गुरुवार, 8 जून 2017

👉अँधेरे की चिंता छोड़ें, प्रकाश को प्रदीप्त करें

🔵 अँधेरे के लिए न तो चिंतित हों और न ही उसका चिंतन करें। अनिवार्य है, प्रकाश को प्रदीप्त करने का उपाय करना। जो लोग अंधकार का ही विचार करते रहते हैं, वे अँधेरे में ही खोए रहते हैं। उनका प्रकाश तक पहुँचना संभव नहीं।

🔴 जीवन में अँधेरा बहुत है और अँधेरे की ही भाँति अशुभ और अनीति भी छाई है। कुछ लोग इस तमस् को स्वीकार कर लेते हैं। ऐसी दशा में उनकी प्रकाश को पाने एवं उस तक पहुँचने की आकांक्षा क्षीण हो जाती है। अंधकार की यह स्वीकृति ही मनुष्य का सबसे बड़ा पाप है। यही उसका स्वयं के प्रति किया गया अपराध है। इसी से उसके दूसरे अन्य अपराधों का जन्म होता है। सभी तरह के पाप इसी मूल पाप से जन्मते एवं पनपते हैं। याद रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह कोई अन्य अपराध या पाप नहीं कर सकता है।

🔵 कतिपय लोग अंधकार की इस स्वीकृति से बचने के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है, पर यह भी एक भूल है। अंधकार को मान लेने वाला भी भूल में है, उससे लड़ने वाला भी भूल में है। न अंधकार को मानना है, न उससे लड़ना है। ये दोनों ही अज्ञान हैं। जो ज्ञानी है, वह प्रकाश को प्रदीप्त करने का आयोजन करता है। सच तो यह है कि अँधेरे की अपनी सत्ता ही नहीं है। वह तो मात्र प्रकाश का अभाव है। प्रकाश का आगमन होते ही वह अपने ही आप हट-मिट जाता है। ऐसी ही बात अशुभ, अनीति एवं अधर्म के संबंध में भी है। अशुभ को, अनीति को, अधर्म को मिटाने के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है, इसके लिए तो बस धर्म का दीया जलाना ही पर्याप्त है। धर्म की ज्योति ही अधर्म की मृत्यु है।

🔴 अँधेरे से लड़ना तो अभाव से लड़ना है। इस तरह तो बस विक्षिप्तता ही हाथ लगती है। लड़ना है, तो प्रकाश को पाने के लिए लड़ो। प्रकाश को प्रदीप्त करने के लिए श्रम एवं मनोयोग का नियोजन करो, क्योंकि जो प्रकाश को पा लेता है, वह अंधकार को मिटा ही देता है। इसलिए अँधेरे की चिंता छोड़ें, प्रकाश को प्रदीप्त करें।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 86

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 8 Jun 2017


बुधवार, 7 जून 2017

👉संयम का संगीत

🔴 जीवन का सत्य संयम के संगीत से प्रकट होता है। जो किसी भी दिशा में अति करते हैं, वे मार्ग से भटक जाते हैं। भटका हुआ मानव-मन अतियों में डोलता और चलता है। एक अति से दूसरी अति पर उसे ले जाना बहुत आसान है। उसका स्वभाव ही कुछ ऐसा है। शरीर के प्रति जो बहुत आसक्त है, वही व्यक्ति प्रतिक्रिया में शरीर के प्रति बहुत क्रूर और कठोर भी हो सकता है। इस कठोरता और क्रूरता में भी वही आसक्ति छिपी होती है। जैसा वह पहले शरीर से बँधा होता है। उसका मन पहले भी शरीर के ही चिंतन में लगा और अब बदली हुई विपरीत दशा में उसका चिंतन शरीर पर ही क्रेंदित होता है। इस भाँति विपरीत अति पर जाकर मन धोखा दे देता है। इस धोखाधड़ी में वह अपनी मूलवृत्ति को बचा लेता है। सदा ही अतियों में चलते रहने की इस मानसिक वृत्ति का कारण यही है। विपरीत अतियों में चलने की यह मन की प्रवृत्ति ही असंयम है।

🔵 जबकि संयम दो विपरीत अतियों के बीच मध्य बिंदु की खोज है। इस मध्य बिंदु पर थिर होने की कला का नाम ही ‘संयम’ है। शरीर के प्रति राग और विराग का मध्य खोजने और उसमें स्थिर होने से वीतरागता का संयम उपलब्ध होता है। संसार के प्रति आसक्ति और विरक्ति का मध्य खोजने और उसमें स्थिर होने से संन्यास का संयम उपलब्ध होता है और इस भाँति जो समस्त अतियों में संयम को साधता है, वह अतियों से अतीत हो जाता है और उसके जीवन में संयम का सुरीला संगीत गूँजने लगता है।

 🔴 संयम के इस सुरीले संगीत में जीवन का समस्त कोलाहल विलीन हो जाता है। इस कोलाहल को जन्म देने वाली ईर्ष्या, द्वेष एवं प्रपंच की सारी वृत्तियाँ और इन सबका जन्मदाता मन भी संयम के इस सुहाने संगीत में अपना अस्तित्व खो बैठता है। फिर तो केवल वही निनादित होता है, जो सदा-सदैव से ही स्वयं के भीतर निनादित हो रहा है। संयम के संगीत का यह सुरीलापन ही तो निर्वाण है, मोक्ष है, परब्रह्म है। यही जीवन का सत्य है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 85

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 7 Jun 2017


मंगलवार, 6 जून 2017

👉 जीवन क्या है?

🔵 जीवन क्या है? यह एक ऐसा प्रश्न है, जो युगों-युगों से पूछा जा रहा है एवं अनुत्तरित है। श्रुति की शरण में जाएँ, तो वह कहती है कि हर व्यक्ति द्वारा जीवन के स्वरूप को समझा जाना चाहिए और उससे जुड़े तथ्यों को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वे कितने भी कड़ुए एवं अप्रिय क्यों न प्रतीत हों? जीवन एक चुनौती है, एक समर है, एक जोखिम है एवं उसे इस रूप में स्वीकार करने के अलावा हमारे पास और कोई चारा भी नहीं।

🔴 जीवन एक रहस्य है, तिलिस्म है, भूल-भुलैया है, एक प्रकार से एक गोरखधंधा है। जिस किसी के पास भी गंभीर पर्यवेक्षण करने की दृष्टि हो, वह उसकी तह तक पहुँच सकता है। इसी आधार पर जीवन से जुड़ी भ्रांतियों के कुहासे को भी मिटाया जा सकता है। कई प्रकार के खतरों से भी बचा जा सकता है। कर्त्तव्य के रूप में जीवन अत्यंत भारी किंतु अभिनेता की तरह हँसने-हँसाने वाला हलका-फुलका रंगमंच भी है, जिसका विनोदपूर्वक मंचन कर आनंद लिया जा सकता है।

🔵 जीवन एक गीत है, जिसे पंचम स्वर में गाया जा सकता है। जीवन एक अवसर है, जिसे गवाँ देने पर सब कुछ हाथ से निकल जाता है। जीवन एक स्वप्न है, जिसमें स्वयं को खोया जा सके, तो भरपूर आनंद का रसास्वादन किया जा सकता है। जीवन एक प्रतिज्ञा है, यात्रा है, जीने की एक कला है, उसे सफल कैसे बनाया जाए, यह यदि जान लिया जाए, इस पर मनन कर लिया जाए, तो फिर उससे बड़ा भाग्यशाली कोई नहीं। जीवन सौंदर्य है, प्रेम है, सत्-चित्-आनंद है। वह सब कुछ है, जो नियंता की इस सृष्टि में सर्वोत्तम कहा जाने योग्य है। हम इसे जीकर तो दिखाएँ।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 84

👉 आज का सद्चिंतन 6 Jun 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Jun 2017


सोमवार, 5 जून 2017

👉 सच्ची साधना

🔵 आज साधु तो बहुत हैं, पर साधना नहीं है। साधना के बिना साधुता कागज के फूलों की तरह है। जिनमें बहुरंगी आकर्षण तो भरपूर है, लेकिन सुगंध का एकदम अभाव है। सब तरफ आज ऐसे ही कागज के फूल दिखाई देते हैं। इसी वज़ह से धर्म की प्रखरता-तेजस्विता मंद पड़ गई है। साधना के अभाव में धर्म असंभव है।

🔴 धर्म की जड़ें साधना में हैं। साधना के अभाव में साधु का जीवन या तो मात्र अभिनय हो सकता है या फिर दमन हो सकता है। ये दोनों ही बातें शुभ नहीं हैं। तप-साधना का मिथ्या अभिनय पाखंड है, जबकि कोरा दमन और भी महाघातक है। उसमें संघर्ष की यातना तो है, पर उपलब्धि कुछ भी नहीं। जिसे दबाया जाता है, वह मरता नहीं, बल्कि और गहरी परतों में सरक जाता है। साधनाविहीन साधु को एक ओर वासना की पीड़ाएँ सताती हैं; दूसरी ओर उसे दमन और आत्म-उत्पीड़न की अग्निशिखाएँ जलाती हैं। एक ओर कूँआ है तो दूसरी ओर खाई। सच्ची साधना के बिना इन दोनों में से किसी एक में गिरना ही पड़ता है।

🔵 सच्ची साधना न तो भोग में है और न दमन में। यह तो आत्मजागरण में है। इन दोनों के द्वंद्व में से उबरने और परमेश्वर में स्वयं को विसर्जित करने में है। साधना वेश-विन्यास की विविधता या कौतुक भरे प्रदर्शन का नाम नहीं है। यह नर से नारायण बनने की अंतर्यात्रा है, जो पशु-भाव का दमन करके नहीं, उसे सर्वथा छोड़कर परमात्म-भाव में प्रतिष्ठित होने में ही संपन्न होती है।

🔴 सच्ची साधना का अर्थ किसी को पकड़ना नहीं है, वरन् सारी पकड़ को एक साथ छोड़ना है। सारी अतियों से, सभी द्वंद्वों से ऊपर उठना-उबरना है। इस सच्ची साधना से जो अपनी चेतना की लौ को द्वंद्वों की आँधियों से मुक्त कर लेते हैं, वे उस कुंजी को पा लेते हैं, जिससे सत्य का द्वार खुलता है और तभी वह साधुता प्रकट होती है, जिसकी अलौकिक सुगंध से अनेकों दूसरी सुप्त और मुरझाई आत्माएँ भी जाग्रत् होकर मुस्कराने लगती हैं।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 83

👉 आज का सद्चिंतन 5 Jun 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Jun 2017


रविवार, 4 जून 2017

👉 क्रान्ति-बीज

🔵 युगसंधि की वेला। सभी शिष्य-साधक ब्रह्ममुहूर्त में ध्यानस्थ। ध्यान की गहराइयों में दिव्य नाद ध्वनित हो उठा। गुरुदेव की वाणी शब्दरूप लेने लगी, ‘‘मेरे पुत्रो! मैं भी एक किसान हूँ। मैंने भी कुछ बीज बोए थे। उनमें अंकुर आए और फूल भी लगे। उन फूलों की सुगंध से मेरा सारा जीवन भर गया। उस सुगंध ने मुझे रूपांतरित कर दिया। मुझे नया जीवन दिया।’’

 🔴 ‘‘अदृश्य और अज्ञात ने अपने बंद द्वार मेरे लिए खोल दिए और मैंने उस परम सत्य को देखा, जो आँखों से देखा नहीं जा सकता। शाश्वत् के उस संगीत को सुना, जिसे सुनने में कान समर्थ नहीं होते हैं। मेरी यह दिव्य अनुभूतियाँ अब वैसे ही मुझसे बहने और प्रवाहित होने को उत्सुक हैं, जैसे पहाड़ों के झरने सागर की ओर प्रवाहित होते और भागते हैं।’’

🔵 ‘‘याद रहे बदलियाँ जब पानी से भर जाती हैं, तो उन्हें बरसना पड़ता है। फूल जब सुवास से भर जाते हैं, तो उन्हें हवाओं को अपनी सुगंध लुटा देनी होती है और जब कोई दीया जलता है, तो आलोक उससे बहता ही है।’’

 🔴 ‘‘ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ है। मैंने अपने जीवन के अनमोल रहस्य अपने साहित्य में सँजोए हैं। मेरे ये विचार क्रांति-बीज हैं। वे जिसके पास पहुँचेंगे, जो भी इन्हें सँभालेगा-फैलाएगा, उसके जीवन में देवत्व के, अमृत के और प्रभु प्रेम के फूल अवश्य ही मुस्कराएँगे। उसका जीवन भी उसी सुगंध से भर उठेगा, जिससे मेरा जीवन भरा था। ये मेरे क्रांति-बीज जिस भी खेत में पड़ेंगे, वहाँ की मिट्टी अमृत के फूलों में परिणत हो जाएगी।’’

🔵 ‘‘जो भी मेरे पास था, उसे क्रांति-बीजों के रूप में तुम सबको सौंप चुका। मेरा प्रत्येक विचार क्रांति बीज है और मेरा समूचा साहित्य इन क्रांति-बीजों का अक्षय भंडार है। सार संक्षेप मैंने दैवीचेतना के संदेशवाहक के रूप में क्रांतिधर्मी साहित्य के रूप में विनिर्मित किया है। मैंने इन्हें तुम्हारे जीवन में बोया, अब तुम सबको इन्हें समूचे विश्व के प्रत्येक मानव के जीवन में बोना है, ताकि हर कहीं देवत्व के फूल खिल सकें। मेरे इन क्रांति-बीजों को हर कहीं बोने के साथ ही तुम सब अपने जीवन में भी इनकी देखभाल करना, क्योंकि मैं तो बो चला, देखना तुम कि बीज, बीज न रह जाए।’’

🔴 ध्यान टूटने के बाद भी साधकों को लगा कि गुरुसत्ता का यह संदेश सतत ध्वनित हो रहा है कि उनके क्रांति-बीजों की सफलता देवत्व के फूल बनकर मुस्कराने में ही है। जीवन की मिट्टी को सुगंध से भरने में ही है।


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 82

👉 आज का सद्चिंतन,


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Jun 2017


शनिवार, 3 जून 2017

👉 जीवन का महामंत्र

🔵 जीवन का सच्चा सदुपयोग ही जीवन का महामंत्र है। जब भी मन में कोई उदात्त प्रेरणा जागे, तो उसे बलपूर्वक थाम लो। कहीं ऐसा न हो कि भूल जाने के दोष के कारण वह सदैव के लिए लुप्त हो जाए। किसी भी सिद्धांत की सार्थकता, उसकी व्यावहारिकता अनुभूति में है। आदर्श चिंतन श्रेष्ठ है, तो आदर्श कर्म श्रेष्ठतम। आध्यात्मिक सत्य की अनुभूति-तत्त्वचिंतन और धारणा की अपेक्षा कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। साधनात्मक पुरुषार्थ थोड़ा-सा ही क्यों न हो, हजार बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा उत्तम है। बातों से भावनाएँ जाग सकती हैं, किन्तु उस सिद्धांत की अनुभूति के लिए यदि आवश्यक पुरुषार्थ न किया गया, तो समझो समय तथा भावना बेकार नष्ट हुई। आदर्शोन्मुखी आध्यात्मिक कर्म में ही तो जीवन का सच्चा सदुपयोग है।

🔴 यह तभी संभव है, जब हृदय में कपट न हो। अपनी लालसाओं-वासनाओं पर बड़े-बड़े सिद्धांतों का आवरण डालकर उन्हें ढका न जाए। अपनी अकर्मण्यता पर सोने की चादर डालकर उसे शरणागति का नाम देना उचित नहीं। शरणागति तो निष्काम कर्म के तीव्र वेग से उपजी सात्विक भावना है, अकर्मण्यता नहीं। निश्चित जान लो कि आध्यात्मिक साधना न हो पाने का कारण शारीरिक सुख-सुविधाओं की चिंता और इंद्रियभोगों की लालसा ही है, क्योंकि जैसे ही मन में आध्यात्मिक साधना में संलग्न होने की, कठोर तप में प्रवृत्त होने की बात पैठती है, इंद्रियाँ विरोध करने लगती हैं। शरीर पूछने लगता है, ‘‘रे मन! भला क्या यह आरामदायक होगा?’’
 
 🔵 सच तो यह है कि सांसारिक उपलब्धियों के लिए जितने साहस और संघर्ष की आवश्यकता है, आध्यात्मिक जीवन के लिए उससे भी कहीं अधिक संघर्ष और साहस आवश्यक है। कृपण व्यक्ति धनसंग्रह के लिए जितना अध्यवसाय करता है, वीर सैनिक शत्रु पर आक्रमण करने के लिए जितना साहस रखता है, आध्यात्मिक ऊर्जा को पाने के लिए, सदैव के लिए जीवन की समस्त दुर्बलताओं को जीत लेने के लिए उतने ही अध्यवसाय की, उतने ही महान् साहस की आवश्यकता है। किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक अनुभूति के पीछे रहस्य है- अदम्य साहस, सर्वथा भयहीन साहस। इस सत्य को पहचानने पर ही जीवन का सच्चा-सार्थक सदुपयोग संभव है। जीवन के सच्चे सदुपयोग अर्थात् जीवन के महामंत्र की साधना करके ही जीवन के रहस्य को जाना जा सकता है। समस्त दुर्बलताओं पर विजय पाई जा सकती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 81

👉 आज का सद्चिंतन 3 Jun 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Jun 2017


शुक्रवार, 2 जून 2017

👉 समग्रता का ईश्वरीय बोध


🔵 मन सिकुड़ा है, मस्तिष्क फैला है। कर्मक्षेत्र समूचे विश्व तक फैलकर सीमातीत हुआ है, स्नेहसूत्र परिवार की छोटी-से-छोटी इकाई में भी टूटकर टुकड़े-टुकड़े हुआ है। स्थूल फैलकर स्थूलतम हो रहा है, सूक्ष्म और अधिक सिमटकर सूक्ष्मतम बन रहा है। कर्म-तर्क-बौद्धिकता के धरातल पर मनुष्य महानता का मुखौटा पहनकर आगे बढ़ा दिख रहा है, कर्म-श्रद्धा-आचार के मूल्यों पर वह बौना और कमजोर पड़ रहा है, आखिर क्यों?

 🔴  बुद्ध का कहा आज लाखों पृष्ठों में विवेचित हो रहा है, श्रीकृष्ण की गीता के अक्षर-अक्षर पर प्रवचन और भाष्य हो रहे हैं। कुरान और बाइबिल को घर-घर तक प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए अथक प्रयास किए जा रहे हैं, पर बुद्ध की करुणा, श्रीकृष्ण का निष्काम कर्म, ईसा व मुहम्मद का प्रेम व भाईचारे की छवि क्यों नहीं चमक-दमक रही हैं, यह एक गूढ़ पहेली है।

🔵  विचार में विश्वास नहीं, धर्म में श्रद्धा नहीं, परस्परता-सामाजिकता में सुख-दुःख की अनुभूति नहीं, तब वह व्यक्ति न तो धार्मिक हो सकता है और न ही सामाजिक। धर्म और समाज के विभिन्न सवाल उस व्यक्ति की स्वार्थ-लालसा और लिप्सा को तीखा और कड़ुवा बना देते हैं। ये कटुस्वार्थ जब सामाजिक कटुता का रूप लेते हैं, तो सांप्रदायिक, जातीय, क्षेत्रीय आदि-आदि विषवल्लरियाँ उगती और पनपती हैं।

 🔴  संप्रदाय, जाति, क्षेत्र-जीवन की ये इकाइयाँ हैं, समग्रता नहीं। जैसे आँख, कान, नाक, पाँव ये शरीर की इकाइयाँ हैं, समग्रता नहीं। इकाइयाँ समग्रता की पूरक हैं, विरोधी-विद्रोही नहीं। विषग्रस्त मनुष्य ही धार्मिकता के मूल्य पर हिंदू-मुसलमान, सिख, ईसाई को लड़ाता है। हम धार्मिक हैं, हम मनुष्य हैं-समग्रता के इस ईश्वरीय बोध में सांप्रदायिकता, जातीयता का विष उत्पन्न हो ही नहीं सकता। हम हिंदू-मुसलमान हैं, पर अविरोधी पूरक इकाई के रूप में ही। समग्रता में तो हम मनुष्य हैं, परमेश्वर की संतान, मनुष्य हैं-मननशील मनुष्य।


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 80

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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