शनिवार, 6 अगस्त 2016

👉 शासक और फल


🔵 वाराणसी के राजा ब्रह्मदत को अपने अवगुणों और दोषों के बारे में जानने की बहुत इच्छा थी। उसने राजभवन के अंदर रहने वाले लोगो से लेकर प्रजा के आम लोगो तक हर किसी से प्रश्न किये। किन्तु किसी को भी उस राजा में कोई त्रुटी नहीं दिखी।

🔴 राजा निराश हो गया। वो हिमालय की छोटी में पहुंचा। किसी घने जंगल के शांत और रमणीय इलाके में एक साधू का आश्रम था। राजा जब वंहा गया तो साधू ने उसका स्वागत किया और भोजन में उसे कंदमूल और फल भेंट किये। राजा मुग्ध होकर बोला महाराज इन फलों का स्वाद तो दिव्य है। ये फल इतने मीठे किस वजह से है। साधू ने सहज स्वर में जवाब दिए ये फल इसलिए इतने मीठे है क्योंकि शासक धर्मिनिष्ठ है इस पर राजा को भरोसा नहीं हुआ। राजा ने पूछा शासक अधर्मी हो तो क्या फल मीठे नहीं होते।

🔵 साधू ने कहा ‘नहीं वत्स फल ही क्या शर्करा घी तेल सब अपना स्वाद खो देते है अगर शासक अधर्मी हो जाये तो उनका रस सूख जाता है। इस पर राजा संतुष्ट तो नहीं हुआ लेकिन फिर भी साधू से विदा लेकर वापिस अपने महल पंहुचा उसके मन में वही बात घूम रही थी। उसने निर्णय करने की ठानी और प्रजा पर भयंकर अत्याचार शुरू कर दिया और अपना स्वाभाव भी क्रूर कर लिया।

🔴 कुछ दिनों बाद फिर से वह उसी साधू के पास पहुंचा और फिर उसी सत्कार के साथ साधू ने उसे फल भेंट किये तो राजा ने पाया कि फल अब उस भांति मीठे नहीं है जितने पिछली बार थे तो राजा ने ये बात साधू से कही तो साधू गंभीर हो गया।

🔵 साधू बोला तब तो अवश्य ही शासक पानी और अधर्मी हो गया है जो फलों ने अपना स्वाद खो दिया है क्योंकि ये उसी के अधर्म का परिणाम है।

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