रविवार, 4 जून 2017

👉 क्रान्ति-बीज

🔵 युगसंधि की वेला। सभी शिष्य-साधक ब्रह्ममुहूर्त में ध्यानस्थ। ध्यान की गहराइयों में दिव्य नाद ध्वनित हो उठा। गुरुदेव की वाणी शब्दरूप लेने लगी, ‘‘मेरे पुत्रो! मैं भी एक किसान हूँ। मैंने भी कुछ बीज बोए थे। उनमें अंकुर आए और फूल भी लगे। उन फूलों की सुगंध से मेरा सारा जीवन भर गया। उस सुगंध ने मुझे रूपांतरित कर दिया। मुझे नया जीवन दिया।’’

 🔴 ‘‘अदृश्य और अज्ञात ने अपने बंद द्वार मेरे लिए खोल दिए और मैंने उस परम सत्य को देखा, जो आँखों से देखा नहीं जा सकता। शाश्वत् के उस संगीत को सुना, जिसे सुनने में कान समर्थ नहीं होते हैं। मेरी यह दिव्य अनुभूतियाँ अब वैसे ही मुझसे बहने और प्रवाहित होने को उत्सुक हैं, जैसे पहाड़ों के झरने सागर की ओर प्रवाहित होते और भागते हैं।’’

🔵 ‘‘याद रहे बदलियाँ जब पानी से भर जाती हैं, तो उन्हें बरसना पड़ता है। फूल जब सुवास से भर जाते हैं, तो उन्हें हवाओं को अपनी सुगंध लुटा देनी होती है और जब कोई दीया जलता है, तो आलोक उससे बहता ही है।’’

 🔴 ‘‘ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ है। मैंने अपने जीवन के अनमोल रहस्य अपने साहित्य में सँजोए हैं। मेरे ये विचार क्रांति-बीज हैं। वे जिसके पास पहुँचेंगे, जो भी इन्हें सँभालेगा-फैलाएगा, उसके जीवन में देवत्व के, अमृत के और प्रभु प्रेम के फूल अवश्य ही मुस्कराएँगे। उसका जीवन भी उसी सुगंध से भर उठेगा, जिससे मेरा जीवन भरा था। ये मेरे क्रांति-बीज जिस भी खेत में पड़ेंगे, वहाँ की मिट्टी अमृत के फूलों में परिणत हो जाएगी।’’

🔵 ‘‘जो भी मेरे पास था, उसे क्रांति-बीजों के रूप में तुम सबको सौंप चुका। मेरा प्रत्येक विचार क्रांति बीज है और मेरा समूचा साहित्य इन क्रांति-बीजों का अक्षय भंडार है। सार संक्षेप मैंने दैवीचेतना के संदेशवाहक के रूप में क्रांतिधर्मी साहित्य के रूप में विनिर्मित किया है। मैंने इन्हें तुम्हारे जीवन में बोया, अब तुम सबको इन्हें समूचे विश्व के प्रत्येक मानव के जीवन में बोना है, ताकि हर कहीं देवत्व के फूल खिल सकें। मेरे इन क्रांति-बीजों को हर कहीं बोने के साथ ही तुम सब अपने जीवन में भी इनकी देखभाल करना, क्योंकि मैं तो बो चला, देखना तुम कि बीज, बीज न रह जाए।’’

🔴 ध्यान टूटने के बाद भी साधकों को लगा कि गुरुसत्ता का यह संदेश सतत ध्वनित हो रहा है कि उनके क्रांति-बीजों की सफलता देवत्व के फूल बनकर मुस्कराने में ही है। जीवन की मिट्टी को सुगंध से भरने में ही है।


🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 82

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