्माण किया जाये। किन्तु क्या किया जाय? हम कहते हैं आपको अपनी शक्ति के अनुसार नागरिक शिक्षा, जनता को उसके अधिकार और कर्त्तव्यों की शिक्षा देना, प्रवासी भारतीय, रंग-भेद को दूर करना, नाना वादों की शिक्षा, राजनीति का ज्ञान प्रदान करना है। राष्ट्र-निर्माण का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है और समस्याएं भी गम्भीर हैं। सम्भव है आपके लिए यही क्षेत्र उपयुक्त हो।

राष्ट्र भाषा के निर्माण की समस्या यथेष्ट महत्व की है। मद्रास, बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र इत्यादि भागों में हिन्दी प्रचार का बीड़ा उठाकर आप अमर बन सकते हैं अपने समय का सदुपयोग हिन्दी के लेख, पुस्तकें लिखकर, हिन्दी में भाषण देकर, जन जागृति द्वारा, अशिक्षित जनता में ज्ञान का प्रकाश प्रदान कर अन्य भारत की 90 प्रतिशत जनता को हिन्दी बोलना लिखना सिखा सकते हैं।

हमारे देश के 75 प्रतिशत व्यक्तियों को भरपेट भोजन तक प्राप्त नहीं होता। उनके लिए उद्योग, धन्धे, घरेलू कार्य, स्त्रियों के लिए सिलाई, बुनाई, कताई, नर्सिंग अध्यापन इत्यादि की शिक्षा दे सकते हैं। जिस देश में जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही हो, तथा अस्पृश्यता हो, धर्म में मायाचार लूट-पाट चल रही हो, पंडित महन्त इत्यादि जनता को ठग रहे हों, नारियों का निरादर हो, उस देश में आपके लिए निर्माण कार्य की न्यूनता नहीं है।

अवकाश निकालिये। विद्यार्थियों को यथेष्ट समय निर्माण-कार्य के लिए प्राप्त हो सकता है, जैसे रविवार दो-दो चार-चार दिन की छुट्टियाँ, दशहरे और बड़े दिन की छुट्टियाँ, ग्रीष्मावकाश। इसी प्रकार अन्य व्यक्ति भी अपना समय निकाल कर सार्वजनिक सेवा में लगा सकते हैं। राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति को सहयोग देकर जीवन सफल करना चाहिये।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 14

बुधवार, 4 मार्च 2020

👉 Jeevan Me Sukh Chahiye जीवन में सुख चाहिए

एक व्यक्ति था. उसके पास नौकरी, घर-परिवार, रुपया-पैसा, रिश्तेदार और बच्चे सभी कुछ था। कहने का सार यह है उस व्यक्ति के पास किसी चीज़ की कोई कमी नही थी। अब जीवन है तो कुछ परेशानियां भी थी उसके जीवन में, जिससे हर पल वह जूझता ही रहता था। वह किसी भी तरह अपनी परेशानियों से मुक्ति चाहता था, कि जीवन में सुख-शांति से रह सके।

एक बार किसी ने उसे बताया की नगर सीमा पर कोई बहुत बड़े संत ठहरे हुए है, जिनके पास हर समस्या और प्रश्न का हल है। इतना सुनते ही वह व्यक्ति भागा-भागा संत की कुटिया में पहुँचा. वहाँ भीड़ बहुत होने के कारण उसकी बारी आते-आते रात हो गई। उसने संत से पूछा, बाबा, मेरे जीवन की परेशानियां कैसे ख़त्म होगी? मैं भी सुख-शांति से जीवन जीना चाहता हूँ।

संत ने कहा, ”इसका उत्तर मैं कल सुबह दूंगा। तब तक तुम एक काम करो. मेरे साथ जो ऊँटों का रखवाला आया था वो बीमार हो गया। तुम आज की रात ऊँटों की देखभाल का जिम्मा ले लो. जब यह सभी ऊँट सो जायें, तब तुम भी सो लेना।

सुबह वह व्यक्ति संत के पास पहुँचा और कहने लगा, मैं तो रात भर जगा रहा, सो ही नही पाया. कभी कोई ऊँट खड़ा हो जाता है तो कभी कोई. एक को बिठाने का प्रयास करता हूँ तो दूसरा खड़ा हो जाता है। कई ऊँट तो बैठना ही नही चाहते तो कई ऊँट थोड़ी देर में अपने आप बैठ जाते है। कुछ ऊँटों ने तो बैठने में बहुत ही समय लिया। मैं तो सारी रात भाग-दौड़ ही करता रहा।

संत ने मुस्कुराहट के साथ कहा, यही तुम्हारे कल के प्रश्नों का उत्तर है. कल पूरी रात का घटनाक्रम तुम्हारा जीवन है। अगर ऊँटों को परेशानियां मान ली जायें, तो समझना आसान होगा कि जीवन में कभी भी किसी भी क्षण सारी परेशानियां ख़त्म नही हो सकती। कुछ ना कुछ हमेशा लगा ही रहेगा. लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नही है कि हम जीवन का आनंद ही ना ले। हमें समस्याओं के बीच रहते हुए भी सुख के पल खोजने होंगे।

संत ने आगे कहा, अगर तुम्हारें जीवन में समस्याओं का ताँता लगा हुआ है तो उन्हें सुलझाने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन हर पल उनके पीछे ही नही भागना चाहिए. ऊँटों के व्यवहार से तुम जान गये होंगे कि कुछ समस्याएं कोशिशों से ख़त्म हो जाती है, तो कुछ अपने आप सुलझ जाती है, कुछ पे कोई असर नही होगा और कुछ समय के साथ धीरे-धीरे सुलझ जाएंगी।

लेकिन इस बीच कुछ नई समस्याएं भी जन्म लेगी, जिनका सामना भी ऐसे ही करना पड़ेगा और इस तरह जीवन चलता ही रहेगा। अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम इस बीच जीवन में आनंद लेते हो या समस्याओं के पीछे हैरान-परेशान व दुखी होकर भागते रहते हो।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Aanad Andar Hai



👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 3 March



👉 आप के निमार्ण-कार्य (भाग २)

आपको निम्न आदतें छोड़ देनी चाहिएं - निराशावादिता, कुढ़न, क्रोध, चुगली और ईर्ष्या। इनका आन्तरिक विष मनुष्य को कभी भी पनपने नहीं देता, समाज में निरादर होता है, आन्तरिक विद्वेष से मनुष्य निरन्तर दग्ध होता रहता है। बात को टालने की एक ऐसी गन्दी आदत है जिससे अनेक व्यक्ति अपना सब कुछ खो बैठे हैं। इनके स्थान पर सहानुभूति, आशावाद, प्रेम, सहनशीलता, संयम की आदतें लोक एवं परलोक दोनों में मनुष्य को सन्तुष्ट रखती हैं। यदि हम आत्मनिर्माण में अपना समय लगायें, तो हमारा जीवन बहुत ऊँचा उठ सकता है।

अमर आत्माओं। जीवन का, उच्च सात्विक और कलात्मक जीवन का निर्माण करो। अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठाओ। मानसिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए स्वाध्याय करो, अधिक से अधिक ज्ञान संचय करो। आत्मोन्नति एवं आत्मतुष्टि के लिए नियमित रीति से आध्यात्मिक ग्रन्थों का पठन-पाठन, अध्ययन, मनन, विद्वानों के सत्संग, भाषण सुनना एक चिर साधना है जिनसे लोग श्रद्धालु होते हैं, संसृति का निर्माण होता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास स्वभाव-निर्माण, चरित्र-निर्माण, सुखी जीवन-निर्माण के लिए विस्तृत कार्य क्षेत्र काम करने के लिए खाली पड़ा है।

अपने भविष्य का निर्माण स्वयं आपके हाथ में है। आज के कार्यों द्वारा आपका भविष्य निर्माण होना है। आप आज जो परिश्रम, और उद्योग कर रहे हैं, उन्हीं के बल पर भविष्य का निर्माण हो सकेगा।

समाज निर्माण कीजिए। आपके समाज में विस्तृत कार्य क्षेत्र हैं जिसमें आपके योग की आवश्यकता है। आपके समाज में इस उन्नत युग में अनमेल विवाह, बाल-विवाह, बहु-विवाह, छूत-अछूत, मजदूर और पूँजीपति, किसान और जमींदार, कृषि की उन्नति, समाज से अशिक्षा को दूर करने की असंख्य छोटी बड़ी अनेक समस्याएं फैली हुई हैं। अपनी जीविका के उपार्जन के पश्चात आप इनमें से कोई भी क्षेत्र छाँट सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 13

👉 दृश्य जीवन की अदृश्य जड़ें

दृश्य की जड़ें हमेशा अदृश्य रहती हैं। पत्तों की हरियाली और रंग-बिरंगे फूलों की खुशबू को लिए झूमते हुए पेड़ों की जड़ें हमेशा जमीन के अन्दर रहती हैं। पत्तों से छलकता पौधों का जीवन, उनकी हरियाली, चमक सभी के जीवन में आनन्द बिखेरती हैं। इनके आस-पास से जो भी गुजरता है, वही इन पौधों के जीवन संगीत को अनुभव करता है। हालांकि इस अनुभूति को पाने वालों में से शायद कुछ को ही पता हो कि इस हरियाली और खुशबू से झरने वाले आनन्द का आधार जमीन के अन्दर है। जिसे सतह से कभी देखा नहीं जा सकता।
  
यह सच तो तब पता चलता है जब कोई इन पेड़ों को, पौधों को उनकी जड़ों से अलग करता है। जड़ों से नाता टूटते ही इन पेड़-पौधों की साँसें टूट जाती हैं। उनकी चेतना और चैतन्यता समाप्त हो जाती है। जमीन से हट जाने पर यही होता है। सारा खेल जड़ों का है। न दिखने पर भी, अदृश्य रहने पर भी, जीवन का सारा रहस्य उन्हीं में है। पेड़-पौधों की ही तरह मनुष्य की भी जड़ें होती हैं। उसके दृश्य जीवन का सारा रहस्य अदृश्य में छुपा होता है। न दिखने वाले संस्कार, कर्मबीज ही जीवन के विविध शुभ-अशुभ घटनाक्रमों में प्रकट होते हैं। यूँ तो चक्र, ग्रन्थियाँ, उपत्यिकायें, ब्रह्मरन्ध्रिकाएँ कहीं ऊपर से नजर नहीं आतीं। परन्तु इन्हीं के माध्यम से हमें विराट्-ब्रह्माण्ड की अदृश्य सूक्ष्मता में व्याप्त प्राण व प्रकाश मिलता है। किसी भी कारण यदि इसमें गतिरोध आ जाए तो दृश्य जीवन का क्रम संकट में पड़ जाता है।
  
आल्वेयर कामू ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि मनुष्य जीवन की एक मात्र-महत्वपूर्ण समस्या दृश्य जीवन की अदृश्य जड़ों को न समझ पाना है। यही वजह है कि अब मनुष्य को जीवन में कोई प्रयोजन नजर नहीं आता। सब कुछ व्यर्थ और निष्प्रयोजन हो गया है। मूल जीवन स्रोत के खो जाने से यह परिणति स्वाभाविक है। समस्या का समाधान तभी सम्भव है जब इन्सान अपनी जड़ें व जमीन को पा ले। ये जड़ें आत्मा व चित्त की हैं और वह जमीन धर्म की है। ऐसा हो जाए तो मनुष्यता में फिर से फूल खिल सकते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २००

👉 इच्छा शक्ति का केन्द्रीकरण

इच्छा शक्ति का केन्द्रीकरण तथा पूरी तत्परता के साथ प्रयत्नशील रहना ही वह आधार है जिसके बल पर इच्छित उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। मनुष्य उन्हीं वस्तुओं अथवा उपलब्धियों को प्राप्त कर सकता है जिनके लिए वह आग्रहपूर्वक प्रयत्न करता है। अगर किसी लक्ष्य विशेष का निर्धारण न कर काम किया जाए तो उसका परिणाम भी शून्य या नगण्य ही रहेगा और कहना नहीं होगा कि लक्ष्य का निर्धारण तभी होता है जब मन में किसी विशिष्ट आकांक्षा का निवास हो और उसे प्राप्त करने के लिए तत्परता के स्तर की व्यग्रता हो। अनेक जीव-जंतु कीट पतंगे फूलों के आस-पास घूमते रहते हैं, पर उनमें से केवल मधुमक्खी ही शहद निकालती है, क्योंकि उसे मधु प्राप्त करने की आकांक्षा और व्यग्रता रहती है।

उस संबंध में ब्रिटेन के प्रसिद्ध विचारक कार्लायल का कथन है कि एक ही विषय पर अपनी शक्तियों को एकाग्र करने से कमजोर व्यक्ति भी बहुत कुछ कर सकता है, जबकि बलवान व्यक्ति भी यदि अपनी शक्तियों को कई दिशाओं में बिखेर देता है तो वह बलवान होते हुए भी कुछ नहीं कर सकता। एक-एक बूँद पानी अगर एक ही स्थान पर निरंतर पड़ता रहे तो कड़े-से-कड़े पत्थर में भी छेद हो जाता है लेकिन यदि पानी का बड़ा भारी बहाव भी शीघ्रतापूर्वक उसके ऊपर से निकल जाए तो उसका नाम-निशान भी उस पर नहीं दिखाई पड़ता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृ. २०

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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