गुरुवार, 11 जनवरी 2018
👉 MY LIFE: An indivisible Lamp (Akhand-Deepak) (Last Part)
🔷 Don’t you know I have five bodies? But fifties of persons know that at one place I do one job and at other place I do another job. At one time I keep writing and at the same time my books keep being prepared & published. Don’t you see me sitting at one place; I regularly come & sit here from morning to evening, again do PUJA at night and sleep. I again do PUJA at evening. Do you see me sitting idle? Which time I write, do you know? I have eight full hours.
🔶 I write for eight full hours and eight hours are devoted to my GURUDEV, writing magazines & other articles, epics. I continue to write for eight full hours but you do not know from where come these eight hours. I am not a single person, I am many persons. There live five persons in the same nest. It is told there are five receptacles in the same body. My five receptacles function as five independent persons.
🔷 I will take care of you. My love will be showering on you. I am sending you off, but it is not the last. This farewell may be from corporeal point of view, but from soul point of view it is not any farewell. The souls are not listened to have died; the love between the souls cannot be ended. I have been grabbing all of you for so many last times through love and will not set you free unless either of you or me is not reached at a decisive stage.
🔶 Either only I will go to hell or you too will be accompanying me to heaven. Either the dog will go to heaven with YUDHISTIR or YUDHISTIR will have to stay with god on the earth. I do not assume you and me comparable to aforesaid statement as it is far above our status. But I am of the view that you have been associated with me for so many births leading me to again pull you towards me. I have pulled you to near me so that I could pour all my love over you.
Finished, today’s session.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
🔶 I write for eight full hours and eight hours are devoted to my GURUDEV, writing magazines & other articles, epics. I continue to write for eight full hours but you do not know from where come these eight hours. I am not a single person, I am many persons. There live five persons in the same nest. It is told there are five receptacles in the same body. My five receptacles function as five independent persons.
🔷 I will take care of you. My love will be showering on you. I am sending you off, but it is not the last. This farewell may be from corporeal point of view, but from soul point of view it is not any farewell. The souls are not listened to have died; the love between the souls cannot be ended. I have been grabbing all of you for so many last times through love and will not set you free unless either of you or me is not reached at a decisive stage.
🔶 Either only I will go to hell or you too will be accompanying me to heaven. Either the dog will go to heaven with YUDHISTIR or YUDHISTIR will have to stay with god on the earth. I do not assume you and me comparable to aforesaid statement as it is far above our status. But I am of the view that you have been associated with me for so many births leading me to again pull you towards me. I have pulled you to near me so that I could pour all my love over you.
Finished, today’s session.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 6)
🔶 मित्रो, ज्ञानयोग उस चीज का नाम है, जिसमें कि अपने भीतर चिंतन में जो अवांछनीय तत्त्व घुलते चले जाते हैं, उनको हम हिम्मत के साथ रोकें और जिन चीजों की आवश्यकता है, जो चिंतन हमारे भीतर आना चाहिए उस चिंतन को बुला करके-निमंत्रित करके अपने भीतर स्थिर करें, तो हमारा मस्तिष्क वह हो सकता है जिसे हम ज्ञान का भण्डार कह सकते हैं।
🔷 विद्या की दृष्टि से, ज्ञान की दृष्टि से, सुलझाव की दृष्टि से एक से एक बहुमूल्य चीजें इसके भीतर से निकलती हुई चली आ सकती हैं। ज्ञान की गंगा हमले मस्तिष्क में से वैसी ही बह सकती है जैसे कि शंकर जी के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती थी। हमारे मस्तिष्क में संतुलन का चंद्रमा उसी तरीके से टँगा रह सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर टँगा हुआ था और हमारा तीसरा नेत्र-विवेक का नेत्र, दूरदर्शिता का नेत्र उसी तरीके से खुल सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर खुला हुआ था। मित्रो, यह ज्ञानयोग की साधना है। प्रकाश चमकना चाहिए हमारे ज्ञान को और विचारों को संतुलित और सुव्यवस्थित करने के लिए।
🔶 अगर आपको ऐसा ज्ञान आए तो में समझूँगा कि हमने आपको अनुष्ठान में और साधना स्वर्ण-जयंती वर्ष में सम्मिलित करके जिस ध्यान की बाबत बताया है उसको आपने जान लिया और उसका व्यवहारिक स्वरूप समझ गए। अगर आप उसका व्यावहारिक रूप नहीं जान पाए और कल्पनालोक में ही उड़ते रहे तो फिर ख्वाब ही देखते रहेंगे, सपने ही देखते रहेंगे। अध्यात्म सपना नहीं व्यावहारिक है। यह हमारे इसी जीवन से ताल्लुक रखता है और आज से ताल्लुक रखता है। ख्वाबों का अध्यात्म नहीं है, सपनों का अध्यात्म नहीं है। ख्वाबों का-सपनों का भगवान नहीं है। भगवान है तो वह जो हमारे आज के अभी के जीवन में आना चाहिए और हमारे व्यक्तित्व के रूप में प्रकट होना चाहिए। हमारे भीतर से प्रकट होना चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
🔷 विद्या की दृष्टि से, ज्ञान की दृष्टि से, सुलझाव की दृष्टि से एक से एक बहुमूल्य चीजें इसके भीतर से निकलती हुई चली आ सकती हैं। ज्ञान की गंगा हमले मस्तिष्क में से वैसी ही बह सकती है जैसे कि शंकर जी के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती थी। हमारे मस्तिष्क में संतुलन का चंद्रमा उसी तरीके से टँगा रह सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर टँगा हुआ था और हमारा तीसरा नेत्र-विवेक का नेत्र, दूरदर्शिता का नेत्र उसी तरीके से खुल सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर खुला हुआ था। मित्रो, यह ज्ञानयोग की साधना है। प्रकाश चमकना चाहिए हमारे ज्ञान को और विचारों को संतुलित और सुव्यवस्थित करने के लिए।
🔶 अगर आपको ऐसा ज्ञान आए तो में समझूँगा कि हमने आपको अनुष्ठान में और साधना स्वर्ण-जयंती वर्ष में सम्मिलित करके जिस ध्यान की बाबत बताया है उसको आपने जान लिया और उसका व्यवहारिक स्वरूप समझ गए। अगर आप उसका व्यावहारिक रूप नहीं जान पाए और कल्पनालोक में ही उड़ते रहे तो फिर ख्वाब ही देखते रहेंगे, सपने ही देखते रहेंगे। अध्यात्म सपना नहीं व्यावहारिक है। यह हमारे इसी जीवन से ताल्लुक रखता है और आज से ताल्लुक रखता है। ख्वाबों का अध्यात्म नहीं है, सपनों का अध्यात्म नहीं है। ख्वाबों का-सपनों का भगवान नहीं है। भगवान है तो वह जो हमारे आज के अभी के जीवन में आना चाहिए और हमारे व्यक्तित्व के रूप में प्रकट होना चाहिए। हमारे भीतर से प्रकट होना चाहिए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
👉 गुरुगीता (भाग 14)
👉 गुरु-चरण व रज का माहात्म्य
🔶 भगवान् भोलेनाथ के मुख से उच्चरित ये महामंत्र गहरे और गहन भावों से भरे हुए हैं। इनका श्रवण और पठन सम्भव है। सामान्य जनों को कुछ अतिशयोक्ति जैसा लगे; किन्तु जो साधक इस पर मनन और निदिध्यासन करेंगे, उन्हें इन महामंत्रों से सत्य और ऋत की प्रकाश किरणें फूटती अनुभव होंगी। इस अनुभूति के क्षणों में उन्हें ऐसा लगेगा कि जो कुछ इन मंत्रों में है, वह तो मात्र संकेत है, यथार्थ तो कहीं और भी अधिक विस्तृत और विराट् है।
🔷 इसे सुस्पष्ट रीति से समझाने के लिए इन पंक्तियों में एक गुरुभक्त साधक की अनुभूति कथा प्रस्तुत की जा रही है। यह अनुभूति कथा सम्पूर्णतया सत्य है। यह सत्य घटना श्री अरविन्द आश्रम पाण्डिचेरी के श्रेष्ठ साधक गंगाधरण के बारे में है। अभी कुछ ही वर्षों पूर्व वह अपनी पार्थिव देह को छोड़कर अपने सद्गुरु के चरणों में विलीन हुए। बातचीत के क्रम में उन्होंने अपने साधनामय जीवन का रहस्य बताते हुए कहा कि श्रेष्ठ, सुगम; किन्तु सर्वाधिक फलदायी एवं प्रभावोत्पादक साधना अपने सद्गुरु के चरणों का चिन्तन और ध्यान है।
🔶 उन्होंने बताया कि जब मैं पाण्डिचेरी आश्रम महर्षि अरविन्द के पास आया, उस समय मेरी उम्र मात्र १७ साल थी। पढ़ा-लिखा कुछ खास था नहीं, सामान्य तमिल बोल पाता था। जिस समय वह अपना अनुभव बता रहे थे उस समय उनकी आयु लगभग ८७ साल थी। तो अपने जीवन के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा- श्री अरविन्द से पहली बार मिलने पर उन्होंने पूछा- तुम यहाँ क्यों आए हो? और क्या चाहते हो? उनके इन सवालों के जवाब में मैंने कहा- प्रभु! मैं नहीं जानता कि मैं क्यों आया हूँ, नहीं मालूम मेरी चाहत क्या है? वैसे तो मैं काफी गरीब हूँ, पर मैं इतना कह सकता हूँ कि मैं यहाँ केवल रोटी खाने के लिए नहीं आया।
🔷 इस सरल उत्तर पर श्री अरविन्द बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने माताजी से कहा कि यह लड़का अपने योग के लिए तैयार है। इसके बाद गंगाधरण जी को आश्रम के कामों में लगा दिया गया। नाली साफ करना, गौशाला की सफाई करना जैसे साधारण काम उन्हें करने पड़ते थे। विगत यादों को कुरेदते हुए गंगाधरण जी ने बताया कि मुझे दिए जाने वाले काम तो अतिसाधारण थे, पर मैं श्री अरविन्द के चरणों का चिन्तन करते हुए उसे भक्ति के साथ करता था। काम के प्रति मेरा यही भाव था कि मैं आश्रम के साधारण काम नहीं; बल्कि अपने सद्गुरु की व्यक्तिगत सेवा कर रहा हूँ।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 26
🔶 भगवान् भोलेनाथ के मुख से उच्चरित ये महामंत्र गहरे और गहन भावों से भरे हुए हैं। इनका श्रवण और पठन सम्भव है। सामान्य जनों को कुछ अतिशयोक्ति जैसा लगे; किन्तु जो साधक इस पर मनन और निदिध्यासन करेंगे, उन्हें इन महामंत्रों से सत्य और ऋत की प्रकाश किरणें फूटती अनुभव होंगी। इस अनुभूति के क्षणों में उन्हें ऐसा लगेगा कि जो कुछ इन मंत्रों में है, वह तो मात्र संकेत है, यथार्थ तो कहीं और भी अधिक विस्तृत और विराट् है।
🔷 इसे सुस्पष्ट रीति से समझाने के लिए इन पंक्तियों में एक गुरुभक्त साधक की अनुभूति कथा प्रस्तुत की जा रही है। यह अनुभूति कथा सम्पूर्णतया सत्य है। यह सत्य घटना श्री अरविन्द आश्रम पाण्डिचेरी के श्रेष्ठ साधक गंगाधरण के बारे में है। अभी कुछ ही वर्षों पूर्व वह अपनी पार्थिव देह को छोड़कर अपने सद्गुरु के चरणों में विलीन हुए। बातचीत के क्रम में उन्होंने अपने साधनामय जीवन का रहस्य बताते हुए कहा कि श्रेष्ठ, सुगम; किन्तु सर्वाधिक फलदायी एवं प्रभावोत्पादक साधना अपने सद्गुरु के चरणों का चिन्तन और ध्यान है।
🔶 उन्होंने बताया कि जब मैं पाण्डिचेरी आश्रम महर्षि अरविन्द के पास आया, उस समय मेरी उम्र मात्र १७ साल थी। पढ़ा-लिखा कुछ खास था नहीं, सामान्य तमिल बोल पाता था। जिस समय वह अपना अनुभव बता रहे थे उस समय उनकी आयु लगभग ८७ साल थी। तो अपने जीवन के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा- श्री अरविन्द से पहली बार मिलने पर उन्होंने पूछा- तुम यहाँ क्यों आए हो? और क्या चाहते हो? उनके इन सवालों के जवाब में मैंने कहा- प्रभु! मैं नहीं जानता कि मैं क्यों आया हूँ, नहीं मालूम मेरी चाहत क्या है? वैसे तो मैं काफी गरीब हूँ, पर मैं इतना कह सकता हूँ कि मैं यहाँ केवल रोटी खाने के लिए नहीं आया।
🔷 इस सरल उत्तर पर श्री अरविन्द बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने माताजी से कहा कि यह लड़का अपने योग के लिए तैयार है। इसके बाद गंगाधरण जी को आश्रम के कामों में लगा दिया गया। नाली साफ करना, गौशाला की सफाई करना जैसे साधारण काम उन्हें करने पड़ते थे। विगत यादों को कुरेदते हुए गंगाधरण जी ने बताया कि मुझे दिए जाने वाले काम तो अतिसाधारण थे, पर मैं श्री अरविन्द के चरणों का चिन्तन करते हुए उसे भक्ति के साथ करता था। काम के प्रति मेरा यही भाव था कि मैं आश्रम के साधारण काम नहीं; बल्कि अपने सद्गुरु की व्यक्तिगत सेवा कर रहा हूँ।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 26
बुधवार, 10 जनवरी 2018
👉 कंजूस और सोना
🔶 एक आदमी था, जिसके पास काफी जमींदारी थी, मगर दुनिया की किसी दूसरी चीज से सोने की उसे अधिक चाह थी। इसलिए पास जितनी जमीन थी, कुल उसने बेच डाली और उसे कई सोने के टुकड़ों में बदला। सोने के इन टुकड़ों को गलाकर उसने बड़ा गोला बनाया और उसे बड़ी हिफाजत से जमीन में गाड़ दिया। उस गोले की उसे जितनी परवाह थी, उतनी न बीवी की थी, न बच्चे की, न खुद अपनी जान की। हर सुबह वह उस गोले को देखने के लिए जाता था और यह मालूम करने के लिए कि किसी ने उसमें हाथ नहीं लगाया! वह देर तक नजर गड़ाए उसे देखा करता था।
🔷 कंजूस की इस आदत पर एक दूसरे की निगाह गई। जिस जगह वह सोना गड़ा था, धीरे-धीरे वह ढूँढ़ निकाली गई। आखिर में एक रात किसी ने वह सोना निकाल लिया।
🔶 दूसरे रोज सुबह को कंजूस अपनी आदत के अनुसार सोना देखने के लिए गया, मगर जब उसे वह गोला दिखाई न पड़ा, तब वह गम और गुस्से में जामे से बाहर हो गया।
🔷 उसके एक पड़ोसी ने उससे पूछा, ''इतना मन क्यों मारे हुए हो? असल में तुम्हारे पास कोई पूँजी नहीं थी, फिर कैसे वह तुम्हारे हाथ से चली गई? तुम सिर्फ एक शौक ताजा किए हुए थे कि तुम्हारे पास पूँजी थी। तुम अब भी खयाल में लिए रह सकते हो कि वह माल तुम्हारे पास है। सोने के उस पीले गोले की जगह उतना ही बड़ा पत्थर का एक टुकड़ा रख दो और सोचते रहो कि वह गोला अब भी मौजूद है। पत्थर का वह टुकड़ा तुम्हारे लिए सोने का गोला ही होगा, क्योंकि उस सोने से तुमने सोनेवाला काम नहीं लिया। अब तक वह गोला तुम्हारे काम नहीं आया। उससे आँखें सेंकने के सिवा काम लेने की कभी तुमने सोची ही नहीं।''
🔶 यदि आदमी धन का सदुपयोग न करे, तो उस धन की कोई कीमत नहीं।
✍🏻 सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
🔷 कंजूस की इस आदत पर एक दूसरे की निगाह गई। जिस जगह वह सोना गड़ा था, धीरे-धीरे वह ढूँढ़ निकाली गई। आखिर में एक रात किसी ने वह सोना निकाल लिया।
🔶 दूसरे रोज सुबह को कंजूस अपनी आदत के अनुसार सोना देखने के लिए गया, मगर जब उसे वह गोला दिखाई न पड़ा, तब वह गम और गुस्से में जामे से बाहर हो गया।
🔷 उसके एक पड़ोसी ने उससे पूछा, ''इतना मन क्यों मारे हुए हो? असल में तुम्हारे पास कोई पूँजी नहीं थी, फिर कैसे वह तुम्हारे हाथ से चली गई? तुम सिर्फ एक शौक ताजा किए हुए थे कि तुम्हारे पास पूँजी थी। तुम अब भी खयाल में लिए रह सकते हो कि वह माल तुम्हारे पास है। सोने के उस पीले गोले की जगह उतना ही बड़ा पत्थर का एक टुकड़ा रख दो और सोचते रहो कि वह गोला अब भी मौजूद है। पत्थर का वह टुकड़ा तुम्हारे लिए सोने का गोला ही होगा, क्योंकि उस सोने से तुमने सोनेवाला काम नहीं लिया। अब तक वह गोला तुम्हारे काम नहीं आया। उससे आँखें सेंकने के सिवा काम लेने की कभी तुमने सोची ही नहीं।''
🔶 यदि आदमी धन का सदुपयोग न करे, तो उस धन की कोई कीमत नहीं।
✍🏻 सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Jan 2018
🔶 योग का उद्देश्य ‘‘चित्त वृत्तियों’’ का संशोधन है ।। पशु- प्रवृतियों को देव आस्थाओं में बदल देने वाल मानसिक उपचार का नाम योग है। योगीजन अपने संगृहीत कुसंस्कारों को उच्चस्तरीय आस्थाओं में परिणत करने के लिए भावनात्मक पुरूषार्थ करते रहते हैं और इन्हीं प्रयत्नों में तल्लीन रहते हैं। जिससे वे उतने ही अंशों में आत्मा को परमात्मा से जोड़ लेता है।
🔷 वातावरण मानवी चिंतन, विचारणा एवं गतिविधि के समन्वय से उत्पन्न होता है। जैसी भी पीढ़ियां बनानी हो ,जैसा भी समाज का ढ़ाँंचा खड़ा करना हो, उसके अनुरूप ही वातावरण बनाना होगा। जब जब भी महामानवों की पीढ़ियां जन्मी हैं, ऐसे सूक्ष्म घटकों के आधार पर ही विकसित हुई है।माहौल को विनिर्मित करने ,वातावरण को बदलने जिसमें श्रेष्ठ मानवों की ढलाई होती चले। आज उज्ज्वलमान व्यक्तियों की आवश्यकता है।
🔶 सेवक कभी अपने मन में ऐसा भाव नहीं लाता कि वह सेवक है। वह अपने स्वामी अथवा सेव्य का आभार मानता है कि उन्होंने अपार कृपा करके उसे सेवा का अवसर प्रदान कि या अर्थात् वह सेवा नहीं कर रहा, अपितु उसके स्वमी उससे सेवा ग्रहण कर रहे हैं। वह उसे जब जिस सेवा के योग्य समझते हैं अथवा जब जैसी इच्छा होती है, वह सेवा ग्रहण करते हैं।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
🔷 वातावरण मानवी चिंतन, विचारणा एवं गतिविधि के समन्वय से उत्पन्न होता है। जैसी भी पीढ़ियां बनानी हो ,जैसा भी समाज का ढ़ाँंचा खड़ा करना हो, उसके अनुरूप ही वातावरण बनाना होगा। जब जब भी महामानवों की पीढ़ियां जन्मी हैं, ऐसे सूक्ष्म घटकों के आधार पर ही विकसित हुई है।माहौल को विनिर्मित करने ,वातावरण को बदलने जिसमें श्रेष्ठ मानवों की ढलाई होती चले। आज उज्ज्वलमान व्यक्तियों की आवश्यकता है।
🔶 सेवक कभी अपने मन में ऐसा भाव नहीं लाता कि वह सेवक है। वह अपने स्वामी अथवा सेव्य का आभार मानता है कि उन्होंने अपार कृपा करके उसे सेवा का अवसर प्रदान कि या अर्थात् वह सेवा नहीं कर रहा, अपितु उसके स्वमी उससे सेवा ग्रहण कर रहे हैं। वह उसे जब जिस सेवा के योग्य समझते हैं अथवा जब जैसी इच्छा होती है, वह सेवा ग्रहण करते हैं।
✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
👉 MY LIFE: An indivisible Lamp (Akhand-Deepak) (Part 1)
🔷 I kindled an incessant lamp, continued to sit before it to count beads of GAYATRI mantra and also continued to emotionally undulate as if I were any snake. I kept asking myself, ‘‘can you light like a lamp to enlighten others?’’ a lamp of the cost of one fourth of a paisa, a little of oil and cotton, if all these taken together can show path to others in the form of a DEEPAK and can sacrifice itself to show others the path then, ‘‘O man! Why can’t you make your life like a Deepak?’’ my incessant Deepak continued to enlighten. I am not one of those who just burn the oil, ghee. I am not among those who misuse the things/ assets. Rather I am among those who believe to refine sentiments through rituals (tools). Thus I continued to refine my sentiments. My life is like a Deepak, enlightening others’ life, guiding the lives of millions of men, opening doors to millions of people. My life is like a Deepak. Enlightening, I have been. From beginning to the end, I have simply been burning.
🔶 I was kindled at the age of 15 years. I know only one thing that I have been burning like a Deepak for the last 60 years. I know nothing else. I have to spend my coming days in HIMAALAYA. What is there in HIMAALAYA? Is there any cinema in HIMAALAYA? Is there any sweet shop in HIMAALAYA? Is there any KACHAORI-SHOP in HIMAALAYA? No there is nothing like that and then what is there? There in HIMAALAYA are wild animals roaring all the night, wild pythons coming out of their holes in night. When in night there comes cold and air makes a different noise, the blood is freezed in veins of body and man finds it difficult to move. I am going to live in such a difficult place that is millions times more dangerous than jail. I am going, for what? For being engulfed in fire so that such a heat is generated within me that could awaken the sleeping fire within millions of people.
🔷 Has slept the honesty of man, the soul of man, the thinking-style of man and have slept the ideals of man. So now the man is alive like a beast-only to eat, sleep and marry. The soul within it has slept. I am going to be engulfed in fire. A dead body has to be either revitalized or reduced to ashes. I am going to generate fire. I am going to toil in order to generate fire, light and sense & knowledge of soul about which I have told you earlier that I had seen at the time of very first visit of my GUERDEV in my house. He gave me a different thinking style and light. I am going for that, so here I go. But wherever I go, I assure you to keep looking at you however you will not be able to see me. You cannot keep a distance from me.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
🔶 I was kindled at the age of 15 years. I know only one thing that I have been burning like a Deepak for the last 60 years. I know nothing else. I have to spend my coming days in HIMAALAYA. What is there in HIMAALAYA? Is there any cinema in HIMAALAYA? Is there any sweet shop in HIMAALAYA? Is there any KACHAORI-SHOP in HIMAALAYA? No there is nothing like that and then what is there? There in HIMAALAYA are wild animals roaring all the night, wild pythons coming out of their holes in night. When in night there comes cold and air makes a different noise, the blood is freezed in veins of body and man finds it difficult to move. I am going to live in such a difficult place that is millions times more dangerous than jail. I am going, for what? For being engulfed in fire so that such a heat is generated within me that could awaken the sleeping fire within millions of people.
🔷 Has slept the honesty of man, the soul of man, the thinking-style of man and have slept the ideals of man. So now the man is alive like a beast-only to eat, sleep and marry. The soul within it has slept. I am going to be engulfed in fire. A dead body has to be either revitalized or reduced to ashes. I am going to generate fire. I am going to toil in order to generate fire, light and sense & knowledge of soul about which I have told you earlier that I had seen at the time of very first visit of my GUERDEV in my house. He gave me a different thinking style and light. I am going for that, so here I go. But wherever I go, I assure you to keep looking at you however you will not be able to see me. You cannot keep a distance from me.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
👉 प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नता का राजमार्ग (भाग 4)
🔶 बुराई की शक्ति अपनी सम्पूर्ण प्रबलता के साथ टक्कर लेती है। इसमें सन्देह नहीं है। ऐसे भी व्यक्ति संसार में हैं जिनसे ‘‘कुशल क्षेम तो है’’ पूछने पर ‘‘आपको क्या गरज पड़ी’’ जैसे उत्तर मिल जाते हैं। ऐसे प्रसंगों से आये दिन भेंट होती है। इनसे टकराया जाये तो मनुष्य का सारा जीवन टकराने में ही चला जाता है। उनसे निबटा न जाय यह तो नहीं कहा जाता, पर किसी भी काम में हमारी विचार और ग्रहण शक्ति सात्विक और ऊर्ध्ववती रहनी चाहिये। शत्रु से युद्ध करते हुये भी उसके गुण, साहस और सूझ-बूझ की प्रशंसा करनी चाहिये।
🔷 यही बात भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सिखाई। जब उसे पता चला कि इस संसार में सब विरोधी ही विरोधी हैं तो भगवान कृष्ण ने समझाया—अर्जुन! भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये इस संसार संग्राम में तू भद्र मनस्कता के साथ युद्ध कर। कोई भी काम करते समय अपने मन को उच्च भावों और संस्कारों से ओत-प्रोत रखना ही सांसारिक जीवन में सफलता का मूल मन्त्र है। यहां निरन्तर टकराने वाले से जो ‘‘अच्छा है सो सब मेरा’’ ‘‘बुरे से प्रयोजन नहीं’’ की धारणा रखने वाला व्यक्ति निश्चय ही अपने जीवन को ऊंचा उठाता और मनुष्य जीवन का वीरोचित लाभ प्राप्त करता है।
🔶 हम जहां रह रहे हैं, उसे नहीं बदल सकते पर अपने आपको बदल कर हर स्थिति से आनन्द ले सकते हैं। सामान्य सतह पर खड़े होकर दीखने वाला दृश्य कम अच्छा लगता है। अट्टालिका पर चढ़ जाने से वही वातावरण और भी व्यापक और अच्छा लगने लगता है। स्वतः की उच्च या निम्न स्थिति के कारण ही संसार अच्छा या बुरा लगता है। जब यह अपने ही हाथ की बात है तो संसार को क्यों बुरा देखें, क्यों बुराइयों का चिन्तन करें। हम भलाई की शक्ति में निमग्न रहकर उच्च स्थिति प्राप्त कर सकते हैं तो ऐसी सुन्दर जीवन व्यवस्था को छोड़ कर अपने आपको दुःखी और दलित क्यों बनावें?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 33
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.33
🔷 यही बात भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सिखाई। जब उसे पता चला कि इस संसार में सब विरोधी ही विरोधी हैं तो भगवान कृष्ण ने समझाया—अर्जुन! भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये इस संसार संग्राम में तू भद्र मनस्कता के साथ युद्ध कर। कोई भी काम करते समय अपने मन को उच्च भावों और संस्कारों से ओत-प्रोत रखना ही सांसारिक जीवन में सफलता का मूल मन्त्र है। यहां निरन्तर टकराने वाले से जो ‘‘अच्छा है सो सब मेरा’’ ‘‘बुरे से प्रयोजन नहीं’’ की धारणा रखने वाला व्यक्ति निश्चय ही अपने जीवन को ऊंचा उठाता और मनुष्य जीवन का वीरोचित लाभ प्राप्त करता है।
🔶 हम जहां रह रहे हैं, उसे नहीं बदल सकते पर अपने आपको बदल कर हर स्थिति से आनन्द ले सकते हैं। सामान्य सतह पर खड़े होकर दीखने वाला दृश्य कम अच्छा लगता है। अट्टालिका पर चढ़ जाने से वही वातावरण और भी व्यापक और अच्छा लगने लगता है। स्वतः की उच्च या निम्न स्थिति के कारण ही संसार अच्छा या बुरा लगता है। जब यह अपने ही हाथ की बात है तो संसार को क्यों बुरा देखें, क्यों बुराइयों का चिन्तन करें। हम भलाई की शक्ति में निमग्न रहकर उच्च स्थिति प्राप्त कर सकते हैं तो ऐसी सुन्दर जीवन व्यवस्था को छोड़ कर अपने आपको दुःखी और दलित क्यों बनावें?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 33
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.33
👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 5)
🔶 दूसरा वाला प्रकाश का ध्यान करने के लिए जो मैंने बताया था और यह कहा था कि आप अपने मस्तिष्क में प्रकाश का ध्यान किया कीजिए। आपके मस्तिष्क में-मन में जब प्रकाश आए, तब आपको ज्ञानयोगी होना चाहिए। कर्मयोगी शरीर से, ज्ञानयोगी मस्तिष्क से। आपके मस्तिष्क के भीतर जो भी विचार आएँ निषेधात्मक नहीं, विधेयात्मक विचार आने चाहिए। अभी तो आप लोगों के मस्तिष्क में विचारों को कितनी भीड़, कितने मक्खी मच्छर, कितनी वे चीजें जो आपके किसी काम की नहीं हैं, कितने विचार, कितनी कल्पनाएँ आती रहती हैं। उनका यदि आप विश्लेषण करें तो देखेंगे कि मस्तिष्क में जाने कितने मक्खी-मच्छरों जैसे विचार भरे पड़े हैं। अभी उनमें से एक तो गुस्से का भरा था, एक कामवासना का विचार करता रहा, एक सिनेमा का विचार करता रहा।
🔷 एक यह विचार करता रहा कि मैंने लॉटरी के तीन टिकट खरीदे हैं, उसमें से तीन-तीन लाख रुपए तो मिल ही जाएँगे। उन रुपयों से क्या-क्या करूँगा? अमुक काम करूँगा, अमुक बच्चे को, अमुक को दूँगा। आदि बेसिर-पैर की सारी को सारी बातें सारे के सारे ताने-बाने बुन रहा है। इससे आपकी सारी शक्तियाँ निरर्थक होती जा रही हैं। यह सब बेकार की कल्पनाएँ हैं जिनके पीछे न कोई तारतम्य है, न वास्तविकता है और न इनसे आपको कुछ लेना-देना है। इस प्रकार की कल्पनाएँ निरर्थक और अनर्थमूलक ही होती हैं। सार्थक कल्पनाएँ अगर आपके मस्तिष्क में आई होती, क्रमबद्ध रूप से आपने विचार किया होता तो आपमें से अधिकांश व्यक्ति वाल्टेयर हो गए होते, रवीन्द्रनाथ टैगोर हो गए होते अगर आपने अपनी कल्पनाओं को क्रमबद्ध बनाया होता, दिशाबद्ध बनाया होता, उत्कृष्ट और सक्षम बनाया होता।
🔶 हमारी एक ही विशेषता है कि हम विद्वान हैं। इसलिए विद्वान हैं कि हमने अपने चिंतन की धाराओं को सीमाबद्ध-दिशाबद्ध करके रखा है। हमारा चिंतन अनावश्यक बातों में कभी भी नहीं जाता। जब कभी जाएगा, क्रमबद्ध बातों में जाएगा, दिशाबद्ध बातों में जाएगा, आदर्श बातों में जाएगा और जो संभव है उनमें जाएगा। हमारा मस्तिष्क इतना ताना-बाना बुनता है कि वह एक वास्तविकता और व्यावहारिकता पर टिका रहता है। जो अवास्तविक है, अव्यावहारिक है और जो अनावश्यक है, ऐसे सारे के सारे विचारों को हम बाहर से ही मना कर देते हैं कि-'नो एडमीशन' यहाँ नहीं आ सकते, बाहर जाइए। आपको दाखिला हमारे मस्तिष्क में नहीं मिल सकता।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
🔷 एक यह विचार करता रहा कि मैंने लॉटरी के तीन टिकट खरीदे हैं, उसमें से तीन-तीन लाख रुपए तो मिल ही जाएँगे। उन रुपयों से क्या-क्या करूँगा? अमुक काम करूँगा, अमुक बच्चे को, अमुक को दूँगा। आदि बेसिर-पैर की सारी को सारी बातें सारे के सारे ताने-बाने बुन रहा है। इससे आपकी सारी शक्तियाँ निरर्थक होती जा रही हैं। यह सब बेकार की कल्पनाएँ हैं जिनके पीछे न कोई तारतम्य है, न वास्तविकता है और न इनसे आपको कुछ लेना-देना है। इस प्रकार की कल्पनाएँ निरर्थक और अनर्थमूलक ही होती हैं। सार्थक कल्पनाएँ अगर आपके मस्तिष्क में आई होती, क्रमबद्ध रूप से आपने विचार किया होता तो आपमें से अधिकांश व्यक्ति वाल्टेयर हो गए होते, रवीन्द्रनाथ टैगोर हो गए होते अगर आपने अपनी कल्पनाओं को क्रमबद्ध बनाया होता, दिशाबद्ध बनाया होता, उत्कृष्ट और सक्षम बनाया होता।
🔶 हमारी एक ही विशेषता है कि हम विद्वान हैं। इसलिए विद्वान हैं कि हमने अपने चिंतन की धाराओं को सीमाबद्ध-दिशाबद्ध करके रखा है। हमारा चिंतन अनावश्यक बातों में कभी भी नहीं जाता। जब कभी जाएगा, क्रमबद्ध बातों में जाएगा, दिशाबद्ध बातों में जाएगा, आदर्श बातों में जाएगा और जो संभव है उनमें जाएगा। हमारा मस्तिष्क इतना ताना-बाना बुनता है कि वह एक वास्तविकता और व्यावहारिकता पर टिका रहता है। जो अवास्तविक है, अव्यावहारिक है और जो अनावश्यक है, ऐसे सारे के सारे विचारों को हम बाहर से ही मना कर देते हैं कि-'नो एडमीशन' यहाँ नहीं आ सकते, बाहर जाइए। आपको दाखिला हमारे मस्तिष्क में नहीं मिल सकता।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
👉 गुरुगीता (भाग 13)
👉 गुरु-चरण व रज का माहात्म्य
🔶 गुरुगीता के महामंत्र साधकों का पग-पग पर मार्गदर्शन करते हैं। साधना की सुगम, सरल, सहज विधियाँ सुझाते हैं। साधकों को इस गुह्यतत्त्व का बोध कराते हैं कि तुम क्यों इधर-उधर भटक रहे हो, क्यों व्यर्थ में परेशान हो? परम कृपालु सद्गुरु के होते हुए तुम्हें किसी भी तरह से भटकने या परेशान होने की जरूरत नहीं है। सद्गुरु के प्रति भाव भरा समर्पण सभी भव रोगों की अचूक दवा है। समस्याएँ भौतिक हों या आध्यात्मिक, लौकिक हों या अलौकिक गुरुचरणों में सभी के सारे समाधान समाए हैं। पिछले मंत्रों में गुरुचरणों की इसी महिमा की चर्चा की गई है। गुरु चरणों की कृपा से गुरुभक्त साधक को साधना का परम प्राप्य अनायास ही सुलभ हो जाता है। गुरु चरण सेवा से जीव ‘अयमात्माब्रह्म’ के दुर्लभ बोध को सुगमता से पा लेता है।
🔷 गुरुभक्ति की इसी भावकथा को आगे बढ़ाते हुए देवों के भी परम देव भगवान् सदाशिव आदिमाता पार्वती से कहते हैं-
गुरुपादाम्बुजं स्मृत्वा जलं शिरसि धारयेत्।
सर्वतीर्थावगाहस्य सम्प्राप्नोति फलं नरः॥ १२॥
शोषकं पापपङ्कस्य दीपनं ज्ञानतेजसाम्।
गुरुपादोदकं सम्यक् संसारार्णवतारकम्॥ १३॥
अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणम्।
ज्ञानवैराग्यसिद्धर्य्थं गुरुपादोदकं पिबेत्॥ १४॥
🔶 सद्गुरु के चरणों का स्मरण करते हुए जल को सिर पर डालने से मनुष्य को सभी तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है॥ १२॥ श्री गुरु चरणों का जल पाप पंक को सुखाने वाला और ज्ञान तेज के दीपक को प्रकाशित करने वाला है। गुरुचरण जल की महिमा से मनुष्य ठीक तरह से संसार सागर को पार कर जाता है॥ १॥ गुरु चरणों का जल पीने से अन्तर्भूमि में गहराई से जमा हुआ अज्ञान का महावृक्ष जड़ से उखड़ जाता है। जन्म-कर्म के बन्धन का निवारण होता है। गुरु पादोदक के पान से साधक को ज्ञान-वैराग्य की सहज सिद्धि होती है॥ १४॥
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 25
🔶 गुरुगीता के महामंत्र साधकों का पग-पग पर मार्गदर्शन करते हैं। साधना की सुगम, सरल, सहज विधियाँ सुझाते हैं। साधकों को इस गुह्यतत्त्व का बोध कराते हैं कि तुम क्यों इधर-उधर भटक रहे हो, क्यों व्यर्थ में परेशान हो? परम कृपालु सद्गुरु के होते हुए तुम्हें किसी भी तरह से भटकने या परेशान होने की जरूरत नहीं है। सद्गुरु के प्रति भाव भरा समर्पण सभी भव रोगों की अचूक दवा है। समस्याएँ भौतिक हों या आध्यात्मिक, लौकिक हों या अलौकिक गुरुचरणों में सभी के सारे समाधान समाए हैं। पिछले मंत्रों में गुरुचरणों की इसी महिमा की चर्चा की गई है। गुरु चरणों की कृपा से गुरुभक्त साधक को साधना का परम प्राप्य अनायास ही सुलभ हो जाता है। गुरु चरण सेवा से जीव ‘अयमात्माब्रह्म’ के दुर्लभ बोध को सुगमता से पा लेता है।
🔷 गुरुभक्ति की इसी भावकथा को आगे बढ़ाते हुए देवों के भी परम देव भगवान् सदाशिव आदिमाता पार्वती से कहते हैं-
गुरुपादाम्बुजं स्मृत्वा जलं शिरसि धारयेत्।
सर्वतीर्थावगाहस्य सम्प्राप्नोति फलं नरः॥ १२॥
शोषकं पापपङ्कस्य दीपनं ज्ञानतेजसाम्।
गुरुपादोदकं सम्यक् संसारार्णवतारकम्॥ १३॥
अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणम्।
ज्ञानवैराग्यसिद्धर्य्थं गुरुपादोदकं पिबेत्॥ १४॥
🔶 सद्गुरु के चरणों का स्मरण करते हुए जल को सिर पर डालने से मनुष्य को सभी तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है॥ १२॥ श्री गुरु चरणों का जल पाप पंक को सुखाने वाला और ज्ञान तेज के दीपक को प्रकाशित करने वाला है। गुरुचरण जल की महिमा से मनुष्य ठीक तरह से संसार सागर को पार कर जाता है॥ १॥ गुरु चरणों का जल पीने से अन्तर्भूमि में गहराई से जमा हुआ अज्ञान का महावृक्ष जड़ से उखड़ जाता है। जन्म-कर्म के बन्धन का निवारण होता है। गुरु पादोदक के पान से साधक को ज्ञान-वैराग्य की सहज सिद्धि होती है॥ १४॥
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 25
👉 समस्याओं का समाधान करें और आगे बढ़ें
🔶 एक गाँव में एक किसान रहता था। वह खेती बाड़ी करके अपने परिवार का पालन पोषण किया करता था। उसके खेत के बीचो-बीच पत्थर का एक छोटा सा हिस्सा ज़मीन से ऊपर निकला हुआ था जिससे ठोकर खाकर वह कई बार खुद भी गिर चुका था और ना जाने कितनी ही बार उससे पत्थर से टकराकर उसका हल भी टूट चुका था।
🔷 रोजाना की तरह एक दिन वह किसान सुबह-सुबह खेती करने पहुँचा लेकिन जो सालों से होता आ रहा था फिर वही हुआ, यानि एक बार फिर से उस किसान का हल उसी पत्थर के हिस्से से टकराकर टूट गया। किसान बिल्कुल क्रोधित हो उठा, और उसने मन ही मन सोचा कि आज जो भी हो जाए वह इस चट्टान को ज़मीन से निकाल कर अपने खेत के बाहर फ़ेंक ही देगा।
🔶 वह तुरंत गांव की ओर भागा और गाँव से चार पाँच लोगों को बुला लाया और सभी को लेकर वह उस पत्त्थर के पास पहुंचा ओर बोला – “मित्रो! ये देखो ज़मीन से निकले चट्टान के इस हिस्से ने मेरा बहुत नुक्सान किया है, और आज हम सभी को मिलकर इसे जड़ से निकालना है और खेत के बाहर फ़ेंक देना है।”
🔷 और ऐसा कहते ही वह फावड़े से पत्थर के आसपास पास खुदाई करने लगा, पर ये क्या! उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि अभी उसने एक-दो बार ही फावड़ा मारा था कि पूरा का पूरा पत्थर ज़मीन से बाहर निकल आया। साथ खड़े सभी लोग भी अचरज में पड़ गए और उन्ही में से एक ने हँसते हुए उस किसान से पूछा,” क्यों भाई, तुम तो कहते थे कि तुम्हारे खेत के बीच में एक बड़ी सी चट्टान दबी हुई है, पर ये तो एक मामूली सा पत्थर निकला?” खुद किसान भी आश्चर्य में पड़ गया क्योंकि सालों से जिसे वह एक भारी-भरकम चट्टान समझ रहा था दरअसल वह बस एक छोटा सा पत्थर था!
🔶 उसे बहुत पछतावा हुआ कि काश उसने पहले ही इसे निकालने का प्रयास किया होता तो ना उसे इतना नुकसान उठाना पड़ता और ना ही दोस्तों के सामने उसका मज़ाक बनता!
🔷 दोस्तों, कुछ इस किसान की तरह ही अक्सर हमारे साथ भी होता है। हम भी कई बार अपनी ज़िंदगी में आने वाली छोटी छोटी मुश्किलो, बाधाओं को बहुत बड़ा समझ लेते हैं और उनका सामना करने बजाय दुःख उठाते रहते हैं, नुकसान उठाते रहते हैं।
🔶 अगर हम उन मुश्किलों का सामना करे और उनसे निकलने की कोशिश करें तो हम देखेंगे कि चट्टान की तरह दिखने वाली समस्याएं एक छोटे से पत्थर के सामान दिखने लगेंगी जिन्हे हम बडी ही आसानी से ठोकर मारकर अपनी ज़िंदगी से निकाल सकते हैं। और अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ सकते हैं।
🔷 रोजाना की तरह एक दिन वह किसान सुबह-सुबह खेती करने पहुँचा लेकिन जो सालों से होता आ रहा था फिर वही हुआ, यानि एक बार फिर से उस किसान का हल उसी पत्थर के हिस्से से टकराकर टूट गया। किसान बिल्कुल क्रोधित हो उठा, और उसने मन ही मन सोचा कि आज जो भी हो जाए वह इस चट्टान को ज़मीन से निकाल कर अपने खेत के बाहर फ़ेंक ही देगा।
🔶 वह तुरंत गांव की ओर भागा और गाँव से चार पाँच लोगों को बुला लाया और सभी को लेकर वह उस पत्त्थर के पास पहुंचा ओर बोला – “मित्रो! ये देखो ज़मीन से निकले चट्टान के इस हिस्से ने मेरा बहुत नुक्सान किया है, और आज हम सभी को मिलकर इसे जड़ से निकालना है और खेत के बाहर फ़ेंक देना है।”
🔷 और ऐसा कहते ही वह फावड़े से पत्थर के आसपास पास खुदाई करने लगा, पर ये क्या! उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि अभी उसने एक-दो बार ही फावड़ा मारा था कि पूरा का पूरा पत्थर ज़मीन से बाहर निकल आया। साथ खड़े सभी लोग भी अचरज में पड़ गए और उन्ही में से एक ने हँसते हुए उस किसान से पूछा,” क्यों भाई, तुम तो कहते थे कि तुम्हारे खेत के बीच में एक बड़ी सी चट्टान दबी हुई है, पर ये तो एक मामूली सा पत्थर निकला?” खुद किसान भी आश्चर्य में पड़ गया क्योंकि सालों से जिसे वह एक भारी-भरकम चट्टान समझ रहा था दरअसल वह बस एक छोटा सा पत्थर था!
🔶 उसे बहुत पछतावा हुआ कि काश उसने पहले ही इसे निकालने का प्रयास किया होता तो ना उसे इतना नुकसान उठाना पड़ता और ना ही दोस्तों के सामने उसका मज़ाक बनता!
🔷 दोस्तों, कुछ इस किसान की तरह ही अक्सर हमारे साथ भी होता है। हम भी कई बार अपनी ज़िंदगी में आने वाली छोटी छोटी मुश्किलो, बाधाओं को बहुत बड़ा समझ लेते हैं और उनका सामना करने बजाय दुःख उठाते रहते हैं, नुकसान उठाते रहते हैं।
🔶 अगर हम उन मुश्किलों का सामना करे और उनसे निकलने की कोशिश करें तो हम देखेंगे कि चट्टान की तरह दिखने वाली समस्याएं एक छोटे से पत्थर के सामान दिखने लगेंगी जिन्हे हम बडी ही आसानी से ठोकर मारकर अपनी ज़िंदगी से निकाल सकते हैं। और अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ सकते हैं।
👉 प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नता का राजमार्ग (भाग 3)
🔶 किसी व्यक्ति में मित्रता का गुण होता है। मित्रता आनन्द देने वाली वस्तु है उससे मित्रता का गुण सीख लें। दूसरा व्यक्ति संयमी है उससे शरीर को सुदृढ़ बनाने और सौन्दर्य तथा यौवन बचाये रखने की धारणा पुष्ट करलें। एक व्यक्ति में और सब दुर्गुण हैं किन्तु वह स्वच्छ, सुथरा रहता है। यह गुण प्रसन्नता और प्रेरणा ग्रहण करने के लिये कम महत्वपूर्ण नहीं। मौन से मनःशक्तियों के संरक्षण का पाठ पढ़ लें तो वाणी विलास प्रिय व्यक्ति से विनोद और हास्य युक्त जीवन की सीख ले सकते हैं।
🔷 वेश-भूषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज, संस्कार-संस्कृति, समाज-व्यवस्था, वर्णाश्रम-व्यवस्था, शासन पद्धति, नगर-ग्राम, शिक्षा-दीक्षा, इतिहास, भूगोल, स्मृति-कर्मकांड, उपासना, पर्व उत्सव, नदी, नाले, जंगल, पर्वत, खेत, खलिहान, परिपाटी प्रक्रिया, आशा विश्वास, मन्तव्य—मान्यताओं आदि में से ढेर से सद्गुणों का संचय कर हम अपनी मनोवृत्ति को सतोगुणी बना सकते हैं और आत्म-पुलक का शाश्वत सुख उपलब्ध कर सकते हैं।
🔶 जीवन की सफलता किस बात पर निर्भर है? इसका एक ही उत्तर है—अपनी भावनाओं पर। मनुष्य अपनी कल्पना से ही अपने आपको सफल अथवा विफल बनाता है। जैसी कल्पना की जाती है, अपने आस-पास उसी प्रकार की दृष्टि रच जाती है। कसाई की कल्पना जानवरों का वध करना होता है, उस तरह की अन्य क्रियायें और सहयोगी उसे अपने आप मिल जाते हैं। भेड़-बकरियां बेचने वाले, खाल और मांस खरीदने वाले, वध करने का स्थान और औजार सब कुछ उसकी इच्छा शक्ति जुटा देती है। यदि एक कसाई के लिये मनोवांछित सृष्टि जुटा लेना कुछ असम्भव नहीं होता तो उत्कृष्ट मनोभूमि द्वारा उत्कृष्ट वातावरण और उच्च सफलतायें प्राप्त कर लेना भी कोई असंभव बात नहीं है। केवल मनुष्य की मानसिक शक्ति का भलाई की दिशा में विकेन्द्रीकरण होना चाहिये।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 33
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.33
🔷 वेश-भूषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज, संस्कार-संस्कृति, समाज-व्यवस्था, वर्णाश्रम-व्यवस्था, शासन पद्धति, नगर-ग्राम, शिक्षा-दीक्षा, इतिहास, भूगोल, स्मृति-कर्मकांड, उपासना, पर्व उत्सव, नदी, नाले, जंगल, पर्वत, खेत, खलिहान, परिपाटी प्रक्रिया, आशा विश्वास, मन्तव्य—मान्यताओं आदि में से ढेर से सद्गुणों का संचय कर हम अपनी मनोवृत्ति को सतोगुणी बना सकते हैं और आत्म-पुलक का शाश्वत सुख उपलब्ध कर सकते हैं।
🔶 जीवन की सफलता किस बात पर निर्भर है? इसका एक ही उत्तर है—अपनी भावनाओं पर। मनुष्य अपनी कल्पना से ही अपने आपको सफल अथवा विफल बनाता है। जैसी कल्पना की जाती है, अपने आस-पास उसी प्रकार की दृष्टि रच जाती है। कसाई की कल्पना जानवरों का वध करना होता है, उस तरह की अन्य क्रियायें और सहयोगी उसे अपने आप मिल जाते हैं। भेड़-बकरियां बेचने वाले, खाल और मांस खरीदने वाले, वध करने का स्थान और औजार सब कुछ उसकी इच्छा शक्ति जुटा देती है। यदि एक कसाई के लिये मनोवांछित सृष्टि जुटा लेना कुछ असम्भव नहीं होता तो उत्कृष्ट मनोभूमि द्वारा उत्कृष्ट वातावरण और उच्च सफलतायें प्राप्त कर लेना भी कोई असंभव बात नहीं है। केवल मनुष्य की मानसिक शक्ति का भलाई की दिशा में विकेन्द्रीकरण होना चाहिये।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 33
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.33
👉 Significance of Birthday (Last Part)
🔷 There are some occasions in human life, when given suggestions leave long-lasting impressions on human mind and not only this, they also inspire and compel the man to revisit his past life in order to overhaul the same with a bright future taking shape in mind. The birthday is one such day that facilitates the mind of that man to execute & implement the rules that he firmly takes that day for his life ahead. He is compelled to accept the presence and majesty of ‘SVA’ (the self) so that he gets a chance to live his life in such a way that leaves the dignity and pride of his own life intact.
🔶 Some occasions are there in a human life that proves to be important and jesting. The happiness on the face of a winner of wrestling, an award or gift or toys can easily be read. How much happy he looks and such happiness develops his physical and mental powers. We can help man develops his internal & outer life both by giving him pleasure and sensation. This way man enters into an enlightened life leaving behind ordinary dull life & this change proves to be important for him.
🔷 Let such occasion is available to everyone on the basis of birthday for the purpose of realizing the dignity, attaining happiness and preparing ground of self-realization. Self-realization is the biggest awareness of the life. To know about the self, to see the self is the biggest knowledge. BHAGWAN has repeatedly said in GEETA, ‘‘know who you are, see who you are, analyze who you are. Set yourself free and don’t degrade/underestimate it.’’ The doors to spiritual progress are opened with attainment of this awareness about the self. The birthday can be supposed to be the most important day for the purpose of thoroughly analyzing about the self. Finished, today’s session.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
🔶 Some occasions are there in a human life that proves to be important and jesting. The happiness on the face of a winner of wrestling, an award or gift or toys can easily be read. How much happy he looks and such happiness develops his physical and mental powers. We can help man develops his internal & outer life both by giving him pleasure and sensation. This way man enters into an enlightened life leaving behind ordinary dull life & this change proves to be important for him.
🔷 Let such occasion is available to everyone on the basis of birthday for the purpose of realizing the dignity, attaining happiness and preparing ground of self-realization. Self-realization is the biggest awareness of the life. To know about the self, to see the self is the biggest knowledge. BHAGWAN has repeatedly said in GEETA, ‘‘know who you are, see who you are, analyze who you are. Set yourself free and don’t degrade/underestimate it.’’ The doors to spiritual progress are opened with attainment of this awareness about the self. The birthday can be supposed to be the most important day for the purpose of thoroughly analyzing about the self. Finished, today’s session.
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 4)
🔶 तीन योग हैं- कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। प्रकाश के माध्यम से इन तीनों योगों को हृदयंगम करने के लिए मैंने आपको कहा है। भगवान का प्रकाश जब कभी शरीर में आएगा तो कर्मयोग के रूप में आएगा और आदमी कर्तव्यनिष्ठ होता हुआ दिखाई पड़ेगा। उसके लिए 'वर्क इज वरशिप' होगा। पूजा कर्म, श्रेष्ठ कर्म, आदर्श कर्म, लोकोपयोगी कर्म, मर्यादाओं से बँधे हुए कर्म सभी कर्मयोग के अंतर्गत आते हैं। जो हमें सिखाते हैं कि जब प्रकाश हमारे शरीर में आता है तो हमारे शरीर की प्रत्येक क्रिया को कर्मनिष्ठ होना चाहिए। परिश्रमी होना चाहिए। यह बताता है कि आदमी को जो प्रकाश का ध्यान करता है, उसे हरामखोर और आलसी नहीं होना चाहिए। चोर और हरामखोर मेरी दृष्टि से दोनों बराबर हैं।
🔷 महाराज जी हमारा बेटा बड़ा हो गया है और खूब कमाता-खाता है और हम तो अपनी मौज करते हैं। नहीं बेटे, कामचोर और चोर में तो कामचोर ही बड़ा होता है। मनुष्य के लिए यह सबसे बड़ी गाली है। कामचोर सबसे खराब आदमी है। नहीं गुरुजी हमको तो पेंशन मिलती है और हम मौज करते हैं। नहीं बेटे, हम तुझे मौज नहीं करने देंगे। जब तक जिंदा है, तब तक शरीर से तुझे कर्म करना पड़ेगा। अपने लिए रोटी खाने, पेट भरने को है, दूसरों के लिए तो नहीं है। उसके लिए कर। गुरुजी ! हमारे बेटे तो पढ़ गए और हम अब निश्चिंत हो गए। तेरे ही तो पढ़ गए समाज के बेटे तो नहीं पढ़े। चल रात को नाइट स्कूल चलाया कर और दूसरों के बच्चों को पढ़ाया कर।
🔶 इसलिए मित्रो, क्या करना पड़ेगा कि जब वह प्रकाश, जो मैंने जप के साथ-साथ करने के लिए बताया है, अगर वह आपके भीतर नसों में स्फूर्ति के रूप में आए तो जब तक आप जिंदा हैं, तब तक हम काम करेंगे, कर्मयोगी बनेंगे, मेहनत करेंगे, मशक्कत करेंगे, श्रेष्ठ काम करेंगे, कर्तव्यों का पालन करेंगे। जो हमारे लिए, हमारे समाज के लिए, देश के लिए, धर्म के लिए सबके लिए कर्तव्यों का बंधन बँधा हुआ है, इसका हम पालन करेंगे। अगर इस तरह की स्फूर्ति और नाड़ी अभ्यास बन जाए तो मैं समझूँगा कि आप कर्मयोगी हैं और आपने उस प्रकाश के ध्यान को जो मैंने बताया था उसे सीख लिया और उसका मकसद समझ गए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
🔷 महाराज जी हमारा बेटा बड़ा हो गया है और खूब कमाता-खाता है और हम तो अपनी मौज करते हैं। नहीं बेटे, कामचोर और चोर में तो कामचोर ही बड़ा होता है। मनुष्य के लिए यह सबसे बड़ी गाली है। कामचोर सबसे खराब आदमी है। नहीं गुरुजी हमको तो पेंशन मिलती है और हम मौज करते हैं। नहीं बेटे, हम तुझे मौज नहीं करने देंगे। जब तक जिंदा है, तब तक शरीर से तुझे कर्म करना पड़ेगा। अपने लिए रोटी खाने, पेट भरने को है, दूसरों के लिए तो नहीं है। उसके लिए कर। गुरुजी ! हमारे बेटे तो पढ़ गए और हम अब निश्चिंत हो गए। तेरे ही तो पढ़ गए समाज के बेटे तो नहीं पढ़े। चल रात को नाइट स्कूल चलाया कर और दूसरों के बच्चों को पढ़ाया कर।
🔶 इसलिए मित्रो, क्या करना पड़ेगा कि जब वह प्रकाश, जो मैंने जप के साथ-साथ करने के लिए बताया है, अगर वह आपके भीतर नसों में स्फूर्ति के रूप में आए तो जब तक आप जिंदा हैं, तब तक हम काम करेंगे, कर्मयोगी बनेंगे, मेहनत करेंगे, मशक्कत करेंगे, श्रेष्ठ काम करेंगे, कर्तव्यों का पालन करेंगे। जो हमारे लिए, हमारे समाज के लिए, देश के लिए, धर्म के लिए सबके लिए कर्तव्यों का बंधन बँधा हुआ है, इसका हम पालन करेंगे। अगर इस तरह की स्फूर्ति और नाड़ी अभ्यास बन जाए तो मैं समझूँगा कि आप कर्मयोगी हैं और आपने उस प्रकाश के ध्यान को जो मैंने बताया था उसे सीख लिया और उसका मकसद समझ गए।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
सोमवार, 8 जनवरी 2018
👉 शासक और फल
🔶 वाराणसी के राजा ब्रह्मदत को अपने अवगुणों और दोषों के बारे में जानने की बहुत इच्छा थी। उसने राजभवन के अंदर रहने वाले लोगो से लेकर प्रजा के आम लोगो तक हर किसी से प्रश्न किये। किन्तु किसी को भी उस राजा में कोई त्रुटी नहीं दिखी।
🔷 राजा निराश हो गया। वो हिमालय की छोटी में पहुंचा। किसी घने जंगल के शांत और रमणीय इलाके में एक साधू का आश्रम था। राजा जब वंहा गया तो साधू ने उसका स्वागत किया और भोजन में उसे कंदमूल और फल भेंट किये। राजा मुग्ध होकर बोला महाराज इन फलों का स्वाद तो दिव्य है। ये फल इतने मीठे किस वजह से है। साधू ने सहज स्वर में जवाब दिए ये फल इसलिए इतने मीठे है क्योंकि शासक धर्मिनिष्ठ है इस पर राजा को भरोसा नहीं हुआ। राजा ने पूछा शासक अधर्मी हो तो क्या फल मीठे नहीं होते।
🔶 साधू ने कहा ‘नहीं वत्स फल ही क्या शर्करा घी तेल सब अपना स्वाद खो देते है अगर शासक अधर्मी हो जाये तो उनका रस सूख जाता है। इस पर राजा संतुष्ट तो नहीं हुआ लेकिन फिर भी साधू से विदा लेकर वापिस अपने महल पंहुचा उसके मन में वही बात घूम रही थी। उसने निर्णय करने की ठानी और प्रजा पर भयंकर अत्याचार शुरू कर दिया और अपना स्वाभाव भी क्रूर कर लिया।
🔷 कुछ दिनों बाद फिर से वह उसी साधू के पास पहुंचा और फिर उसी सत्कार के साथ साधू ने उसे फल भेंट किये तो राजा ने पाया कि फल अब उस भांति मीठे नहीं है जितने पिछली बार थे तो राजा ने ये बात साधू से कही तो साधू गंभीर हो गया।
🔶 साधू बोला तब तो अवश्य ही शासक पानी और अधर्मी हो गया है जो फलों ने अपना स्वाद खो दिया है क्योंकि ये उसी के अधर्म का परिणाम है।
🔷 राजा निराश हो गया। वो हिमालय की छोटी में पहुंचा। किसी घने जंगल के शांत और रमणीय इलाके में एक साधू का आश्रम था। राजा जब वंहा गया तो साधू ने उसका स्वागत किया और भोजन में उसे कंदमूल और फल भेंट किये। राजा मुग्ध होकर बोला महाराज इन फलों का स्वाद तो दिव्य है। ये फल इतने मीठे किस वजह से है। साधू ने सहज स्वर में जवाब दिए ये फल इसलिए इतने मीठे है क्योंकि शासक धर्मिनिष्ठ है इस पर राजा को भरोसा नहीं हुआ। राजा ने पूछा शासक अधर्मी हो तो क्या फल मीठे नहीं होते।
🔶 साधू ने कहा ‘नहीं वत्स फल ही क्या शर्करा घी तेल सब अपना स्वाद खो देते है अगर शासक अधर्मी हो जाये तो उनका रस सूख जाता है। इस पर राजा संतुष्ट तो नहीं हुआ लेकिन फिर भी साधू से विदा लेकर वापिस अपने महल पंहुचा उसके मन में वही बात घूम रही थी। उसने निर्णय करने की ठानी और प्रजा पर भयंकर अत्याचार शुरू कर दिया और अपना स्वाभाव भी क्रूर कर लिया।
🔷 कुछ दिनों बाद फिर से वह उसी साधू के पास पहुंचा और फिर उसी सत्कार के साथ साधू ने उसे फल भेंट किये तो राजा ने पाया कि फल अब उस भांति मीठे नहीं है जितने पिछली बार थे तो राजा ने ये बात साधू से कही तो साधू गंभीर हो गया।
🔶 साधू बोला तब तो अवश्य ही शासक पानी और अधर्मी हो गया है जो फलों ने अपना स्वाद खो दिया है क्योंकि ये उसी के अधर्म का परिणाम है।
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026
शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...



















